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कश्मीरी पंडितों, डोगरा और सिखों के समूह ने अनुच्छेद 370 खात्मे पर जताया एतराज, कहा-एकपक्षीय, गैरलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है फैसला

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कश्मीर की एक तस्वीर। न्यूयार्क टाइम्स।

नई दिल्ली। कश्मीरी पंडितों, डोगरा और सिख समुदाय से जुड़े नागरिकों के एक समूह ने शनिवार को जारी अपने एक लिखित बयान में जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की निंदा की है। “दि क्विंट” की रिपोर्ट के मुताबिक बयान के सभी 64 हस्ताक्षरकर्ताओं ने इसे एकपक्षीय, गैरलोकतांत्रिक और पूरी तरह से असंवैधानिक करार दिया है।

कुछ प्रमुख नामों में कार्डियोलाजिस्ट उपेंद्र कौल, रिटायर्ड एयर वाइस मार्शल कपिल काक और पत्रकार प्रदीप मैगजीन, शारदा उगरा और अनुराधा भसीन शामिल हैं। इसके अलावा छात्र, एकैडमीशियन, थियेटर प्रोफेशनल ने भी इस पर हस्ताक्षर किए हैं।

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समूह ने अपने बयान में केंद्र के फैसले को जबरन थोपा गया फैसला बताया है इसके साथ ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर की बंदी को तत्काल वापस लेने की मांग की है। 5 अगस्त को फैसले से पहले ही राज्य में अभूतपूर्व स्तर पर सुरक्षा बलों की तैनाती कर दी गयी थी। इसके साथ ही संचार के सभी साधनों को ठप कर दिया गया था। शुक्रवार को कुछ छूट दी गयी थी लेकिन उस दिन प्रदर्शन होने के चलते कर्फ्यू को फिर से लागू कर दिया गया। बकरीद के त्योहार के मौके पर कल जब प्रशासन ने कुछ छूट दी तो एक बार फिर प्रदर्शन शुरू हो गया। रायटर्स के हवाले से न्यूयार्क टाइम्स में आयी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भागीदारी करने वालों में ज्यादातर महिलाएं शामिल थीं।

समूह का कहना था कि फैसला भारत सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से किए गए वादे के बिल्कुल विपरीत है। गौरतलब है कि 1947 में राजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षर किए गए भारत के विलय पत्र में ही यह शर्त शामिल थी। जिसे बाद में संविधान सभा में औपचारिक रूप से 370 के तहत स्थान दे दिया गया।

अपने बयान में इस समूह ने कहा है कि “हम इस मौके पर भारत के नागरिकों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर ने भारत के साथ मिलने का फैसला भारतीय डोमिनियन के सेकुलर और लोकतांत्रिक चरित्र के चलते किया था।” “भारत में संविधान सभा की 1949 में कार्यवाही के दौरान जम्मू-कश्मीर अकेला रजवाड़ा था जिसने अपने शामिल होने की शर्तों पर बातचीत की थी और जिसके नतीजे के तौर पर बगैर किसी विरोध के अनुच्छेद 370 सामने आया था।”

बयान में कहा गया है कि “इस मामले में बेहद छुपे तरीके से जिस तरह से भारत सरकार आगे बढ़ी है और उसने जम्मू-कश्मीर की विधान सभा की राय और उसकी सहमति को बिल्कुल दरकिनार कर दिया वह पूरी तरह से तानाशाहीपूर्ण और गैलोकतांत्रिक है जो लोकतंत्र की सभी मान्यताओं को खारिज करता है। हम एक बार फिर इस तथ्य को दोहराते हैं कि हम जम्मू-कश्मीर के लोगों से कोई संपर्क नहीं किया गया और कोई भी फैसला जो हमारी बगैर सहमति के लिया जाएगा उसे कतई वैध करार नहीं दिया जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में लगाए गए संचार पर पाबंदी को तत्काल हटाया जाए। इसके साथ ही उन्होंने हिरासत में लिए गए सभी राजनीतिक प्रतिनिधियों को तत्काल रिहा करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि वे अपनी मातृभूमि के विभाजन से बेहद दुखी हैं और वे इस बात की शपथ लेते हैं कि इस संकट के समय में बिल्कुल एकजुट रहेंगे। उन्होंने कहा कि जातीय, सांस्कृतिक या फिर सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने की किसी भी कोशिश का वे पुरजोर विरोध करेंगे।

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