Tuesday, October 26, 2021

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देश की सत्ता और भारतीय जनता के बीच भगत सिंह की लाश!

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सुप्रसिद्ध लेखक पत्रकार खुशवंत सिंह की पुस्तक ‘दिल्ली’ का हिंदी अनुवाद करते हुए ऊषा महाजन ने (दिल्ली की असलियत) में लिखा है, “ज्ञातव्य है कि खुशवंत सिंह के दादा सुजान सिंह और पिता सोभा सिंह नई दिल्ली को बनाने वाले बिल्डरों-ठेकेदारों में प्रमुख माने जाते थे”

‘दिल्ली’(पृ-291-92) में उल्लेख है “(8)अप्रैल, 1929 की एक सुबह थी, मैं (सोभा सिंह) अपना पास लेकर सेंट्रल असेंबली की विजिटर्स गैलरी में बैठा था, सुनने में आया था कि बहुत रोचक वाद-विवाद होने वाला है। उग्रवाद का मुकाबला करने के लिए प्रस्तावित ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ को पास न होने देने के लिए कांग्रेस इसकी धज्जियां उड़ाने वाली थी, मैं हॉल में झांक कर यह देख रहा था कि ऐसे कौन-कौन से प्रसिद्ध नेता हैं, जिनकी तस्वीरें अखबारों में आती रहती हैं। अपने साथ गैलरी में बैठे लोगों पर मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया, सिवाय दो नवयुवकों के, जो मेरी दाईं ओर बैठे थे, उन लड़कों ने कोट-टाई वगैरह नहीं पहन रखे थे। कॉलेज ने निरे छोकरे लग रहे थे, बहस उतनी दिलचस्प नहीं हो रही थी, जितनी मैंने सोचा था। लंबे-लंबे लच्छेदार भाषण हो रहे थे, जो उतनी दूर से मुझे ठीक से सुनाई भी नहीं दे रहे थे।

इसलिए अपने साथ लाए अखबार की सुर्खियों पर भी नजर दौड़ाने लगा, अचानक देखा कि मेरी गल मे बैठे वे दोनों युवक सदस्यों पर गोलियां बरसा रहे थे। सदन में धुआं उठ रहा था और लोग दरवाजों की तरफ दौड़ रहे थे या बेंचों के नीचे छिप गए थे। ‘विजिटर्स गैलरी’ खाली हो चुकी थी, सिर्फ मैं ही अपनी सीट पर जहां का तहां बैठा था और युवक गोलियां चलाते जा रहे थे, मैंने देखा कि उनमें से एक लड़का अपनी पिस्तौल को थपथपा रहा था। शायद उसमें गोलियां खत्म हो चुकी थीं। तभी पिस्तौल लिये पुलिस वालों ने हमें घेर लिया। एक एंग्लो इंडियन सार्जेन्ट ने चिल्लाकर कहा ‘हैड्स अप’! हमने अपने हाथ ऊपर उठा दिए। लड़कों ने अपनी पिस्तौलें पुलिस को सौंपने से पहले मेरी ओर देखा और मुस्कुराए। मैं मानद मजिस्ट्रेट था। पुलिस ने मुझे पहचान लिया और सदन के बाहर निकाल ले गए।

विधायकों को मारने से उन लड़कों को क्या मिलने वाला था, यह बात मेरी समझ के बाहर की चीज थी, यह मैं जानता था कि इसके लिए अब उन्हें फांसी दे दी जाएगी और यही हुआ भी (इससे पहले उन्होंने एक ऐंग्लो इंडियन सार्जेंट का कत्ल किया था और उसी के लिए उन्हें फांसी दी गई। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च, 1931 को फांसी लगी थी)” (पेपरबैक संस्करण1995, किताबघर, नई दिल्ली)

इसके बाद की कहानी दिल्ली में ही क्या शायद भगत सिंह के बारे में अभी तक प्रकाशित किसी भी किताब में नहीं है, असेंबली (संसद भवन) में बम फेंकने की उपरोक्त घटना (दोपहर के खाने) के बाद नई दिल्ली पुलिस स्टेशन में सर सोभा सिंह ने अपना बयान दर्ज करवाते हुए कहा “12 बजकर 25 मिनट पर मैं असेंबली पहुंचा, मैं विजिटर्स गैलरी में खड़ा था, जब अध्यक्ष ने ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’पर फैसला सुनाया और ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’पर फैसला सुनाया और ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’पर अपना आदेश दिया, मैंने देखा कि एक लंबा नवयुवक, जो नमदे की टोपी पहने हुए था, सदन के फर्श पर कुछ फेंक रहा था, उसके पास ही एक और छोटा सा व्यक्ति खड़ा था, जिसके सिर पर बाल नहीं थे। दोनों ने ही खाकी निकर पहन रखी थी… तब मैंने देखा कि दूसरा आदमी कुछ गिरा रहा है, मेरे ठीक पीछे वर्दी में दो पुलिस वाले खड़े थे और मैंने उनसे बम फेंकने के लिए जिम्मेवार व्यक्तियों को गिरफ्तार करने के लिए कहा, इसके ठीक बाद उसी दिशा में से मैंने दो पिस्तौल चलने के धमाके सुने, पूरे सदन में धुआं ही धुआं था, लेकिन मैंने इन दोनों व्यक्तियों को दो अंग्रेज और दो भारतीय पुलिस वालों द्वारा गिरफ्तार करते हुए देखा था। मैं दोषी व्यक्तियों को पहचान सकता हूं”। (फाइल नं. 306, खण्डⅴ/ⅶ,पृ0 44, राष्ट्रीय अभिलेखागार)

