तो क्या जोशीमठ में उपद्रव की साजिश थी?

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उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट जोशीमठ में आंदोलन कर रहे लोगों को माओवादी बताकर पूरे मुद्दे से ध्यान हटाने और आंदोलन को खत्म करने की साजिश रच रहे थे। लेकिन आंदोलनकारियों की सूझ-बूझ से उनकी साजिश नाकाम साबित हो गयी।

जोशीमठ के लोग जो बात पहले दबी जुबान में कह रहे थे, भाजपा अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट के उस बयान के बाद अब खुलकर कहने लगे हैं, कि भाजपा जोशीमठ मुद्दे का कोई तार्किक हल करने की बजाए लोगों को गुमराह करके आंदोलनकारियों को ही निशाने पर लेने की साजिश रच रही थी।

दरअसल, एक बयान में भट्ट जोशीमठ में पुनर्वास करने और एनटीपीसी को वापस भेजने के लिए आंदोलन कर रहे लोगों को माओवादी और चीन का मददगार बताया था।

हालांकि महेन्द्र भट्ट सफाई दे चुके हैं कि माओवादी उन्होंने गलती से कह दिया था, लेकिन इसके बावजूद जोशीमठ के लोगों का गुस्सा कम नहीं हुआ है। जोशीमठ संघर्ष समिति के लोग अब खुले में आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा जोशीमठ में उपद्रव करवाने की साजिश कर रही थी।

इस उपद्रव के ठीक बाद महेन्द भट्ट को माओवादी वाला बयान देना था, जो उपद्रव के बाद ठीक निशाने पर बैठता। लेकिन, जोशीमठ के लोगों की सूझ-बूझ के कारण उपद्रव नहीं हुआ। महेन्द्र भट्ट का बयान पेंडिंग में चला गया, ऐसे में उन्होंने बेवक्त ही यह बयान दे दिया।

बेतुके बयानों के लिए जाने जाते हैं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट

गौरतलब है कि जोशीमठ के लोगों ने 26 जनवरी, 2023 को तिरंगा मार्च निकाला था। इसी दिन तय किया गया था कि 27 जनवरी को जोशीमठ में एक बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा। इस दिन जोशीमठ के तबाही के लिए जिम्मेदार मानी जा रही तपोवन-विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना बना रही एनटीपीसी के जोशीमठ स्थित कार्यालय का घेराव करने का भी फैसला किया गया था।

जोशीमठ के सभी लोगों को 27 जनवरी को एनटीपीसी के घेराव में शामिल होने के लिए कहा गया था। लेकिन, 26 जनवरी की देर शाम अचानक एनटीपीसी का घेराव करने की योजना स्थगित कर दी गई। रात को ही जोशीमठ के लोगों को विभिन्न माध्यमों से यह सूचना भेज दी गई कि 27 जनवरी को एनटीपीसी का घेराव करने के बजाय सिर्फ जोशीमठ की सड़कों पर जुलूस निकाला जाएगा। लोगों को इंटर कॉलेज तिराहे पर एकत्रित होने के लिए कहा गया। हालांकि उस समय किसी की समझ में नहीं आया कि एनटीपीसी के घेराव की जो बड़ी योजना थी, वह स्थगित क्यों की गई?

बावजूद इसके 27 जनवरी की सुबह करीब 6000 लोग जोशीमठ में इंटर कॉलेज तिराहे पर पहुंचे और यहां से जुलूस की शक्ल में कचहरी तक गए, जहां रोज की तरह धरना दिया गया।

जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक और जोशीमठ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अतुल सती कहते हैं, “संघर्ष समिति के लोगों को 26 जनवरी की रात को ही पता चल गया था कि भाजपा ने एनटीपीसी के घेराव के दौरान पथराव और आगजनी करने की योजना बनाई है। इस पथराव और आगजनी की आड़ में दरअसल भाजपा के लोग जोशीमठ में उपद्रव फैलाना चाहते थे। पथराव और आगजनी के बाद पुलिस लाठीचार्ज करती और आंदोलन में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता।”

अतुल सती कहते हैं कि योजना के अनुसार ठीक उसी वक्त भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र भट्ट का यह बयान आना था, जिसमें जोशीमठ में पथराव और आगजनी की घटनाओं के लिए माओवादियों को जिम्मेदार ठहराया जाना था। वे कहते हैं कि, 26 जनवरी को इस योजना का पता चल जाने के बाद संघर्ष समिति ने एनटीपीसी के घेराव की योजना स्थगित कर दी थी।

भाजपा की यह योजना असफल हो गई तो महेन्द्र भट्ट ने बेवक्त ही जोशीमठ में माओवादी दखल होने की बात कहकर अपनी छीछालेदर करवा दी।

