Sunday, October 17, 2021

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बेहद कामयाब रहा वैश्विक महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई का केरल मॉडल

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सोमवार 20 अप्रैल से केरल के 2 जिलों (कोट्टयम, इडुक्की) में लॉकडाउन हटाने के साथ ही जनजीवन सामान्य हो जाएगा। क्योंकि यहां कोरोना के एक भी सक्रिय मामले नहीं हैं। जबकि पांच अन्य जिलों में भी कुछ प्रतिबंधों को हटा लिया गया है। बता दें कि केरल में कोरोना संक्रमित के 396 मामले मिले थे जिनमें से 255 लोग संक्रमण मुक्त होकर अपने घरों को लौट चुके हैं। केरल में कोरोना से होने वाली मृत्युदर भारत में सबसे कम और रिकवरी दर सबसे ज़्यादा है।

वैश्विक मृत्युदर- 5.75 % भारत में 2.83 % जबकि केरल में 0.58% है। केरल के कासरगोड जिले में, जहां राज्य के कोरोनो वायरस मामलों में से 44 प्रतिशत मामले हैं, यहां रिकवरी की दर राष्ट्रीय औसत से तीन गुना अधिक है। कोरोना वायरस के मामले में केरल के इस सबसे बुरे हॉटस्पॉट इलाके से अभी तक किसी की भी इस वायरस के संक्रमण से मौत होने की खबर नहीं है। जबकि केरल में सिर्फ 2 लोगों की कोरोना से मौत दर्ज की गई है।

देश का पहले कोविड-19 संक्रमित मरीज की पुष्टि 30 जनवरी को केरल में हुई थी। बावजूद इसके जहाँ भारत के तमाम दूसरे राज्यों में कोविड-19 संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है वहीं केरल ने इस वैश्विक महामारी पर लगभग नियंत्रण प्राप्त कर लिया है। जबकि केरल पूरी तरह से कोरोना महामारी के चपेट में आने के अनुकूल था। केरल से करीब 20 लाख लोग घाटी के देशों में काम करते हैं। जबकि केरल की महिलाएं नर्सों के रूप में देश-विदेश में अपनी सेवाएं दे रही हैं। अतः किसी भी दूसरे राज्य की अपेक्षा केरल में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय आवागमन ज़्यादा होता है। बावजूद इसके केरल ने न सिर्फ बहुत कम समय में इस महामारी पर काबू पा लिया और इसका नुकसान भी कम से कम हुआ। कल से केरल में ज़रूरी सेवाएं शुरु कर दी गई हैं।

आखिर केरल ने वैश्विक महामारी कोरोना को कैसे मात दी। बावजूद इसके कि केरल सरकार ने कोविड 19 वैश्विक माहामरी के खिलाफ चिकित्सीय, सामाजिक, मनौवैज्ञानिक और आर्थिक मौर्चे पर रणनीति बनाकर उस पर अमल किया। सरकार के नेतृत्व में काम करने वाले केरल वासी और वहां की बहुजन आबादी का इसमें महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।  

केरल की सामाजिक-राजनीतिक संरचना

दलित और पिछड़ी जातियों ने केरल में समाज सुधार और आत्म-सम्मान के आंदोलनों से राज्य की राजनीति, अर्थनीति में अपनी स्थिति को प्रभावशाली बनाया है। और ये दशकों के संघर्ष और आंदोलन की बदौलत है। झझवा समुदाय (जो पारंपरिक रूप से ताड़ी निकालने का काम करते रहे थे) को श्री नारायण गुरु ने संगठित किया, बाद में उनके शिष्य डॉ पल्पु ने एनएनडीपी गठित की, जबकि पुलाया समुदाय को अय्यानकली ने गठित किया था। केरल की वर्तमान वाम मोर्चा सरकार के गठन में मुख्यतः वहां की दलित पिछड़ी जातियों की बड़ी और निर्णायक भूमिकाएं हैं। अतः केरल की सरकारी नीतियों और योजनाओं में बहुजन समाज का व्यापक प्रभाव और हस्तक्षेप है। निजीकरण के खिलाफ़ सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सार्वजनिक शिक्षा के लिए बहुजन समाज ने केरल में संघर्ष किया। बहुजन समाज के प्रभाव के चलते ही केरल सरकार अपने बजट का सबसे बड़ा हिस्सा शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करती है। 

