जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मुर्मू का इस्तीफा, एक साल से भी कम रहा कार्यकाल

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नई दिल्ली। कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाए जाने के ठीक एक साल बाद जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर गिरीश चंद्र मुर्मू ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने 31 अक्तूबर, 2019 को अपना कार्यभार संभाला था। इस तरह से वह एक साल से भी कम समय तक सूबे के लेफ्टिनेंट गवर्नर रहे। 

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक सरकार के वरिष्ठ अफसरों से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मुर्मू ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। हालांकि राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है। एलजी बनने से पहले मुर्मू वित्त मंत्रालय में एक्स्पेंडीचर सेक्रेटरी थे और बताया जाता है कि नवंबर 2015 में पीएम द्वारा घोषित किए गए डेवलपमेंट पैकेज को उन्होंने ड्राफ्ट किया था।

हालांकि कुछ सूत्र उनके सीएजी भी बनाये जाने की बात कर रहे हैं। क्योंकि मौजूदा सीएजी राजीव महर्षि का कार्यकाल इसी हफ्ते समाप्त होने जा रहा है। अभी तक यह नहीं तय हो पाया है कि मुर्मू की जगह कौन लेगा। हालांकि इस मामले में महर्षि का भी नाम लिया जा रहा है।

श्रीनगर के सूत्रों ने बताया कि एलजी आफिस ने दोपहर में दिल्ली से गए एक मीडिया प्रतिनिधिमंडल के साथ अपनी बैठक रद्द कर दी थी। इसके अलावा शाम को होने वाली सभी बैठकों को भी उन्होंने रद्द कर दिया था। वह बुधवार की शाम को श्रीनगर से जम्मू के लिए रवाना हुए और बताया जा रहा है कि बृहस्पतिवार को वह दिल्ली आ जाएंगे।

एक सप्ताह पहले चुनाव आयोग ने एलजी मुर्मू द्वारा जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव पर की गयी टिप्पणी पर बेहद अचरज जाहिर किया था। बेहद कड़े शब्दों में चुनाव आयोग ने कहा था कि चुनाव कराने या फिर उसके समय से जुड़े सभी फैसले केवल और केवल चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक साक्षात्कार में मुर्मू ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन को अनिश्चितकाल के लिए नहीं बनाए रखा जा सकता है और चुनाव बहुत दूर नहीं हैं।

श्रीनगर के सूत्रों का भी कहना है कि चीफ सेक्रेटरी बीवीआर सु्ब्रमण्यम और एलजी के बीच कुछ मतभेद पैदा हो गए थे और नतीजे के तौर पर कुछ प्रशासनिक परेशानियां भी खड़ी हो गयी थीं। एलजी ने बैठकें और फाइल अपने दफ्तर में बुलानी शुरू कर दी थी इसके साथ ही जरूरी कार्यवाही के लिए चीफ सेक्रेटरी को नोट भेजने लगे थे।

एलजी के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि वह नौकरशाहों में लोगों के प्रति जवाबदेहियों के कम होने से बेहद चिंतित थे और इस नजरिये लोगों को काम करने के लिए वह नौकरशाहों पर दबाव डालते थे। उनका कहना है कि वह नौकरशाहों पर जनता से ज्यादा से ज्यादा एकताबद्ध होने का दबाव बना रहे थे। उनकी चाहत थी कि विकास के कार्यक्रमों में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करायी जाए।

मूर्मू ने अपने पहले 7 महीने केंद्र के निर्देश पर जम्मू-कश्मीर पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने में लगाया। वह जम्मू से काम करते थे। और एलजी तथा चीफ सेक्रेटरी के बीच मतभेद पैदा हो गए थे। फिर कोविड-19 के विस्फोट के दौरान वह श्रीनगर घाटी में गए।

हालांकि नौकरशाहों के एक हिस्से में जनता तक न पहुंचने के लिए उनकी खुद की आलोचना हो रही थी। उसके बाद मुर्मू ने जिलों का दौरा करना शुरू किया। पहले वह उत्तरी कश्मीर गए और उसके बाद उन्होंने दक्षिण कश्मीर का दौरा किया।

इसके साथ ही सूबे में 4G इंटरनेट सुविधा शुरू करने के सिलसिले में भी उन्होंने सकारात्मक आश्वासन दिया था। 

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