Friday, December 2, 2022

सुप्रीम कोर्ट से केंद्र को बड़ा झटका, वोटर लिस्ट को आधार से जोड़ने के आदेश के खिलाफ याचिका पर होगी सुनवाई

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सुप्रीम कोर्ट सोमवार को केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ एक याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया, जिसमें मतदाता सूची डेटा को आधार पारिस्थितिकी तंत्र से जोड़ने के लिए सक्षम बनाया गया था। याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने तर्क दिया कि आधार कार्ड नहीं होने के आधार पर वोट देने के अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता। केंद्र ने मतदाता सूची के साथ आधार विवरण को जोड़ने की अनुमति देने के लिए मतदाता पंजीकरण नियमों में संशोधन किया था ताकि डुप्लिकेट प्रविष्टियों को हटाया जा सके।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस. ओका की पीठ ने दीवान से सवाल किया कि उनके तर्क से लगता है कि जिसके पास आधार नहीं है, उसे वोट देने से मना नहीं किया जाना चाहिए, या यहां तक कि आधार होने पर भी यह अनिवार्य नहीं होना चाहिए। इस पर वकील ने जवाब दिया कि मतदान का अधिकार सबसे पवित्र अधिकारों में से एक है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि आधार कार्ड के अभाव में आदिवासी क्षेत्रों के लोगों के लिए भी विकल्प उपलब्ध नहीं हो सकते हैं। उच्चतम न्यायालय को बताया गया कि आधार अधिनियम के तहत एक विशिष्ट धारा है, जिसमें कहा गया है कि आधार संख्या नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इसके बाद पीठ ने सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे द्वारा दायर याचिका को इसी तरह की लंबित याचिकाओं के साथ टैग कर दिया।पीठ ने मामले को दिसंबर के मध्य में आगे की सुनवाई के लिए निर्धारित कर दिया।

चित्रकूट जेल एनकाउंटर केस

यूपी के चित्रकूट जेल में पिछले साल हुए एनकाउंटर मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने यूपी सरकार को आदेश दिया है कि मामले की जांच रिपोर्ट दो हफ्ते में कोर्ट और याचिकाकर्ता को दी जाए।अगली सुनवाई नवंबर के आखिरी हफ्ते में होगी। याचिकाकर्ता ने यूपी की एनकाउंटर नीति पर रोक लगाने की भी मांग की है।

यूपी सरकार की ओर से वकील मुकुल रोहतगी पेश हुए। उन्होंने कहा कि इस मामले में इंक्वायरी हुई है, जिसमें साफ है कि जिनका चित्रकूट में एनकाउंटर हुआ, वह अपराधी थे और उन पर पहले से ही कई आपराधिक केस चल रहे थे।

सीजेआई यूयू ललित ने कहा कि पुलिस की क्रॉस फायरिंग में तीन लोगों की मौत हुई है।यूपी सरकार ने इंक्वायरी भी कराई है। सीजेआई ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है।आप प्रोटेस्ट याचिका दाखिल कर सकते हैं, लेकिन अगर आप थर्ड पार्टी हैं तो यह भी नहीं होगा।

पिछले साल चित्रकूट जेल में शॉर्प शूटर अंशु दीक्षित और पश्चिमी यूपी के कुख्यात बदमाश मुकीम काला और पूर्वांचल के अपराधी मेराज अहमद के बीच गैंगवॉर हो गया था, जिसमें अंशु दीक्षित ने 9एमएम की पिस्टल से मुकीम काला और मेराज अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इतना ही नहीं, उसने पांच बंदियों को बंधक भी बना लिया था।जिसके बाद पुलिस बल एक्टिव हुआ और पीएसी के साथ मौके पर पहुंचा। यहां अपराधी अंशु दीक्षित ने पुलिस पर फायरिंग कर दी, जिसके बाद पुलिस ने एनकाउंटर में अंशु दीक्षित को वहीं मार गिराया था।

बाबरी विध्वंस केस: आदेश सुरक्षित

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अयोध्या के विवादित ढांचा विध्वंस मामले में पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं समेत 32 आरोपियों को बरी किए जाने के निचली अदालत के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया।

जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस  सरोज यादव की पीठ ने अयोध्या वासियों हाजी महमूद अहमद और सैयद अखलाक अहमद की अपील सुनवाई योग्य है या नहीं, इस पर अपना आदेश सुरक्षित रखा है। दोनों याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे ढांचा विध्वंस मामले की अदालती कार्रवाई के दौरान अभियुक्तों के खिलाफ गवाह थे और वे विवादित ढांचे को ढहाये जाने के पीड़ित भी हैं।

गौरतलब है कि छह दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद को ढहा दिया था। इस मामले में आरोपी बनाए गए पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती तथा बजरंग दल संस्थापक विनय कटियार समेत 32 लोगों को विशेष सीबीआई अदालत ने 30 सितंबर 2020 को बरी कर दिया था।

कैदियों के लिए मतदान के अधिकार की मांग

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) के प्रावधानों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया, जो कैदियों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करता है। याचिका में कैदियों के मताधिकार की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट और न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी ने अधिवक्ता जोहेब हुसैन की दलीलों पर विचार किया और गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। याचिका 2019 में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के छात्र आदित्य प्रसन्ना भट्टाचार्य द्वारा दायर की गई थी, जिसमें अधिनियम की धारा 62 (5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील में कहा गया है कि यह प्रावधान, लोगों को वंचित करने के लिए जेल में कारावास के मानदंड का उपयोग करता है और यह, अत्यधिक व्यापक भाषा के उपयोग के साथ मिलकर प्रावधान को कई विषम और चौंकाने वाले परिणाम उत्पन्न करता है। सबमिशन सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने मामले को 29 दिसंबर को आगे की सुनवाई के लिए निर्धारित किया।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य पर 25हजार जुर्माना लगाया

बंबई हाईकोर्ट ने हाल ही में साइकिल चलाते समय एक महिला के साथ अनजाने में टकराने के लिए एक 9 वर्षीय लड़के के खिलाफ दर्ज एक आपराधिक मामले को खारिज कर दिया। लड़के पर गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 338 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और एसएम मोदक ने राज्य पर ₹25,000 का जुर्माना लगाते हुए कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 83 के तहत संरक्षण के बावजूद एक नाबालिग लड़के के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से लड़के को आघात पहुंचा और पुलिस द्वारा दिमाग का पूरी तरह से उपयोग न करने को दर्शाया गया।

धारा 83 में कहा गया है कि सात साल से ऊपर और बारह साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया गया कोई भी अपराध अपराध नहीं है, जिसने प्रकृति और उसके आचरण के परिणामों को समझने के लिए पर्याप्त परिपक्वता प्राप्त नहीं की है।

नागरिकता संशोधन कानून पर 6 दिसंबर को सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को नागरिकता संशोधन अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाले मामलों के बैच में दो वकीलों को नोडल वकील नियुक्त किया। [ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया]।चीफ जस्टिस  उदय उमेश ललित,जस्टिस  एस रवींद्र भट और जस्टिस  बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने मामले को 6 दिसंबर को एक उपयुक्त पीठ के समक्ष आगे की सुनवाई के लिए पोस्ट किया।

अधिवक्ता पल्लवी प्रताप, याचिकाकर्ता इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के वकील और अधिवक्ता कानू अग्रवाल (केंद्र सरकार के वकील) को सभी प्रासंगिक दस्तावेजों का संकलन तैयार करने के लिए नोडल वकील के रूप में नामित किया गया था। कोर्ट ने नोडल वकील को सभी वकीलों के साथ डिजिटल प्रारूप में संकलन साझा करने के लिए भी कहा।कोर्ट ने कहा कि सभी वकील तीन पेज से अधिक की लिखित दलीलें साझा करें। नोडल वकील भौगोलिक/धार्मिक वर्गीकरण को ध्यान में रखते हुए एक या दो अन्य मामलों को प्रमुख मामलों के रूप में नामित कर सकते हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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