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Friday, September 24, 2021

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अमेरिका में लिया गया था भारत में नोटबंदी का फैसला!

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नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने देश से पचास दिन मांगे थे, पचास की बजाए अब तो चार साल बीत चुके हैं पर हालत जस के तस बने हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी को अच्छी तरह से पता था, पचास दिनों में लोगों के सपनों का भारत बनने वाला नहीं है और लोग भी यह बात समझ रहे थे कि जुमलेबाज़ी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। पर एक सवाल यक्ष प्रश्न की तरह जनता के सामने खड़ा है कि नोटबंदी लागू करने का असली मकसद क्या था जिसकी वजह से अभी तक मोदी जी मानने को तैयार ही नहीं हैं कि उन्होंने गलती की है?

‘नार्सिसिस्म’ जैसे गैरमामूली या ‘सेल्फाईटिस’ जैसे मामूली मनोरोगों से पीड़ित ‘प्रधानसेवक’ मोदी ने जिस दिन नोटबंदी की घोषणा की थी, उस दिन कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों और दरबारी बुद्धिजीवियों को छोड़ कर सारा देश सकते में था। सब जानते हैं, दुनिया में कहीं भी व्यापार या उद्योग एक तिहाई ‘हाथ-दस्ती’ (cash in hand) के बूते ही चलता है। भारत जैसे देश में जहाँ दाई माँ के हाथों से लेकर बेटे के हाथों मुखाग्नि दिये जाने तक के सफ़र में जीवन की कश्ती ‘हाथ-दस्ती’ की पतवार से ही पार लगती है।

समाज और घर-परिवार की जिम्मेवार इकाई की रूप में यह बात तो एक साधारण आदमी भी जानता है कि हमारे यहाँ सदियों से आशीर्वाद के साथ-साथ शगुन, बधाई और विदाई की सभी रस्में ‘नगदी’ से ही अदा किये जाने की परंपरा रही है। हाँ जिसने कभी समाज में पुत्र-मित्र या पिता-पति के रूप में घर-परिवार की जिम्मेवारी ही न उठाई हो और सारा जीवन एक परजीवी (parasite) के रूप में बिता दिया हो उसके लिए इस बात को समझना थोड़ा मुश्किल है। बैंकों और पट्रोल-पंपों की कतारों में लोग खड़े लोग भी और घरों-दफ्तरों में बैठे समाजशास्त्री-अर्थशास्त्री भी इसी बात पर माथा फोड़ रहे थे कि नोटबंदी के पीछे ‘गोपनीय’ वजह क्या है?

प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले नोटबंदी के पीछे जो तर्क रखा था वो यह था कि नकली करेंसी ख़त्म करने के लिए, आतंकवादियों को कंगाल करने और ‘काले धन’ को बाहर निकालने के लिए यह कदम उठाया गया है। सेवक-भक्त खुश थे लेकिन लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े फटेहाल लोग समझ रहे थे कि वोट डाला, गलती हो गयी। देश-विदेश से अर्थशास्त्रियों ने जब सवाल उठाने शुरू किये कि भारत में जहाँ 84 करोड़ लोग रोज भूखे-पेट सोते हैं, जहाँ 90 फ़ीसदी लोग चिल्लर से गुजारा करते हैं, जहाँ 10 लाख बच्चे कुपोषण की वजह से हर साल दम तोड़ देते हैं, कर्जे के बोझ तले दबे लाखों किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं और रोज कर रहे हैं, करोड़ों की तादाद में मंडियों में खड़े दिहाड़ीदारों से काले धन की उम्मीद का औचित्य क्या था? इन सवालों को सुनता कौन? ‘प्रधानसेवक’ जापान चले गए थे। 

जापान दौरे पर गए ‘प्रधानसेवक’ मोदी ने वहां के उद्योगपतियों को भारतीय जनता की परेशानी पर चुटकी लेते हुए बताया कि पहले गंगा में कोई एक चवन्नी भी नहीं डालता था, अब 500 और 1000 के नोट भी बह रहे हैं। उद्योगपतियों से भारत में निवेश करने को कहा और यह भी कहा ‘गुजराती होने के नाते कॉमर्स मेरे ख़ून में है, पैसा मेरे ख़ून में है। इसलिए मेरे लिए इसे समझना आसान है।’ मनोवैज्ञानिक इस प्रवृत्ति को ‘पर-पीड़ा सुख’ कहते हैं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के प्रधानमंत्री का एक ऐसे मनोविकार से पीड़ित होना! अब आप जरा अपने बच्चों के भविष्य का अंदाजा लगाइए। 

