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Saturday, September 25, 2021

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मुजफ्फरनगर किसान महापंचायत में मुस्लिमों की कम भागीदारी पर उठे सवाल

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मुज़फ़्फ़रनगर की किसान महापंचायत हर मायने में कामयाब रही और इससे निकला संदेश अब राष्ट्रीय फलक पर बहस का सबब बन गया है। लेकिन इस महापंचायत में मुसलमानों की कम तादाद में शिरकत अलग ही कहानी बता रही है। जिस पर विमर्श ज़रूरी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट राजनीति के केंद्र में रहा है और मुसलमानों को साथ लेकर चलने की महेन्द्र सिंह टिकैत की रणनीति काफ़ी हद तक कामयाब रही। लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के ज़रिए भाजपा ने इस समीकरण को बदल दिया। 

2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे में जाटों की बालियान खाप पर बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने के आरोप लगते रहे हैं। राकेश टिकैत का परिवार बालियान खाप से ही है। राकेश टिकैत मार्का राजनीति के अतीत को देखते हुए लगता यह है कि इतनी सफल पंचायत के बावजूद राकेश टिकैत मुसलमानों के संशय के घेरे में है। किसानों के मुद्दे पर आयोजित यह महापंचायत अंततः चुनाव में राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने की भी एक बड़े कदम के रूप में देखी जा रही है, इसलिए इसका विश्लेषण ज़रूरी है कि यूपी में किसान राजनीति क्या हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल करेगी? हालाँकि जब मुद्दे बड़े हों और लक्ष्य भी बड़ा हो तब ऐसे में ऐसे सवाल बहुत मायने नहीं रखते लेकिन राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए ऐसे सवालों का किया जाना और उसका जवाब तलाशना ज़रूरी है।

मुज़फ़्फ़रनगर महापंचायत का गवाह बनने के लिए जब हमने अपनी यात्रा दिल्ली से 5 सितम्बर (रविवार) को शुरू की तो रास्ते में बहुत बड़ी तादाद में मुस्लिम नामों वाले होर्डिंग किसान एकता जिन्दाबाद का नारा बुलंद करते हुए दिखे। मुज़फ़्फ़रनगर आते-आते यह तादाद बढ़ती गई। मुजफ्फरनगर से ठीक पहले सुजड़ू गाँव की सड़क पर जब हम लोग पहुँचे तो कुछ मुस्लिम युवक भागते हुए हमारी गाड़ी की तरफ़ आए। उनके हाथों में हलवे की प्लेट थी। उनका सवाल था कि क्या हम लोग महापंचायत में जा रहे हैं, जवाब हाँ में मिलने पर उन्होंने कहा कि तो मुँह मीठा करते जाओ। इतनी देर में ट्रैक्टर ट्रालियों, बसों और अन्य वाहनों का रेला किसान एकता जिन्दाबाद का नारा लगाते हुए आया, कुछ और मुस्लिम युवक उनकी तरफ़ हलवे की प्लेट लेकर दौड़े। उन वाहनों पर बैठे लोग हलवे की प्लेट ख़ुश होकर पकड़ते और खाते हुए आगे बढ़ जाते। लेकिन इन दृश्यों से आप मुस्लिम अंडरकरेंट का अंदाज़ा नहीं लगा सकते। बातचीत से ही मालूम पड़ता है कि दरअसल दिलों का हाल क्या है।

शादाब नामक युवक से जब हमने अपने नाम का परिचय देते हुए हलवा खिलाने का सबब पूछा तो उनका कहना था कि पहले की सारी बातें हम भूल चुके हैं। अब हम लोग संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले एक हो गए हैं। हमारा लक्ष्य अब एक है। शादाब ने कहा कि क्या आपको नहीं लगता कि महंगाई जिस तरह बढ़ रही है, उससे किसान प्रभावित नहीं हैं? लेकिन शादाब के साथ खड़े युवक आसिफ़ ने शादाब की बात का प्रतिवाद करते हुए कहा कि यह तो किसानों का स्वागत है। हमारा पुराना भाईचारा है। बाक़ी जब चुनाव आएगा तब देखेंगे। अभी पंजाब, हरियाणा के किसान भाई आ रहे हैं, जिन्होंने मोदी-योगी की बदमाशियों को चुनौती दी है, इसलिए हम उनका स्वागत कर रहे हैं। सरकार के ख़िलाफ़ तो दरअसल लड़ाई पंजाब और हरियाणा के किसानों ने शुरू की है। जब हमने पूछा कि यहाँ से लोग महापंचायत में नहीं गए, आसिफ ने कहा कि किसी पर कोई रोक-टोक नहीं ना कोई दबाव। हमारे गांव से थोड़े से लोग गए हैं।