13 अप्रैल, 1929 को सुबह (करीब 9.30 बजे) अब्दुल समद, प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के द्वारा नई दिल्ली पुलिस स्टेशन में बटुकेश्वर दत्त और थाना कोतवाली में भगत सिंह की शिनाख्त परेड करवाई गई थी, जिसमें ‘सरदार साहिब सोभा सिंह, ऑनरेरि मजिस्ट्रेट, नई दिल्ली’ भी शिनाख्त करने वालों में शामिल थे। (फाइल न. 306 ए, खंडⅴ/ⅶ पृ.30-36)

4 जून , 1929 को जिला न्यायाधीश जे. मिडिलटन की अदालत में जो (जिला कारागार में बनाई गई थी, और उस समय वहां होती थी, जहां अब मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज है) सरकारी गवाह नंबर 7, सर सोभा सिंह, सुपुत्र-सुजान सिंह उम्र 38 वर्ष, जाति-हिंदू सिख, निवासी नई दिल्ली, व्यवसाय-ठेकेदार और मानद मजिस्ट्रेट ने शपथ उठाकर बायन दिया था—

जिस दिन बम गिरे, मैं लेजिस्लेटिव असेंबली में था। असेंबली के अंदर मेरे कुछ दोस्त थे और मुझे उनके साथ दोपहर भोज के लिए आमंत्रित किया गया था। मैं असेंबली भवन में करीब 12.30 बजे पहुंचा था। उस समय “ट्रेड डिस्प्यूट बिल’पर मत के लिए घंटी बज रही थी, मैं नक्शे में ‘जी’निशान के स्थान पर खड़ा था। मेरे दोस्त गैलरी में सीट न. 139 के नीचे और ऊपर बैठे हुए थे।

इसके बाद मैं ध्यान से अपने दोस्तों पर निगाहें टिकाए हुए था। ताकि वे भीड़ में गुम न हो जाएं, तब मैंने देखा कि गैलरी में उन (दोस्तों) के पीछे खड़ा एक आदमी कुछ फेंक रहा है, जो मुझे सिगरेट केस जैसा लगा और तब बम फटने का धमाका सुनाई पड़ा। वहां धुआं ही धुआं था और लोग इधर-उधर भागने लगे, मुझे कुछ समझ में नहीं आया कि हुआ क्या है।

देखा कि मेरे दोस्त खड़े हो गए औ उन्होंने अपनी सींटें छोड़ दीं। तब मैंने देखा कि एक दूसरा आदमी भी जो पहले आदमी के पास ही खड़ा था। कुछ और फेंक रहा था। उसने चीज गिराई, वह सीट नं.144 के पास गिरी इससे धुआं और शोर हुआ।

तब मैंने ऊपर सीढ़ियों पर जाने के लिए अपनी सीट छोड़ दी। तभी मैंने दो बार पिस्तौल चलने की आवाज सुनी। वहां पुलिस के दो सिपाही थे। मैंने उनसे उन दो आदमियों, जो कुछ फेंक रहे थे, को गिरफ्तार करने के लिए कहा, पुलिस सदन के उस भार की ओर भागी और मैं उनकी पीछे-पीछे, जब मैं उस स्थान नजदीक पहुंचा, तो पुलिस सदन के उस भाग की ओर भागी और मैं उनके पीछे-पीछे। जब मैं उस स्थान के नजदीक पहुंचा, तो पुलिस वालों से मिला, जो उन दोनों को गिरफ्तार करके ला रही थी। मैं अदालत में उन दोनों अभियुक्तों को पहचानता हूं। जिसने पहला बम फेंका था, वह भगत सिंह था और जिसने दूसरा फेंका था वह बटुकेश्कर दत्त था, उस घटना के बाद से ही मैं इनका नाम जानता हूं।

दोपहर के भोजन के बाद पुलिस ने मेरा बयान दर्ज किया था। बाद में पुलिस ने अभियुक्तों की शिनाख्त के लिए मुझे नई दिल्ली पुलिस स्टेशन और थाना कोतवाली में बुलाया था। मैंने भगत सिंह को थाना कोतवाली में और बटुकेश्वर दत्त को नई दिल्ली थाने में पहचाना था। दोनों को ही करीब 20 आदमियों में मिला दिया गया था। इस घटना से पहले मैं उन्हें नहीं जानता था। शिनाख्त परेड से पहले मैंने इन्हें केवल तब देखा था (1) जब इन्होंने बम गिराए थे और (2) जब पुलिस इन्हें गिरफ्तार करने के बाद ले जा रही थी। इन घटनाओं के बाद मैं नीचे असेंबली हॉल में चला गया था और मैंने देखा कि वो बेंच ध्वस्त हो गई है, जहां दूसरा बम गिरा था। सीट नं. 141 के पीछे, लॉबी में एक कुर्सी पर बैठे सर बोमन जी दलाल को भी मैंने देखा था, उन्हें कुछ चोट लगी थी।

इस बयान के बाद मिस्टर आसफ अली वकील द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में सोभा सिंह ने बताया-

