Wednesday, December 7, 2022

गुजरात के मोरबी में केबल पुल टूटने से हुई मौतें:किसकी निगाह जायेगी जलते मकान पै?

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बस्ती के सभी लोग हैं ऊंची उड़ान पै, किसकी निगाह जायेगी जलते मकान पै? अवध के जनप्रतिबद्ध शायर मरहूम चन्द्रमणि त्रिपाठी ‘सहनशील’ द्वारा कोई तीन दशक पहले पूछा गया यह सवाल गुजरात के मोरबी में मच्छु नदी पर बने केबल पुल के टूटने से कोई डेढ़ सौ लोगों की (जिनमें ज्यादातर आम औरतें व बच्चे थे) जानें जाने के बाद नये सिरे से जवाब की मांग करने लगा है और इस मांग को, और तो और, इस आधार पर भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि इस हादसे को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक ने खुद को मर्माहत प्रदर्शित करते हुए गहरा शोक जताया, साथ ही पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की और दावा किया है कि राहत व बचाव में पूरी ताकत झोंक दी गई है।

अब होंगे वे बहुत दुःखी और बचाव में झोंक दी होगी पूरी ताकत, लेकिन बड़े से बड़े मुआवजे से भी हादसे में हुए उस जानी नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते, जिसने कई घरों का दिया बुझा दिया है तो कई का इकलौता कमाऊ सदस्य छीन लिया है। वे तो यह भी नहीं कह सकते कि रविवार को हादसे के दिन जब वे गुजरात के ही बड़ोदरा में ‘स्वदेशी’ टाटा एयरबस सी-295 ट्रांसपोर्ट विमानों के मॅन्युफैक्चरिंग प्लांट की आधारशिला रखते हुए कह रहे थे कि उनकी सरकार ने अपने अथक प्रयासों से देश की मानसिकता व कार्यसंस्कृति दोनों बदल डाली हैं, जिससे वह विनिर्माण का गढ़ बनने की ओर बढ़ चला है और निजी क्षेत्र को इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए तो उन्हें मालूम था कि मोरबी के उक्त केबल पुल की मरम्मत करा रही निजी क्षेत्र की कम्पनी ने, बकौल सम्बन्धित नगरपालिका, बिना फिटनेस सर्टिफिकेट हासिल किये उसे लोगों के लिए खोलकर मौत का पुल बनने का मार्ग ‘प्रशस्त’ कर रखा है?

एक साथ सौ लोगों का ही बोझ उठा सकने की क्षमता वाले इस पुल पर (जिसे उक्त कम्पनी द्वारा दो करोड़ रुपयों की लागत से कथित मरम्मत के बाद मनमाने ढंग से तीन चार दिन पहले ही खोला गया था) जैसे अनियंत्रित ढंग से क्षमता से कई गुने लोगों को बाकायदा टिकट बांटकर पहुंचने दिया गया और पुल के अचानक टूट गिरने के बाद वे जिस तरह घंटों तक असहायता की स्थिति में रहने को मजबूर हुए, उससे लगता है कि प्रधानमंत्री को तो क्या, आधारशिला-समारोह में उनके साथ मौजूद गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेन्द्रभाई पटेल को भी शायद ही इसकी जानकारी रही हो।

होती तो वे भी प्रधानमंत्री जैसी ही ऊंची उड़ान क्यों उड़ते रहते? इस जमीनी सच्चाई से वाकिफ नहीं होते कि भले ही प्रधानमंत्री अपने भाषणों से लेकर ‘मन की बात’ तक में दावा करते रहते हैं कि उनके कार्यकाल में भारत ने जल, थल और नभ में अपनी बहुआयामी उपलब्धियों से न सिर्फ दुनिया में अपना डंका बजा दिया है बल्कि उसे स्पष्ट संदेश भी दिया है, उसमें सिर्फ उनके गृहराज्य तक में चुनाव से चुनाव तक की पार्टियों व नेताओं की अनर्थकारी सोच के कारण इतनी भी ‘क्षमता’ नहीं बच पायी है कि वह एक पुराने केबल पुल की मरम्मत के बाद उस पर लोगों की आवाजाही का निरापद संचालन सुनिश्चित कर सकें। एक कवि के शब्द उधार लेकर कहें तो वह ऐसे दौर में जा पहुंचा है, जिसमें सत्ताधीश बनवाते हैं पुल तो वह बन जाता है श्मशान।