अतः केरल के सामाजिक संरचना को समझे बिना कोरोना के खिलाफ़ केरल की जीत को नहीं समझा जा सकता। केरल राज्य की कुल 3.5 करोड़ आबादी में 23 प्रतिशत मुस्लिम (बहुतायत पसमांदा) 19 प्रतिशत ईसाई (बहुतायत कन्वर्टेड आर्थिक-समाजिक पिछड़े) और 22% आबादी दलित और पिछड़ी जातियों की है। जबकि कथित ऊंची जाति के नायरों की आबादी लगभग 15 फीसदी है। केरल में सत्तासीन वाम मोर्चा को मुख्यतः इन्हीं दलित और पिछड़ी जातियों का समर्थन मिलता है। जिन्हें केंद्र में रखकर ही वर्तमान केरल सरकार ने अपनी नीतियां बनाई हैं और अपने बजट का सबसे ज़्यादा खर्च सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य पर किया है। इसके तहत सरकारी अस्पतालों को केरल के हर गांव तक पहुँचाया गया। राज्यों में स्वास्थ्य का हाल बताने वाली नीति आयोग के हेल्थ इंडेक्स (स्वास्थ्य सूचकांक) में केरल देश में सर्वश्रेष्ठ है। प्राइमरी हेल्थ सेंटर (पीएचसी) पब्लिक हेल्थ सिस्टम की सबसे अहम कड़ी बन गया। प्राइमरी हेल्थ सेंटर में काम करने वाले अधिकांश कार्यकर्ता दलित-पिछड़ी और ईसाई समुदाय से आते हैं। 

विकास का केरल प्रारूप यानि सत्ता का विकेन्द्रीकरण और कुडुम्बाश्री

केरल ने सामाजिक कल्याण के सभी मानकों को पूरा करने की नीति अपनाई और सफलता पाई है। भूमि सुधार कार्यक्रम को लागू करने के मामले में केरल देश का पहला प्रांत है। यहां विकास की विकेंद्रीकृत व्यवस्था को प्रोत्साहित किया गया। ग्राम पंचायत के अंतर्गत कुडुम्बाश्री नाम से चलाई जा रही इस योजना के तहत हर स्थान में परिवारों की एक मंडली बनाई गई है। केरल देश का एक मात्र राज्य है, जिसके सभी गांवों में अस्पताल हैं। इतना ही नहीं संचार के आधारभूत ढांचे के मामले में भी यह प्रांत अव्वल है।

वर्गवादी बहुजन राजनीतिक चेतना के चलते पिछले दो दशकों में लोगों ने सामाजिक बदलाव में राजनीति की असली भूमिका को भी ठीक से समझ लिया। राज्य में लोकतांत्रिक मोर्चा और वाममोर्चा का मौजूदा स्वरूप 1980 के दशक में बना और बहुत थोड़े बदलावों के साथ अभी तक चल रहा है। जिसमें हर जाति वर्ग का प्रतिनिधित्व है।

कोविड-19 के खिलाफ त्वरित कदम

24 घंटे के भीतर युद्ध स्तर पर 300 से अधिक डॉक्टरों और 400 से अधिक स्वास्थ्य निरीक्षकों की नियुक्ति की गई। राज्य सरकार द्वारा तत्काल 20000 करोड़ वित्तीय सहायता के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की गई। 