हमारा कारवाँ आगे बढ़ गया लेकिन आसिफ की बातें जेहन में आती रहीं। गाड़ी एक जगह खड़ी कर हम लोग धीरे धीरे पैदल ही मुज़फ़्फ़रनगर के जीआईसी मैदान की तरफ़ बढ़ने लगे। माथे पर नमाज़ पढ़ने का निशान साबित अली का अलग ही व्यक्तित्व बता रहा था। हमारे सवाल पर जैसे उन्होंने आसिफ की बातों का ही विस्तार कर दिया हो। साबित अली ने कहा कि यह रैली बदलाव का संकेत है। हम सब मुस्लिम-हिन्दू एक साथ हैं। हमारे लिए अखिलेश, मायावती, योगी, मोदी, राहुल सब एक जैसे हैं। इन्होंने हमें बांटने में कसर नहीं रखी लेकिन किसान आंदोलन हमें अब एक मंच पर ले आया है। यह बहुत मज़बूत एकता है। इसे अब कोई तोड़ नहीं सकता। बाक़ी राकेश टिकैत की गतिविधियों को हम लोग गौर से देख रहे हैं। कई बातें हैं, जो वक्त आने पर साफ़ होंगी।

यह अजब इत्तेफाक था कि लोग बात कर रहे थे और एक दूसरे की बात को आगे बढ़ा रहे थे, जबकि वे लोग एक दूसरे को जानते तक नहीं थे। लेकिन मुस्लिम अंडरकरेंट उनकी बातों को एक धागे में पिरो रहा था। 

गुरैनी गाँव के फ़ैसल ने साबित अली की बातों को विस्तार दिया। उनसे हमारी मुलाक़ात मुजफ्फरनगर के महावीर चौक पर हुई। फ़ैसल ने कहा कि अगर चुनाव आते आते राकेश टिकैत ने अपने खाप की वजह से भाजपा के जाट उम्मीदवार को वोट दे दिया तो हम क्या करेंगे?  पहले भी ऐसा हुआ है। हम लोग छले जा चुके हैं। इस बात की गारंटी और भरोसा देने में टिकैत परिवार अभी नाकाम है कि अब वो भाजपा के जाट प्रत्याशी को अंतिम समय में वोट के लिए नहीं कहेगा। आप पत्रकार लोग टिकैत परिवार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर नज़र रखो, जवाब वहीं से आएगा। बाक़ी हमें जो करना होगा, उसके लिए किसी लंबी चौड़ी रणनीति की ज़रूरत नहीं है। हमारा हर क़दम खुली किताब है। 

मेरा मानना है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने अपने मंच को किसानों का मंच बनाने की बेहतरीन कोशिश की लेकिन मंच टिकैत परिवार के कब्जे में ही था। भाषण में जिस तरह विभिन्न खापों का नाम लेकर उनके अग्रणी नेताओं को एक-एक मिनट का समय देकर बोलने के लिए कहा जा रहा था, वो काबिलेगौर है। इस दौरान किसी बड़े मुस्लिम नेता का एक मिनट के लिए ही मंच से न बुलवाना भी सोचने को मजबूर करता है। हालांकि यह महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह कोई धार्मिक महापंचायत नहीं थी लेकिन यह जाटों के तमाम खापों की भी तो महापंचायत नहीं थी। 

आने वाले वक्त में संयुक्त किसान मोर्चा को यूपी में अपनी गतिविधियों को विस्तार देते समय इस बात पर जरूर ध्यान देना चाहिए। किसान महापंचायत किसी खाप विशेष, किसी जाति विशेष का जमावड़ा नहीं बनना चाहिए। अगर आंदोलन के बाक़ी नेता किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल, दर्शनपाल, गुरनाम सिंह चढ़ूनी और योगेन्द्र यादव द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर अमल करेंगे तो यह आंदोलन मज़बूत होता जाएगा। मंच पर ही मीडिया को दो घंटे तक राकेश टिकैत का इंटरव्यू देना इस आंदोलन को मज़बूत नहीं करेगा। अभी मीडिया जिस दौर में है, वो निश्चित रूप से किसान आंदोलन को मज़बूती नहीं देने वाला। राकेश टिकैत को इतनी मामूली सी बात क्यों नहीं समझ आ रही। 

बहरहाल, मुजफ्फरनगर में अलग-अलग खापों के नाम से जगह-जगह लंगर, केले के ढेर और हुक्के की गुड़गुड़ाहट बता रही थी कि किसान आंदोलन में प्रायोजित के नाम पर कुछ नहीं है। यह लोगों के अंदर से पैदा हुई चेतना का नतीजा है। लेकिन जल्द होने वाले यूपी चुनाव में यह किस रूप में सामने आएगा उसका जवाब अभी बाक़ी है। खापों में बंटे जाट और मुसलमान एक ही शेर पर सवारी करेंगे या फिर अलग-अलग शेर उन्हें कई घाटों का पानी पिलाकर उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे।

(मुजफ्फरनगर महापंचायत से लौटे वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक यूसुफ किरमानी की रिपोर्ट।)

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