Friday, January 27, 2023

खास रिपोर्ट: नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के खात्मे के लिए टुटुवापानी में हुआ बड़ा जमावड़ा, टिकैत ने की शिरकत

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नेतरहाट/रांची। नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। दरअसल रेंज को फायरिंग के लिए इस्तेमाल करने की समयावधि 11 मई, 2022 को समाप्त हो रही है। इसको आगे विस्तार न दिया जाए इसके लिए इलाके के लोगों ने एक बार फिर से गोलबंदी शुरू कर दी है। फायरिंग रेंज को खत्म करने के लिए पिछले तीन दशकों से काम कर रही फायरिंग रेंज विरोधी जनसंघर्ष समिति के नेतृत्व में 22-23 मार्च को दो दिवसीय विरोध एवं संकल्प दिवस का आयोजन किया गया।टुटुवापानी में आयोजित इस कार्यक्रम में किसानों के राष्ट्रीय नेता राकेश टिकैत और माले विधायक विनोद सिंह ने शिरकत की।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि जहां भी गरीब, मजदूर और किसानों का आंदोलन होगा, वहां मेरा समर्थन रहेगा। टिकैत ने कहा कि कोई भी आंदोलन आदमी से नहीं, बल्कि विचारधारा से चलता है। ऐसे आंदोलनों में युवाओं को आगे आना होगा।

किसान नेता ने कहा कि नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज निर्माण के विरोध की शुरुआत लगभग 3 दशक पूर्व हुई थी। आंदोलन की शुरुआत करने वाले कई लोग आज जीवित नहीं होंगे। बावजूद इसके, यह आंदोलन आज भी मजबूती से चल रहा है। यह सबसे बड़ी जीत है।

टिकैत ने कहा कि दिल्ली में एक आंदोलन शुरू हुआ था, जो 13 महीने तक चला। इस आंदोलन को पूरे देश का समर्थन मिला। जिसके बाद हमारी जीत हुई।

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कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए जाते राकेश टिकैत

उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 विचारों के आदान-प्रदान का साल है। देश में गरीब, मजदूर और किसान जहां भी आंदोलन करेंगे, मेरा उनको भरपूर समर्थन मिलेगा। किसान अपनी जमीन नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि यह उनका अधिकार है। सरकार जमीन लेने की बजाए शिक्षा देने का काम करे, तो समाज एवं देश की प्रगति होगी। उन्होंने आगे कहा कि नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज से विस्थापित होने वाले लातेहार और गुमला जिले के लोग कहां जाएंगे, यह काफी गंभीर विषय है।

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज मामले को सदन में उठाया: विनोद सिंह

इस मौके पर मौजूद माले विधायक विनोद सिंह ने कहा कि गत 20 दिसंबर, 2021 को विधानसभा में मैंने सरकार से कहा था कि दिनांक 20.08.1999 को जारी बिहार सरकार की अधिसूचना संख्या 1862 के तहत बने नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का उक्त क्षेत्र के ग्रामीण विरोध कर रहे हैं।

उनका कहना था कि मैंने यह भी पूछा था कि यह एक इको सेंसेटिव क्षेत्र है और 11 मई, 2022 को राज्य सरकार फील्ड फायरिंग रेंज की समयावधि विस्तार पर रोक लगाने को लेकर क्या विचार रखती है?  इस सवाल पर सरकार ने बताया कि इस संबंध में विभाग को अब तक कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।

विनोद सिंह ने कहा कि फायरिंग रेंज की समयावधि विस्तार पर सरकार जब तक रोक नहीं लगाती तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा।

आंदोलन के प्रति लोगों में उत्साह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस दो दिवसीय विरोध एवं संकल्प दिवस में भाग लेने के लिए ग्रामीण ट्रैक्टर्स में राशन-पानी लेकर पहुंचे थे। नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज निर्माण का विरोध करने के लिए 22 मार्च की अहले सुबह से ही लातेहार और गुमला जिले के विभिन्न गांवों के ग्रामीण टुटुवापानी मैदान पहुंचने लगे थे। ग्रामीणों को ट्रैक्टरों में सपरिवार सवार होकर टुटुवापानी पहुंचते देखा गया।

