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फेसबुक पोस्ट के चलते पासपोर्ट रद्द! मोदी सरकार निकाल रही है कश्मीरियों को डराने के नये-नये तरीके

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कश्मीर में सुरक्षा बलों का जमावड़ा।

नई दिल्ली। 29 अगस्त को जम्मू और कश्मीर पुलिस के एक अफसर ने पांच आदमियों के नाम और फेसबुक प्रोफाइल फोटो ट्वीट कर आरोप लगाया कि वो “झूठी खबरें पोस्ट कर इलाके के लोगों को भड़का कर शांति भंग करना चाहते हैं।”

ये लोग पुंछ और राजौरी ज़िले के हैं जो हाल ही में बने केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा हैं और फ़िलहाल कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात (यूऐई) में रहतें हैं, और इन लोगों पर फेसबुक  में “संवेदनशील टिप्पणियां” पोस्ट करने का आरोप है।

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पुलिस ने इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की है जिसमें इन पर लगाए आरोपों  में “धर्म, नस्ल, … के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना“ और सूचना तकनीक अधिनियम की धारा 66B के अंतरगत “बेईमानी से चोरी हुए कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण प्राप्त करने की सजा” शामिल हैं।

श्रीनगर के एक कश्मीरी भौतिक शास्त्री, जिन्होंने 20 अगस्त को एक फेसबुक पोस्ट में भारतीय सेना पर एक कश्मीरी के साथ मार-पीट और अत्याचार करने का आरोप लगाया था ने जब यह खबर सुनी तो वह चिंतित हो गए।

यह मामला अपने आप में चौंका देने वाला नहीं था- सोशल मीडिया पोस्ट्स की वजह से भारत में लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत कई बार दर्ज हो चुकी है, खास कर 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद। 

जिस बात ने इन भौतिक शास्त्री को, जो कि यूरोप में पढ़ रहे हैं असल में चौंका दिया वह एक न्यूज़ रिपोर्ट थी, जिसमें राजौरी, जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) युगल मन्हास ने बयान दिया कि इन पांच आदमियों के पासपोर्ट को रद्द करने की प्रक्रिया जल्द ही चालू की जाएगी। 

“क्या अब वो पासपोर्ट रद्द करना शुरू कर देंगे? मुझे नहीं पता क्या करना चाहिए। क्या मुझे अपनी पोस्ट हटा लेनी चाहिए? मैं वो बिलकुल भी नहीं हटाना चाहता। मुझे मालूम है कि मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं।”, अपनी पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर इन भौतिक शास्त्री का हमें तह बयान मिला।

एक इंटरव्यू में एसएसपी मन्हास ने हफपोस्ट को बताया कि इन पांच लोगों नें ऐसी पोस्ट्स लिखी थीं जो “एक धार्मिक समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर रही थीं,” और  भारत की संप्रभुता को खतरा पंहुचा रही थीं। “उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा है कि ‘हम भारत सरकार के खिलाफ जेहाद करने के लिए तैयार हैं,” मन्हास ने बताया।  

जांच पड़ताल जारी है और उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि इन लोगों के पासपोर्ट रद्दीकरण के विकल्प पर विचार किया जा रहा है जिससे इन लोगों की “उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।”

लोगों को देश में वापस लाने के लिए पासपोर्ट रद्द करने की रणनीति केवल तभी काम कर सकती है जब भारत का उन देशों में जहां यह लोग रह रहे हैं उन के साथ प्रत्यर्पण समझौता या संधि हो, जो इस मामले में कुवैत और यूएई से है।

हालांकि, मन्हास ने हफपोस्ट इंडिया के साथ बातचीत में यह स्वीकार किया कि जब उन्होंने मीडिया से उन लोगों के पासपोर्ट रद्द करने के बारे में बात की थी तब उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि भारत ने दोनों देशों के साथ प्रत्यर्पण संधि की है या नहीं ।

