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‘हायर’ हो चुके पायलट कांग्रेस से ‘फायर’

कांग्रेस आलाकमान यह संदेश देने में सफल रहा कि उसने सचिन पायलट को मनाने की पूरी कोशिश की, मगर यह कोशिश सफल नहीं हो सकी- यह भी स्पष्ट है। सचिन पायलट जैसे गांधी परिवार के डिनर टेबल वाले नेता का बागी होना, खुद प्रियंका गांधी और राहुल गांधी की ओर से सुलह-संवाद की कोशिशों का फेल हो जाना- निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है। मगर, यह कांग्रेस आलाकमान की सहृदयता और सदाशयता का भी सबूत है। सचिन पायलट ने जो संकट राजस्थान में कांग्रेस सरकार और पार्टी के लिए खड़ा किया, उसे समझने में क्या आलाकमान से गलती हुई?- यह सवाल भी जरूर उठेंगे।

राजस्थान संकट को समझने के लिए सिर्फ एक सवाल का सहारा लिया जाना चाहिए था- क्या राजस्थान में ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा हैं सचिन पायलट?

अगर इस प्रश्न का जवाब ‘हां’ है तो इसका मतलब यह है कि सचिन पायलट किसी और उड़ान के लिए हायर हो चुके हैं। ऐसे में किसी भी सूरत में कांग्रेस आलाकमान को सचिन पायलट को मनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी। सचिन पायलट से सुलह-सफाई की जो कोशिशें की गयीं, उसके दो स्पष्ट मायने निकले-

एक, सचिन पायलट प्रकरण कांग्रेस का अंदरुनी मसला है।

दूसरा, ऑपरेशन लोटस का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

यही दावे बीजेपी खुलकर करती रही है। मतलब यह कि कांग्रेस आलाकमान की पहल से बीजेपी के दावों की ही पुष्टि हुई। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि राजस्थान में सचिन पायलट को मनाने की कोशिश के प्रति कांग्रेसजनों में कोई उत्साह नहीं था। राजस्थान के प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से सचिन पायलट का पोस्टर हटाया जाना इस बात का सबूत था। मगर, आलाकमान की नाराज़गी के बाद उस पोस्टर को दोबारा लगाया गया ताकि सचिन से बातचीत का माहौल खराब न हो।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पीएल पुनिया ने जब सार्वजनिक रूप से कह दिया था कि सचिन पायलट बीजेपी में हैं तो बवाल इतना बढ़ा कि उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े। मगर, सच देखा जाए तो पुनिया जैसे वरिष्ठ नेता के अनुभव से यह बात साफ हो रही थी कि सचिन पायलट बीजेपी के हाथों में खेल रहे हैं।

जब कोई पार्टी से निकलता है, पार्टी टूटती है या फिर सरकार पर आंच आती है तो सवाल आलाकमान की ओर उठते ही हैं। इसे रोका नहीं जा सकता। मगर, इन सवालों का डर लेकर भी आलाकमान अपना आचरण नहीं बदल सकता। सचिन पायलट की इकलौती जिद थी कि वह सीएम बनना चाहते हैं। आलाकमान ने उन्हें वक्त आने पर सीएम बनाने का वादा भी कर रखा था। लोकसभा चुनाव के बाद वादा पूरा करना था, मगर चुनाव नतीजे ऐसा रहे कि खुद राहुल गांधी को ही अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। बड़े मसले पर फैसला लेने वाला नेतृत्व परिदृश्य से ओझल हो गया। देखते-देखते 2 साल बीत गये। सचिन पायलट का धैर्य जवाब देने लग गया था। मगर, इसके लिए क्या वे ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा बनने की हद तक कदम उठा लेंगे? यह चिन्ताजनक बात थी।

सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष थे और प्रदेश के डिप्टी सीएम थे। बगावत के बाद ऐसी स्थिति उन्हें किसी भी सूरत में मिलेगी, इसका भरोसा खुद उनको भी नहीं होगा। अधिक से अधिक वे ‘हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे’ का भाव ही रख सकते हैं। सचिन पायलट इस भाव में आ गये। मगर, आलाकमान सचिन के इस भाव को महसूस नहीं कर सका। पारिवारिक दोस्ती को तवज्जो मिली। नतीजा यह है कि पूरे प्रकरण में ‘ऑपरेशन लोटस’ की सक्रियता पर बहस होने से रह गयी।