पीएल / बीपीएल के किसी भी विचार के बिना एक महीना भोजन प्रदान करने का आदेश और अमल किया गया। केरल, कोरोना वैश्विक महामारी को नियंत्रित करने के लिए कानून (Kerala Epidemic Diseases Act) बनाने वाला देश का पहला राज्य बना। कोविड-19 सैंपल लेने के लिए साउथ कोरिया की तर्ज पर किओस्क (WISK ) स्थापित किया गया। “चैन तोड़ो” अभियान – भारत में पहली बार हाथ धोने, स्वच्छता और शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए जागरपरता अभियान पंचायत स्तर पर चलाया गया। किंडरगार्टन (आंगनवाड़ी) के लिए घर पर मिड डे मील प्रदान करने की योजना बनाई गई। लॉकडाउन स्थिति के लिए इंटरनेट बैंडविड्थ और कनेक्टिविटी का विस्तार करने वाला भारत का पहला राज्य बना। इसके अलावा केरल ने अपने यहां प्लाज्मा थेरेपी की शुरुआत की। जबकि ये इंडिया समेत दुनिया के कई देशों में अभी नहीं शुरु हुआ है। 

रैपिड टेस्टिंग की रणनीति

केरल का कासरगोड हॉटस्पॉट बन गया। मार्च के आख़िरी हफ्ते में वहां हर रोज़ 30-40 लोग कोविड-19 पॉजिटिव निकल रहे थे। इन्हें केवल क्वारंटाइन किया गया और इनके हर प्राइमरी और सेकेंडरी कॉन्टैक्ट के रैपिड टेस्ट किए गए और इस पर नियंत्रण पा लिया गया। इनकी रैपिड टेस्टिंग की स्ट्रैट्जी सही साबित हुई। इसके लिए साउथ कोरिया की तर्ज पर केरल में भी कोविड टेस्टिंग किओस्क (WISK) स्थापित किये गए। केरल WISK स्थापित करने वाला देश का पहला राज्य बना।  घरों से जाकर सैंपल लेने के लिए मोबाइल वैन स्थापित की गई। आँकड़ों पर बात करें तो जनसंख्या घनत्व के आधार पर भारत सबसे ज़्यादा कोविड टेस्टिंग केरल में हुई।

केरल: पहला मरीज मिलते ही अलर्ट, पंचायत स्तर तक जागरूकता

केरल में बीते दो हफ्ते से नए मामले सामने नहीं आए हैं। हालांकि बीते शुक्रवार को सिर्फ एक मामला आया है। वहीं खबर लिखे जाने तक 394 संक्रमित हैं। कोरोना को रोकने में केरल के गांवों में पंचायत सदस्य और जूनियर पब्लिक हेल्थ नर्स और जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर्स जैसे हेल्थकेयर वर्कर्स बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। 
सबसे पहले तो दूसरे शहरों या गांवों से किसी के आने पर उसे गांव के बाहर ही एक अस्थायी नल पर भेजा जाता है, जहां वह अच्छी तरह से हाथ पैर धो ले। इसके बाद गांव में जाने पर पूछताछ की जाती है।
इससे केरल में कोरोना का ग्राफ बढ़ने पर रोक लगी है। नए मामलों में कमी और सक्रिय मामलों में ठीक होने का सिलसिला यदि इसी तरह दो हफ्ते और जारी रहा तो केरल वैश्विक महामारी के जबड़े से निकल जाने वाला पहला राज्य बन सकता है।

गांवों में लिंक वर्कर्स या आशा (एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) हैं। शहरों में ऊषा (अर्बन सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) वर्कर्स हैं। इन्हें लोगों को कैसे समझाना है इसकी ट्रेनिंग दी जाती है। हर आशा करीब एक हजार लोगों की इंचार्ज होती है। हेल्थकेयर वर्कर्स और पंचायत सदस्यों को अहम जानकारियां दी जाती हैं, इसमें वुहान से एयरपोर्ट पर आए पहले यात्री के साथ क्या किया गया और क्या कुछ करना चाहिए जैसी बातें शामिल होती हैं।

