Friday, April 19, 2024

न्याय प्रणाली का मखौल उड़ाते वकील

न्याय की बात जहां आती है वहां कुछ बड़ी सैद्धांतिक बातें सामने आने लगती हैं। मसलन न्याय में विलंब अन्याय है, वादकारी का हित सर्वोच्च है वगैरह। पर जब व्यवहार में हम देखते हैं तो ठीक इसके विपरीत नज़र आता है। प्रक्रियात्मक खामियों के अलावा सिस्टम में व्याप्त कदाचार, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के साथ विशेषकर बड़े वकीलों की कुटिलता से किसी मामले को अनंत काल तक लटकाये रखने एवं न्याय में विलंब होने और ‘तारीख पर तारीख’ की त्रासदी सामने आती है।

सनी देओल का फिल्मी डायलॉग तारीख पर तारीख अब रोज़मर्रा की भाषा का हिस्सा बन गया है और न्यायपालिका पर हमला करने के लिए तो यह सत्ता पक्ष का जुमला बन गया है। वादकारियों को प्रक्रियात्मक अनिमितताओं के कारण न तो समय से न्याय मिल पा रहा है न ही उनकी पीड़ा का कोई तारणहार है। वे न्याय प्रणाली के अंतिम पायदान पर असहाय पड़े रहने के लिए अभिशप्त हैं। यही कारण है कि समाज में मौके पर ही न्याय की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और आये दिन देश के किसी न किसी हिस्से में घटित हो रही है।

न्याय प्रणाली की कानूनी जटिलताओं के कारण सम्भवतः वकीलों का समावेश न्याय प्रणाली में हुआ होगा ताकि वादकारियों को सम्यक न्याय मिल सके।

वैसे तो सुप्रीम कोर्ट हो या हाईकोर्ट प्रति व्यक्ति न्यायाधीशों की संख्या अत्यंत सीमित होने के कारण मुकदमों के निस्तारण में विलंब होता है पर निचली अदालत में वादकारियों को न्याय मिलने में अत्यंत पीड़ादायक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और वे प्रणालीगत उत्पीड़न के शिकार बनकर रह जाते हैं।

उनका इतना अधिक सामाजिक, आर्थिक और मानसिक शोषण होता है कि आम तौर पर लोग पुलिस, अदालत जाने के नाम से ही घबराने लगते हैं, साथ ही कुछ लोगों में कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है।

सत्र न्यायालय में या निचली अदालतों में यह अनुभव बड़ा ही कडवा और पीड़ादायक होता है। सर्दी की हाड़ कंपा देने वाली सुबह। अदालत में काम-काज शुरू होने का समय होता है, सुबह करीब साढ़े दस बजे। मुक़दमा लड़ने वाले दोनों पक्षों के प्रतिनिधि करीब सौ या तीन सौ कि मी की दूरी से भी ठिठुरते-कांपते, अपना टिफ़िन पैक कर के अदालत तक पहुंचते हैं।

अदालत कक्ष के बाहर की ठंडी ज़मीन, और थोड़े खुशनसीब हुए तो किसी बेंच पर बैठ जाते हैं। बेंच भी स्टील की होती है जो बाहर की ठण्ड को अपने भीतर सोख लेती है। जब न्याय की गुहार लगाते लोग घंटे, दो घंटे इन्तजार कर चुके होते हैं तब उन्हें पता चलता है कि आज तो ‘स्ट्राइक’ है। आम तौर पर लोगों को समझ नहीं आता कि यह ‘स्ट्राइक’ या हड़ताल है किस लिए। बताया जाता है कि यह स्ट्राइक वकीलों की तरफ से है।

निचले स्तर पर न्यायिक कार्य को जैसे वकीलों ने हाईजैक किया हुआ है। कभी-कभी किसी केस को जबरदस्ती लंबा खींचने के लिए भी वकील ऐसा करते हैं। अधिवक्ता संघ के ताकतवर वकील यह फैसला करते हैं। कभी अपने व्यक्तिगत कारणों से भी वे हड़ताल की घोषणा कर देते हैं। सज़ा के करीब आ चुके अभियुक्त को बचाने के लिये कुछ और तिकड़म करने का समय मिल जाये, इसलिए भी ऐसा किया जाता है।

