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Thursday, September 23, 2021

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आठवें दौर की वार्ता में भी सरकार गिना रही है कानून के फायदे, किसान अपनी मांग पर अडिग

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विवादित कृषि कानूनों पर किसान नेताओं और सरकार के बीच वार्ता का दौर जारी है। अभी तक जो तस्वीर सामने आयी है वह उत्साहवर्धक नहीं है। इसका कुछ एहसास भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की उस फेसबुक पोस्ट में दिखा है जिसमें उन्होंने लिखा है कि वार्ता के इस आठवें दौर में भी सरकार कानून के फायदे गिना रही है। जब कि किसान एमएसपी पर कानून बनाने और तीनों कानूनों को खत्म करने की अपनी मांग पर अडिग हैं। इसके साथ ही टिकैत ने यह भी कहा है कि डेडलाक बरकरार है। और बहुत अच्छे संकेत नहीं हैं। इन स्थितियों में समझा जा सकता है कि सरकार किस हद तक क्रूर और बेपरवाह होने के साथ ही संवेदनहीन हो गयी है।

वार्ता शुरू होने से पहले अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव हन्नान मोल्ला ने साफ़ कह दिया था कि अब गेंद सरकार के पाले में है। अब उसे तय करना है कि वह किसानों की समस्या सुलझाना चाहती है या इस आंदोलन के खिलाफ़ नया षड्यंत्र करना चाहती है। उन्होंने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि सरकार किसानों के प्रति मानवीयता दिखाएगी।

उन्होंने कहा कि मुख्य एजेंडा है तीनों कानूनों को वापस लेना और MSP को कानूनी दर्जा देना। इसमें कोई कानूनी समस्या नहीं है। यह राजनीतिक इच्छा का सवाल है। अगर सरकार कॉर्पोरेट के साथ है तो वापस नहीं लेगी और अगर किसान के साथ है तो जरूर वापस लेगी।

वहीं केन्द्रीय कृषि मंत्री ने उम्मीद जताई है कि आज की बातचीत में कोई न कोई हल निकलेगा। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि आज सभी मुद्दों पर चर्चा होगी। आज की वार्ता के लिए विज्ञान भवन पहुंचे किसान प्रतिनिधि मंडल ने भी आज कोई समाधान निकलने की उम्मीद जताई है और कहा है कि नये साल में कोई न कोई हल निकलेगा।

बता दें कि कल, तीन जनवरी को आज की वार्ता से ठीक पहले शाहजहांपुर बॉर्डर से दिल्ली के लिए निकले किसानों के जत्थे पर हरियाणा के NH-8 पर धारूहेड़ा के पास पुलिस ने जमकर आंसू गैस के गोले दागे थे।

वहीं अब तक इस आंदोलन में 60 अधिक किसान शहीद हो चुके हैं जिनमें 5 आत्महत्या शामिल हैं। किसानों की इन मौतों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों चाहे कृषि बिल पर हस्ताक्षर करने वाले भारत के महामहिम रामनाथ कोविंद हों या कोई और बीजेपी नेता हो, किसी ने भी अफ़सोस का एक शब्द नहीं कहा है।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि अब तक 60 जाने गई हैं और हर 16 घंटे में एक किसान की मौत हो रही है। जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी है। राकेश टिकैत ने कहा कि कानून वापस हों, MSP पर कानून बने, स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू हो। हमें बिन्दुवार वार्ता (कानूनों पर) करने में कोई दिलचस्पी नहीं है।

किसानों ने ऐलान किया है कि अगर सरकार ने मांग नहीं मानी तो 13 जनवरी को कृषि कानूनों की कॉपियां जलाकर लोहड़ी का त्योहार मनाया जाएगा।

रविवार 3 जनवरी को संगरूर में किसानों पर लाठीचार्ज के बाद किसान नेता मंजीत सिंह राय ने कहा है कि, पंजाब सरकार ने यदि किसानों पर अत्याचार बंद नहीं किया तो उनके खिलाफ भी पंजाब में मोर्चा खोला जायेगा।

गौरतलब है कि बीते 40 दिनों से लाखों किसान दिल्ली और राजस्थान-हरियाणा की सीमा पर खुले आकाश के नीचे भीषण ठण्ड और इस बीच बारिश और वज्रपात में सड़कों पर बैठे हुए हैं और सरकार अपनी जिद पर कायम है तो किसान भी अपनी मांग पर अडिग हैं। किसानों का साफ़ कहना है कि तीनों नये कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की क़ानूनी गारंटी से कम किसी और पर बात नहीं होगी। जब तक उनकी मांगें नहीं मान ली जाएंगी तब तक वे वापस नहीं जायेंगे।

इस बीच खबर है कि, अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति (AIKSCC) व संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में दिल्ली सीमाओं पर जारी किसान आंदोलन के साथ एकजुटता कायम करने छत्तीसगढ़ से 1000 किसानों का जत्था 7 जनवरी को राजधानी रायपुर से दिल्ली के लिए रवाना होगा और छत्तीसगढ़ के किसानों को इन काले कानूनों से अवगत कराने 8 जनवरी से 22 जनवरी 2021 तक “खेती बचाओ” यात्रा प्रदेश के सभी धान खरीदी केन्द्रों में चलाई जाएगी। यह यात्रा 22 सितम्बर 2020 को किसान महासंघ से सम्बद्ध संयुक्त किसान मोर्चा धमतरी से जारी खेती बचाओ आंदोलन का राज्यव्यापी स्वरूप होगा।

गौरतलब है कि दिल्ली के बॉर्डर पर 26 नवंबर से किसानों ने डेरा जमा रखा है। कड़ाके की सर्दी में भी खुले आसमान के नीचे आंदोलन जारी है। आज की बैठक से पहले किसान संगठनों ने एक बड़ा ऐलान किया है और वो है 23 मार्च को राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकालेंगे और 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली होगी। 

(पत्रकार नित्यानंद गायेन की रिपोर्ट।)

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