इस विरोध दिवस के दूसरे दिन उमड़े जनसैलाब ने एक स्वर में फायरिंग रेंज का अंतिम सांस तक विरोध करने का संकल्प लिया।

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रैली में जुटी जनता

आपको बता दें कि पूर्व में जारी सरकार की अधिसूचना के अनुसार 11 मई, 2022 को प्रस्तावित नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि समाप्त हो जाएगी। वक्ताओं ने कहा कि यह इलाका संविधान की 5 वीं अनुसूची में अधिसूचित है। 5 वीं अनुसूची इलाके में केन्द्र सरकार व राज्य सरकार की एक इंच भी जमीन नहीं है। यहां के प्राकृतिक संसाधन जल-जगंल-जमीन पर यहां के लोगों का अधिकार है। पेसा कानून के अन्तर्गत स्पष्ट है कि ग्राम सभाओं की सहमति के बगैर किसी भी गांव का सामुदायिक संसाधन किसी को भी हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता है।

कोयलकारो आन्दोलन का शांतिपूर्ण तरीके से अगुआई करने वाले रेजन गुड़िया ने कहा कि इसी राज्य के खूंटी के मुण्डाओं तथा स्थानीय लोगों ने अपने सामुदायिक संसाधनों की रक्षा का आंदोलन चलाया। जिसका नतीजा यह है कि आज केन्द्र और राज्य सरकार को अपनी परियोजना को स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा। आज जनसंघर्ष ही एकमात्र रास्ता है। जिसकी बदौलत तानाशाह सरकारों को झुकाया जा सकता है। केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति के वरिष्ठ नेता अनिल मनोहर ने कहा कि हम जिस मजबूती से विगत 29 वर्षों से इस विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक आन्दोलन को जारी रखे हुए हैं। इसे आने वाली पीढ़ी और धार देगीहमारे संघर्ष की जीत पक्की है।

इस विरोध दिवस में भाग लेने पहुंचे सौ गांवों के ग्राम प्रधानों ने एक स्वर में  25 अप्रैल को टुटुवापानी आन्दोलन स्थल से पद यात्रा कर राज्यपाल को ज्ञापन देने पर अपनी सहमति दी। सभा का समापन “जान देंगे, जमीन नहीं” के नारों, जुलूस वशपथ-ग्रहण के साथ किया गया।

इस सभा के आयोजन और उसकी सफलता के पीछे विस्थापन से उपजे आदिवासियों का दर्द और भय है। विडम्बना यह है कि उनके निवास स्थान आम तौर पर वन क्षेत्र होते हैं या फिर उनकी जमीन विभिन्न प्रकार के खनिजों से भरी पड़ी होती है। जिसके चलते जनहित के नाम पर उन्हें किसी न किसी परियोजना का शिकार बनना पड़ता है। और विस्थापन उनके जीवन की त्रासदी बन कर आता है। लेकिन हमें समझना चाहिए कि जब कोई गांव बसता हैतो उस गांव में वहां के बाशिंदों की कई पीढ़ियां पलती बढ़ती हैं। सामाजिक रीति-रिवाज और आस्था के लिहाज से उन गावों के आस-पास उनके अपने धार्मिक स्थलचारागाह और मसान स्थल बनते हैं।

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नतीजतन विस्थापन लोगों को उनके निवास स्थान से हटाकर दूर करने का ही मामला नहीं है, बल्कि इसके साथ उनकी संस्कृति, सामाजिक आचार-व्यवहार, आजीविका के संसाधनों की अनदेखी कर, उनको इन सब से भी वंचित कर देने का मामला होता है। इस परिप्रेक्ष्य में पुनर्वास की बात करना अजीब लगता है, क्योंकि भौतिक संसाधनों का पुनर्वास हो भी जाता हो तो भी भावनाओं का पुनर्वास कैसे हो सकता है?

