एक थी जॉर्ज फ्लायड की हत्या और एक है तूतीकोरिन में बाप-बेटे की पुलिस कस्टडी में मौत!

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पुलिस हिरासत में मारे गए पिता और पुत्र।

नई दिल्ली। एक अफ्रीकी-अमेरिकी की पुलिस प्रताड़ना से मौत के बाद अमेरिका समेत पूरी दुनिया में विद्रोह उठ खड़ा होता है। दास और औपनिवेशिक दौर की मूर्तियां ढहाई जाने लगती हैं। श्वेत समुदाय के लोग अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों से माफी मांगना शुरू कर देते हैं। यहां तक कि अमेरिकी पुलिस घुटनों के बल खड़ी होकर अफ्रीकी-अमेरिकियों से माफी मांगती है। लेकिन भारत में उससे भी ज्यादा जघन्य, क्रूर, वीभत्स, दर्दनाक और एक तरह से कहें कि हैवानी घटना के बाद भी किसी की कान पर जूं तक नहीं रेंगता है। यहां पुलिस आरोपों को सीधे खारिज कर देती है।

विपक्षी राजनेता बयान देकर अपनी खानापूर्ति कर लेते हैं। सरकार कुछ मुआवजे का ऐलान कर कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेती है। और समाज में तो कोई जुंबिश ही नहीं दिखती है। एक मुर्दा समाज जो सदियों से इससे भी ज्यादा घिनौनी चीजों का वाहक रहा हो भला उसकी चमड़ी पर इसका क्या असर पड़ने वाला है। लिहाजा बाप-बेटे की क्रूर हत्या सोशल मीडिया में पकने वाली चाय की कुछ प्यालियों की चर्चा तक ही सीमित हो कर रह जाती है। 

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घटना कुछ यूं है कुछ रोज़ पहले तूतीकोरिन पुलिस ने मोबाइल बेचने वाले दो व्यक्तियों को अपनी ‘कस्टडी’ में ले ली थी। आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने उन्हें खूब पीटा। हिरासत में लिए गए पिता और पुत्र पुलिस की मार झेल नहीं पाये और वे अस्पताल में दम तोड़ दिए। यह भी कहा जा रहा है कि उनके साथ पुलिस ने ‘सेक्सुअल’ हिंसा भी की। हालाँकि यह सब कुछ जांच का विषय है, मगर इस घटना ने तमिलनाडु में तूफ़ान मचा रखा है और पुलिस और सरकार के प्रति लोगों में ज़बरदस्त गुस्सा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस हिंसा के शिकार पिता और पुत्र मोबाइल के व्यापारी थे। उनका संबंध नादर (Nadar) जाति से है। पी. जयराज (59 साल) और उनके पुत्र जे बेन्निक्स (31 साल) को तूतीकोरिन पुलिस ने शुक्रवार को हिरासत में लिया था। कोरोना वायरस के दौरान लॉकडाउन से सम्बंधित नियमों का पालन नहीं करने के इलज़ाम में उन्हें गिरफ्तार किया था। पुलिस का आरोप है कि इन दोनों ने लॉकडाउन के नियम के खिलाफ 8 बजे शाम के बाद भी दुकान खोल रखी थी।  

पुलिस के अनुसार, कोविलपट्टी ‘सब-जेल’ में जयराज को तेज़ बुखार आया और बेन्निक्स के सीने में दर्द उठा। फिर उन्हें स्थानीय सरकारी अस्पताल ले जाया गया। मगर कुछ घंटों के अन्तराल के बाद दोनों मर गए। पुलिस की बातों को ख़ारिज करते हुए परिवारवालों ने आरोप लगाया है कि जयराज और बेन्निक्स के साथ पुलिस ने ‘टार्चर’ किया जिससे उनकी मौत हो गई है।

इस घटना के बाद आरोप प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो गई है। विपक्षी पार्टी डीएमके ने सत्ता में बैठी एआईएडीएमके सरकार को निशाना बनाया है और दुःख ज़ाहिर किया है कि कैसे पुलिस कानून को अपने हाथ में ले सकती है। वहीं दूसरी तरह राज्य की सरकार ने मृतक के परिवारवालों को 25 लाख रूपए देने की घोषणा की है और साथ-साथ उनके परिवार को नौकरी देने का वादा किया है। इस के अलावा पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने ट्वीट कर कहा है कि “पुलिस द्वारा हिंसा एक जघन्य अपराध है। यह विडंबना है कि जब रक्षक ही शोषक बन जा रहे हैं।” 