रिकॉर्ड के लिए, भारत के पास कुवैत और यूएई के साथ प्रत्यर्पण संधियां हैं।

लेकिन पांच वकीलों ने हफपोस्ट इंडिया को बताया कि कथित रूप से आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट पर विदेश में रहने वाले नागरिकों के पासपोर्ट को रद्द करने जैसा कदम उठाना “अभूतपूर्व” है। 

जब से सरकार ने जम्मू और कश्मीर के विशेषाधिकारों को निरस्त किया  है, J & K- जो अभी भी गंभीर संचार और यातायात प्रतिबंधों के दौर से गुज़र रहा  है – सरकार की ज़्यादती और सीमा से बाहर जा कर नियंत्रण करने की एक प्रयोगशाला में बदल गया है।

जैसा कि इस उदाहरण से पता चलता है, कानून और व्यवस्था बनाए रखने का बहाना उन फ़ैसलों की ओर अग्रसर है जो न केवल भारतीय नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि खतरनाक मिसाल भी कायम करते हैं।

नेताओं सहित हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया है या गिरफ्तार किया गया है, न केवल उनके मौलिक अधिकारों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए, बल्कि जम्मू और कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) का भी पालन न करते हुए। बिना फोन और इंटरनेट, परिवारों को यह पता लगाने में भी मुश्किल हो रही है कि उनके रिश्तेदार कहां हैं, कानूनी मदद और सलाह तो दूर की बात है।

पासपोर्ट के मुद्दे पर, सुप्रीम कोर्ट की वकील कामिनी जायसवाल ने कहा, “आपका सवाल है कि क्या वे ऐसा कर सकते हैं?” हां, वे ऐसा कर सकते हैं। उन्होंने बिना आधार के लोगों को जेल में रखा है। वर्तमान व्यवस्था कुछ भी कर सकती है। वे कानून के शासन की परवाह नहीं करते हैं। आपको इसे चुनौती देनी होगी। “

क्या वे अब पासपोर्ट रद्द करना शुरू करने जा रहे हैं?

पासपोर्ट रद्द करने के बारे में कानून क्या कहता है?

पासपोर्ट अधिनियम, 1967 में पासपोर्ट के निरस्तीकरण और रद्द करने की अनुमति दी गई है, इसके वृहद् और अस्पष्ट मापदंडों के कारण लम्बे समय से इसके दुरुपयोग का ख़तरा बना हुआ है। उदाहरण के लिए, अधिनियम की धारा 10 (3) कहती है कि यदि पासपोर्ट प्राधिकरण “भारत की सुरक्षा” के लिए आवश्यक समझता है तो पासपोर्ट को ज़ब्त या रद्द किया जा सकता है।

सरकार आम तौर पर नीरव मोदी जैसे भगोड़े लोगों के पासपोर्ट को रद्द करने की ओर अग्रसर होती है, यह भगोड़ा हीरा व्यापारी एक अरब डॉलर के बैंक घोटाले के मामले में फरार है, न कि आम नागरिकों के जो बिना अपने पासपोर्ट राज्यविहीन हो जायेंगे। 

1978 के एक मामले में, मेनका गांधी बनाम भारत संघ, पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) (सी) के तहत गांधी के पासपोर्ट को “आम जनता के हितों” में एक पासपोर्ट अधिकारी ने ज़ब्त किया, जिस पर सात न्यायाधीशों वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने फैसला दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 जिस में जीवन का अधिकार और स्वतंत्रता की गारंटी सुनिश्चित की गयी है, में नागरिक की यात्रा और विदेश जाने की स्वतंत्रता भी शामिल है।

इस ऐतिहासिक फैसले में, जिसने जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों के दायरे का विस्तार किया, अदालत ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (1) (ए) – भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता – और अनुच्छेद 21, को साथ में पढ़ा जाना चाहिए।

अदालत ने कहा, “पानी में मिश्रित प्रवाह होना चाहिए जिसमें निर्बाध और निष्पक्ष न्याय हो।”

फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणी।

मेनका गांधी बनाम भारत संघ में सर्वोच्च न्यायालय ने देखा कि अनुच्छेद 10 (3) (सी) के तहत दिया गया सरकारी आदेश अस्पष्ट था, और इससे अधिकारियों को असीम शक्तियां प्राप्त हुईं, जिसने अनुच्छेद 14 में दिए समानता के अधिकार का उल्लंघन किया।

अदालत ने कहा कि गांधी को कारण नहीं बताए गए और न ही उन्हें जवाब देने का अवसर मिला, जो कि ऑडी ऑल्टरम पार्टेम नियम का उल्लंघन है, जिसका मतलब “दूसरे पक्ष को सुनना” है, जिससे  प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन हुआ। 

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि कोई भी कार्यकारी आदेश और प्रक्रिया जिससे किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन होता है, मनमाना या तर्कहीन नहीं हो सकतें हैं, यह नोट किया कि सरकार को पासपोर्ट रद्द या निरस्त करते वक़्त लगभग हमेशा कारण बताना चाहिए।

“यहां तक कि कार्यकारी अधिकारियों को भी जब प्रशासनिक कार्रवाई करनी होती है, जिस से नागरिकों के निहित मौलिक अधिकारों पर कोई रोक या प्रतिबंध होता है, तो ध्यान रखना चाहिए कि न्याय न केवल किया जाए बल्कि प्रकट रूप से भी समझ आए। उनका यह कर्तव्य है कि वे इस तरह आगे बढ़ें कि उनके काम में किसी भी प्रकार की मनमानी, तर्कहीनता या अन्याय की सम्भावना भी  प्रतीत न हो। उन्हें इस तरह से कार्य करना चाहिए जो कि प्रत्यक्ष रूप से निष्पक्ष हो और प्राकृतिक न्याय की आवश्यकताओं को पूरा करता हो।” अदालत ने कहा।

ह्वाट्सएप के बारे में जानकारी।

सुरेश नंदा बनाम सीबीआई, 2008 के एक मामले में, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो ने संजीव नंदा के पिता के पासपोर्ट को जब्त कर लिया था, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत पासपोर्ट ज़ब्त नहीं कर सकती है। (संजीव नंदा दिल्ली के एक व्यवसायी हैं, जिन्होंने 1999 में अपनी बीएमडब्ल्यू को छह लोगों के ऊपर चढ़ा दिया था।)

मेनका गांधी मामले के चार दशक बाद, कश्मीरी भौतिक शास्त्री इस बात पर बहस कर रहे हैं कि क्या उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया जाएगा यदि वह फेसबुक पोस्ट अपनी टाइमलाइन पर रहने देते हैं, क्या उन्हें देश में वापस आने दिया जाएगा, और क्या वह भविष्य में नौकरी ढूंढ पाएंगे।

उन्होंने कहा, “अल्पावधि में, मुझे डर है कि वे मेरा पासपोर्ट रद्द कर देंगे। आगे आने वाले समय में, मान लीजिये, मुझे आईआईटी (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) में एक टीचिंग पोस्ट मिलती है, और कोई व्यक्ति इस पोस्ट को दिखा कर कहता है कि देखो ‘यह कैसे-भारत-विरोधी ’पोस्ट लिख रहा था’, तब क्या होगा? क्या फिर मैं वह पद नहीं खो दूंगा?”

कश्मीर से जाने से पहले इन भौतिक शास्त्री की मां ने उन्हें किसी के साथ कश्मीर की चर्चा करने से मना किया था। लेकिन जब यह 28 वर्षीय दिल्ली में उतरे और लोगों को बात करते हुए सुना कि कैसे कश्मीरियों ने मोदी सरकार के इस कदम का स्वागत किया है और सब कुछ कितना शानदार है, तो वह चुप न रह सके।