दरअसल आदिवासी समूहों की जल, जंगल और जमीन से जुड़ी यही भावना उनको अपने पूर्वजों का स्थान छोड़ने से रोकती है। आदिवासी समुदाय की यह विशेषता है कि वे कहीं भी कुछ भी कर लेने के आमतौर पर आदी नहीं होते हैं। उनकी एक विशिष्ट जीवन शैली है, जिसके इर्द-गिर्द ही वो अपना जीवनयापन कर पाने में सक्षम होते हैं।

अब अगर इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो हम पाते हैं कि आदिवासियों के लिए झारखण्ड में संकट के बादल तब मंडरायेजब अंग्रेजों ने यहां के जल-जंगल और जमीन को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने का मन बनाया। और उसके लिए कानूनी जामा पहनाकर उसे अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। आदिवासी समुदाय के लिए जल, जंगल औरजमीन ईश्वरीय उपहार ही नहीं है बल्कि यह उसकी अस्मिता से जुड़ा प्रश्न है।

1793 में बना स्थाई बदोबस्ती कानून, 1855 में बना रिजर्व फॉरेस्ट एक्ट, 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून, देश की स्वतंत्रता के बाद 1951 का इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एंड रेग्युलेशन एक्ट, 1957 काकोल वायरिंग एक्ट एवं 1972 में बने वन्य जीव संरक्षण कानून समेत तमाम कानूनों ने आदिवासियों के सामने उनके जल, जंगल औरजमीन से जुड़े अस्मिता के सवाल को लाकर खड़े कर दिए।

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महिलाओं की भी अच्छी-खासी शिरकत

इसका नतीजा यह हुआ कि स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत के सपनों को साकार करने के लिए बने कल-कारखानों औरनदी घाटी परियोजनाओं ने झारखंडी समाज को उसकी जमीन से बेदखल कर दिया।

यदि एक गैरसरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो अब तक सूबे में कुल पन्द्रह लाख दो हजार नौ सौ बहत्तर (15,02,972) लोग विस्थापित हुए हैं। जिनमें आदिवासी समुदाय के छः लाख बीस हजार तीन सौ सताईस (6,20,327), अनुसूचित जाति केदो लाख बारह हजार आठ सौ बानबे (2,12,892) एवं अन्य वर्ग से छः लाख उनहत्तर हजार सात सौ तिरपन (6,69,753) लोग नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंजसमेत तमाम कारणों से विस्थापित हुए हैं।

डेवलपमेंट इनड्यूस्ड डिस्प्लेस्मेंट एण्ड रिहैबिलिटेशन इन झारखंड” पुस्तक के लेखक अलेक्स एक्का के अनुसार सिंचाई परियोजना के लिए 5.07,952.00 एकड़, औद्योगिक इकाइयों के लिए 1,75,730.18 एकड़, थर्मल पावर स्टेशन के लिए 6,026.87 एकड़, रक्षा मामलों के लिए 1,12,289.11 एकड़, राष्ट्रीय पार्क एवं अभ्यारण्य के लिए 5,05,238.50 एकड़ एवं अन्य परियोजनाओं के लिए 2,28,82428 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया। इस तरह से देखें तो कुल 20,51,185.54 एकड़ जमीन 1951 से लेकर 1995 तक विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर ली गई है।

नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज से प्रभावित लोग केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति, लातेहार गुमला के बैनर तले पिछले 29 सालों से अपने जल,जंगल, जमीन एवं अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आंदोलित हैं।

