ग्राउंड रिपोर्ट: मिर्जापुर में ग्रामीणों का ऐलान-‘रोड नहीं तो वोट नहीं’

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मिर्ज़ापुर। चुनावी रैली, रोड-शो, जनसंपर्क अभियान इन दिनों उफान पर होते हुए अंतिम चरण को पहुंच चुका है। आम जनता की नब्ज़ को टटोल पाना इस चुनाव में मुश्किल दिख रहा है। प्रत्याशियों के समर्थन में होने वाली जनसभा में दल विशेष के कार्यकर्ताओं व समर्थकों का ही जुटान हो रहा है। ऊपर से सितम ढा रही प्रचंड गर्मी ने लोगों को डरा रखा है। चट्टी-चौराहे से लेकर गली-मोहल्ले में वोट किसको देंगे, को लेकर चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन सभी एक दूसरे के ही मन मिजाज को भांपते हुए दूसरे की नब्ज को टटोलते दिखाई दे रहे हैं।

जर्जर सड़क

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों से अलग इस बार का लोकसभा चुनाव दिखाई दे रहा है। सरकार की योजनाओं पर अपने नाम की मुहर लगाकर विकास का ढिंढोरा पीटते-इतराते जनप्रतिनिधियों को पसीने बहाने पड़ रहे हैं। लोगों की नाराज़गी, बाहरी-भीतरी का मुद्दा भी जोर पकड़े हुए है। कहीं-कहीं जनप्रतिनिधियों के प्रति गहरी नाराज़गी और विकास कार्यों के नाम पर किए गए छल को लेकर भी नाराजगी ‘वोट’ के ‘बहिष्कार’ का कारण बनी हुई है। देश में छठवें चरण का मतदान सम्पन्न हो चुका है, सातवें चरण का मतदान होने को है ऐसे में सत्तारूढ़ पार्टी और उनके सहयोगी दलों की बढ़ती व्याकुलता कहीं न कहीं से जनता व जनप्रतिनिधियों के बीच बढ़ती हुई दूरियों के साथ-साथ जनता की जनप्रतिनिधियों से बढ़ती नाराज़गी को दर्शाती है।

वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से लगा हुआ मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र भी सत्ता के लिए इस बार नाक का सवाल बना हुआ है। विकास का ढिंढोरा पीटने वाले जनप्रतिनिधियों के चेहरे पर करारा तमाचा जड़ने के लिए काफी हैं उन इलाकों के अधूरे पड़े विकास के काम जिनके लिए जनता को रोज जद्दोजहद करना पड़ रहा है। कहीं सड़क बनी ही नहीं है तो कहीं सड़कों की बदहाली लोगों के लिए जी का जंजाल बनी हुई है।

इन्हीं में एक नाम है राजापुर-गोपालपुर यह गांव मिर्ज़ापुर के मझवां विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत आता है। गोपालपुर, राजापुर गांव के लोग पिछले दो दशकों से सड़क के लिए तरस रहे हैं। निदान के नाम मिलते आश्वासनों ने ग्रामीणों के आक्रोश को बढ़ा दिया है। ग्रामीणों ने वोट (मतदान) का बहिष्कार करने का निर्णय लेते हुए पिछले दिनों गांव की सड़क पर प्रर्दशन कर इलाके के सांसद और विधायक मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए कहा है कि ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’।

ग्रामीण पवन कुमार बताते हैं कि “जंगी रोड से गोपालपुर-राजापुर संपर्क मार्ग विगत 18 वर्षों से ज्यादा समय से खराब पड़ा हुआ है। जिसका बजट पास होने के बावजूद अभी तक सड़क निर्माण का कार्य पूर्ण नहीं हुआ है। अक्रोशित ग्रामीण कई बार गोपालपुर में प्रर्दशन भी कर चुके हैं, लेकिन आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने ग्रामीणों की समस्या को दूर करना तो दूर की बात रही है, गांव में आकर मिलना भी मुनासिब नहीं समझा है।”