ऐसी हड़ताल को एक सामान्य, साधारण घटना माना जाता है। दूर-दराज से आये लोग चुपचाप अपने घरों को वापस लौट जाते हैं। कल या अगली तारीख़ पर जब वे आएंगे तो फिर से हड़ताल होगी या नहीं, उन्हें खबर नहीं होती। भय बना रहता है कि फिर से यही कहानी दोहराई जा सकती है।

वकीलों ने हाईजैक कर ली है निचली अदालतों की व्यवस्था

देश में कम से कम निचली अदालतों में न्यायिक कार्य प्रणाली वरिष्ठ वकीलों द्वारा हाईजैक कर ली गई है। ऐडवरसेरियल प्रणाली में वकीलों का महत्व अधिक होता है और न्यायाधीश एक तरह से पिछली बेंच पर बैठे हुए रहते हैं। वे पक्ष और विपक्ष के वकीलों की बहस सुनते हैं, अपनी आवश्यकता के अनुसार और न्यायसम्मत तर्कों को नोट करते हैं, और आखिर में अपना फैसला सुनाते हैं।

दो पंक्तियों में लिखी गई यह बात वास्तव में काफी जटिल होती है और बरसों तक का समय ले सकती है। इस अनावश्यक विलम्ब का एक बड़ा कारण है वकीलों द्वारा की गई हड़ताल, जो न्याय की प्रक्रिया को बहुत धीमा बना देती है। बाकी अन्य कारण तो होते ही हैं।

न्यायपालिका लोकतंत्र का तीसरा सबसे अहम् स्तम्भ है। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों के बावजूद आये दिन निचली अदालतों में वकीलों की हड़तालें जारी हैं। वकील हडताल पर जाकर स्वयं उसी सर्वोच्च न्यायालय के खिलाफ जाते रहते हैं जो न्याय का सर्वोच्च प्रतीक है। संविधान का अनुच्छेद 21 यह वादा करता है कि आम आदमी को जल्दी से जल्दी न्याय मिलेगा और इन आकस्मिक हड़तालों से संविधान का भी उल्लंघन होता है।    

वकीलों की हड़ताल अवैध है

संवैधानिक नियमों के अनुसार हड़ताल करने का अधिकार मौलिक अधिकार है– संविधान के भाग III द्वारा संघ गठित करने की स्वतंत्रता का अधिकार 19 (सी), जिसके तहत सामान्य हित को कायम रखने वाले लोगों का एक समूह एकजुट हो सकता है और अपने अधिकारों की मांग कर सकता है।

हालांकि, अनुच्छेद 19 के तहत संघ निर्मित करने की स्वतंत्रता एक पूर्ण अधिकार नहीं है, इस पर कुछ उचित प्रतिबंध लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने अपने विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट कर दिया था कि वकीलों की हड़ताल अवैध है और इसकी बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।

पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया ऐतिहासिक फैसला कुछ इस तरह है-

“न्यायालय ने माना कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या बहिष्कार का आह्वान करने का कोई अधिकार नहीं है। सांकेतिक हड़ताल पर भी जाने का भी अधिकार नहीं। विरोध यदि आवश्यक है, तो केवल प्रेस वक्तव्य, टीवी साक्षात्कार, अदालत परिसर के बाहर बैनर और/या तख्तियां लेकर, काली या सफेद या किसी भी रंग की पट्टी पहनकर, अदालत परिसर के बाहर और दूर शांतिपूर्ण विरोध मार्च आदि करके ही किया जा सकता है।”

हुसैन बनाम भारत संघ के एक अन्य ऐतिहासिक मामले में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वकीलों की हड़ताल और अदालत का निलंबन गैरकानूनी है और अब समय आ गया है कि कानूनी बिरादरी समाज के प्रति अपने कर्तव्य का एहसास करे जो सबसे महत्वपूर्ण है।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भूमिका

अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 4 में बार काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना के बारे में उल्लेख किया गया है और आगे की धारा 7 बताती है, जिसमें खंड (बी) बीसीआई को अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण और शिष्टाचार के मानक निर्धारित करने की शक्ति देता है। अदालतों के फैसलों के मुताबिक, बीसीआई को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वकील हड़ताल और विरोध प्रदर्शन में शामिल न हों।