संवेदना ज़ाहिर करना और मृतक के घरवालों के प्रति सहयोग की भावना रखना अच्छी बात है। मगर बड़ा सवाल यह है कि किस तरह बेलगाम पुलिस को काबू  में किया जाये? कैसे उनको जनता के साथ सहयोग के भावना से काम करने के लिए प्रेरित किया जाये? कैसे यह सुनिश्चित किया जाए कि फिर कोई जॉर्ज फ्लॉयड की मौत न मरे। कैसे इस बात को यकीनी बनाया जाये कि तमिलनाडु के उपर्युक्त पिता और पुत्र के साथ जो कुछ भी हुआ, वह किसी दूसरे इन्सान को न झेलना पड़े। 

इस के लिए ज़रूरी है कि पुलिस में सुधार किया जाये। उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करने के लिए तैयार किया जाये। उनके दिलों में यह बात बैठाई दी जाए कि लोकतंत्र में पुलिस अपनी मनमानी नहीं थोप सकती है। पुलिस को यह भी बतला दिया जाए कि अगर उन्होंने कानून को अपने हाथ में लिया तो इस के बड़े बुरे नतीजे होंगे। जो पुलिस अफसरान कानून तोड़ते हैं उनको अक्सर ऐसा लगता है कि उन्हें राजनेता और सरकार बचा लेगी। मगर पुलिस सुधार की कामयाबी इसी में है कि पुलिस को भी कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए। अगर पुलिस को लोकतंत्र जैसे ढांचे में काम करना है तो उनके दफ्तर में और सारे बड़े बदलाव करने की ज़रुरत है। 

सब से पहली बात तो यह है कि पुलिस जनता के साथ आज भी उसी जेहन से काम करती है जब वह अंग्रेजों के दौर में किया करती थी। अपनी स्थापता से (1861) लेकर आजतक पुलिस आम जनता के लिए एक भय, भ्रष्टाचार और हिंसा की अलामत है। शुरूआती दौर से ही पुलिस को ज्यादा पावर दिया गया ताकि वे आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को कुचले सकें। यही वह दौर था जब “राजद्रोह” (124-A) के हथियार पुलिस को दी गयी ताकि  स्वतंत्रा सेनानियों  को बड़ी आसानी से जेल में डाला जा सके। 

दुर्भाग्य देखिये कि आज़ादी के 70 साल गुज़र जाने के बाद न तो पुलिस की गुंडागर्दी पर ही लगाम लगी और न ही काले कानून को ही ख़त्म किया गया। विडम्बना देखिये कि जिस औपनिवेशिक देश ने राजद्रोह का कानून बनाया था उसने इसे कब का ख़त्म कर दिया है, वहीं जो लोग आज़ादी से पहले इसके शिकार थे वे आज़ादी के बाद इसका इस्तेमाल विरोधियों को खामोश काराने के लिए किया जाता रहा है।

पुलिस सुधार के लिए यह ज़रूरी है कि उसे राजनीतिक दबाव से दूर रखा जाये। बहुत सारे विद्वानों और पुलिस के रिटायर्ड अफसरान का कहना है कि पुलिस अपने पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने में इस लिए विफल हो जाती है कि वह राजनीतिक दबाव में काम करती है। तभी तो पुलिस, राजनेताओं और आपराधिक तत्वों के बीच मौजूद गठजोड़ को ख़त्म किए बगैर पुलिस रिफॉर्म्स का लक्ष्य पूरा हो सकता है। इन दिनों दिल्ली पुलिस भी सरकार के दबाव में काम कर रही है। ऐसे ऐसे सामाजिक और राजनीतिक एक्टिविस्टों को जेल में डाला जा रहा है जो सरकार से अलग राय रखते हैं।

पुलिस सुधार की करवाई के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि पुलिस के अन्दर जड़ जमा चुकी सांप्रदायिक मानसिकता को ख़त्म किया जाए। साथ ही साथ पुलिस में वंचित तबकों — खासकर मुसलमानों — को उचित प्रतिनिधित्व देने की ज़रूरत है। याद रहे कि आज़ादी से पहले मुसलमान लोग फ़ौज और पुलिस में अच्छी तादाद में थे। मगर आज़ादी के बाद उनका प्रतिनिधित्व कम होता चला। मिसाल  के तौर पर आज देशभर में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व पुलिस में उनकी आबादी का आधा (6 से 7 %) है। 

हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी पुलिस में सुधार करने की खातिर एक आर्डर पर दस्तख़त किया है। जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या के बाद, अमेरिका में नस्लपरस्ती के विरोध में आन्दोलन इतना तेज़ हुआ कि अमेरिकी सरकार तक को पुलिस सुधार करने के लिए झुकना पड़ा। क्या भारत में ऐसा कुछ शीघ्र नहीं होना चाहिए?  

(अभयकुमारजेएनयू से पीएचडी हैं। आप अपनी राय इन्हें debatingissues@gmail.com पर भेज सकते हैं।)  

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