पवन बताते हैं कि “हम ग्रामीणों द्वारा मांग की जा रही है कि यदि सड़क का निर्माण जल्द से जल्द नहीं हुआ तो इस लोकसभा चुनाव में हम सामूहिक रुप से वोट का बहिष्कार करेंगे।”

ग्रामीणों द्वारा वोट का बहिष्कार किए जाने और गोपालपुर गांव में सड़क की बदहाली को करीब से देखने समझने के उद्देश्य से “जनचौक” की टीम ने गोपालपुर गांव का रुख कर जब पड़ताल किया तो जन-समस्याओं से लगातार दूरी बनाए हुए तथा कोविड काल में सांसद-विधायक की गैर-मौजूदगी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ग्रामीणों की माने तो जनप्रतिनिधियों ने जो वादे किए थे उन्हें पूरा करने की बात तो दूर उन्होंने अपने क्षेत्र में झांकना भी जरूरी नहीं समझा है, जबकि उनका (गोपालपुर) गांव जिला मुख्यालय से महज छः-सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, बावजूद इसके सांसद विधायक भूल से भी इधर झांकने नहीं आएं हैं। जनप्रतिनिधियों को लेकर क्या कहते हैं ग्रामीण, क्या है वहां की चुनावी तस्वीर देखिए पूरी रिपोर्ट….

ग्रामीण ने क्यों कहां रोड नहीं तो वोट नहीं

मिर्ज़ापुर जिला मुख्यालय से तकरीबन सात किलोमीटर दूर मिर्ज़ापुर-प्रयागराज मार्ग पर जंगीरोड से दक्षिण दिशा में मुख्य मार्ग से तकरीबन आधा किलोमीटर आगे बढ़ने पर नगर के चन्द्र दीपा वार्ड के सोहता का अड्डा से एक मार्ग लंका की पहड़ी की ओर जाता है तो दूसरा राजापुर-गोपालपुर गांव के लिए, यूं कहें कि नगर पालिका परिषद मिर्ज़ापुर और सीटी विकास खंड के साथ नगर विधानसभा क्षेत्र और मझवां विधानसभा क्षेत्र को यह इलाका बांटता हुआ सरहदी इलाका कहलाता है। गोपालपुर-राजापुर सीटी ब्लाक और मझवां विधानसभा क्षेत्र अंतर्गत आते हैं। बावजूद इसके विकास से महरूम बने हुए हैं। विकास की आस कोई पुल और बड़ी मांग की नहीं बल्कि सड़क है, जो पूरी नहीं हो पा रही है।

“जनचौक” की टीम नगर पालिका परिषद क्षेत्र की परिधि को पार करते हुए धरकार बस्ती की ओर बढ़ती है वैसे ही बदहाली उपेक्षा की धुंधली हुई तस्वीर दिखने लगती है।

खुले में सड़क पर घरों का बहता गंदा पानी जल निकासी व्यवस्था की हकीकत बयां कर रहा है तो सड़क के बीच में भूमिगत नाली का टूटा हुआ चैम्बर, जर्जर हो चुका सीसी रोड बदहाली की कहानी सुनाता हुआ सामने आ जाता है। धरकार बस्ती से होते हुए तकरीबन दो किलोमीटर आगे जाने पर सड़क नदारद कहीं-कहीं गिट्टी नजर आती है। वरना मिट्टी और पथरीली राहों पर लोगों को आवागमन करते हुए देखा जा सकता है।

