Sunday, March 3, 2024

आत्महत्या मामले में पुलिस की जांच ग़ैरक़ानूनी नहीं: अर्णब मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कि पीड़ितों के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि अभियुक्तों के अधिकार आत्महत्या प्रकरण में पुलिस द्वारा की जा रही पुनः जाँच को स्थगित करने से इंकार कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में न्यायिक हिरासत में चल रहे रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को बड़ा झटका देते हुए कहा है कि आत्महत्या मामले में पुलिस की जांच को गैरक़ानूनी  नहीं कहा जा सकता। इस बीच, सीजेएम के आदेश पर जेल में ही पुलिस रोज तीन घंटे पूछताछ करेगी।   

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि अन्वय नाइक आत्महत्या मामले में रायगढ़ पुलिस द्वारा शुरू की गई आगे की जांच को अवैध और मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना नहीं कहा जा सकता है। चार्जशीट दाखिल होने के बाद भी पुलिस आगे जाँच कर सकती है।  

गोस्वामी को अंतरिम जमानत देने से इंकार करते हुए जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस एमएस कार्णिक ने कहा कि हमारी राय में, आगे की जांच को अवैध और मजिस्ट्रेट की बिना अनुमति के नहीं कहा जा सकता है। खंडपीठ ने कहा कि कानून आगे की जांच के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं करता है।खंडपीठ ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर, 2020 को होगी जिसमें याचिकाकर्ता की प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करने की प्रार्थना पर विचार किया जाएगा, हम जाँच पर रोक नहीं लगायेंगे।

खंडपीठ ने गोस्वामी के वकीलों वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और अबद पोंडा द्वारा उठाए गए तर्कों को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि उनके खिलाफ पुलिस की कार्रवाई अवैध थी क्योंकि वे मुकदमा नहीं कर सकते थे, मजिस्ट्रेट द्वारा 2019 में मामले में क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद उन्होंने जांच रद्द कर दी। ।कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल करने के बाद भी आगे की जांच करना, पुलिस का एक वैधानिक अधिकार है।

खंडपीठ ने कहा कि तथ्य यह है कि मजिस्ट्रेट ने प्रथम शिकायतकर्ता को नोटिस और अवसर नहीं दिया कि वह रिपोर्ट स्वीकार करने से पहले एक विरोध याचिका दायर कर सके ताकि मामले की जड़ तक जाया जा सके। शिकायतकर्ता द्वारा राज्य सरकार को उसकी शिकायत के निवारण के लिए लगातार अनुनय-विनय किया गया क्योंकि उसके दो परिवार के सदस्यों ने आत्महत्या कर ली थी, और इस पृष्ठभूमि में, संबंधित जांच अधिकारी, मजिस्ट्रेट को सूचित करने के बाद, आगे की जांच शुरू करता है, अवैध या अनियमित नहीं कहा जा सकता।

खंडपीठ ने कहा कि पीड़िता के अधिकार भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने कि आरोपी के अधिकार। हकीकत है मजिस्ट्रेट द्वारा ‘ए’ समरी को बिना शिकायतकर्ता को सूचित किये, बिना उसे प्रतिवाद दाखिल करने का मौका दिए अपना फैसला सुना दिया। इसलिए हम याचिकाकर्ता के इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकते हैं कि आगे जाँच नहीं की जा सकती।

खंडपीठ ने अर्णब गोस्वामी के मामले में प्रशांत कनौजिया में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गये न्याय दृष्टान्त को लागू करने से इंकार कर दिया और कहा कि दोनों मामले में तथ्य अलग-अलग हैं। खंडपीठ ने पिछले साल उच्चतम न्यायालय में प्रशांत कनौजिया की रिहाई के लिए दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में दिए गये तथ्यों  का अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि यह रिपब्लिक टीवी के एंकर अर्णब गोस्वामी के मामले में लागू नहीं होता।

