बीजेपी को हराने के लिए कुनबा नहीं विपक्ष चाहिए सोनिया जी!

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वीडियो कान्फ्रेन्स के जरिए कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 19 दलों की मीटिंग का नेतृत्व किया। इससे निश्चित तौर पर कांग्रेस की मजबूत होती साख का पता चलता है कि कांग्रेस अपने सहयोगी दलों को साथ जोड़े रखने में कामयाब है। मगर, पता यह भी चलता है कि इस कोशिश में कांग्रेस विपक्ष को नया आकार नहीं दे सकी।

2024 में केंद्र की मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने का संकल्प जिन दलों ने लिया है वे सारे दल मिलकर भी ‘विपक्ष’ नहीं हैं। ये दल या तो यूपीए के सदस्य हैं या फिर क्षेत्रीय सरकार में कांग्रेस के साथ हैं। ममता बनर्जी अपवाद हैं जिन्होंने पश्चिम बंगाल में मोदी-शाह ब्रिगेड को परास्त करने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को साथ लेकर विपक्षी एकता की पहल करने की कोशिश दिखलायी थी। सोनिया गांधी के नेतृत्व में सद्भावना दिवस पर हुई बैठक राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को खड़ा करने की ममता बनर्जी की सोच से बिल्कुल अलग बैठक रही।

कई ऐसे दल हैं जो एनडीए में नहीं हैं, विपक्ष का हिस्सा बन सकते हैं लेकिन कांग्रेस उन दलों को इस बैठक से जोड़ नहीं पायी। 19 दलों के इस जमावड़े को क्या विपक्ष कहा जा सकता है? विपक्ष तो छोड़िए इस पहल को विपक्षी दलों को जोड़ने की कोशिश भी कैसे कहा जाए? नीचे कुछ सवालों में इन प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे-   

  • एनडीए से अलग हो चुके अकाली दल को क्या राष्ट्रीय स्तर की सियासत में विपक्षी खेमे में जगह नहीं मिलनी चाहिए? क्या इसकी कोशिश की गयी?
  • चंद्रबाबू नायडू का तेलुगू देशम  हों या फिर चंद्रशेखर राव की टीआरएस या जगन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस- क्या इन दलों के बगैर देशव्यापी विपक्ष खड़ा हो सकता है?
  • आम आदमी पार्टी ने अपने दम पर बीजेपी को राजधानी दिल्ली में लगातार दूसरी बार धूल चटा दी। आप को न्योता नहीं भेजा जाना देशव्यापी विपक्ष तैयार करने की पहल कैसे कही जा सकती है?
  • बहुजन समाज पार्टी आज भी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से अधिक ताकतवर है लेकिन उसे भी बैठक में निमंत्रण देने के लायक नहीं समझा गया। विपक्ष को एकजुट करने की यह कैसी कोशिश है?
  • समाजवादी पार्टी को न्योता दिया गया लेकिन वह बैठक में शरीक नहीं हुई तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? एसपी का यह फैसला बीएसपी को बैठक में नहीं बुलाए जाने के फैसले को भी क्या मुंह चिढ़ाता नहीं दिख रहा?
  • नवीन पटनायक की बीजेडी को भी अगर इस बैठक में जोड़ा जा पाता तो यह सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की उपलब्धि होती। मगर, ऐसा नहीं हुआ तो क्या यह विफलता नहीं है?
  • जम्मू-कश्मीर से महबूबा मुफ्ती की पीडीपी को दूर रखकर कांग्रेस विपक्ष की बैठक को पूरा कैसे मान सकती है?