बदहाल सड़क की कांटे की तरह चुभती हुई गिट्टी-मिट्टी से होते हुए आगे जाने पर मार्ग त्रिमोहानी में तब्दील हो जाता है एक तरफ मार्ग के शिलान्यास का शिलापट्ट तो दूसरी ओर देशी शराब की दुकान का बोर्ड दिख जाता है। दोनों में फर्क सिर्फ यही दिखाई देता है कि शिलान्यास का शिलापट्ट छुपा हुआ प्रतीत होता है, जबकि देशी शराब की दुकान खुलकर उभर कर सामने डट कर खड़ा हुआ नज़र आता है। सोचने वाली बात होती है कि सरकार के नुमाइंदों को इस गांव में सड़क की उपेक्षा, सड़क की जरुरत उतनी नहीं महसूस हुई है, जितनी की गांव में देशी शराब की दुकान को खोलना।

राहगीर रजई बिंद कहते हैं “जंगी रोड से होते हुए यह मार्ग राजापुर, गोपालपुर, चितावनपुर, इटवा को निकल जाता है जहां बराबर आवागमन होता रहता है। इस मार्ग से कई गांवों के लोगों का सीधा जुड़ाव बना हुआ है, बावजूद यह मार्ग दो दशक से उपेक्षित पड़ा हुआ है।” वज़ह पूछे जाने पर वह तपाक से सवाल दागते हैं कि “यह सवाल तो उन नेताओं से पूछा जाना चाहिए, प्रशासन के लोगों से पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार क्यों नहीं दो दशक से इस गांव की सड़क को बनवाया जा रहा है?”

रजई अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाएं थे कि उधर से गुजर रहे कुछ ग्रामीण मीडिया कर्मियों को देख साइकिल को ब्रेक देते हुए रूकते हैं और आक्रोशित भाव से कह पड़ते हैं, “नेतवन क काम बन जात हौ त हम पचे से का मतलब, जनता गढ्ढा में जीये चाहे, पानी बिना सुखाएं नेतवन के ऐसे का लेवें देवे के बाय। दस बरिस अनुप्रिया सांसद रह के ना झांके आई, तीन पंचवर्षीय रमेश चंद्र बिंद मझवां क विधायक रहेन त का किहें? जबकि रमेश चंद्र बिंद पड़ोसे के गांव इटवा के रहें वाला हैं। जब उहों झांके ना आयन त अनुप्रिया, सुचिस्मिता अउर विनोद बिंद भला कईसे आए जातन?”

ग्रामीण तंज कसते हुए कहते हैं कि “सभी ने गोपालपुर गांव के लोगों को ठगा है। तो भला किसको मतदान, किस लिए और क्यों हम मतदान करने जाते?” मतदान सभी का मौलिक अधिकार है, इसके जरिए देश में एक स्वच्छ लोकतंत्र और मजबूत राष्ट्र निर्माण में मजबूती मिलती है, बताये जाने पर ग्रामीण शासन-प्रशासन के प्रति भी अपनी नाराजगी को जग जाहिर करते हुए कहते हैं कि “हमें नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने तो ठगा ही है, क्या शासन और शासन के लोगों ने भी कभी हमारी पुकार-गुहार को सुनने का साहस किया है?”

ग्रामीण सप्पू बिंद बड़े ही बेबाकी से कहते हैं कि, “साहब हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। सड़क के खराब होने और कई सालों से न बनने के कारण बरसात में सड़क पर कीचड़ फैल जाता है तो गर्मी में धूल उड़ता है पैर जलते हैं। सड़क नहीं है जल निकासी के लिए नाली नहीं बना है। पीने के पानी की समस्या भी गंभीर हो चली है। बरसात के दिनों में बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। अधिकारी भी कभी इधर झांकने नहीं आते। सांसद-विधायकों ने तो मानो मुंह ही फेर लिया है। ऊपर से रात में मिट्टी लदे वाहनों के फर्राटे भरने से खतरा बना रहता है। धूल के मारे सांस लेना भी कठिन हो चला है। घर के दीवारों पर धूल की परते जम गई हैं जो यहां की बदहाली दर्शाने के लिए काफी है।”