मैं एक ठेकेदार हूं और सरकार के लिए काम करता हूं। मैं दिल्ली म्यूनिसिपल कमेटी का मनोनीत सदस्य हूं। जब दोनों अभियुक्तों ने बम फेंके, तब उनसे मेरी दूरी करीब 200 फुट की थी। उस दिन गैलरी में बहुत भीड़ थी। विजिटर्स गैलरी में करीब 450 आदमी अवश्य मौजूद होंगे। कुर्सियों के पीछे और रास्ते में खड़े लोगों की 2-3 कतारें थीं। लोग एक दूसरे से सटकर खड़े थे।

दोपहर के भोजन से पहले सदन में जहां मैं खड़ा था। उस तरफ की रोशनी (आकाश की) प्रायः बंद कर दी जाती है और दूसरी तरफ की खुली रहती है। ऐसे धूप के चौंधे को रोकने के लिए किया जाता है। परिणामस्वरुप असेंबली में सारी रोशनी उस तरफ से आती है, जिस तरफ अभियुक्त खड़े थे। रोशनदान गैलरी के काफी ऊपर गैलरी की छत से भी ऊपर बने थे।

बम फेंकने के समय, बम फेंकने वाले इन दोनों आदमियों के चेहरे मैंने साफ-साफ नहीं देखे थे। उन्हें गिरफ्तार किए जाने के बाद जब मैंने देखा, तो वे मेरे काफी नजदीक थे। जब उन्होंने बम फेंके, मैंने सिर्फ उनके कपड़े ही देखे थे। दोनों अभियुक्तों द्वारा फेंकी गई वस्तु सिगरेट केस जैसी लग रही थी। यह बहुत संभव है कि वह(वस्तु) कागज का गट्ठा हो। हर बार वस्तु फेंकने के बाद धमाका हुआ था। यह भी स्वभावतः संभव है कि किसी और ने कहीं और से कुछ फेंका हो, जो मैंने नहीं देखा और उन्हीं चीजों से धमाका हुआ हो। बाद में अखबार में अभियुक्तों के फोटो छपे थे। और लिखा था कि इनमें से एक ने नमदे का टोप( सॉफ्ट हैट) पहन रखा था। मैंने उस फोटो में देखा था कि एक अभियुक्त ने नमदे का टोप पहना हुआ है। मैं विश्वास करता हूं कि पुलिस को दिए बयान में मैंने “सॉफ्ट हैट”कहा था, ना, कि सॉफ्ट कैप’।

शोभा सिंह।

मैंने पुलिस के सामने यह नहीं कहा था कि मैंने दो अंग्रेज और दो भारतीय पुलिस वालों को इन दोनों को गिरफ्तार करते देखा था। मैंने कहा था कि मैंने गिरफ्तारी के बाद इन्हें लाते हुए देखा था।

मेरा बयान पुलिस ऑफिसर की उपस्थिति में स्टेनोग्राफर द्वारा रिकॉर्ड किया गया था। स्टेनोग्राफर ने मेरा जो बयान नोट किया था, मुझे पढ़कर सुनाया था। मैंने अब यह बयान सुना है। यह वह बयान है जो मैंने पुलिस के सामने दिया था, लेकिन इसमें दो गलतियां हैं, जो स्टेनोग्राफर की भूल से हुई होगी। मैंने “सॉफ्ट कैप”नहीं कहा था और मैंने यह यह भी नहीं कहा था कि मैंने दोनों को गिरफ्तार होते देखा था। यह सही है कि मैंने आदमी के हाथ में जो देखा था, वह सिगरेट केस जैसा लगता था। न कि गेंद जैसा, मैंने वह बयान उर्दू में दिया था। मैंने ‘गोली’ नहीं ‘सिगरेट केस जैसा कुछ’कहा था।

जब पहला बम फटा, मैंने लोगों की तरफ देखा और तब मैंने मिस्टर करेरा और सर जॉर्ज स्कस्टर को देखा था। पहले बम से धुआं और दूसरे बम से और गहरा धुआं उठा था। सदन में धुआं काफी समय तक फैला रहा।

सदन के फर्श से गैलरी करीब 16 फीट ऊपर है। यूरोपियन ग्रुप के लोग सीट नं.7 और 8 और कुछ उसके पीछे बैठते हैं। स्वतंत्र ग्रुप के लोग सीट नं. 9 और 10 और उनके पीछे बैठते हैं। सीट नं. 11 से 16 और उनके पीछे की सीटें स्वराज पार्टी के सदस्यों को पास हैं। सीट नं. 6 सर बोमन जी दलाल की है। मुझे याद है कि उस दिन मैंने उन्हें अपनी सीट पर बैठे देखा था। सीट नं. 11 और 12 मिस्टर जयकर और पंडित मदन मोहन मालवीय की है, जो क्रमशः उग्रवादी और राष्ट्रवादी ग्रुप के नेता हैं। सीट नं. 13 से 16 स्वराज पार्टी के नेताओं की है।

दूसरे बम का धमाका एक खाली बेंच पर हुआ था। मुझे धमाके के बाद पता लगा कि वह खाली थी। सरदार जवाहर सिंह (एम.एल.ए) ने मुझे बताया कि धमाके के समय वह बेंच खाली थी। इससे अगली बेंच भी खाली थी।

बेंच(डेस्क) करीब तीन-साढ़े तीन फुट ऊंचे है। सीट की दोनों तरफ लकड़ी होती है। जब कोई व्यक्ति सीट पर बैठता है, तो शरीर का निचला हिस्सा डेस्क में सुरक्षित रहता है।