2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चुनाव में हार गयी थी तब विपक्ष को विस्तार और आकार देने का काम इन्हीं सोनिया गांधी के नेतृत्व में हुआ था। एनडीए से ताकतवर बनकर यूपीए उभरी थी। आज एनडीए खुद को एकजुट नहीं रख पा रहा है। अकाली दल ही नहीं, लोक जनशक्ति पार्टी भी दो भागों में बंट चुकी है, जेडीयू भी एनडीए में असहज है। फिर भी उन्हें कांग्रेस रिझा नहीं पा रही है तो यह वह विपक्ष नहीं है जो 2024 में मोदी सरकार को उखाड़ फेंके। विपक्ष को विस्तार दिए बगैर यह सपना पूरा नहीं हो सकता।

यह बात जरूर कही जा सकती है कि कई क्षेत्रीय दलों को एकजुट करना आसान नहीं है। क्षेत्रीय हितों के लिए आरजेडी-जेडीयू और कांग्रेस मिलकर महागठबंधन बना सकते हैं लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों को विपक्ष के खेमे में ला खड़ा करना कोई आसान काम नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस मिलकर सरकार बना सकते हैं और देशव्यापी विपक्ष के दायरे में शिवसेना को लाया जा सकता है तो यही काम बिहार में भी हो सकता है और यूपी में भी। यूपी में एसपी-बीएसपी एक साथ लोकसभा का चुनाव 2019 में लड़ चुके हैं तो 2017 में कांग्रेस और एसपी मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। यह भी याद दिलाने की जरूरत है कि 2019 में चंद्रशेखर राव और चंद्र बाबू नायडू दोनों ही राष्ट्रीय स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिशों में जुटे हुए थे।

ऐसा नहीं है कि जो कोशिश हुई है वह बिल्कुल गैरजरूरी या महत्वहीन हो। मगर, यह पहल पिछले दिनों ऐसी ही अनेक पहल के मुकाबले कितनी असरदार रहने वाली है उसका मूल्यांकन करना जरूरी है। संसद सत्र के दौरान राहुल गांधी निश्चित रूप से विपक्ष को एकजुट करने में कामयाब रहे। शरद पवार ने भी विकल्प तलाशने के लिए बड़ी बैठक बुलायी। ममता बनर्जी ने भी दिल्ली आकर विपक्षी दलों को टटोला। सवाल ये है कि कांग्रेस क्या इन प्रयासों में आगे कुछ जोड़ पायी? इसी सवाल का जवाब नहीं मिल रहा।

एक और महत्वपूर्ण बात। क्या विपक्ष के पास केवल मोदी सरकार को उखाड़ने या वैकल्पिक सरकार बनाने का एजेंडा होगा? कोई सपना, कोई रोडमैप, वैकल्पिक सरकार का स्वरूप, लक्ष्य तो सामने रखना होगा। उदाहरण के लिए यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन ने विपक्ष को यह कहकर एकजुट किया था कि वह लोकपाल लाकर देश से भ्रष्टाचार को दूर भगा देगा। मोदी सरकार को हर मोर्चे पर विफल बताना मात्र विपक्ष को एकजुट करने का आधार नहीं हो सकता। जब तक वैकल्पिक कार्यक्रम नहीं रखा जाता है तब तक विपक्षी एकता का आधार मजबूत नहीं हो सकता।

सिर्फ महंगाई के मुद्दे पर ही अगर विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश होती तो वह सद्भावना दिवस के मौके पर हुई बैठक से कहीं अधिक गंभीर साबित होती। किसान, पेगासस, महामारी में कुप्रबंधन जैसे मुद्दे भी विपक्ष के लिए एकजुट होने का आधार हैं और हो सकते हैं। संसद के भीतर जो एकता दिखी थी उसे संसद के बाहर विस्तार देना जरूरी था। यह कहने में संकोच नहीं हो सकता कि ऐसी कोशिश कर पाने में कांग्रेस विफल रही। विपक्ष का मतलब न तो यूपीए रह गया है और न ही वे दल जो कांग्रेस के साथ रहे और सरकार बनाए। विपक्ष इससे बाहर भी है। इसलिए जब विपक्षी एकता की बात हो, तो सही अर्थ में विपक्ष के मायने सामने आने चाहिए।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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