सामाजिक पूँजी और स्वास्थ्यगत ढाँचा

कोविड-19 से जूझ रहा केरल अपने लोगों को उबारने की कोशिश दो मोर्चों पर कर रहा है। एक तो उनके पास पहले से ही देश के किसी भी राज्य से बेहतर स्वास्थ्य सेवा-संरचना है, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा व्यवस्था के चलते वह मानव विकास सूचकांक (HDI) में देश का अव्वल राज्य बना रहता है! इस वक्त बेहतर स्वास्थ्य सेवा-संरचना उसके लिए बड़ा सहारा बनी हुई है! 

वैश्विक महामारी कोविड-19 के खिलाफ़ केरल के प्रयासों और महामारी पर काबू पाने के संदर्भ में एक शब्द जबर्दस्त रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है- सामाजिक पूँजी। यह सामाजिक पूंजी केरल के पब्लिक हेल्थ सिस्टम की रीढ़ साबित हुई है। 

केरल के लिए गेम चेंजर ग्रास रूट लेवल पर मौजूद हेल्थकेयर वर्कर हैं। जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन स्वास्थ्यकर्मियों को सामाजिक पूँजी कहा जा रहा है। इन ‘ग्रासरूट वर्कर्स की मदद से कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और कंटेनमेंट स्ट्रैट्जी’ को अमली जामा पहनाया गया। और ये मुमकिन हुआ है हेल्थकेयर के विकेंद्रीकरण की केरल सरकार की नीतियों की वजह से। सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के ज़रिए स्वास्थ्य सेवाओं को प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स से ज़िला अस्पतालों और स्थानीय निकायों तक पहुंचाया है।

सामाजिक पूंजी के साथ एक एक्सपर्ट सामाजिक पूंजी भी है। जो कि उत्साही युवा डॉक्टरों की टीम है, जो मुनाफे के बजाय सही मायने में पब्लिक हेल्थ के लिए समर्पित है।

हर आशा क़रीब 1,000 लोगों की इंचार्ज होती है। इनके साथ जूनियर पब्लिक हेल्थ नर्स (जेपीएचएन) भी होती हैं जो कि 10,000 लोगों की आबादी की इंचार्ज होती हैं। इनके ऊपर एक जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर होता है जो 15,000 लोगों के लिए उत्तरदायी होता है। 

इसके अलावा, स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक न्याय विभाग के बीच एक लिंक आंगनवाड़ी वर्कर्स का भी होता है। एक आंगनवाड़ी वर्कर 1,000 लोगों की इंचार्ज होती है।

अलग-अलग स्पेशियलिटीज से लिए गए नौ डॉक्टरों की टीम के कॉनवल्सेंट प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल से कोरोना वायरस के मरीजों का इलाज करने पर लिखे गए पेपर को इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने एप्रूव किया है।

टेलीमेडिसिन और काउंसिलिंग कॉल सेंटर

हर जिले में कम से कम दो कोविड स्पेशल अस्पताल सुनिश्चित किए गए। जबकि केरल में जोख़िम वाले लोगों को सामान्य लोगों के संपर्क से दूर रखा गया। दूसरी बीमारियों से ग्रस्त 60 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों को जिनकी संख्या 71.6 लाख है अलग किया गया। और उन्हें टेलीमेडिसिन के जरिए अपने डॉक्टरों से संपर्क कराने की योजना बनाकर अंजाम दिया गया । इसके अलावा उनकी मदद के लिए राज्य के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन द्वारा वॉलंटियर कॉर्प्स नियुक्त किए गए। इसके अलावा परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञों की नियुक्ति की गई।

कोविड-19 के कंट्रोल के लिए एक्सपर्ट्स मेडिकल कमेटी की पिछले डेढ़ महीने से हर रोज़ मीटिंग होती थी ताकि मेडिकल और पब्लिक हेल्थ मसलों पर चर्चा हो सके। रोज़ाना सुबह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए मुख्यमंत्री को सीधे रिपोर्ट किया जाता और शाम 4 बजे रिपोर्ट सबमिट की जाती।

