Sunday, May 29, 2022

ग्राउंड जीरो से सकलडीहा: शौचालय बना बकरीशाला, लकड़ी के धुएं में महिलाएं पका रहीं खाना

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सकलडीहा (चंदौली)। “लॉक-डॉउन के दौरान हम लोगों के बैंक खाते में कोई पैसा नहीं आया था। हमें आवास भी नहीं मिला है। शौचालय बनाने के लिए ग्राम प्रधान ने सामान दिया था। हमने खुद से यह शौचालय बनाया। फिर भी इतना ही बन पाया। शौचालय की टंकी भी नहीं बन पाई। हम शौचालय के रूप में इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं, इसलिए इसमें बकरी बांधते हैं।”

फोटो-1 पबारू राम की झोपड़ी के पास बना शौचालय।

यह कहना है बयालीस वर्षीय पबारू राम का। वह केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय के संसदीय क्षेत्र चंदौली के डेवड़ा गांव की दलित बस्ती के निवासी हैं। डेवड़ा गांव चहनियां विकास खंड के लक्ष्मगढ़ ग्राम पंचायत का हिस्सा है। डेवड़ा गांव को लोक निर्माण विभाग डयोणा लिखता है तो बेसिक शिक्षा विभाग ड्योढ़ा।

डेवड़ा स्थित प्राथमिक विद्यालय एवं लोक निर्माण विभाग का बोर्ड।

यह चहनियां-सैदपुर मार्ग पर स्थित गुरेरा मोड़ से रामगढ़ जाने वाली सड़क किनारे बसा है। दाहिनी तरफ अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल चमार समुदाय के लोगों की करीब पचास घरों की बस्ती है। बायीं तरफ यादव, ब्राह्मण, कहार, कुम्हार, धोबी आदि जातियों की घनी बस्ती है। दो-चार घरों में चमार समुदाय के लोग भी बायीं तरफ रहते हैं। डेवड़ा गांव रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम अघोरपीठ मठ से महज चार किलोमीटर की दूरी पर है जहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बीते पांच दिसम्बर को आए थे लेकिन पबारू राम या उनके जैसे वंचित समाज के लोगों के जीवन पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिखा।

दलित पबारू राम स्नातक उपाधिधारक हैं लेकिन राजगीर का काम करते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी किरन देवी के अलावा पांच लोग और हैं। उनकी चौदह वर्षीय बड़ी बेटी सोनाली आठवीं तक की पढ़ाई की है। उससे छोटी मोहिनी कुमारी छठवीं की छात्रा है। वह दो किलोमीटर दूर मुहम्मदपुर स्थित कम्पोजिट पूर्व माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने जाती है। दस साल की चांदनी अपने आठ साल के भाई अंशु कुमार और सात साल की छोटी बहन रौशनी के साथ स्थानीय प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाती है।

पबारू राम की झोपड़ी।

सरकारी योजनाओं के लाभ के बारे में पबारू राम बताते हैं कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत उनका जॉब कार्ड बना है लेकिन उन्हें या उनकी पत्नी को काम नहीं मिलता है। मजदूरी कर किसी तरह वे लोग परिवार का पेट भर रहे हैं।

पबारू राम का जॉब कार्ड

पबारू राम के परिवार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत बने राशन कार्ड पर अनाज तो मिलता है लेकिन लॉक-डॉउन के दौरान उस परिवार को केंद्र या राज्य सरकार की तरफ से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिली। उनकी पत्नी के नाम से प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस का कनेक्शन मिला है लेकिन पैसे के अभाव में वे उसकी रिफिलिंग नहीं करा पा रहे हैं। उनकी पत्नी किरन कहती हैं, “रसोई गैस की कीमत एक हजार रुपये से अधिक हो गयी है। हमारे पास इतना पैसा इकट्ठा हो ही नहीं पाता है, इसलिए हम लोग चूल्हे पर ही भोजन बनाते हैं।”

लकड़ी और उपले पर खाना बनाती पबारू राम की बेटी।

पबारू राम का ई-श्रम कार्ड है लेकिन अभी तक उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिला था। भारत सरकार की आयुष्मान योजना के तहत उनका या उनके परिवार का हेल्थ कार्ड अभी नहीं बना है। वह बताते हैं, “मेरे पिता स्वर्गीय बच्चन राम के नाम से बहुत साल पहले इंदिरा आवास मिला था। उसमें उनके बड़े भाई रहते हैं। हम लोग इस झोपड़ी में अपना जीवन जीने को मजबूर हैं।”