उस दिन ‘ऑफिशियल बॉक्स’पूरा भरा हुआ था। सर जॉन साइमन राष्ट्रपति गैलरी में थे। प.मदन मोहन मालवीय पहला बम फटने के समय अपनी सीट से 10 या 12 फुट की दूरी पर थे।

सदन के सदस्य और आगंतुक अध्यक्ष के निर्णय को लेकर काफी उत्तेजित थे। जो उस दिन का प्रमुख आकर्षण था। बहस समाप्त हो गई थी। निर्णय सुना दिया गया था और अध्यक्ष ने खड़े होकर ‘ऑर्डर!ऑर्डर!’ कहा था, मैं तब ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’पर अपनी ‘रुलिंग’सुना रहा था और उसी क्षण पहले बम सीधे ही लोग उठ खड़े हुए जब दूसरे बम का धमाका हुआ, तब गैलरी में कोई नहीं था।

मैंने करीब 10-15 व्यक्तियों को सीट के पास खड़े देखा और बाकी बरामदे में भाग रहे थे। भगत सिंह ने बम फेंकते समय ‘सॉफ्ट हैट’पहन रखा था”अदालत द्वारा पूछने पर सोभा सिंह ने स्पष्ट किया-

“जब मैंने पुलिस को अपना बयान दिया तो स्टेनोग्राफर ने खुद ही अंग्रेजी में अनुवाद कर लिया था। उसने वह मुझे अंग्रेजी मे ही पढ़कर सुनाया था। जिसमें कुछ शब्द उर्दू के भी थे। मैं अंग्रेजी समझता हूं। बहुत अच्छी तरह नहीं जानता, लेकिन अंग्रेजी में कही गई हर बात समझ सकता हूं।“

जिला न्यायधीश मिडिलटन ने 12 जून, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए अपने 43 पृष्ठों के फैसले में लिखा है “यह स्पष्ट है कि इस गवाह (सोभा सिंह) की गवाही में गलत शिनाख्त के लिए ‘लूप होल’मौजूद है। यह माना जा सकता है कि वह दोनों अभियुक्तों को ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचानता है। जिन्हें (उसके सामने) गिरफ्तार किया गया था, निश्चित रुप से कह सके कि ये वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने वास्तव में बम फेंके थे। (हालांकि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में 6 जून, 1929 को लिखित बयान देकर खुद ही स्वीकार किया था कि बम उन्होंने ही फेंके थे, लेकिन पिस्तौल उनके पास नहीं थी।)

जिला न्यायधीश के फैसले के विरुद्ध दायर अपील में लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश फ्लोरडे और एडिशन ने 13 जनवरी, 1930 के फैसले में भी सोभा सिंह की गवाही का उल्लेख प्रमुखता से किया है। यह फैसला ऑल इंडिया रिपोर्टर 1930 लाहौर 266 और 1930 पंजाब लॉ रिपोर्टर 73 पर प्रकाशित है।

खैर…. असेंबली बम केस में भगत सिंह को उम्रकैद और बाद में लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी की सजा हुई और मुझे(सोभा सिंह) अपनी वफादारी का ईनाम तरह-तरह की उपाधियों के रुप में प्राप्त हुआ। पहले मुझे ‘सरदार बहादुर’की उपाधि मिली, फिल सी.बी.ई., फिर ‘नाइटहुड’की पदवी दी गई और उसके बाद मुझे राज्य परिषद् के लिए मनोनीत कर लिया गया। मुझे नहीं मालूम कि भारत के वे राष्ट्रवादी लोग पीठ के पीछे मुझे क्या-क्या कहते थे, लेकिन हर उपाधि के बाद वे फूल-मालाएं लेकर बधाइयां देने जरूर आते, मुझे नई दिल्ली का प्रमुख भवन निर्माता कहा जाने लगा था, जबकि यह सच नहीं था, बहरहाल, मैं अब क्वीन्स-वे पर किसी दो तल्ली कोठी में रहने लगा था, जिसका नाम मैंने ‘बैकुंठ’ही रखा था। बड़े-बड़े राष्ट्रवादी नेता मेरी मेजबानी खुशी से स्वीकार करते थे। यों ऐसा भी हुआ कि सप्रू, जयकर और सी. राजगोपालाचारी जैसे राष्ट्रवादी नेता मेरे घर आकर ठहरे, मेरे नए घर से सड़क के उस पार एक ओर जिन्ना रहते थे, दूसरी ओर बिड़ला हाउस में आकर गांधी ठहरते, सैर करते हुए दोनों मेरे घर के ‘रोज गॉर्डन’में आ जाते और राजनैतिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करते।”

हमारे और उनके बीच भगत सिंह की लाश

“भगत सिंह भारतीय क्रांतिकारी इतिहास के आतंकवादियों में सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए।”(हिस्ट्री ऑफ सिक्ख्स, खुशवंत सिंह. पृ.226, नोट 21)