इसके अलावा केरल राज्य में ‘दिशा’ नाम से एक कम्युनिटी कॉल सेंटर बनाया गया। इसमें एक टोल फ्री नंबर है। यह सेंटर ज़िला मेडिकल ऑफ़िसर के यहां होने वाली शिकायतों या इन्क्वायरीज़ के बारे में बताता है। 

आइसोलेशन और क्वारंटाइन के साथ एक महत्वपूर्ण समस्या मानसिक संकट है। इससे निपटने के लिए केरल सरकार ने 241 काउंसिलिंग साथ कॉल सेंटर स्थापित किए हैं, जो अब तक – 23 हजार काउंसलिंग सत्र आयोजित कर चुके हैं ताकि मौजूदा स्थिति से डरे या घबराए हुए लोगों को निजात दिलाया जा सके। 

शारीरिक दूरी, सामाजिक एकता

जैसे ही यह स्पष्ट हो गया कि वायरस सतहों पर देर तक टिका रहता है और हवा के माध्यम से फैलता है, राज्य सरकार ने अपने संसाधनों को हैंड सैनिटाइज़र और मास्क बनाने के लिए जुटाया। सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी ने हैंड सेनिटाइज़र का उत्पादन शुरू किया। यूथ मूवमेंट- डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया- और अन्य संगठनों ने भी हैंड सैनिटाइज़र का उत्पादन करना शुरू कर दिया, जबकि महिलाओं के सहकारी-कुडुम्बश्री (45 लाख मिलियन सदस्य) की इकाइयाँ – मास्क बनाने के काम में लग गईं।

स्थानीय प्रशासकों ने अपनी स्वयं की आपातकालीन समितियों का गठन किया और सार्वजनिक क्षेत्रों को स्वच्छ करने के लिए समूह बनाए और बसों की सफाई की, यात्रियों के हाथ और चेहरे धोने के लिए बस स्टेशनों में सिंक स्थापित किए। ये सामूहिक सफाई अभियान समाज पर एक शैक्षणिक वैज्ञानिक प्रभाव डालते हैं, इसके जरिए ही वोलंटियर्स “चैन तोड़ो” अभियान की सामाजिक ज़रूरत के बारे में आबादी को समझाने में सक्षम हुए।

केरल जैसे दुनिया की घनी आबादी वाले क्षेत्र में क्वारंटाइन करना कोई आसान मामला नहीं है। सरकार ने कोरोना वायरस केयर सेंटर स्थापित करके क्वारंटाइन मरीजों को सहूलियत देने के लिए खाली इमारतों को अपने कब्जे में ले लिया है और इसमें उन लोगों के लिए व्यवस्था बनाई है, जिन्हें घर पर क्वारंटाइन करने की जरूरत है, लेकिन वे भीड़भाड़ वाले घरों में हैं उन्हें सरकार द्वार स्थापित इन फैसिलिटीज में रखा जाएगा। हर कोई जो संगरोध क्वारंटाइन में है और इन केंद्रों में हैं उसे स्थानीय उनके खाना और इलाज सेल्फ स्व-गवर्नमेंट द्वारा किया जाएगा, और इलाज के बिल का भुगतान राज्य द्वारा किया जाना सुनिश्चित किया गया।

जहां देश भर में कोरोना को मुसलमान द्वारा फैलाया जाना साबित करने के लिए कोरोना जेहाद जैसे टर्म और नैरेटिव बनाए जा रहे हैं वहीं केरल के मुख्यमंत्री पिनारई विजयन ने कहा- “शारीरिक दूरी, सामाजिक एकता- इस समय हमारा नारा होना चाहिए।” 