अपनी झोपड़ी के सामने खड़े पबारू राम।

पबारू राम के पड़ोसी इक्यावन वर्षीय सचानू कहते हैं, ‘मुझे अभी तक शौचालय नहीं मिला है।’ वह बताते हैं कि सरकारी कागज पर उनका शौचालय बन चुका है जबकि उन्हें आज तक शौचालय का पैसा या सामान नहीं मिला है। आवास के बारे में पूछने पर कहते हैं कि उन्हें बहुत पहले इंदिरा आवास मिला था। अभी हम उसी में रह रहे हैं। सचानू की पत्नी के नाम प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस का कनेक्शन है लेकिन वे लोग भी खाना चूल्हे पर ही बनाते हैं।

फोटो-8  अपने आवास के सामने खड़े सचानू

अगर दलित बस्ती के अंदर जाने वाले रास्ते की बात करें तो यह बहुत ही पतली गली है जिसमें कोई भी तीन पहिया वाहन नहीं जा सकता है। गली के शुरुआती हिस्से पर सालों पहले ईंटें बिछाई गई थीं लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा कच्चा है। सचानू बताते हैं कि बरसात के दिनों में बस्ती के लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

दलित बस्ती की गलियां

दलित बस्ती के पिछले हिस्से में जाने पर भाजपा की योगी सरकार का विकास का दावा हवा-हवाई साबित हो जाता है। घास-फूस और तिरपाल की एक झोपड़ी में करीब आधा दर्जन बच्चों को एक किशोर पढ़ा रहा होता है। किशोर का नाम विपिन कुमार है। वह हसनपुर स्थित श्री कृष्णा इंटर कॉलेज में इग्यारहवीं का छात्र है। पूछने पर विपिन बताता है, “मैं बस्ती के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाता हूं। अभी इतने बच्चे ही आते हैं। मेरी कोशिश है कि मैं बस्ती के सभी बच्चों को निःशुल्क पढ़ाऊं।”

झोपड़ी में बच्चों को निःशुल्क पढ़ाता विपिन कुमार

निःशुल्क पढ़ाने का विचार कैसे आया? इसके जवाब में उसने कहा, “मैं खाली समय में घूम ही रहा था। ख्याल में आया कि क्यों न मैं बस्ती के बच्चों को पढ़ाऊं। इससे बस्ती के बच्चे भी यहां-वहां फालतू नहीं घूमेंगे और उनकी शिक्षा में सुधार होगा”। विपिन के पिता शिवपूजन की करीब दस साल पहले मौत हो गई थी। उसकी चालीस वर्षीय मां भगवानी देवी छह सदस्यीय परिवार का खर्च चलाती हैं। वह और उसका परिवार सत्तरवर्षीय सास चमेला देवी को मिले एक कमरे के इंदिरा आवास में रहता है। अंत्योदय कार्डधारक चमेला देवी को सरकार की ओर से वृद्धा पेंशन का लाभ मिलता है लेकिन भगवानी देवी विधवा पेंशन योजना से वंचित हैं।

अपने बच्चों के साथ भगवानी देवी।

भगवानी देवी बताती हैं, “काफी भाग-दौड़ के बाद विधवा पेंशन मिलना शुरू हुआ था। एक साल तक मिला। फिर बंद हो गया। पिछले पांच सालों से किसी प्रकार की कोई भी पेंशन नहीं मिल रही है। कई बार ग्राम प्रधान और अधिकारियों से गुहार लगा चुकी हूं लेकिन अभी तक पेंशन चालू नहीं हुई है।“

भगवानी देवी और उनके परिवार के पास कोई राशन कार्ड नहीं है। उन्हें कोई सरकारी आवास भी नहीं मिला है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत उन्हें रसोई गैस का कनेक्शन भी नहीं मिला है। वह बताती हैं, “बहुत कोशिश की लेकिन प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत गैस का कनेक्शन नहीं मिल पाया। अंत में मैंने पैसा देकर गैस-कनेक्शन कराया लेकिन महंगा होने की वजह से रसोई गैस भरा नहीं पा रही हूं। अब लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती हूं।“