मैं उनके अंतिम दिनों के दौरान एकदम चुप रहा हूं क्योंकि मेरा एक भी शब्द उनकी सजा कम करवाने की संभावनाओं में घातक हो सकता था। मैं चुप रहा, हालांकि मैं महसूस करता रहा कि फट पडूंगा, लेकिन अब सब कुछ समाप्त हो गया है। हम सब मिलकर उसे नहीं बचा पाए, जो हमें इतना प्यारा था और जिसकी अद्भुत हिम्मत और बलिदान भारत के युवकों के लिए प्रेरणा-स्रोत थी। आज भारत अपने लाडले बच्चों तक को फांसी के फंदों से नहीं बचा सकता। हर जगह शोक और हड़ताल होगी। पूरे देश में हमारी विवशता पर दुःख होगा। लेकिन उस पर गर्व भी होगा। जो अब नहीं रहा और जब इंग्लैण्ड हमसे समझौते की बात करेगा, तब भगत सिंह की लाश हमारे बीच में होगी, बशर्ते हम भूल न जाएं। “(भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिए जाने पर पंडित पर पंडित जवाहर लाल नेहरु का बयान, ‘लीडर’, इलाहाबाद; 26 मार्च, 1931)

“हम सरकार पर गुंडागर्दी का आरोप लगा सकते हैं, परंतु उस पर समझौते के उल्लंघन का दोष नहीं लगा सकते। मेरी स्पष्ट राय में सरकार की इस भयंकर भूल से आजादी प्राप्त करने की हमारी शक्ति बढ़ी है, जिसके लिए भगत सिंह और उसके साथी मरे…हमें गुस्से में ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए। जिससे हम इस अवसर का फायदा उठाने में चूक जाए”(भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर लटकाएं के बाद महात्मा गांधी का बयान. ‘लीडर’, इलाहाबाद; 26 मार्च, 1931)

वह स्थान जहां भगत सिंह को फाँसी दी गयी थी।

“गांधी जी ने स्वयं वायसराय से निश्चयपूर्वक कहा कि यदि उन लड़कों को फांसी दी ही जानी है, तो बेहतर होगा कि उन्हें कांग्रेस सेशन के बाद फांसी पर लटकाए जाने की अपेक्षा पहले ही लटका दिया जाए। “ (हिस्ट्री ऑफ दि इंडियन नेशनल कांग्रेस डॉ. बी. पटाभि सीतारमैय्या, पृ.442)

राजसत्ता के लिए हर विरोध, विद्रोही या क्रांतिकारी एक ‘खतरनाक आंतकवादी’ही होता है और सत्ता के संविधान में उसके लिए सिर्फ एक ही सजा है- फांसी। यानी मुठभेड़ में मौत से बच गए तो सजा-ए-मौत, फांसी पर लटकाए जाने के वही कानून, वही तर्क और वही न्याय की भाषा। सरकार किसी की भी हो, क्या फर्क पड़ता है? अगर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की सजा कम करने या क्षमा करने का कोई भी तर्क लॉर्ड इर्विन को नहीं मिलता, तो किश्ता गौड़ और भूमैया की सजा को माफ करने का तर्क महामहिम राष्ट्रपति को कैसे मिल सकता है? अदातल, कानून और न्यायमूर्तियों की नजर में ‘हत्या, हत्या है’भले ही उद्देश्य देश आजाद करवाना हो या सामाजिक- राजनैतिक-आर्थिक परिवर्तन, क्रांतिकारी उद्देश्यों के प्रति ईमानदारी के बारे में कोई भी संदेह न होने के बावजूद प्रायः न्यायाधीश विधि-अनुसार ‘न्याय’करने के लिए विवश होते हैं। इसलिए ‘स्वयं दुबारा कानून नहीं लिख सकते’या बना सकते। राजसत्ता अपने विरुद्ध किसी भी ‘विद्रोह’को कुचलने के लिए ‘स्वतंत्र न्याय पालिका’को भी अक्सर हथियार के रुप में ही इस्तेमाल करती है। भगत सिंह से लेकर भुट्टो तक ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं। न्याय की नौटंकी के लिए न पेशेवर भाड़े के गवाहों की कमी पड़ती है और न ही वायदा माफ सरकारी गवाहों की। सरकार के पास सिक्कों या सम्मानों की क्या कमी है? “आतंकवादी”के विरुद्ध ‘अध्यादेश’जारी करने में कितनी देर लगती है? विशेष अदालतों से लेकर प्रिवी कौसिंल या सुप्रीम कोर्ट तक हर अध्यादेश अंततः पूर्ण रुप से संवैधानिक ही ठहराया जाएगा न!

राजसत्ता के साथ स्वतंत्रता के समझौतों पर विमर्श करने वाले राजनेता, क्रांतिकारियों को सजा कम करवाने या माफ करवाने की शर्त नहीं रख सकते और अगर रखना भी चाहें, तो मानेगा कौन? भारतीय संदर्भ में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति महात्मा गांधी के साथ इस बात से सहमत थी कि भगत सिंह व अन्य की सजाओं को कम कराने के इर्विंन समझौते की शर्त न रखी जाए। शर्त रखी जाती, तो समझौता कैसे होता? क्या इसीलिए समझौता-वार्ता के दौरान उन्होंने (गांधी जी ने) सजा (फांसी की) कम करने की प्रार्थना नहीं की? (फाइल ने एस-45/1931के, डब्ल्यू 2 होम गवर्नमेंट पॉलिटिकल ब्रांच में लॉर्ड इर्विन की टिप्पणी) गांधी जी को स्वयं लगता था कि ‘भगत सिंह को फांसी देने से स्थिति अत्यंत जटिल हो सकती है’। लेकिन गृह सचिव हबेंट इमर्सन ने जब उनसे कहा- “अगले कुछ दिनों के लिए दिल्ली में ही हो रही सभाओं और हिंसा भड़काने वाले भाषणों को रुकवाने के लिए कुछ करें” तो उन्होंने हरसंभव प्रत्यन करने का वायदा किया’और एक पत्र में लिखा, “मैंने हर संभव सावधानी बरती है और आशा करता हूं। कुछ अशोभनीय नहीं घटेगा “(20 मार्च 1931, गांधी जी का पत्र इमर्सन के नाम)।

