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न्यायिक हिरासत साईबाबा के लिए रोजाना का टॉर्चर है: अरुंधति रॉय

प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा है कि किसी आरोपित को जब पुलिस हिरासत में रखा जाता है तो पुलिस कस्टडी में इंटरोगेशन के नाम पर ज़्यादा टॉर्चर होता है। हमारे देश में क़ानून सबके लिए एक बराबर नहीं है। आपका जेंडर क्या है, आपकी जाति क्या है, आपका धर्म क्या है, आप कहां रहते हैं, आपके पास कितना पैसा है आदि के हिसाब से स्लाइडिंग स्केल है उसके हिसाब से टॉर्चर भी होगा, सजा भी होगी, जेल में जो कुछ भी होगा, लेकिन सामान्यतः शारीरिक मानसिक रूप से सक्षम लोगों को पुलिस कस्टडी में टॉर्चर किया जाता है लेकिन न्यायिक हिरासत में टॉर्चर नहीं होता है।

लेकिन साईबाबा जो कमर के नीचे पूरा पैरलाइज्ड हैं। जो अपने लिए कुछ भी नहीं कर सकते। उनके लिए न्यायिक हिरासत में हर रोज टॉर्चर होता है। उनका शरीर हर रोज थोड़ा-थोड़ा करके मर रहा है। ये वीभत्स है। अरुंधति रॉय ने ये बातें प्रोफेसर जीएन साईबाबा की रिहाई के मुद्दे पर दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित एक प्रेस कान्फ्रेंस में कहीं। इसको वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, सीपीआई महासचिव डी राजा, डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता संजय काक समेत कई वक्ताओं ने संबोधित किया।

उन्होंने आगे कहा कि हम लोग जंगल भी गये थे। वहां आदिवासी लोगों के साथ हमने काफी वक़्त बिताया। ऑपरेशन ग्रीन हंट हम लोग शायद भूल गये हैं वो क्या था जंगल में लाखों पैरामिलिट्री फोर्स के जवान गांव-गांव जा रहे थे वो घर जला रहे थे, बलात्कार कर रहे थे। सलवा जुडूम जो आदिवासियों का एक मिलिट्री ग्रुप है उसको खड़ा किया था। जो जंगल में शोषण हो रहा था सब टीवी में कह रहे थे कि वहां वायलेंट प्रोटेस्ट होना चाहिए। लेकिन जो वायलेंस उनके ऊपर हो रहा था। जो गांव के गांव जला रहे थे।

लाखों आदिवासी रातों को जंगल में रहते थे, घर नहीं आते थे। क्योंकि उनकी पूरा ज़मीन कार्पोरेट माइनिंग के लिये दे दी गयी थी। जो लड़ाई आज किसान लड़ रहे हैं वो लड़ाई साल 2002 में आदिवासी लोग लड़ रहे थे। साईबाबा लड़ रहे थे, सुधा भाद्वाज लड़ रही थीं। सोमा सेन, गौतम नवलखा लड़ रहे थे। वो सब आज जेल में हैं। इसीलिए क्योंकि जो आज नर्मदा का पानी बह रहा था ऊपर तक भरकर उसमें आदिवासियों के घर बह गये । अब वो पानी किसानों के घर तक पहुँच गया है। हमारे शहर तक पहुँच गया है। जो लोग पहले लड़ रहे थे वो अब जेल में हैं, अब नये लोग आ गये हैं।

आज ये बहुत बड़ी बात है कि मेनस्ट्रीम मीडिया यहां नहीं है। वहां कोई रिपोर्ट नहीं है। इसका मतलब है कि उन्होंने एक अल्टरनेट रियलिटी खड़ा कर दिया है। जिसमें 90 प्रतिशत लोगों की ख़बर नहीं है। अगर हम ये प्रेस कान्फ्रेंस पांच साल पहले भी कर रहे होते तब चाहे कैसी भी रिपोर्ट करते पर मेन स्ट्रीम मीडिया आ जाती। पर अब तो वो बहाने भी नहीं बनाते। ”

सिर्फ़ चुनाव से लोकतंत्र नहीं होता है। ये तो खरीदा जाता है। जो सांसद विधायक एक पार्टी से दूसरे पार्टी में उछल रहे हैं। उनकी खुलेआम नीलामी क्यों नहीं होती है। अगर खुलेआम फासीवादी सरकार होती तो हर संस्था, पुलिस स्टेशन, न्यायिक तंत्र को कब्जा करने की ज़रूरत नहीं होती। ये बहुत ख़तरनाक है। हर चीज भगवा नदी में बह गयी। आज हम किससे मांग करें कि साई बाबा को छोड़ दिया जाये। जो बात हम सालों से कहते आये हैं वो आज आम बात हो गयी है। किसान आंदोलन से बात घर-घर तक पहुंची है कि अब खेत खलिहान कार्पोरेट के हवाले किया जा रहा है।