गुजरती होने का दंभ ठुस्स हो गया जब जापान में किसी ने हाथ पर धेला नहीं धरा। लौट के बुद्धू घर को आए।

भारत लौट कर ‘प्रधानसेवक’ मोदी गोवा में मोपा ग्रीनफील्‍ड एयरपोर्ट का शिलान्‍यास करने के बाद वहां भाषण देते हुए जोर-जोर से रोने लगे (यह एक अलग तरह का मनोविकार है), बोले “मैंने राजनीति के चलते अपना घर-परिवार सब छोड़ दिया।” पहली बार ऐसा तमाशा देख कर गोवावासी हैरान थे, देश परेशान था। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि जिस बात के लिए ‘प्रधानसेवक’ रो रहा है इसे आंसू पोछने के लिए रुमाल दें या ताली बजाएं। 

‘प्रधानसेवक’ ने कहा सिर्फ 50 दिन का वक्त मुझे दे दो, आपने जैसा हिंदुस्तान मांगा था, मैं वैसा ही हिंदुस्तान आपको दूंगा। यदि नहीं दे पाया तो जिस चौराहे पर बोलोगे वहां आ जाऊंगा। लोग फिर एक बार जुमले के झांसे में आ गए। लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता तथा देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़े जा चुके अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने इसे काले धन से निपटने के नाम पर लिया गया एक निरंकुश और तानाशाही भरा फैसला बताया।  

कुछ नहीं हुआ। घूम-फिर गदही, पीपल नीचे। सब वहीं का वहीं। 

“समाज में जो कुछ भी घट रहा है, उसके पीछे आर्थिक शक्तियां हुआ करती हैं।” अपने समय के सबसे प्रभावशाली अर्थशास्त्री अल्फ़्रेड मार्शल की सिर्फ इस बात पर यकीन करें तो सवाल उठता है कि नोटबंदी के इस फैसले के पीछे भी वो कौन सी आर्थिक शक्तियां थीं? 

कहानी उस दिन से शुरू होती है जिस दिन मोदी ने संसद की सीढ़ियों पर माथा टेक कर देश की एकता और संप्रभुता की शपथ ली थी और प्रधानमंत्री पद संभाला था। प्रधानमंत्री  के रूप में मोदी का निर्वाचित होना बहुत सारे लोगों के लिए भारत-अमेरिका सम्बन्धों के लिए चिंता का विषय था क्योंकि अमेरिका ने मोदी को अमेरिका जाने के लिए वीज़ा देने से मना कर दिया था। खबर आई कि पिछले दो साल से अमेरिकी खुफ़िया एजेंसी सीआईए गुजरात के मुख्यमंत्री की जासूसी कर रही थी। ज़ाहिर सी बात है काफ़ी मोटी ‘फ़ाइल’ तैयार की गयी होगी। ख़बर आते ही थोड़ा ग़िला-शिकवा किया गया लेकिन उसके साथ ही प्रधानमंत्री मोदी को जब अमेरिका आने का न्योता मिला और वीज़ा लग गया तो ग़िले-शिकवे भी दूर हो गए और ‘फ़ाइल’ की बात भी आई-गई हो गई। गुप्त ‘फ़ाइल’ सामने पड़ी हो तो कोई ना-नुकुर कैसे कर सकता है। 

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014, सितम्बर में अमेरिका यात्रा की और राष्ट्रपति ओबामा से मुलाक़ात की। निश्चित तौर पर तब तू-तड़ाक (जैसा कि मोदी का दावा है) नहीं की होगी क्योंकि वह सीआईए की फ़ाइल भी सामने पड़ी होगी। यात्रा के दौरान भविष्य-निर्माण (नोटबंदी सहित) संबंधी वक्तव्य जारी किए गए जिसमें नोटबंदी का ज़िक्र कहीं नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ओबामा को ‘जाऊँ छूँ, आऊ जे’ कहा और भारत आने का निमंत्रण देकर लौट आए। 

इस यात्रा के बाद 25 से 27 जनवरी, 2015 भारत के गणतन्त्र दिवस के पावन अवसर पर आयोजित परेड के मुख्य अतिथि के रूप में अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा भारत पधारे। भारत के इस दौरे पर राष्ट्रपति ओबामा भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने एक रणनीतिक भागीदारी (Strategic Partnership) की घोषणा की थी। जिसे विदेश निति के तहत सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाने की बात की गई थी और इस भागीदारी का मकसद भारतीय अर्थव्यवस्था को केन्द्रीकृत करना भी था, जिसकी प्राप्ति नोटबंदी से ‘लेसकैश’ प्रणाली के द्वारा ही जा सकती थी। 