दरअसल 1956 की एक अधिसूचना द्वारा इसको स्थापित किया गया था। बिहार सरकार के मैनूवर्स फील्ड फायरिंग एंड आर्टिलरी प्रैक्टिस एक्ट 1938 की धारा 9 के अंतर्गत नेतरहाट पठार के 8 गांवों चोरमुंडा, पकरीपाठ हुस, हरमुंडाटोली, नावाटोली तैना, अहस और गुरदारी को इसमें शामिल किया गया था। और सेना इन इलाकों में तोपाभ्यास करती आ रही थी।

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इस दौरान इन गांव वालों के साथ सेना के अमानवीय व्यवहार की कई घटनाएं सामने आयीं।  जिनमें तोपाभ्यास के दौरान मृत्युसामूहिक बलात्कार के कारण कई महिलाओं की मौत, बलात्कार एवं  छेड़छाड़ की घटनाएं शामिल हैं। इन घटनाओं को लेकर पठार क्षेत्र की एक महिला जिसकी उम्र आज की तारीख में 60 से 65 साल के आस-पास है, के बयान को नोट किया जा सकता है।  वह कहती है, “मोर साईस कहत रहे, जब पलटन मने फायरिंग से आयें, राउरे मने अपन साथ हांसुआ चाहे टांगी धरल रहबा, पलटन मने पासे आये तो रैइत देबा।” इसका मतलब कि मेरी सास कहती थीं कि जब फायरिंग रेंज के जवान फायरिंग से आएं तो आप लोग अपने साथ दरांती या कुल्हाड़ी पकड़कर रखो, जैसे ही वे पास आएं उन्हें काट डालो। उस महिला का यह बयान सेना के अमानवीय व्यवहार व ऊपर दी गई घटनाओं को साबित करने के लिए काफी है।

इस क्रम में फील्ड रेंज को खत्म करने की जगह सरकार ने उसे बढ़ाने का फैसला ले लिया। उक्त अधिसूचना के समाप्त होने से पहले ही तत्कालीन बिहार सरकार ने 1991 एवं 1992 में एक और अधिसूचना जारी कर क्षेत्र का विस्तार करते हुए उसमें 245 और गांवों को शामिल कर लिया। जिनका क्षेत्रफल 1471 वर्ग किलोमीटर था। यानि ये पूरा इलाका अधिसूचित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। इसके अन्तर्गत 188 वर्ग किलोमीटर का संधान क्षेत्र नेतरहाट एवं उसके भीतर 9-9 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में सैनिक शिविर बनने के लिए कुल 206 वर्ग किलोमीटर की भूमि का अर्जन किए जाने का प्रस्ताव सामने आया।

लेकिन जनता को यह मंजूर नहीं था। लिहाजा उसने आंदोलन शुरू कर दिया। और विरोध में केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति ने मोर्चा संभाला। उसके आह्वान पर प्रभावित क्षेत्र के लोगों ने सत्याग्रह शुरू कर दिया। जिसका नतीजा यह रहा कि 22-23 मार्च, 1994 को सेना को अपना तोपाभ्यास रोकना पड़ा। और अंत में वह वापस चली गयी।

People’s Union for Democratic Rights Delhi, October 1994 की रिपोर्ट से ज्ञात हुआ कि सरकार की मनसा पायलट प्रोजेक्ट के तहत स्थाई विस्थापन एवं भूमि अर्जन की योजना को आधार दिया जाना था। केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति के प्रतिनिधियों ने माना कि रूटीन तोपाभ्यास के कारण ही पायलट प्रोजेक्ट जैसी परियोजना सामने आई है। लिहाजा केन्द्रीय समिति ने निर्णय लिया कि अगर पायलट प्रोजेक्ट को समाप्त करवाना है, तो तोपाभ्यास को ही रोकना होगा। इसी निर्णय के तहत 20 मार्च 1994 से पहले सत्याग्रह आन्दोलन की घोषणा हुई, जिसमें लाखों की संख्या में सत्याग्रह में उपस्थित होकर लोगों ने 22 मार्च, 1994 को फायरिंग अभ्यास के लिए आई सेना की गाड़ियों के काफिले को वापस कर दिया था, तब से लेकर आज तक सेना नेतरहाट के पठार पर तोपाभ्यास के लिए नहीं आई है।