जी एन साईबाबा की पत्नी वसंता कुमारी ने बताया कि जीएन साईबाबा से बात हुई थी तो उन्होंने बताया था कि उन्हें कोविड के लक्षण हैं। उन्हें, स्वाद, गंध, भूख आदि नहीं महसूस हो रहा था। तब हमने चिट्ठी लिखकर जेल प्रशासन से उनकी कोविड जांच कराने का आग्रह किया था। इसके बाद 12 फरवरी को उन्हें कोविड जांच के लिये ले जाया गया था। रिजल्ट आने के बाद हमें बताया गया। उनके बैरक में 25 लोग हैं उनमें से 10 लोग कोविड पोजिटिव हैं पर उनमें से किसी को भी अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया। साईबाबा के केस में खतरा ज़्यादा था। उनका पूरा शरीर पोलियो प्रभावित है। ऐसे लोगों का हृदय प्रभावित होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है।

कोविड उनकी किसी भी शारीरिक अंग में अटैक करके नुकसान पहुंचा सकता है। हमारे परिवार ने 2020 में देखा था कि नजदीकी लोगों की मौत हुई थी। कोविड से उबरने के बाद भी कई लोग पोस्ट कोविड प्रभाव के चलते मर गये। इससे मुझे घबराहट हुई कि साईबाबा को अस्पताल में होना चाहिए। मैंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, जेल अधीक्षक को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि वो सामान्य रोगी से अलग हैं। वो 90 प्रतिशत विकलांग हैं। उन्हें कम से कम दो हेल्पर चाहिए। वो पलंग पर लेट जायें तो खुद से उठ नहीं पाते। पीछे बैठ नहीं पाते। व्हीलचेयर से उन्हें ट्वॉयलेट पर बैठाने के लिए लोग चाहिए। बावजूद इसके उन्हें अंडासेल जैसे छोटी सी जगह में रखा गया है। उनसे सरकार को क्या ख़तरा है मुझे नहीं पता।

वहीं शिक्षक नेता नंदिता नारायण ने कहा कि गुजरात जनसंहार के कसूरवार बाबू बजरंगी, माया कोडनानी, मालेगांव बम ब्लास्ट आरोपी प्रज्ञा ठाकुर से न्यायपालिका को ख़तरा नहीं महसूस होता। न्यायपालिका को 90 प्रतिशत विकलांग व्हीलचेयर पर बैठे प्रोफेसर जीएन साईबाबा से ख़तरा महसूस होता है। अजीब है ये तर्क।

बता दें कि 7 मई, 2017 को दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा, जेएनयू के छात्र हेम मिश्रा, पत्रकार प्रशांत राही समेत पांच लोगों को गढ़चिरौली कोर्ट ने आजीवन कारावास की सज़ा सुनायी थी। गढ़चिरौली कोर्ट ने इन सभी को माओवादियों से संपर्क रखने और भारत के खिलाफ षड्यंत्र रचने का दोषी क़रार दिया था। आजीवन कारावास की सज़ा पाने वालों में दो अन्य लोग महेश तिर्की और पांडु नरोटे भी थे। इसके अलावा कोर्ट ने छठे आरोपी विजय तिर्की को 10 साल की सज़ा सुनाई थी। उन्हें आतंकवादी समूह या संगठन का सदस्य होने तथा किसी आतंकवादी संगठन को समर्थन देने के अपराध से संबंधित गैर कानूनी गतिविधियां (निवारक) कानून की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था।

जबकि 13 फरवरी, 2021 को नागपुर सेंट्रल जेल अधीक्षक अनूप कुमरे ने बताया थ कि जीएन साईबाबा कोविड-19 से पीड़ित पाए गए हैं। उन्हें सीटी स्कैन एवं अन्य जांच के लिए ले जाया जाएगा जिसके बाद चिकित्सक तय करेंगे कि उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में आगे की चिकित्सा के लिए भेजा जाए अथवा नहीं।

वहीं जी एन साईबाबा की पत्नी वसंता कुमारी ने दावा किया था कि नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में ऐसे मरीजों के उपचार के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उक्त अस्पताल में व्हीलचेयर तक मयस्सर नहीं है। आवश्यक सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं। साईबाबा हृदय और किडनी रोग समेत कई अन्य रोगों से ग्रस्त हैं जिससे जटिलताएं बढ़ सकती हैं।

(शेखर आजाद के साथ सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on March 11, 2021 8:31 am

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