गुप्त ‘फ़ाइल’ की प्रेत-छाया के नीचे सीआईए द्वारा संचालित यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) द्वारा तैयार ‘कैटलिस्ट’ (Catalyst) नाम की इस एजेंसी की देखरेख में होना तय किया गया है जिसका सीईओ, स्नेपडील के उपाध्यक्ष बादल मालिक को बनाया गया। यह वही ‘स्नेपडील’ है जिसका विज्ञापन पहले फ़िल्म अभिनेता आमिर खान करते थे और असहिष्णुता के बारे में बयान देने पर उन्हें हटा दिया गया था। 

‘कैटलिस्ट’ और भारतीय वित्त मंत्रालय के बीच हुए इस ‘समझौता ज्ञापन’ (MOU) की खबर की तसदीक अपने यहां ‘इकनोमिक टाइम्स’ (Oct 18, 2016) ने भी की थी और बताया था कि USAID ही ‘कैटलिस्ट’ को तीन साल के लिए फंडिंग करेगा लेकिन यह फंडिंग कितनी होगी इसे गोपनीय रखा गया। सब जानते हैं खुफ़िया एजेंसी सीआईए और प्रधानमंत्री मोदी सब काम गोपनीय तरीके से करते हैं।

इस सारी योजना के तहत जब भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन से नोटबंदी के बाबत सलाह की गई तो उन्होंने ऐसा करने से यह कहते हुए साफ़ इंकार कर दिया कि इससे देश को फायदा कम नुकसान ज्यादा होगा। इंतज़ार का फल मीठा होता है सो प्रधानमंत्री मोदी ने इंतज़ार किया। रघुराम राजन का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद मोदी के करीबी मुकेश अम्बानी के एक मुलाजिम उर्जित पटेल को भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बना दिया गया। उर्जित पटेल को प्रधानमंत्री मोदी अच्छी तरह से जानते थे क्योंकि उर्जित पटेल 2005-06 में गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन में कार्यकारी निदेशक हुआ करते थे। मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉरपोरेशन से मुकेश अम्बानी को कितना नफा-नुक्सान हुआ यह कहानी अलग है लेकिन उसके बाद उर्जित पटेल अम्बानी के मुलाजिम हो गए थे।  

उर्जित पटेल ने गवर्नर पद सँभालते ही नोटबंदी की इजाज़त दे दी। देश की जनता को उसके बाद क्या कुछ देखना-झेलना पड़ा है यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। एंतोनियो ग्राम्शी के कथनानुसार मनुष्य केवल ‘शक्ति’ के द्वारा ही नहीं बल्कि ‘विचारों’ के द्वारा भी शासित होता है। यही वजह रही कि कतारों में खड़े कई भद्रलोक तब भी इस बात पर यकीन कर रहे थे कि यह फैसला देश के भले के लिए लिया गया है। कुछेक का मानना था कि फैसला तो ठीक है लेकिन जल्दी कर गए, पहले करेंसी का बंदोबस्त कर लेना चाहिए था। 

जितने मुंह उतनी बातें। लेकिन बात खुल कर तब सामने आई जब पिछले दिनों प्रख्यात जर्मन अर्थशास्त्री और व्यापार-पत्रकारिता से जुड़े नोर्बर्ट हेरिंग (Norbert Haring) ने यह खुलासा किया कि यह कदम अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा के कहने पर उठाया गया और इसकी तैयारी और पैसा अमेरिकी एजेंसी ‘यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ (USAID) ने दिया था।  ‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन ग्लोबलाईज़ेशन’ के शोधकर्ता कॉलिन टॉडहन्टर ने भी इस फैसले को “मेड इन अमेरिका’ बताते हुए यह बात सामने रखी कि इसके लिए सारी तैयारी ‘यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ (USAID) ने भारतीय वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर की थी।  

‘कैश के विरुद्ध भागीदारी’ के नाम पर हुए इस समझौते को सरसरी निगाह से देखने पर यही समझ में आता है कि ‘कैटलिस्ट’ का काम ‘कैशलेस’ भारत को ‘डिजिटल इंडिया’ बनाने में मदद करना है और पूरी ‘अर्थव्यवस्था की स्केलिंग’ करना भर है। लेकिन व्यवहारिक नज़रिए से देखें तो ‘कैटलिस्ट’ नाम की यह संस्था भारत की पूरे आर्थिक प्रबन्ध की नेटवर्किंग के अन्दर प्रवेश करके न सिर्फ भारत की एक-एक पाई का हिसाब रखेगी बल्कि अमेरिका को भारत का आर्थिक भविष्य डिज़ाइन करने में भी मदद करेगी।