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स्थानीय लोगों के जोरदार विरोध को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने प्रशासनिक अधिकारियों, सेना के अधिकारियों और जनसंघर्ष समिति के बीच वार्ता की पेशकश की जो तीन चक्रों में चली।

प्रथम त्रिपक्षीय वार्ता

गुमला के तत्कालीन उपायुक्त विद्यासागर की मध्यस्थता में सेना के अधिकारियों, गुमला व पलामू जिले (तब लातेहार जिला नहीं था) के अधिकारियों तथा जनसंघर्ष समिति के प्रतिनिधियों के बीच प्रथम त्रिपक्षीय वार्ता 9 जुलाई 1994 को हुई।

इस वार्ता में प्रशासन द्वारा पायलट प्रोजेक्ट नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज परियोजना को रद्द करने का मौखिक आश्वासन दिया गया और रूटीन फायरिंग चलने देने का आग्रह किया गया। जनसंघर्ष समिति ने सेना के अधिकारियों पर विगत 30 वर्षों (1964 से 1994) तक के गोलाबारी अभ्यास के दौरान घटी नेतरहाट पठार क्षेत्र की जनता के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक क्षति की जिम्मेदारी लेने को कहा। सेना के अधिकारियों ने जिम्मेदारी लेने से साफ इंकार कर दिया। नतीजतन जनसंघर्ष समिति ने नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज में सभी तरह की सैनिक गतिविधियों पर रोक लगा दी।

द्वितीय त्रिपक्षीय वार्ता  

9 जून, 1997 को दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल आयुक्त यूके संगमा के नेतृत्व में प्रशासन, सेनाधिकारियों तथा पलामू-गुमला में कार्यरत केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति बीच वार्ता हुई। उन्होंने समिति के पांच प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए रांची बुलाया। वार्ता में नेतरहाट रेंज को सेना के गोलाबारी अभ्यास के लिए पुन: उपलब्ध कराने की पेशकश की गई। जन संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि विगत 30 वर्षों के कटु अनुभवों से आम जनता आहत है और वह नेतरहाट रेंज में फिर से गोलाबारी अभ्यास नहीं चाहती है। जनता को पायलट प्रोजेक्ट के तहत किसी शर्त पर भूमि अधिग्रहण और विस्थापन मंजूर नहीं है। प्रतिनिधियों ने प्रशासन के सामने निम्नलिखित मांगें रखीं-

1. पायलट प्रोजेक्ट के लिए आदिवासियों की जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाए और गजट में अधिसूचित क्षेत्रों की अधिसूचना गजट अधिसूचना द्वारा ही रद्द किया जाए।

2. जनता को विश्वास में लेकर ही सैनिक या असैनिक कार्यक्रम प्रभावित क्षेत्र में रखे जाएं। जनता की जानकारी, सहमति और सहयोग के बिना कोई भी कार्यक्रम आदिवासी क्षेत्र के लिए पारित नहीं किया जाए।

3. फायरिंग रेंज को अन्यत्र स्थानांतरित करने के विकल्प की तलाश जारी रखी जाए।

4. पलामू-गुमला में स्थितजन संघर्ष समिति किसी एक व्यक्ति विशेष को औपचारिक तौर पर प्रशासन या सेना के अधिकारियों से वार्ता करने के लिए अधिकृत नहीं करती है। लिहाजा समिति के प्रतिनिधियों से मिलकर ही वार्ता का कार्यक्रम रखा जाए।