अखबारों, पत्रों, डायरियों, संस्मरणों, राष्ट्रीय अभिलेखागार के दस्तावेजों, फाइलों, आत्मकथाओं और अन्य तथ्यों को देखने, पढ़ने, समझने, विचारने के बाद बहुत साफ-साफ नजर आता है कि सरकारी अधिकारिक स्तर पर गांधी जी भगत सिंह वगैरह के विषय में “विशेष चिंतित”नहीं थे। सजा माफ/कम कर दो, तो अच्छा है और नहीं ही करनी, तो फिर देरी से भी क्या फायदा, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर उनका कहना था “उनका रास्ता गलत और व्यर्थ है…”यदि क्रांतिकारी उनके साथ सहयोग करें, तो वह भगत सिंह को फांसी के फंदे से बचा सकते हैं” मैंने वायसराय से बार-बार निवेदन किया। मैंने उन्हें मनाने की हरसंभवन कोशिश की”लेकिन सब व्यर्थ।

इतिहासकारों का यह कहना कि ”गांधी जी को लॉर्ड इर्विन ने चकमा दे दिया” या वायसराय गांधी जी को बेवकूफ बना गया था”- अपने आप ऐसा झूठ बोलना है। जिसे ‘क्षमा’नहीं किया जा सकता। निःसंदेह महात्मा गांधी बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ और कुशलतम राजनीतिज्ञ हैं, जिसके जटिल व्यक्तित्व के सामने लॉर्ड इर्विन जैसे सैकड़ों अफसर पानी भरते हैं। भगत सिंह के शब्दों में “कांग्रेस और हमारी पार्टी में इतना ही अंतर है कि अंग्रेजों से भारतीयों के हाथों में सत्ता आ जाने पर कांग्रेस संतुष्ट हो जाएगी, जबकि हमारा उद्देश्य समाजवाद की स्थापना है, उनका लक्ष्य समझौते की वकालत करना था। हमें ऐसे समझौते से घृणा है”इसीलिए किसी प्रकार की रहम की अपील की बजाए भगत सिंह ने पंजाब के राज्यपाल को लिखा था “हमें फांसी पर चढ़ाने के बजाय गोली मार दी जाए।”

क्रांतिकारियों के विरुद्ध अधिकांश मुकदमों में ‘सहायता करने वाले कांग्रेसी’(नेता फंड और वकील) हैं। आसफ अली से लेकर लाहौर तक के अनेक राय बहादुर मौजूद हैं। अगर यह कांग्रेस नेताओं की ‘सहानुभूति’है, तो फिर यहां सवाल खड़ा होता है कि क्रांतिकारियों के पक्ष और विपक्ष में खड़े लोग अंततः सत्ता-सुविधा के गलियारे में खड़े क्यों दिखाई देते हैं? क्या कारण रहे होंगे कि भगत सिंह ने ‘असेंबली बम केस’में हाईकोर्ट में अपने मुकदमे की पैरवी स्वयं की और आसफ अली सिर्फ बटुकेश्वर दत्त की ओर से पेश हुए? आश्चर्य है कि वरिष्ठ विधिवेत्ता ए.जी नूरानी ने ‘दि ट्रायल ऑफ भगत सिंह’(1996)में लिखा है कि आसफ अली हाईकोर्ट में भी दोनों अपीलार्थियों की तरफ से पेश हुए थे। काश, उन्होंने ए.आई.आर, 1930 लाहौर 266 पर छपा फैसला ही पढ़ लिया होता।

यही नहीं, श्री नूरानी आगे (पृ.30 पर) लिखते हैं कि “राष्ट्रीय नेता मोती ला नेहरु, जिन्ना और मालवीय- उल्लेखनीय है कि भगत सिंह के बचाव में सिर्फ दो गवाह पेश हुए थे- पहले गवाह थे डॉ.क्यू.ए. मंसूरी(मुस्लिम यूनिर्वसिटी, अलीगढ़) और दूसरे थे पंडित मदन मोहन मालवीय, डॉ मंसूरी की गवाही 7 जून 1929 को और श्री मालवीय की गवाही 10 जून 1929 को रिकॉर्ड की गई थी, मोती लाल नेहरु और जिन्ना की गवाही का प्रश्न नहीं हो सकता, मालूम नहीं श्री नूरानी ने किस आधार पर ऐसा लिखा है ? कोर्ट फाइलें बिना देखे पढ़े तो ऐसा ही संभव है, इतिहास गवाह है कि मोती लाल नेहरु ने असेंबली बम काण्ड की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था “सभी संवेदनशील व्यक्तियों की भर्त्सना करनी चाहिए”भगत सिंह की फांसी के 66 साल और भारत की आजादी के 50 साल बाद भी आज तक अनेक ऐतिहासिक फैसले, गवाहियां और गुप्त दस्तावेज फाइलों में कैद हैं। खेदजनक है कि भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों के बारे में लेखकों, इतिहासकारों और शोधार्थियों ने बहुत से ‘असुविधाजनक’तथ्य जानबूझकर कर छोड़ दिए हैं या इतने तोड़-मरोड़ दिए है कि कुछ समझ में नहीं आता-सच क्या है?