सूरज मिश्र

100-150 मीटर आगे चलने पर सूरज कुमार मिश्रा दिख जाते हैं। लकड़ी के छोटे जर्जर गोमटी में घर-गृहस्थी के कुछ जरुरी सामान की दुकान खोलकर अपना जीविकोपार्जन कर रहे हैं। करीब पहुंचने पर तपाक से बोलते हैं, “कहां गर्मी में आप लोग ‘जीव’ (जान) देने निकले हैं? इतना कह कर वह तुरंत ठंडे पानी का बॉटल हाथ में पकड़ा देते हैं। फिर जैसे ही उनसे सवाल किया जाता है कि “आप सभी लोगों ने मतदान बहिष्कार कि चेतावनी दी है इसकी वजह क्या हो सकती है? इस पर वह बोलते हैं इंटरलॉकिंग सड़क में पड़ी दरार की ओर इशारा करते हुए बताते हैं “इस गांव में सड़क की समस्या 20 साल से है। गांव के लोग सड़क की समस्या से जूझ रहे हैं। कहीं-कहीं सड़क बनी है तो कहीं कहीं पूरी सड़क ही नदारत है।”

सांसद-विधायक सभी ने किया है निराश

मझवां विधानसभा क्षेत्र के राजापुर-गोपालपुर के लोगों में मतदान बहिष्कार करने की घोषणा यूं ही नहीं है, बल्कि उनकी मांगे जायज भी हैं। गोपालपुर गांव निवासी प्रमोद कुमार दुबे कहते हैं कि “गांव में अभी तक कोई भी ऐसा कार्य नहीं हुआ है जिसे विकास से जोड़कर देखा जा सके। इतना जरूर हुआ है कि कागजी खानापूर्ती जरूर कर ली गई है।”

राजापुर गांव के रामकिशोर बताते हैं “20 साल से सभी (जन-प्रतिनिधियों) ने उन्हें सिर्फ निराश ही किया है। कुछ कुछ दूरी पर जो इंटरलॉकिंग सड़क बनी हुई है वह भी पूरी तरह से उखड़ने लगी है। तो कहीं सड़क में दरार भी पड़ चुकी है जो विकास की कलई खोलने के लिए काफी है।”

गोपालपुर अनुसूचित जाति बस्ती की ओर जाने वाले इंटरलॉकिंग सड़क में पड़ी दरार की ओर इशारा करते हुए ग्रामीण कहते हैं मानक विहीन बने इंटरलॉकिंग सड़क की जांच होनी चाहिए थी, लेकिन किससे शिकायत की जाए जब यहां कोई आता ही नहीं और ना ही हम ग्रामीणों की कोई सुनवाई हो पा रही है। जबकि कोई एक दो वर्ष से नहीं बल्कि दो दशक से यहां के लोग समस्याओं से जूझ रहे हैं। जिनमें सड़क समस्या सबसे गंभीर है।”

पांच हजार की आबादी पर समस्या भारी

तकरीबन पांच हजार की आबादी वाले गोपालपुर गांव में ब्राह्मण, हरिजन, मौर्य, नट, सोनकर जाति के लोग निवास करते हैं। इनमें सर्वाधिक ब्राह्मण फ़िर दलित, मौर्य बिरादरी के लोग हैं। पिछले दो दशकों से सड़क की समस्या से जूझ रहे यहां के ग्रामीण सांसद विधायक की कार्य प्रणाली से पूरी तरह से नाखुश हैं। पिछले दिनों ग्रामीणों ने एकजुट होकर रायशुमारी करते हुए गांव की उपेक्षा किए जाने का आरोप लगाते हुए प्रदर्शन भी किया था, बावजूद इसके कोई भी जिम्मेदार अधिकारी व जनप्रतिनिधि ने गांव में आकर ग्रामीणों की समस्याओं को करीब से देखने सुनने और जानने का प्रयास नहीं किया है।