तृतीय त्रिपक्षीय वार्ता  

9 जुलाई 1997 को गुमला के उपायुक्त सुखदेव सिंह के नेतृत्व में नेतरहाट के पलामू डाक बंगले पर वार्ता हुई। इस मौके पर उन्होंने प्रमंडलीय आयुक्त दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल, रांची के नाम पर सरकार के विशेष सचिव एस. कुमार द्वारा प्रेषित पत्र का जिक्र करते हुए कहा कि प्रस्तावित पायलट प्रोजेक्ट नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के लिए भूमि अधिग्रहण नहीं किया जायगा। सेना के अधिकारियों ने जान माल की सुरक्षा पर पूरा ध्यान रखने, दैनिक मुआवजा राशि बढ़ाने, अस्थाई आवास-चिकित्सा एवं अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराके जनसंघर्ष समिति की निगरानी में सीमित अवधि तक ही गोलाबारी अभ्यास करने का आश्वासन दिया।

जन संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों ने कहा कि समिति किसी भी तरह के फायरिंग अभ्यास को पायलट प्रोजेक्ट नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज का ही रूप मानती है। लिहाजा समिति बिहार सरकार के द्वारा जारी पायलट प्रोजेक्ट की विधिवत अधिसूचना को रद्द करने की मांग करती है। इस मौके पर विगत 30 वर्षों में गोलाबारी अभ्यास के दौर के पीड़ितों ने प्रशासन और सेना के अधिकारियों के सामने अपनी मर्मस्पर्शी व्यथा-कथा सुनाई। उनकी आपबीती सुन एवं देख कर आयुक्त महोदय ने कहा कि समस्या गंभीर है, सेना फायरिंग अभ्यास का अपना नैतिक आधार खो चुकी है। इसका निराकरण स्थानीय प्रशासन के अधिकार क्षेत्र से बाहर है, इस लिए प्रशासन सरकार के पास इसकी अनुशंसा करेगी।

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9 जुलाई, 1997 के बाद 2003 तक सेना द्वारा फायरिंग अभ्यास की कोई सूचना नहीं आई। लेकिन 2 नवम्बर, 1999 को 1991-92 की अधिसूचना की अवधि समाप्त होने के पूर्व ही बिहार सरकार ने असाधारण अंक अधिसूचना संख्या-1862, दिनांक 20.08.1999 एवं अधिसूचना संख्या 1005/2-11-1999 (बिहार गजट) के द्वारा एक अधिसूचना जारी कर दी। जिसके तहत 12 मई 2002 से 11 मई 2022 तक की अवधि विस्तार किया गया, जो अब भी प्रभावित है।

झारखण्ड राज्य अलग होने के बाद झारखण्ड सरकार ने उक्त अधिसूचना को अनुमोदित किया, जिसके तहत 26 जनवरी 2004 को सेना की एक टुकड़ी एक बार चोरमुंडा गांव पार कर चुकी थी, बाकी सेना की गाड़ियां पीछे थीं, चोरमुंडा गांव के लोगों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए गांव की मुख्य सड़क पर लगे नाके को बंद कर दिया और “जान देंगे, जमीन नहीं” के नारे के साथ उसे घेर लिया। इस आंदोलन में पूरे पठार क्षेत्र की महिलाएं और पुरुष शामिल हो गए। इस मौके पर कई महिलाओं को सेना के जवानों ने रायफल के कुंदों से मारा।

इसी घटना में चोरमुंडा गांव की मरियम के हाथ में काफी चोट आई थी।

इस बीच राष्ट्रपति, देश के प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री, गृहमंत्री को नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज को बंद करने सम्बन्धित एक ज्ञापन उपायुक्त के माध्यम से दिया गया। एकीकृत बिहार व झारखण्ड राज्य बनने के बाद भी राज्य के हर राज्यपाल और मुख्यमंत्री को इस बाबत ज्ञापन सौंपा जाता रहा है। सेना द्वारा फायरिंग की नोटिस नहीं आने के बाद भी लोग 22-23 मार्च के पूर्व हर साल प्रखंड व जिला स्तर पर जुलूस के माध्यम से अपनी उपस्तिथि दर्ज कराते रहे हैं।