झूठ क्या है? इस पर चर्चा थोड़ा बाद में करूंगा। पिछले 50 वर्षों में भारत के अधिकांश राजनैतिक दलों क्रांतिकारियों और शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को महानता, देशभक्ति और बलिदान की प्रतीक मूर्तियों की तरह ही इस्तेमाल किया है। जन्म-तिथि या पुण्य तिथियों पर श्रद्धांजलियों की रस्म-अदायगी भर करते हैं। कांग्रेस से लेकर भाजपा तक के उनके व्यक्तित्वों का महिमा-मंडन तो किया, लेकिन राजनैतकि सिद्धांतों और विचारों को कभी जनता तक नहीं पहुंचने दिया। यथास्थिति राजनैतिक दल सामाजिक व्यवस्था-परिवर्तन के क्रांतिकारी (साम्यवादी) विचारों को भला कैसे बढ़ावा देते? मुक्ति संग्राम के नायकों की विचारधारा सत्ताधारी दलों के हितों के एकदम विपरीत पाठ पढ़ाती है। गांधी, नेहरु, इंदिरा, राजीव मेमोरियल ट्रस्टों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए , लेकिन क्रांतिकारियों के नाम या विषय पर एक भी महत्वपूर्ण संस्थान नहीं बनाया गया।

व्यक्तिगत स्तरों पर क्रांतिकारी इतिहास-लेखन का जितना भी काम अब तक हुआ है, वो इतना अपर्याप्त और आधा अधूरा है कि समझाता कम उलझाता ज्यादा है।

“असहाय भारतीय जनता की ओर से हम जोर देकर यह बात कहना चाहते हैं कि “तुम व्यक्तियों की हत्या कर सकते हो। लेकिन विचारों की हत्या नहीं की जा सकती है। बड़े-बड़े साम्राज्य नष्ट हो गए, लेकिन सभी विचार अनुजीवित रहे हैं। ब्रुवां और जार धराशायी हो गए, जबकि क्रांतियां विजेता के रुप में आगे बढ़ गईं….

ये शब्द 8 अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने के बाद शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा बांटे गए उसी पोस्टर के हैं, जिसमें लिखा था ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाका करना जरुरी है।‘

असेंबली में बांटे गए इस पोस्टर की मूल प्रतियां राष्ट्रीय संग्राहलय में सुरक्षित हैं। वैसे यह पोस्टर के.सी. घोष की पुस्तक ‘द रोल ऑव ऑनर’ पृष्ठ 412 डॉ. कौशल्या देवी दुबलिश की पुस्तक ‘रिवोल्यूशनरीज एंड देयर एक्टीविटीज इन नॉदर्न इंडिया’पृष्ठ200-201 पर अंग्रेजी में और वीरेंद्र सिंधु की पुस्तक ‘युगद्रष्टा भगतसिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे’(राजपाल एंड संस द्वारा प्रकाशित) पृष्ठ 160-161 पर हिंदी (अनुवाद) में प्रकाशित हुआ है, लेकिन शहीद भगत सिंह शोध समिति, लुधियाना के तत्वावधान में जगमोहन सिंह और चमन लाल द्वारा संपादित पुस्तक ‘भगत सिंह और उनके दस्तावेज’(राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण:1986), पृष्ठ 271-272 पर प्रकाशित इस पोस्टर के हिंदी अनुवाद में उपरोक्त पैरा गायब कर दिया गया है’।

पुस्तक में पोस्टर का पूरा का पूरा पैराग्राफ शामिल न करने के पीछ क्या कारण है। यह शोध समिति के विद्वान संपादक ही जानें, लेकिन ऐसा हरगिज नहीं लगता है कि शोध के दौरान संपादकों को कोई ऐसा पोस्टर मिल गया हो, जिसमें उपरोक्त पैरा ही न हो या अनुवादक की असावधानी प्रूफरीडर की गलती या प्रेस की मेहरबानी से ऐसा हो गया हो।

वीरेंद्र सिंधु की पुस्तक(पृष्ठ33) में सुखदेव को लिखे भगत सिंह के इस पत्र में लिखा है:’एक बात मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि क्रांतिकारी विचारों के होते हुए हम नैतिकता के संबंध में आर्य-समाजी ढंग की कट्टर धारणा नहीं अपना सकते। ‘पर जगमोहन सिंह और चमन लाल की पुस्तक पृष्ठ 270 पर छपा है: ‘हां एक बात मैं तुम्हें खास तौर पर बताना चाहता हूं कि बावजूद क्रांतिकारी विचारों के हम नैतिकता संबंधी सभी सामाजिक धारणाओं को ही अपना सकें।‘

यहां महत्वपूर्ण है कि ‘आर्य समाजी ढंग की कट्टर धारणा’की जगह “सभी धारणाओं में लिखने के पीछे संपादकों का मकसद आखिर क्या है?”