गांव निवासी नीरज कुमार दुबे उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहते हैं “सांसद अनुप्रिया पटेल झांकने तक नहीं आई हैं। मझवां विधायक रमेश बिंद से लेकर सुचिस्मिता और मौजूदा विधायक जो भदोही से चुनाव लड़ रहे हैं, विनोद बिंद इन्होंने भी कोई विकास नहीं सिर्फ निराश ही किया है।”

प्रमोद कुमार दुबे भी गांव की उपेक्षा का खुला आरोप लगाते हुए कहते हैं “जब जिला मुख्यालय से लगे हुए गांव की यह स्थिति है तो जिले के सुदूर अंचलों में बसने वाले गांव की क्या स्थिति हो सकती है आंकलन किया जा सकता है।”

कभी रहा नगर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा अब है मझवां का इलाका

सड़क को लेकर मतदान का बहिष्कार करने वाले ग्रामीणों को इस बात का भी मलाल है कि उन्हें नगर विधानसभा से काटकर नए परिसीमन के तहत मझवां विधानसभा में कर दिया गया है, तभी से उनकी दुर्गति भी प्रारंभ हो गई है। ग्रामीण बीते दिनों की बात को याद करते हुए “जनचौक” को बताते हैं कि ” जब यह गांव नगर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा हुआ करता था उस वक्त यहां के नगर विधायक डॉक्टर सुरजीत सिंह डंग रहे तब के बाद इस गांव में किसी भी जनप्रतिनिधि ने झांकना भी मुनासिफ नहीं समझा है।

“ग्रामीण बताते हैं कि समीप के गांव इटवां के ही रहने वाले रमेश चंद्र बिंद जो कभी मझवां विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे उन्होंने जितना स्वयं के विकास पर ध्यान दिया उतना इस गांव पर कदापि नहीं दिया है। अब वह भी मुंह उठाए हुए मिर्ज़ापुर लोकसभा चुनाव में ताल ठोंकते हुए विकास की बात करते हुए घूम रहे हैं।”

क्या आपके गांव में किसी जनप्रतिनिधि ने इस चुनावी बेला में कदम रखा है? इस सवाल पर ग्रामीण एक सिरे से सिर हिलाते हुए साफ शब्दों में कहते हैं आएंगे भी तो किस मुंह से और किस लिए? जब उन्होंने कुछ किया ही नहीं है तो गांव में आकर करेंगे भी क्या?”

मुंह चिढ़ाता हुआ नज़र आता है डिप्टी सीएम के नाम का शिलापट्ट

गोपालपुर गांव में एक कोने में काफी प्रयास के बाद एक शिलान्यास का पट्ट दिखलाई दे जाता है। नज़र दौड़ाने पर
“जनपद मिर्जापुर विशेष मरम्मत अन्तर्गत जंगीरोड से राजापुर-चितावनपुर सम्पर्क मार्ग के शिलान्यास का आंकड़ा दिख जाता है। जिस पर मोटे शब्दों में लिखा हुआ है, लंबाई 3.00 किमी, लागत 104.44 लाख का शिलान्यास उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के कर कमलों द्वारा 24 जून 2021 को किया गया। शिलान्यास के शिलापट्ट पर सांसद अनुप्रिया पटेल तो विधायक के तौर पर तत्कालीन मझवां विधायक सुचिस्मिता मौर्या का भी नाम दर्ज है। हैरान करने वाली बात है कि सड़क का शिलान्यास भी हो जाता है शिलान्यास का पट्ट भी लग जाता है, बजट भी पास हो जाता है, लेकिन सड़क की दशा जस की तस ही बनी हुई है। ग्रामीण कहते हैं “विकास कार्य के नाम यहां खेला हुआ है। जिसकी जांच होनी चाहिए।”