याद कीजिए, गत वर्ष के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां अपनी पार्टी की विजय पताका फहराने के लिए वैसा ही अभियान चला रहे थे, जैसा इन दिनों गुजरात में उसकी सत्ता बरकरार रखने के लिए चला रहे हैं। तब इसी तरह कोलकाता में एक पुल टूटा तो उन्होंने अपनी प्रतिद्वंद्वी तृणमूल कांग्रेस पर कड़ा राजनीतिक प्रहार करते हुए उसे ‘ऐक्ट ऑफ गाड’ मानने से इनकार कर दिया और ‘ऐक्ट ऑफ फ्रॉड’ बताया था। कहा था कि ऐन विधानसभा चुनाव के वक्त उसके टूटने से पता चलता है कि  मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वहां कैसी सरकार चलाई है। लेकिन अब गुजरात में भी विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उसी तर्ज पर पुल टूटने से उससे कई गुना बड़ा हादसा हुआ है तो वे अपनी पार्टी की राज्य सरकार पर वही कसौटी लागू नहीं कर रहे।

इसके उलट चाहते हैं कि इस ‘दुःखदायी’ मामले पर एकदम से राजनीति न की जाये। उनके निकट इस ‘राजनीति न करने’ का एकमात्र अर्थ यह है कि उसे लेकर कतई कोई सवाल न पूछा जाये। यह भी नहीं कि अपने बहुप्रचारित गुजरात मॉडल के तहत वे विभिन्न परियोजनाओं की लाभार्थियों तक जिस डिलीवरी का दर्पपूर्वक बखान करते रहते हैं, इस मामले में उसका ऐसा बदहाल क्यों देखने में आया है? लेकिन क्या इस सवाल का मुंह सिर्फ इसलिए बन्द किया जा सकता है कि पुल की मरम्मत कराने वाली कम्पनी के खिलाफ कड़ी कानूनी धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया गया है? असल मुद्दा तो दरअसल यह है कि जब उक्त कम्पनी पुल की मरम्मत और उसे खोलने के मामले में मनमानी बरत रही थी, यहां तक कि उसे बिना ट्रायल उस पर कई गुनी भीड़ चढ़ने देने में भी कुछ गलत नजर नहीं आ रहा था, तो जिस सरकारी अमले की उस पर नजर रखने की जिम्मेदारी थी, वह क्या कर रहा था?

प्रसंगवश, चूंकि हम अभी भी राजनीति को राज्य के नैतिक आचरण, व्यवहार व क्रियाकलाप का पर्याय बनाने में विफल रहे हैं, उसके मजे लूटने वाले किसी भी विपदा के समय सोते पकड़े जाने पर धृष्टतापूर्वक कहने से नहीं चूकते कि उस पर राजनीति बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। अपनी जिम्मेदारियों से बचने और कारस्तानियों पर परदा डालने का उन्हें महज यही एक रास्ता दिखता है! लेकिन राजनीति इतनी ही बुरी चीज है तो वह किसी भी वक्त क्यों होनी चाहिए? किसी विपदा को उसी ने पाला-पोषा या आमंत्रित किया हो तो प्रतिकार का इसके अलावा और कौन-सा तरीका है कि वैकल्पिक राजनीति से उसे कठघरे में खड़ा किया जाये? लोगों के जीवन-मरण के प्रश्नों पर नहीं तो राजनीति और कब और कैसे बरती जाये? और जैसे भी बरती जाये, उसका क्या अर्थ?

सच्ची बात तो यह है कि प्रधानमंत्री के गृह राज्य में ऐसी काहिली कहें, भ्रष्टाचार या कर्तव्यहीनता, इस हादसे में पहली दफा सामने नहीं आई है। पूर्ण नशाबन्दी बाले इस राज्य में गत जुलाई में जहरीली शराब से मौतें होनी शुरू हुईं और उनकी संख्या कई दर्जन तक जा पहुंची तो भी लगभग ऐसा ही अनुत्तरदायित्वपूर्ण सरकारी रवैया देखने में आया था। भले ही तब तगड़े मीडिया मैनेजमेंट के सहारे उस पर बहुत चर्चा नहीं होने दी गई, उससे जुड़े कई सवालों की जवाबों की प्रतीक्षा अभी भी खत्म नहीं हुई है।

ऐसे में इस हादसे से जुड़े सवालों के जवाब कब और कैसे मिलेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। खासकर जब अंदेशे बरकरार हैं कि राज्य में आसन्न विधानसभा चुनावों में जनादेश छीनने के लिए लोगों के जीवन-मरण के मुद्दों को भावनात्मक मुद्दों से प्रतिस्थापित करने की कोशिशें और तेज होंगी। लेकिन क्या इनकी जवाबदेही से हमेशा के लिए इनकार किया जा सकता है? नहीं, एक दिन तो इस पुल की तरह लोगों का धैर्य भी टूट ही जायेगा।

(कृष्ण प्रताप सिंह दैनिक अखबार जनमोर्चा के संपादक हैं।)

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