10 जुलाई, 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अनुसूचित जनजाति मोर्चा (आ.ज.पा. के घटक संगठन) के कार्यक्रम में फायरिंग रेंज के रद्द होने की घोषणा की थी। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत दिनांक 1अगस्त, 2017 को मांगी गई सूचना के जवाब में झारखंड सरकार के गृह मंत्रालय के अवर सचिव सह जन सूचना पदाधिकारी विजय कुमार सिंह ने दिनांक 16-08-2017 को पत्र संख्या –DB/सू.अ. (02) 41/2017-4815 के तहत उक्त अधिसूचना के प्रभावित होने की सूचना उपलब्ध कराई।

2020-21 को प्रतिनिधियों ने झारखण्ड सरकार के गृह मंत्रालय से सूचना अधिकार अधिनियम के माध्यम से नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की वर्तमान स्थिति को जानने के लिए सूचना मांगने की कोशिश की। परन्तु सरकार की ओर से कोई सूचना नहीं मिली। इस बीच समिति ने सरकार पर दबाव बनाये रखने के लिए प्रभावित इलाके के हर गांव के लोगों से 10-10 की संख्या में सूचना मांगने का आग्रह किया था। अभी तक पूरे प्रभावित इलाके में मात्र 25 लोगों ने सूचना के अधिकार का प्रयोग किया, जिसमें अधिकतर समिति के लोग शामिल थे। गृह मंत्रालय से निराश होने पर करीब 15 लोगों ने वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को भी इको सेन्सिटिव के नाम पर घेरने की कोशिश की, परन्तु यहां भी लोगों को निराशा ही मिली।

चूंकि 1999 की बिहार सरकार की असाधारण अंक अधिसूचना संख्या 1862 दिनांक 20.08.1999 एवं अधिसूचना संख्या 1005/2-11-1999 (बिहार गजट) अभी प्रभावित है। जिसकी अवधि 12 मई 2002 से 11 मई 2022 तक है।

इसलिए प्रभावित क्षेत्र के लोग डरे हुए हैं। उनका कहना है कि कहीं झारखण्ड सरकार ने तोपाभ्यास की अवधि का विस्तार तो नहीं किया है?

इसके निदान के लिए केन्द्रीय जनसंघर्ष समिति ने माले विधायक विनोद कुमार सिंह (बगोदर विधान सभा), विधायक बंन्धु तिर्की (मांडर विधानसभा), विधायक भूषण तिर्की (गुमला विधानसभा), विधायक चमरा लिंडा (विशुनपुर विधानसभा) एवं मनिका विधायक रामचंद्र सिंह से निम्नलिखित बिन्दुओं पर झारखण्ड विधान सभा के शीतकालीन सत्र में सवाल पूछकर संशय को दूर करने का आग्रह किया।

इसके तहत उन्होंने पूछा है कि (1) मैनुवर्स फील्ड फायरिंग एंड आर्टिलरी प्रैटिक्स 1938 की धारा 9 के अंतर्गत बिहार सरकार असाधारण अंक अधिसूचना संख्या- 1862 दिनांक 20.08.1999 एवं अधिसूचना संख्या 1005/2-11-1999 (बिहार गजट) क्या प्रभावित एरिया में अभी भी प्रभावित है?

(2) बिहार सरकार ने असाधारण अंक अधिसूचना संख्या- 1862 दिनांक 20.08 1999 एवं अधिसूचना संख्या 1005/2-11- 1999 (बिहार गजट) जिसकी अवधि 11 मई 2022 को समाप्त होने वाली है। क्या उक्त अधिसूचना की अवधि समाप्त होने पर इसके समयावधि या क्षेत्र विस्तार से सम्बंधित प्रस्ताव माननीय गृह मंत्रालय के पास विचार के लिए लंबित है?

(3) क्या झारखण्ड सरकार ने नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार हेतु कोई अधिसूचना जारी की है?