यह बात कि वह डरे हुए थे और इसके पहले कि वह एक फेसबुक पोस्ट लिख अपने बचपन के दोस्त के साथ शोपियां में भारतीय सेना के कैंप में हुई मार-पीट और प्रताड़ना के बारे में लोगों को बता सकें  उन्होंने भारत से बाहर जाने का इंतज़ार किया, यह बात वह भौतिक शास्त्री भूले नहीं थे। वे पहले  आईआईटी से पढ़ाई कर चुके हैं और फिलहाल अपनी पीएचडी की पढ़ाई विलायत के एक रिसर्च इंस्टीट्यूट से कर रहे हैं। इस सबके के बावजूद उन्हें अपनी सुरक्षा का डर सताता रहता है।

उन्होंने पिछले दिसंबर में अपने घर में छापे का जिक्र करते हुए कहा,”मुझे पिछले अनुभव से पता है कि आईआईटी वाला कार्ड इन परिस्थितियों में काम नहीं करता है।” 

“मैं निराश हूं। जिन लोगों पर यकीन था कि वह सही और गलत, अच्छे और बुरे के बीच अंतर को समझेंगे, वे इस झूठे राष्ट्रवाद में बह रहे हैं। यह राजनीति के बारे में नहीं है, लेकिन उन लोगों के साथ सहानुभूति के बारे में है जो  इस  भयानक समय से  गुज़र रहे  हैं। ” उन्होंने कहा।

वह जब मस्कट में अपनी कनेक्टिंग फ्लाइट का इंतजार कर रहे थे, तब उन्होंने अपने आप को अपने दोस्त के बारे में लिखने के लिए मजबूर पाया। फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि 12 अगस्त को एक सेना का जवान उनके दोस्त के घर आया, उसकी पिटाई की और उसका फोन जब्त कर 14 अगस्त को शोपियां में सेना के ठिकाने से फ़ोन लेने को कहा।

भारतीय सेना ने कश्मीर में अत्याचार के आरोपों से इनकार किया है।

ये  फिजिसिस्ट जो सामान्य रूप से नियमित अंतराल पर अपने घर आते हैं, कहते हैं कि कम से कम एक वर्ष के लिए भारत वापस आने की योजना नहीं है। उन्हें डर है कि उनके परिवार को निशाना बनाया जा सकता है।

“मैं हताश हूं। ऐसी चीजें हैं जो मैंने अपनी आंखों से देखी हैं लेकिन मैं कुछ नहीं कह सकता। यह एक पिंजरे में रहने जैसा है।,” उन्होंने आगे कहा, “कल, अगर वे मेरा पासपोर्ट रद्द करते हैं, तो सवाल करने  के  लिए भी कौन है?” 

फेसबुक पर अपनी पोस्ट डालने के बाद, कश्मीरी फिजिसिस्ट ने कहा कि वह इस बात पर स्तब्ध थे कि कितने लोगों ने हंसते हुए इमोजी के साथ प्रतिक्रिया दी।

हालांकि, जिस बात ने उन्हें हिलाकर रख दिया था वो एक व्यक्ति की टिप्पणी थी जिसने लिखा, “मैं एनआईए को इसकी सूचना दे रहा हूं। उन्हें जांच करने दो।”

उस व्यक्ति ने इसके बाद info.nia को संबोधित अपने ईमेल का स्क्रीनशॉट अपलोड किया, जिसमें लिखा था, “मेरे सामने एक फेसबुक प्रोफाइल (लिंक) आई जिसकी अच्छी साख प्रतीत होती है जो भारतीय सशस्त्र बलों के खिलाफ पोस्ट कर रही है। प्रोफ़ाइल की लिंक और उसकी सबसे हाल ही की पोस्ट का स्क्रीनशॉट साझा कर रहा हूं। कृपया इसे रजिस्टर करें। धन्यवाद। जय हिन्द।”

(हफ़्फिंगटन पोस्ट इंडिया पर 7 सितम्बर 2019 को प्रकाशित बेतवा शर्मा की रिपोर्ट का साभार सहित अनुवाद। अनुवाद ‘कश्मीर ख़बर’ के लिए सागरिका ने किया है।)  

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