हालांकि, ऐसे उदाहरण हैं जहां बीसीआई ने स्वयं वकीलों को हड़ताल के लिए बुलाया था। पूर्व कैप्टन के मामले में सुनाया फैसला हरीश उप्पल बनाम भारत संघ और अन्य, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि “वकीलों को हड़ताल करने का कोई अधिकार नहीं है”। केवल दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में जहां बार और/या बेंच की गरिमा, अखंडता और स्वतंत्रता मुद्दे पर हैं, अदालतें एक दिन से अधिक के लिए काम से विरत रहने के विरोध को नजरअंदाज कर सकती हैं।

न्याय की पनाह में आये लोगों को जल्दी न्याय मिले

न्यायपालिका का मौलिक कर्तव्य उन लोगों की सेवा करना है जो अपने लिए न्याय मांग रहे हैं और ऐसा करने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इसकी प्रत्येक शाखा को एक-दूसरे के साथ सहयोग करना चाहिए। सिस्टम की कोई भी कमी संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगी।

इसलिए वकीलों के हड़ताल के आह्वान से न्यायपालिका के कामकाज पर प्रतिकूल असर पड़ता है. बार-बार होने वाले विरोध और हड़ताल से न्याय प्रशासन में बाधा आती है जिससे मामलों की सुनवाई में देरी होती है और अंततः मामले लंबित हो जाते हैं।

वकीलों की शिकायतों का समाधान?

वकीलों की हड़तालों पर लगाया गया प्रतिबंध उचित है क्योंकि हड़तालों के परिणाम न्यायपालिका की जड़ों को कमजोर कर रहे हैं। पर अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा करना भी महत्वपूर्ण है, ताकि कानूनी प्रणाली की कार्यप्रणाली संतुलित रहे।

अधिवक्ता अधिनियम 1961 की धारा 7 खंड (डी) अधिवक्ताओं के अधिकारों, विशेषाधिकारों और हितों की रक्षा के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यों की व्याख्या करती है| इसलिए नियमों का पालन करते हुए वकीलों की शिकायतों को सुना जाना चाहिए और आगे कदम उठाए जाने चाहिए उनके मुद्दों से निपटें जिनका वे सामना कर रहे हैं।

भारत के विधि आयोग की 266वीं रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि प्रत्येक जिला मुख्यालय पर जिला न्यायाधीश एक न्यायिक अधिकारी की अध्यक्षता में एक अधिवक्ता शिकायत निवारण समिति का गठन कर सकते हैं जो बड़ी संख्या में रोजमर्रा के मामलों से निपटेगी।

आम आदमी की स्थिति और न्याय मिलने में होने वाले विलम्ब को देखते हुए वकीलों की हड़तालें संविधान की धारा 19 के दायरे से बाहर हैं। कुछ ऐसे पेशे हैं जिनका उद्देश्य बड़े पैमाने पर समाज की सेवा करना है और कानूनी पेशा उनमें से एक है जिसे बिना किसी देरी के लोगों को न्याय प्रदान करने की दिशा में काम करने की आवश्यकता है।

वकीलों को अपनी शिकायतों के समाधान की मांग करने का अधिकार है, लेकिन अपने मुवक्किल के अधिकार की कीमत पर नहीं, जिन्हें ऐसी हड़तालों के कारण परेशानी उठानी पड़ती है, जिससे लोगों को न्याय देने की प्रक्रिया में देरी होती है।

सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने कहा कि एक मंच प्रदान करने के लिए जिला न्यायालय स्तर पर एक अलग शिकायत निवारण समिति का गठन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 20 अप्रैल, 2023 को स्पष्ट किया कि ‘वकील हड़ताल पर नहीं जा सकते, न ही न्यायिक कार्यों से विरत रह सकते हैं’।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम आर शाह और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने कहा कि जिला अदालत स्तर पर भी एक अलग शिकायत निवारण समितियों का गठन किया जाना चाहिए। वकील यहां भी वास्तविक शिकायतों के मामलों को दर्ज कर सकते हैं।

पीठ ने कहा है कि बार का कोई भी सदस्य हड़ताल पर नहीं जा सकता है। अदालत का कहना है कि वकीलों के हड़ताल के कारण न्यायिक कार्य बाधित होता है। पर ज़मीनी हकीकत क्या है, यह उनसे पूछा जाना चाहिए जो न्याय के लिए बरसों तक भटकते रहते हैं।

(चैतन्य नागर स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं।)

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