(4) क्या झारखण्ड सरकार ने नेतरहाट फील्ड रिंग रेंज को निरस्त कर दिया है?

(5) यदि हां, तो इससे संबंधित कोई अधिसूचना झारखण्ड सरकार द्वारा जारी की गई है?

(6) मैनुवर्स फील्ड फायरिंग एंड आर्टिलरी प्रैक्टिस 1938 की धारा के अंतर्गत बिहार सरकार में असाधारण अंक अधिसूचना संख्या-1882, दिनांक 20.08.1999 एवं अधिसूचना संख्या 1005/2-11-1999 (बिहार गजट) क्या इको सेंसिटिव एरिया में प्रभावित हो सकती है?

इस सम्बन्ध में माले विधायक विनोद कुमार सिंह ने विधान सभा के शीतकालीन सत्र में लिखकर सवाल पूछे।

जिसमें उन्होंने पूछा कि मैनुवर्स फील्ड फायरिंग एंड आटिलरी पैटिक्स एक्ट 1938 की धारा के अंतर्गत बिहार सरकार ने असाधारण अंक अधिसूचना संख्या-1882 दिनांक 20.08. 1999 एवं अधिसूचना संख्या 1005/2-11-1999 ( बिहार गजट) क्या प्रभावित एरिया में अभी भी प्रभावित है? इसके उत्तर में सरकार ने इस बात को स्वीकार किया कि यह अधिसूचना अभी भी प्रभावित है।

आगे उन्होंने पूछा कि क्या उक्त क्षेत्र में इस फायरिंग रेंज का विरोध हो रहा है और क्या ये क्षेत्र इको सेंसिटिव जोन है? सरकार ने इस प्रश्न को स्वीकार करते हुए हाँ में उत्तर दिया।

उन्होंने तीसरे सवाल में पूछा कि यदि दोनों पत्र स्वीकारात्मक हैं तो क्या सरकार फायरिंग रेंज की अवधि विस्तार को लेकर विचार कर रही है? यदि हाँ तो कब तक? यदि नहीं तो क्यों नहीं?  इस प्रश्न के जवाब में सरकार ने कहा कि इस सम्बन्ध में कोई प्रस्ताव नहीं आया है।

समिति के प्रतिनिधियों का मानना है कि यदि इस जवाब को सकारात्मक रूप से देखें तो सेना इस बात को मानने लगी है कि नेतरहाट की जनता आज भी फायरिंग रेंज का विरोध करती है, जिसके कारण उसने राज्य सरकार के पास प्रस्ताव नहीं भेजा।

यदि इस जवाब को नाकारात्मक रूप से लेंतो सरकार नेतरहाट फील्ड रेंज को रद्द करना ही नहीं चाहती। यदि सरकार की मंशा साफ होती तो विनोद कुमार के तीसरे सवाल के जवाब में कह सकती थी कि फायरिंग अभ्यास की अवधि का अब हम विस्तार नहीं करेंगे और फायरिंग रेंज को रद्द करते हैं। सरकार के पास इस तरह के निर्णय लेने के अधिकार भी हैं।

इस पर सरकार का पक्ष या नीयत साफ होनी चाहिए था क्योंकि

1. यह इलाका पलामू व्याघ्र परियोजना के तहत इको सेंस्टिव इलाका है, जहां पटाखा फोड़ना भी गुनाह है।

2. राज्य सरकार ने नेतरहाट को टूरिजम जोन के रूप में विकसित करने की घोषणा की है।

3. क्योंकि यह इलाका पांचवीं अनुसूची का इलाका है। पेसा एक्ट लागू हैजिसके तहत ग्राम सभा की सहमति के बिना किसी तरह की परियोजना नहीं बन सकती है।

लोगों को डर इस बात का है कि सरकार जब विधान सभा के माननीय सदस्य को ढुल-मुल जवाब दे सकती है, तो फिर चोरी छिपे वह अधिसूचना भी जारी कर सकती है।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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