डेवड़ा दलित बस्ती में सड़क किनारे धूप लेते बस्ती के लोग।

भगवानी देवी के परिवार में उनके बेटे विपिन के अलावा तीन बेटियां हैं। उनकी दो बेटियों मंजू और अंजू की शादी हो चुकी है। पंद्रह साल की नीतू हसनपुर स्थित श्रीकृष्णा इंटर कॉलेज में नौवीं की छात्रा है। भगवानी देवी बताती हैं कि उन्हें शौचालय मिला है लेकिन उनका शौचालय उपयोग में ही नहीं है। वह सेम की लताओं से ढक गया है। वह यह भी बताती हैं कि लॉक-डॉउन के दौरान उन्हें सरकार की तरफ से एक रुपये की भी आर्थिक सहायता नहीं मिली जबकि उनका जॉब कार्ड भी बना है। ई-श्रम कार्ड और आयुष्मान योजना के तहत हेल्थ कार्ड का लाभ उन्हें अभी भी नहीं मिल पाया है।

भगवानी देवी का शौचालय।

उनकी पड़ोसी अनीता देवी ईंटों के बने चूल्हे पर उपली और लकड़ी जलाकर रोटी बना रही थीं। उन्होंने बताया, “मुझे प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी गैस कनेक्शन मिला है लेकिन गैस भराने के लिए मेरे पास एक हजार रुपये इकट्ठा हो ही नहीं पाते हैं। इसलिए, चूल्हे पर खाना बनाती हूं।“ उन्होंने भी बताया कि उन्हें कोई सरकारी आवास नहीं मिला है। वह झोपड़ी में रहती हैं।

खाना पकाती अनीता देवी।

आवास नहीं मिलने की शिकायत बस्ती के रमेश कुमार और सुदर्शन को भी थी। अंत्योदय कार्ड धारक जिउतनाथ को इंदिरा आवास मिला था लेकिन परिवार बढ़ने की वजह से उनके बेटों को आवास नहीं मिलने का दर्द उन्हें भी था। वह कहते हैं, “ये सभी मुझसे अलग रहते हैं। अगर इन्हें आवास मिल जाता तो अच्छा होता।”

अपनी झोपड़ी के सामने खड़े जिउतनाथ और सुदर्शन

प्रधानमंत्री आवास योजना और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत मिलने वाले आवास को लेकर कुछ ऐसा ही हाल रामगढ़ गांव की हरिजन बस्ती में भी मिला। यहां माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियों से कर्ज लेकर लोग आवास का निर्माण करा रहे हैं।

माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियों से कर्ज लेकर बनवा रहे आवास

बाबा कीनाराम अघोरपीठ मठ से महज चार सौ मीटर की दूरी पर रामगढ़ की हरिजन बस्ती है जहां के बाशिंदे माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियों से 19.65 प्रतिशत की दर से कर्ज लेकर आवास बनाने को मजबूर हैं। बस्ती निवासी राधिका और नन्दलाल अपना आवास बनाने में व्यस्त थे। राधिका से बातचीत करने पर पता चला कि वे ‘कैशपॉर माइक्रो क्रेडिट’ से नब्बे हजार रुपये का कर्ज लेकर आवास का निर्माण करा रहे हैं क्योंकि सरकार की ओर से उन्हें आज तक कोई आवास नहीं मिला। उन्होंने बहुत बार कोशिश की लेकिन दबंग जातियों के प्रधानों ने उन्हें आवास नहीं दिया। राधिका ने बताया कि वह पूर्व में एक लाख रुपये का कर्ज ली थीं जिसे वह पहले ही भर चुकी हैं।

निर्माणाधीन आवास के सामने बैठी राधिका एवं कश्मीरा।

बता दें कि ‘कैशपॉर माइक्रो क्रेडिट’ जैसी माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियां ग्रामीण इलाकों में महिलाओं का समूह बनाकर एक साल या दो साल की अवधि का ऋण उपलब्ध कराती हैं। उनके कर्मचारी हर सप्ताह महिलाओं से प्रीमियम जमा कराते हैं। इन माइक्रो फाइनेंसिंग कंपनियों का ब्याज दर राष्ट्रीयकृत बैंकों के ब्याज दर से बहुत अधिक होता है जिसकी वजह से कई बार कर्ज लेने वाली महिलाओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लॉक-डॉउन के दौरान इन कंपनियों से कर्ज लेने वाली महिलाओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। कई महिलाएं आज भी ऋण को अदा नहीं कर पा रही हैं जिससे कंपनी के कर्मचारियों से आए दिन विवाद होता रहता है।