गोस्वामी की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने पिछले साल उच्चतम न्यायालय द्वारा जगिशा अरोरा बनाम भारत संघ में पारित आदेश पर भरोसा किया था जिसमें प्रशांत कनौजिया को रिहा करने का आदेश पारित किया गया था। यूपी के एक पत्रकार प्रशांत कनौजिया को उनके कुछ ट्वीट्स पर गिरफ्तार किया गया था और रिमांड पर लिया गया था, उनकी पत्नी जगिशा अरोड़ा द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में उनकी नजरबंदी को चुनौती दी गयी थी।  

जस्टिस एसएस शिंदे और एमएस कार्णिक की खंडपीठ ने इस तर्क से सहमति व्यक्त नहीं की। खंडपीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने कनौजिया को संविधान के अनुच्छेद 142 की शक्तियों के तहत छोड़ने का आदेश पारित किया था जो उच्च न्यायालय के पास उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए, याचिकाकर्ता को जल्द रिहा करने की प्रार्थना को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, उस मामले के तथ्यों का उल्लेख करते हुए खंडपीठ ने कहा कि कनौजिया को ऑनलाइन कुछ ट्वीट्स के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 500 और 505 सपठित धारा 67 सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000  के तहत गिरफ्तार किया गया था।

खंडपीठ ने कहा कि इसके विपरीत गोस्वामी के खिलाफ मामला धारा 306 आईपीसी के तहत आत्महत्या करने के लिए उकसाने का केस दर्ज़ है जिसमें अधिकतम 10 साल कारावास की सजा का प्रावधान है, धारा 306 आईपीसी संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है जिसका ट्रायल सत्र न्यायालय द्वारा किया जाता है और इसमें समझौता भी अमान्य है। खंडपीठ ने सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन ऑफिस बनाम राहुल मोदी में उच्चतम न्यायालय के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें हाईकोर्ट द्वारा रिट याचिका में पारित जमानत के एक निर्देश को निरस्त कर दिया गया था।

अंतरिम राहत के लिए याचिका और आवेदन इस आधार पर दाखिल किया गया था कि याचिकाकर्ता को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया है। हालांकि, याचिका और आवेदन दाखिल करने की तिथि पर, आवेदक, याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में था जैसा कि याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं स्वीकार किया गया है। सुनवाई के दौरान याची के वकील हरीश साल्वे ने अदालत को बताया कि वह बंदी प्रत्यक्षीकरण की प्रार्थना पर जोर नहीं दे रहे हैं । उनका यह बयान आज पारित आदेश में भी दर्ज है।

इसके विकल्प में साल्वे ने इस तर्क के आधार पर जांच पर रोक लगाने की मांग की कि प्राथमिकी में धारा 306 आईपीसी के तहत अपराध का खुलासा नहीं किया गया था। खंडपीठ ने कहा कि इस समय जब जाँच प्रगति पर है कोर्ट इस दलील पर विचार नहीं कर सकता है।

न्यायालय ने अंतरिम जमानत मांगने वाली अर्जी को खारिज कर दिया है और कहा है कि याचिकाकर्ता के पास दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439 के तहत नियमित जमानत का वैकल्पिक उपचार उपलब्ध है। अर्जी को खारिज करते हुए खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां प्रकृति में प्रथम दृष्ट्या हैं और केवल वर्तमान अंतरिम आवेदन के स्थगन तक ही सीमित हैं। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि निचली अदालत को आदेश में टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना नियमित जमानत आवेदन पर विचार करना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को असाधारण क्षेत्राधिकार के तहत रिहा करने का कोई मामला नहीं बनता है। पीठ ने कहा कि अर्णब गोस्वामी को जमानत के लिए पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट फिर सत्र न्यायालय में आवेदन करना होगा। वहां से जमानत नहीं मिलने पर ही वह उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दायर कर सकते हैं। इस मामले में कोई अलग से व्यवस्था नहीं है।

इस बीच, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, अलीबाग ने सोमवार को स्थानीय सीआईडी यूनिट, रायगढ़ पुलिस को रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी से हर दिन 3 घंटे तक पूछताछ करने के की अनुमति दी है। यूनिट ने 5 नवंबर को मजिस्ट्रेट से तलोजा जेल में गोस्वामी से पूछताछ करने की अनुमति मांगी थी, जहां उन्हें मजिस्ट्रेट द्वारा दो सप्ताह की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद वर्तमान में रखा गया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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