चंदा एकत्र कर नदी के पुल पर बना है रेलिंग

इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि राजापुर-गोपालपुर गांव में जाने के लिए गांव से बाहर बेलघाट नदी पुल पर जर्जर होकर टूट चुके रेलिंग को ग्रामीणों ने चंदा एकत्र कर स्वयं के श्रम और पैसे से बनवाया है, ताकि दुर्घटना से बचा जा सके। दरअसल, कुछ वर्षों पूर्व बेलघाट नदी पुल पर लोहे की रेलिंग के जर्जर होकर टूटकर गायब हो जाने के चलते एक बड़ा हादसा हो गया था जो लोगों को आज भी भूले नहीं भूलता है। हुआ यह था कि एक रिक्शे पर सवार होकर कुछ लोग शहर से गांव की ओर आ रहे थे कि तभी अचानक रिक्शा पलट जाने से एक व्यक्ति नदी में गिर पड़ा था जिसकी दर्दनाक मौत हो गई थी। जबकि एक अन्य व्यक्ति आज भी विक्षिप्त होकर घूंट-घूंट कर जिंदगी जी रहा है। इस हादसे के बाद लोगों ने कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर शासन-प्रशासन का भी दरवाजा खटखटाया था, लेकिन किसी ने भी इस पहाड़ी नदी पर टूटे रेलिंग की जगह नई रेलिंग का निर्माण करवाएं जाने का काम तो दूर कोई मौके पर आकर झांकना भी गंवारा नहीं समझा था। थक हारकर ग्रामीणों ने स्वयं चंदा एकत्र कर पहाड़ी नदी पर लोहे की रेलिंग की बजाए मजबूत दीवाल का निर्माण करवाया है, ताकि दुर्घटना ना होने पाएं। ग्रामीण आज भी न तो उस हादसे को भूल पाए हैं और ना ही चंदा एकत्र कर पुलिया के रेलिंग का निर्माण करवाएं जाने के कार्य को भूलें हैं।

ग्रामीण सांसद को जानना तो दूर उनकी सूरत तक नहीं पहचानते

देश को विकसित भारत बनाने और विश्व गुरु की पहचान दिलाने की वकालत करते नहीं थकने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मन की बात में अक्सर स्वच्छता, विकास और जन संवाद पर जोर देते हुए आएं हैं तो वहीं उनके अपने सांसद जनता से सीधा संवाद तो दूर रहा है वह उनके पास फटकना भी गंवारा नहीं समझा।

परशुराम मिश्र

परशुराम मिश्रा मतदान बहिष्कार और सांसद का नाम लेते ही बिफर पड़ते हैं कहते हैं, “72 साल की अवस्था हो गई है मेरी, आज तक हमने अनुप्रिया पटेल (सांसद) का सूरत (चेहरा) तक नहीं देखा है कि वह हैं कैसी, सिर्फ नाम सुना है? वह कभी इस गांव में आई ही नहीं है तो कहां से देखें? मैं जानता तक नहीं उसे। बीजेपी-मोदी की सरकार है, जिसके नाम पर वह जीत रही है। 10 वर्षों से सांसद है, लेकिन आज तक गांव में कभी झांकने नहीं आई है। कुछ भी काम नहीं किया है।”

मतदान के बहिष्कार किए जाने के निर्णय के बारे में पूछे जाने पर वह कहते हैं “क्या मतदान करें जब कोई सुनवाई ही नहीं है।, फिर बोलते हैं भाई हमारा लोकतंत्र मजबूत हो, राष्ट्र मजबूत हो अच्छी बात है, लेकिन हमारी सुनने वाला भी तो हो? आप सांसद अनुप्रिया पटेल से कभी मिले हैं? के सवाल पर वह ठेठ मिर्ज़ापुरी अंदाज में तंज कसते हुए कहते हैं “हम कहां जाएं उन्हें (सांसद को) ‘नून-सतुआ’ लेके ढ़ूढ़े, दिल्ली जाई जहां ऊ बैठी रहत हैं।”

(मिर्जापुर से संतोष देव गिरी की ग्राउंड रिपोर्ट)

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