समझौता ज्ञापन (MOU) के मुताबिक ‘कैटलिस्ट’ को जिन छह शहरों में काम करना था उनमें इंदौर, विशाखापट्नम, कोटा, जयपुर, भोपाल के अलावा नागपुर का नाम भी था, जहाँ आरएसएस का हेड क्वार्टर है। एक बार फिर साबित हुआ कि इतिहास अपने को दोहराता है। 1968 में इसी अमेरिकी एजेंसी USAID ने ‘हरित क्रांति’ के नाम पर भारत को कृषि की एक प्रयोगशाला के रूप में इस्तेमाल किया था जिसके परिणाम हम आज भी किसानों की ‘आर्थिक संकट से उपजी आत्महत्याओं’ के रूप में भुगत रहे हैं। 

भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों को लेकर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस होती रहती है और इसमें विमर्श का केंद्र हमेशा से ही ‘संप्रभुता’ का रहा है। अब जब मोदी सरकार ने इस ‘कैटलिस्ट’ नाम की एजेंसी को जिस तरह से देश की अर्थव्यवस्था को मापने का कार्यभार सौंपा है तो इसके साथ ही फिर एक बार इस प्रश्न का खड़ा होना स्वाभाविक है कि उस किसी भी देश की संप्रभुता कितनी सुरक्षित मानी जाएगी जिसकी आर्थिक नीतियां विश्व चौधरी अमेरिका की संस्था के निर्देशों के तहत बनाई जा रही हों और उनका कार्यान्वयन भी उसी की देख-रेख में होना तय हो गया हो? इसका एक उदाहरण तो तभी सामने आ गया था जब ट्रम्प ने अपने परम मित्र मोदी को चेतावनी दी थी कि ‘आप अपनी दवाइयाँ बहुत सस्ती बेच रहे हैं।‘ मोदी फिर भी ट्रम्प का चुनाव प्रचार करते रहे। 

इसमें उस गुप्त फ़ाइल की क्या भूमिका है पता नहीं पर भारत पर बनाए जा रहे दबाव का ही नतीजा है कि मोदी सरकार के राज में विश्व बैंक ने भारत का ‘विकासशील’ का तमगा भी हटा लिया है। अब भारत निम्न मध्य आय कैटेगरी में गिना जाएगा। भारत नए बंटवारे के बाद जांबिया, घाना, ग्‍वाटेमाला, पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश और श्रीलंका जैसे देशों की श्रेणी में आ गया है। सबसे हास्यास्पद बात यह है कि इस दरम्यान हमारे वित्त मंत्रालय द्वारा आंकड़ों की जादूगरी दिखाते रहने की वजह से भारत का दुनिया की ‘सबसे तेज बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍था’ का तमगा बरकरार रहा। विश्व बैंक के इस दबाव का असर बजट में भी साफ़ देखा जा सकता है और बैंकों के विलय के फैसले में भी।  

किसी भी देश पर पिछले दरवाजे से किस तरह से कब्जा किया जाता है, कैसे तख़्ता पलट किया जाता है, कैसे विभिन्न देशों के सत्ताधारियों को ब्लैकमेल किया जाता है, नहीं मनाने पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री क़त्ल कर दिये जाते हैं यह बात जॉन पर्किंस अपनी किताब ‘कनफेशंस ऑफ आ एकोनोमिक हिटमैन’ में कर चुके हैं। संयुक्त राज्य अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) या ‘कैटलिस्ट’ (Catalyst) के साथ किये गए करार की बात अगर झूठ है तो इसे प्रधानमंत्री मोदी को लोगों के सामने खुलकर रखना चाहिए। नहीं तो लोग तो कहेंगे ही कि नव-दासता की ओर पहला कदम था- नोटबंदी। लोग तो कहेंगे ही कि- देश की आज़ादी और संप्रभुता का सौदा है नोटबंदी। देश के साथ द्रोह है –नोटबंदी। 

झूठ को सच बना देने की कला में कोई कितना भी माहिर हो एक बात तो तय है कि सच को ज्यादा दिनों तक नहीं छुपाया जा सकता। जो सच सामने है उसके आधार पर धूमिल के शब्दों में कहें तो, 

‘हवा से फड़फड़ाते हुए हिंदुस्तान के नक्शे पर
गाय ने गोबर कर दिया है’  

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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