कम्युनिटी किचेन बनाकर पुलिस द्वारा घर-घर खाना बनाना सुनिश्चित किया गया 

केरल में सबसे ज्यादा बड़ी आबादी बहुजन समाज के मजदूर मेहनतकशों की है। अतः केरल सरकार ने दूसरा बड़ा काम अपनी जरूरतमंद आबादी तक पकाया हुआ साफ-सुरक्षित खाना पहुंचाने का किया ताकि लोग लॉक डाउन के दौरान घरों से बाहर निकलने के लिए मजबूर नहीं हों। इसके लिए स्थानीय स्तर पर बाकायदा 1400 से अधिक कम्युनिटी किचेन स्थापित किए गए। जिसे चलाने का जिम्मा स्वयंसेवी निकायों को दिया गया। 

केरल सरकार ने वर्ष 2020-21 के बजट में कुडुम्बाश्री योजना के तहत 1000 होटलों की स्थापना के लिए बजट आवंटित किया था। 

अगर लोगों को जरूरी सामान मंगाना है तो उसके लिए भी बड़े पैमाने पर नेटवर्क खड़ा किया गया है! इसमें नगरपालिकाओं, पंचायतों और अन्य स्वयंसेवी संगठनों को लगाया गया है! 

इसके अलावा केरल के मुख्यमंत्री 20,000 करोड़ रुपए कोरोना महामारी से निपटने के लिए आवंटित किया था जबकि तब तक पूरे देश के लिए माननीय प्रधानमंत्री ने सिर्फ 15,000 करोड़ रुपए आवंटित किए थे।    

प्रवासी श्रमिकों के लिए कैंप व शिविर 

देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान देश भर में प्रवासी मज़दूर फँसे हुए हैं। जाहिर है केरल में भी हैं। केरल के फणसे प्रवासी मजदूरों के लिए सरकार 5,278  ऐसे शिविर खोले जिसमें प्रवासी मजदूरों के रहने खाने के अलावा हर ज़रूरी सुविधाएं मुहैया करवाई गईं ताकि वो लॉकडाउन का उल्लंघन करके कोविड-19 संक्रमण के वाहक न बनें। मजदूरों को उनकी मांग के मुताबिक उनके राज्य का खाना उपलब्ध करवाने की खास व्यवस्था की गई। जो मजदूर खुद खाना बनाना चाहते थे उनके लिए चावल, दाल, सब्जी, आटा उपलब्ध कराया गया। चूंकि मजदूर पूरे दिन शिविर में रहकर बोर न हों इसके लिए शिविर में उनके मनोरंजन की भी व्यवस्था की गई। साथ ही इन शिविरों की जिम्मेदारी जिला कलेक्टर, जिला पुलिस प्रमुख, जिला श्रम अधिकारी को दी गई। 

केरल पुलिस की भूमिका

केरल पुलिस की सराहना किए बिना कोरोना के खिलाफ केरल की जीत की कहानी अधूरी है। केरल पुलिस इस देश की सबसे मानवीय, संवेदनशील और उदार पुलिस है। कुछ दिन पहले कोविड-19 संक्रमण से बचने के लिए हैंडवाश के प्रति जन जागरुकता लाने का एक क्रिएटिव आईडिया के तहत केरल पुलिस वर्दी में हैंडवॉश डांस करती नज़र आई। डांस वीडियो को अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर केरल पुलिस ने पोस्ट किया जो वायरल हुआ था, वीडियो में कुछ केरल पुलिसकर्मी ‘हैंडवॉश डांस’ करते दिख रहे हैं।

केरल पुलिस ने बिना किसी यातना-प्रताड़ना के ये सुनिश्चित किया कि लॉकडाउन का उल्लंघन न हो, साथ ही हर बीमार को दवाई और भूखे तक खाना पहुँचे ये भी केरल पुलिस ने सुनिश्चित किया।  

(सुशील मानव जनचौक के विशेष संवाददाता हैं।)

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