जोशीमठ संघर्ष समिति के सक्रिय सदस्य और पूर्व नगर पालिका सभासद प्रकाश नेगी इस बात की पुष्टि करते हैं। वे कहते हैं, भाजपा के लोग 27 जनवरी के प्रदर्शन के दौरान कोई बड़ी साजिश करना चाहते थे। इस साजिश का पता चलते ही रातों-रात जोशीमठ के लोगों को एनटीपीसी की तरफ जाने के बजाय इंटर कॉलेज तिराहे पर बुलाया गया।

प्रकाश नेगी के अनुसार जब 6000 लोगों की भीड़ जुटी तो यहां भी भाजपा के लोगों द्वारा गड़बड़ी फैलाने के प्रयास की आशंका थी। इस आशंका को देखते हुए संघर्ष समिति के लोगों को जुलूस में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर तैनात कर दिया गया, ताकि जुलूस में शामिल कोई व्यक्ति पथराव जैसा कोई प्रयास करे तो उसे तुरंत रोका जा सके।

प्रकाश नेगी कहते हैं, संभवतः भाजपा के लोग एनटीपीसी के आसपास तैनात थे, लेकिन जब आंदोलन करने वाले लोग वहां नहीं पहुंचे, तो वे इंटर कॉलेज तिराहे से तहसील तक निकाले जा रहे जुलूस में शामिल नहीं हो पाए, लिहाजा जुलूस पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा और उपद्रव फैलाने के भाजपा के मंसूबों पर पानी फिर गया।

यह पहला मौका नहीं है जब बद्रीनाथ क्षेत्र से विधान सभा सदस्य रहे और अब चुनाव हारने के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए महेन्द्र भट्ट ने इस तरह का बेतुका बयान दिया हो। वे कई बार इस तरह का बयान दे चुके हैं और हंसी का पात्र बन चुके हैं।

हालांकि, इस बार के उनके बयान के बाद जोशीमठ के लोगों का आक्रोश आसमान पर है और महेन्द्र भट्ट की सफाई के बाद भी लोगों का गुस्सा शांत नहीं हुआ है। महेन्द्र भट्ट के पुराने बयानों पर नजर डालें तो कोरोना काल में उन्होंने एक के बाद एक अजीबोगरीब बयान दिए थे।

एक बयान में उन्होंने कोविड संक्रमण से बचने के लिए अजीबोगरीब नुस्खे बताए थे। उन्होंने कहा था कि सुबह दो चम्मच गोमूत्र पीने से कोविड संक्रमण नहीं होगा। एक बयान में उन्होंने यह भी कहा था कि गाय के गोबर की राख को पानी में मिलाकर और छानकर उस पानी नहाया जाए तो कोविड नहीं होगा। इन बयानों पर लोगों ने उन्हें जमकर लताड़ा था और मजाक उड़ाया था।

इसी दौर में जब जमातियों को लेकर एक वर्ग विशेष के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा था तो महेन्द्र भट्ट इसमें भी कूद पड़े थे। उन्होंने पहाड़ के लोगों को सुझाव दिया था कि वे नजीबाबाद से आने वाली सब्जियां न खरीदें।

दरअसल, नजीबाबाद मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और सब्जी का व्यवसाय करने वाले लोग ज्यादातर मुस्लिम हैं। महेंद्र भट्ट ने अपने बयान में यह भी जोड़ा था कि सब्जी खरीदते समय लोग इस बात का विशेष ध्यान रखें कि जिस दुकान से वे सब्जी खरीद रहे हैं, वह किसकी दुकान है। उनका इशारा दरअसल सीधे-सीधे मुसलमानों की दुकान से सब्जी खरीदने की तरफ था।

इस बयान के बाद भी सोशल मीडिया पर महेन्द्र भट्ट की जमकर छीछालेदर हुई थी। इसके अलावा पिछले वर्ष भाजपा सरकार द्वारा घोषित घर-घर तिरंगा अभियान के दौरान भी महेन्द्र भट्ट ने एक बेतुका बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि जिस घर में तिरंगा नहीं वह घर देशद्रोहियों का है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से यह भी कहा था कि जिन घरों पर तिरंगा न लगा हो, उनका फोटो खींचकर भेजें।

इस बयान को लेकर भी लोगों ने महेन्द्र भट्ट को जमकर निशाना बनाया था। कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों, जन संगठनों और आम लोगों ने सवाल उठाया था कि क्या वे महेन्द्र भट्ट के कहने पर या महेन्द्र भट्ट के डर से घर में तिरंगा फहराएंगे? लोगों ने महेन्द्र भट्ट से नागपुर स्थित आरएसएस कार्यालय के बारे में सवाल पूछे थे, जहां कई वर्षों तक तिरंगा नहीं फहाराया गया।

हाल के दिनों में महेन्द्र भट्ट बार-बार एक बात दोहरा रहे हैं कि जोशीमठ में दिल्ली, मुंबई और जेएनयू से लोगों को बुलाया जा रहा है। इस बात पर आम लोग सोशल मीडिया पर महेन्द्र भट्ट से पूछ रहे हैं कि जब जेएनयू से पढ़ी-लिखी निर्मला सीतारमन देश का आम बजट पेश कर सकती हैं तो जेएनयू के लोग जोशीमठ क्यों नहीं जा सकते?

जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति का कहना है कि यहां के उजड़ते लोगों के संघर्ष में शामिल होने वाले देश के हर नागरिक का स्वागत किया जाएगा। हालांकि समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब तक जोशीमठ के आंदोलन में शामिल होने के लिए जेएनयू से कोई नहीं आया है।

महेन्द्र भट्ट अपने बयानों से लगातार वामपंथियों पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन ऐसा करते हुए भी वे अपनी जमकर छीछालेदर करवा रहे हैं। इसका एक मजेदार उदाहरण जोशीमठ में हाल में किये गये पुतला जलाने का कार्यक्रम है। बयान के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने महेन्द्र भट्ट का पुतला फूंका। जवाब में महेन्द्र भट्ट ने भी जोशीमठ में अपने कार्यकर्ताओं से पुतला दहन करवाया, लेकिन पुतला कांग्रेस का नहीं, बल्कि वामपंथियों का जलाया गया।

वामपंथियों को लेकर महेंद्र भट्ट अपने पूर्वाग्रह के कारण भूल जाते हैं कि सीमान्त जनपद चमोली में वामपंथी किस भूमिका में रहे हैं। संभवतः इस बारे में उनके पास कोई जानकारी है ही नहीं। ले-देकर भाजपा के लोग किसी जमाने में कर्णप्रयाग में लगाये गये ‘दिल्ली दूर, पेकिंग नजदीक’ के नारे का हवाला देकर वामपंथियों को देशद्रोही और चीन समर्थक घोषित करने का प्रयास करते रहे हैं। जबकि इस नारे की असलियत बाद में सामने आ गई थी।

वामपंथी कार्यकर्ता स्वर्गीय नन्दकिशोर मैठाणी का हस्तलिखिल लेख

जनचौक के पास चमोली जिले के समर्पित वामपंथी कार्यकर्ता रहे स्वर्गीय नन्दकिशोर मैठाणी का एक हस्तलिखित लेख है। इस लेख में वे इस नारे की असलियत बताते हुए लिखते हैं, 1962 में भारत और चीन के बीच हुई झड़प के बाद उत्तराखंड में कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों पर रोक लगा दी।

इसी दौर में कर्णप्रयाग में श्रीकृष्ण थपलियाल नामक एक व्यक्ति ने दिल्ली दूर, पेकिंग नजदीक का नारा लगाया। उसे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद उसका कहीं पता नहीं चला। उसे जबरन कम्युनिस्ट कार्यकर्ता बताकर कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लोगों का दमन बढ़ा दिया गया।

लेख के अनुसार बाद में कॉमरेड राजेश्वर राव ने भारत सरकार को बताया था कि नारा लगाने वाले श्रीकृष्ण थपलियाल का कम्युनिस्ट पार्टी से कोई संबंध नहीं था। यह बात भी खूब चर्चा में रही थी कि श्रीकृष्ण थपलियाल का संबंध आरएसएस से था। इसके बावजूद महेन्द्र भट्ट जैसे लोग 1962 में लगाये गये उस नारे की आड़ लेकर अपने पूर्वाग्रहों पर प्रदर्शन करते रहे हैं।

सीपीआई एमएल के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी भी जोशीमठ में माओवादी गतिविधियों के बयान पर सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि महेन्द्र भट्ट को माओवाद, सीपीआई और सीपीआई एमएल में फर्क मालूम नहीं है।

मैखुरी के अनुसार देश के जिस राज्य मे माओवादी नक्सलियों की गतिविधियां चल रही हैं, उनका रिकॉर्ड केन्द्रीय गृह मंत्रालय के पास दर्ज होता है, लेकिन उत्तराखंड को लेकर कोई ऐसी सूचना गृह मंत्रालय के पास नहीं है। ऐसे में महेन्द्र भट्ट के पास यह सूचना कहां से आई और उन्होंने क्या इस बारे में बयान देने से पहले पुलिस, इंटेलिजेंस और केन्द्रीय गृह मंत्रालय को सूचित किया, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

(उत्तराखंड से वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।)

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