आगे-आगे होगा यह कि संपादक सिर्फ पिस्तौल और बम कभी इंकलाब नहीं लाते’प्रकाशित करेंगे और ‘बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है’को गायब कर देंगे, परिणामस्वरुप 21वीं सदी तक पहुंचते-पहुंचते भगत सिंह की छवि एक महान क्रांतिकारी हीरो भर की रह जाएगी और उनके महत्वपूर्ण विचारों को संपादक शोध की सलीब पर लटका कर मार डालेंगे।

भगत सिंह के विचारों की हत्या का सिलसिला उनके शहीद हो जाने के फौरन बाद ही शुरु हो गया था, वीरेंद्र सिंधु की पुस्तक ‘युगदृष्ठा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे’ पृष्ठ 274 पर लिखा है: ‘भगत सिंह जीवन के दूसरे क्षेत्रों की तरह ही अध्ययन में भी अत्यंत गतिवान थे। इस गति से ही उन्होंने फांसी की कोठऱी में बैठे-बैठे वक्तव्य तो जाने कितने लिखे थे, पर कई पुस्तकें भी लिखी थीं, इनमें महत्वपूर्ण पुस्तकें थीं: “आइडियल ऑफ सोशलिज्म’(समाजवाद का आदर्श), ‘द डोर टू डेथ’ (मृत्यु के द्वार पर), ‘आटोबॉयोग्राफी’ (आत्मकथा) और द रिवोल्यूशनरी मूवमेंट ऑफ इंडिया विद शार्ट बायग्राफिक स्केचेज ऑफ द रिवोल्यूशनरीज’(भारत में क्रांति का आंदोलन और क्रांतिकारियों का संक्षिप्त परिचय)… उनका कहना था कि इस पुस्तक की ‘पालिटिकल वैल्यू’ बहुत अधिक है, पर ये पुस्तकें उनके सामने न आ सकीं।‘ आखिर में ये पुस्तकें कहां गईं, किसने गायब कीं, क्यों गायब कीं?

इस संदर्भ में आगे लिखा है: कुलवीर सिंह को भगत सिंह ने कहा था कि ‘यह सब सामग्री कुमारी लज्जावती जी को दे दी जाए’। कुलवीर सिंह के शब्दों में:1993-34 में मैंने इस सहित्य की बात चाचा जी (सरदार अजीत सिंह)को लिखी , जो उस समय जर्मनी में थे। उन्होंने उत्तर दिया कि उस सब सहित्य की नकल करा कर मुझे भेज दो, मैं उन्हें यहां अंग्रेजी और जर्मन भाषाओं में छपवा दूंगा। मैं लज्जावती के पास गया। उन्होंने कहा: वह देश की संपत्ति है, इसलिए मैंने पंडित जवाहर लाल नेहरु को दे दी थी। कुछ दिन बाद पंडित नेहरू लाहौर आए तो मैंने उनसे उस साहित्य की नकल दे देने को कहा। वे बोले, ‘तुमसे किसने कहा कि मेरे पास वह साहित्य है? “मैंने लज्जावती का नाम लिया। वे चुप हो गए और फिर न बोले। इसके बाद मैंने फिर लज्जावती से पूछा तो वे बोलीं ‘मैंने दो पुस्तकें श्री विजय कुमार सिन्हा को दे दी है।‘मिलने पर श्री विजय सिंन्हा ने स्वीकार किया और 1946 तक कहते रहे कि उन्हें देखभाल कर जल्दी ही छपाएंगे, पर बाद में उन्होंने कहा कि वे पुस्तकें सुरक्षा के ख्याल से किसी मित्र के पास रखी थीं, वहीं नष्ट हो गईं।‘

वीरेंद्र सिंधु ने आगे लिखा है कि ‘बहुत दर्दनाक है यह संस्मरण, क्योंकि यह कुछ पुस्तकों की कहानी नहीं है, न किसी व्यक्ति के हानि-लाभ की कहानी है यह पुस्तक की धरोहर के छिन जाने की कहानी है। इतिहास इसके लिए किसे दोष देगा, मैं नहीं जानती।’

भगत सिंह के व्यक्ति और विचारों की हत्या का षड्यंत्र अगर न होता तो शायद भगत सिंह का वह सपना कभी का साकार हो गया होता, जो उन्होंने फांसी पर चढ़ने से एक दिन पूर्व 22 मार्च 1931 को पत्र में लिखा था: ‘मेरे दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते फांसी पाने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी और देश आजादी के लिए बलिदान होने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि इंकलाब को रोकना इंपीरियलिज्म की तमाम शैतानी शक्तियों के बस की बात न रहेगी। ‘आज कितनी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू करती हैं? और नहीं करती तो क्यों नहीं करतीं?

आजादी के 45 सल बाद नेताजी सुभाष चंदर बोस को ‘भारत रत्न’देने का सरकारी फैसला (जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया) मात्र एक उदाहरण है-शहीदों के प्रति राष्ट्र-सम्मान का, देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूमने वाले अमर शहीद भगत सिंह का का चित्र या प्रतिमा आज भी संसद भवन में वर्जित है। आखिर क्यों? इन ढेर सारे सवालों का सत्ता में बैठे ‘भ्रष्ट’नेताओं के पास क्या जवाब हो सकता है? सिर्फ सरकारें बदलने से सत्ता का चरित्र नहीं बदलता, स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती मनाते हुए भी राष्ट्र की सत्ता और भारतीय जनता के बीच ‘भगत सिंह की लाश(है) रहेगी- बशर्ते हम भूल न जाएं।‘

(अरविंद जैन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं। उनका यह लेख आजादी की अर्धशताब्दी के मौके पर 1997 में हंस में प्रकाशित हुआ था।)

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