प्रज्ञा को संसद में भेजा ही गया है गोडसे के महिमामंडन के लिए

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अभी तक संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों के लोग कभी चोरी-छुपे तो कभी खुलेआम गांधी को गाली देते थे या फिर उनके हत्यारे गोडसे का महिमामंडन करते देखे जाते थे। लेकिन पहली बार एक चुनी हुयी सांसद ने यह काम किया है। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने गोडसे को देशभक्त बताया था और अब उससे आगे बढ़कर कल उन्होंने एक बार फिर यही बात संसद के भीतर दोहरायी है। चुनाव के दौरान दिए गए उनके बयान की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आलोचना की थी और कहा था कि वह कभी भी प्रज्ञा ठाकुर को दिल से माफ नहीं कर पाएंगे। हालांकि उम्मीद की जा रही थी कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि उल्टे बाद में उनको रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील विभाग की सलाहकार समिति का सदस्य बनाकर पुरस्कृत कर दिया गया। यह नियुक्ति इसलिए सवालों के घेरे में आ जाती है क्योंकि प्रज्ञा ठाकुर खुद आतंकी गतिविधियों में शामिल होने की आरोपी हैं और अभी भी इस मामले में उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। ऐसे में भला उन्हें इस तरह के किसी संवेदनशील फोरम में कैसे रखा जा सकता था?

सरकार का यह फैसला बताता है कि मोदी के दांत दिखाने के कुछ हैं और खाने के कुछ और। हालांकि इस घटना के बाद अभी भी कुछ लोग मोदी से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि पिछली बार भले ही उन्होंने कोई कार्रवाई न की हो लेकिन इस बार वह जरूर करेंगे और लिहाजा उनसे इसी तरह की मांग भी कर रहे हैं। इस तरह की उम्मीद करने वाले शायद अभी भी न तो मोदी, न बीजेपी और न ही आरएसएस को समझ सके हैं। दरअसल संघ का गठन एक लक्ष्य के साथ हुआ है। मोदी, बीजेपी और प्रज्ञा ठाकुर से लेकर संघ के तमाम हाइड्रा रूपी संगठन उसी लक्ष्य के लिए कार्यरत हैं। गांधी के साथ सत्य, अहिंसा तथा सत्याग्रह की उनकी विचारधारा उस रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा है। सच्चाई यह है कि गांधी को भले ही भौतिक तौर पर खत्म कर दिया गया हो लेकिन वैचारिक तौर पर वह अभी भी न केवल प्रासंगिक हैं बल्कि अपने पूरे वजूद और पहचान के साथ जिंदा हैं। लिहाजा यह बात तय है कि उन्हें मारने और वैचारिक तौर पर अप्रासंगिक बनाने के जरिये ही संघ खुद को स्थापित कर सकता है।

क्योंकि गांधी और संघ के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। गांधी सत्य की बात करते थे लेकिन संघ का कारोबर झूठ और अफवाह से चलता है। गांधी अहिंसा के पुजारी थे लेकिन संघ शस्त्र की पूजा करता है और हिंसा उसका प्रमुख साधन है। गांधी के लिए सत्याग्रह एक संकल्प है। लेकिन संघ के शब्दकोश में उसका कहीं दूर-दूर तक स्थान नहीं है। क्योंकि वह वर्णव्यवस्था जैसी इस तरह की पुरातनपंथी श्रेणीबद्ध व्यवस्था का पक्षधर है जिसमें चीजें फिक्स्ड हैं। लिहाजा उसमें अधिकार से ज्यादा कर्तव्य मायने रखते हैं। अनायास नहीं संविधान दिवस के मौके पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जनता के अधिकारों की जगह उसे उसके कर्तव्यों की याद दिलाते दिखे।

अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में संघ के सामने सबसे बड़ा कार्यभार यह है कि वह जनता के मानस से गांधी को हटाए। उसके लिए वह एक तरफ गांधी की छवि को हर तरीके से धूमिल करते हुए मटियामेट करने की कोशिश कर रहा है तो दूसरी तरफ उनके हत्यारे गोडसे और दूसरे आरोपी रहे वीर सावरकर को महिमामंडित करने का काम कर रहा है। सरकार में आने के बाद नरेंद्र मोदी भी इसी प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहे हैं। देश और दुनिया में गांधी जी की 150वीं जयंती मनायी जा रही है। कहने के लिए सरकार भी उस काम में ‘धूमधाम’ से लगी है। लेकिन क्या कभी देश में कोई ऐसा अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुआ जिसमें देश और दुनिया की बड़ी शख्सियतें हिस्सा ली हों? क्योंकि गांधी कोई मामूली शख्सियत नहीं थे। और दुनिया के तमाम देशों में न केवल उनके समर्थक हैं बल्कि सरकारों और संस्थाओं के स्तर पर भी उन्हें मान्यता हासिल है।

इसलिए अगर सचमुच में गांधी को मानने वाली कोई सरकार होती तो क्या यह उसका पहला कर्तव्य नहीं बनता कि वह गांधी और उनके विचारों पर इस तरह का कोई अंतरराष्ट्रीय आयोजन करती। लेकिन गांधी को मोदी जी ने देश निकाला दे दिया है। वह बौद्ध धर्म की की तरह चाहते हैं कि गांधी भी बाहर ही रहें। इसीलिए जब विदेश की धरती पर जाते हैं तो उन्हें गांधी और बौद्ध धर्म दोनों याद आते हैं। लेकिन देश में रहते उनको इन दोनों में से किसी की जरूरत नहीं पड़ती।

दरअसल देश में गांधी को खत्म करने का नरेंद्र मोदी प्रोजेक्ट चला रहे हैं। क्या कभी किसी ने गांधी पर बोलते हुए मोदी के मुंह से सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह शब्द सुना? कभी नहीं सुना होगा। क्योंकि मोदी को उनके इन विचारों को खत्म करना है। और उसे महज स्वच्छता तक सीमित कर देना है। और रणनीति यह है कि स्वच्छता का लक्ष्य पूरा होने के साथ ही गांधी भी खत्म हो जाएंगे। साथ ही इसके समानांतर गांधी के हत्यारे और वैचारिक तौर पर उनके धुर विरोधी गोडसे तथा सावरकर को स्थापित कर देना है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सावरकर को भारत रत्न देने की बहस को चुनावी एजेंडा बनाना इसी लक्ष्य का एक हिस्सा था। वरना कोई बता सकता है कि इस देश में किसी को भारत रत्न देने के मुद्दे को कभी चुनावी एजेंडा बनाया गया हो?

दरअसल सावरकर की फोटो को संसद के कक्ष में पहले ही लगा दिया गया है अब उनके बगल में गोडसे को लगाए जाने की बारी है। और इस तरह से गांधी को देश और समाज की जेहनियत से खत्म करने के बाद आखिरी लड़ाई संसद में होगी। जिसमें अभी प्रारंभिक दौर में साव रकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग की जा रही है। उसकी अगली कड़ी में गोडसे के चित्र को संसद में लगाये जाने की मांग सामने आ सकती है। और फिर गांधी और गोडसे आमने-सामने होंगे। और इस तरह से गोडसे और सावरकर की स्थापना के साथ ही गांधी को वैचारिक तौर पर मारने का संघ का लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा।

लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। यह तभी संभव है जब देश की पूरी जनता झूठ और अफवाहों में जीने लगे। जब वह आजादी की पूरी लड़ाई और उसकी विरासत भुला दे। या फिर पूरा देश एक फासिस्ट राज के लिए वह तैयार हो जाए। लेकिन निकट भविष्य में अभी भी ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है। प्रज्ञा ठाकुर का गोडसे को महिमामंडित करने का मसला बेहद गंभीर है। और उस पर न केवल विपक्षी दलों बल्कि पूरे देश को प्रतिकार में उठ खड़ा होना चाहिए। और इस मामले में प्रज्ञा से माफी नहीं बल्कि उनकी संसद की सदस्यता खत्म करने की मांग पूरे जोर-शोर से उठनी चाहिए।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

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