सच यह है कि ‘ऑपरेशन लोटस’ ने ही वह परिस्थिति बनायी, जिसमें सचिन पायलट की महत्वाकांक्षा को पंख लगे। विधायकों की खरीद-फरोख्त की हुई कोशिशें हों या इसके लिए चल रहे प्रयास, उन्हें सचिन पायलट ने कबूल किया। यह राजस्थान में कांग्रेस के मुखिया और सरकार में उप मुखिया के तौर पर उनका अक्षम्य अपराध माना जाएगा। मगर, आलाकमान क्षमा के लिए भी तैयार दिखा। एक तरह से कहें तो आलाकमान सचिन पायलट के आगे झुकने-गिड़गिड़ाने को तैयार दिखा।

अगर सचिन पायलट किसी ‘ऑपरेशन लोटस’ का हिस्सा नहीं होते तो कोई कारण नहीं था कि वे अपने आलाकमान की बात नहीं मानते। कांग्रेस पार्टी ने उन्हें 26 साल की उम्र में सांसद बनाया। उनके पिता के गुजर जाने के बाद उनकी माता को भी चुनाव लड़ने का अवसर दिया। सचिन पायलट को केंद्र में मंत्री बनाया। राजस्थान में प्रमुख पद दिए। और, जो सचिन पायलट मांग रहे थे वह भी उन्हें देने को आलाकमान तैयार था। बस थोड़ा वक्त मांगा जा रहा था। आम तौर पर न आलाकमान इतना विनम्र होता है और न ही आलाकमान के सामने कोई नेता इतना उद्दंड। मगर, इसकी वजह साफ है। आने वाले दिनों में यह बात और अधिक स्पष्ट होगी।

राजस्थान प्रकरण में यह बात साफ है कि सचिन पायलट के पास 30 विधायक नहीं थे। अगर 30 होते, तो ‘ऑपरेशन लोटस’ खुलकर दिखाई पड़ता। यूं पर्दे के पीछे से नहीं चल रहा होता। मगर, यह बात भी साफ है कि करीब 2 दर्जन विधायक सचिन के साथ हो सकते हैं। ऐसा होने पर गहलोत सरकार की आयु पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसा लगता है कि बीजेपी ने ‘ऑपरेशन लोटस’ को दो चरण में अंजाम देना तय किया है। पहले चरण में वह गहलोत सरकार को कमजोर कर रही है। सचिन पायलट को सरकार से अलग कर रही है। और, दूसरे चरण में उसका हमला निर्णायक होगा।

कांग्रेस आलाकमान को अपने मूल विरोधी बीजेपी की रणनीति को पहले सूंघना चाहिए था। सचिन पायलट तो प्यादा हैं। उनके रूठने या नाराज होने से बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि बीजेपी सचिन पायलट का इस्तेमाल किस तरीके से कांग्रेस के खिलाफ करने जा रही है। बीजेपी के लिए भी राजस्थान में वसुंधरा राजे के रहते सचिन पायलट को नेतृत्वकारी भूमिका देना आसान नहीं है। अगर आसान होता तो बीजेपी ऑपरेशन लोटस की दो चरणों वाली थ्योरी पर काम नहीं कर रही होती। अब तक पूरी तस्वीर सामने आ चुकी होती।

सचिन पायलट अपनी ही पार्टी के खिलाफ बीजेपी के हाथों इस्तेमाल हुए हैं। अब वे अलग पार्टी भी बनाते हैं तो भी उनका तात्कालिक मकसद कांग्रेस सरकार को नुकसान पहुंचाना रहेगा। कांग्रेस की मदद से सरकार बनाने की उनकी कोशिश आगे बढ़ेगी। बीजेपी इसमें सचिन की मदद करेगी क्योंकि ऐसा करते हुए उन्हें न अपनी पार्टी में किसी नेतृत्व के सवाल को हल करना होगा और न ही कांग्रेस सरकार को गिराने के खुले इरादों पर उसे किसी को सफाई देने की जरूरत है। आखिर में, यह बात फिर भी अच्छी है कि कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट के पीछे बहुत ज्यादा वक्त बर्बाद नहीं किया। दो दिन में ही उसे बात समझ में आ गयी। ये सचिन तो हायर हो चुका पायलट है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल विभिन्न चैनलों के पैनल में उन्हें देखा जा सकता है।)

This post was last modified on July 14, 2020 3:59 pm

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