फोटो-17 कैशपॉर माइक्रो क्रेडिट का ऋण कार्ड

राधिका ने बताया कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत उनके परिवार का जॉब कार्ड बना है। उन लोगों ने काम भी किया लेकिन उन्हें पूरी मजदूरी अभी तक नहीं मिली है। लॉक-डॉउन के दौरान सरकार की ओर से भेजी गई धनराशि मिलने के बाबत वह कहती हैं, “उन्हें लॉक-डॉउन के दौरान कोई पैसा नहीं मिला।” राधिका को शौचालय बनाने के लिए बारह हजार रुपये का चेक मिला था जिससे वह उसका निर्माण करा चुकी हैं। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत उन्हें एलपीजी गैस सिलेंडर का कनेक्शन मिला है लेकिन वह लकड़ी के चूल्हे पर ही खाना बनाती हैं। राधिका का आयुष्मान योजना के तहत हेल्थ कार्ड नहीं बना है। राधिका ने बताया कि ई-श्रमकार्ड योजना के तहत उनका ई-श्रम कार्ड नहीं बना है। राधिका का परिवार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्यान्न पाता है और मजदूरी कर जीवन यापन करता है।

राधिका का राशन कार्ड

उसी बस्ती की निवासी कश्मीरा बताती हैं कि भारत सरकार की आयुष्मान योजना के तहत उनका भी हेल्थ कार्ड नहीं बना है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत उन्हें अनाज यूनिट से मिलता है। उन्होंने भी कहा कि उन्हें लॉक-डॉउन के दौरान किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं मिली। कश्मीरा के नाम से गैस कनेक्शन है लेकिन खाना वह लकड़ी और उपले पर ही पकाती हैं। कश्मीरा भी ‘कैशपॉर माइक्रो क्रेडिट’ कंपनी से कर्ज ली हैं और हर हफ्ते किस्त भर रही हैं।

बस्ती के पिछले हिस्से में पैंसठ वर्षीय रामू राम और उनकी पत्नी सरस्वती देवी मिलीं। रामू राम ने बताया कि वह खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत बने कार्ड पर राशन पाते हैं लेकिन उन्हें शौचालय और आवास नहीं मिला है। बुजुर्ग होने की वजह से उनके परिवार को जॉब कार्ड नहीं बना है। उन्हें और उनकी पत्नी को वृद्धा पेंशन भी नहीं मिलती है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी गैस का कनेक्शन है लेकिन वे लोग लकड़ी और उपले पर ही खाना बनाते हैं।

रामू राम और उनकी झोपड़ी

रामू राम का हेल्थ कार्ड बना है लेकिन उन्हें इसका लाभ नहीं मिल पाया। वह बताते हैं कि कुछ महीने पहले वह सकलडीहा स्थित प्रतीक्षा चिकित्सालय में भर्ती हुए थे लेकिन अस्पताल ने हेल्थ कार्ड पर निःशुल्क इलाज करने से साफ मना कर दिया था। लोगों को इलाज का पूरा पैसा वहन करना पड़ा था। रामू राम बताते हैं कि उन्हें भी लॉक-डॉउन के दौरान सरकार की ओर से कोई भी पैसा नहीं मिला था।

रामू राम का हेल्थ कार्ड

बस्ती के पिछले हिस्से के आखिरी छोर पर सैंतीस वर्षीय संजय राम छह सदस्यीय परिवार के साथ पुआल की छोपड़ी में रहते हैं। उनकी मां कमला देवी विधवा हैं लेकिन उन्हें विधवा या वृद्धा पेंशन नहीं मिलता है। संजय राम के पास राशन कार्ड भी नहीं है। ना ही उन्हें प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत एलपीजी गैस कनेक्शन का लाभ ही मिला है। उनका या उनके परिवार का ई-श्रम कार्ड और हेल्थ कार्ड भी नहीं बना है। उनका कहना है कि वह आवास के लिए कई बार गुहार लगा चुके हैं लेकिन अभी तक उन्हें आवास नहीं मिला है। संजय के परिवार में उनकी पत्नी अनिता के अलावा ग्यारह साल की आंशू है जो कक्षा चार में पढ़ती है। नौ साल की गरिमा दूसरी कक्षा की छात्रा है जबकि सात साल का आलोक अभी पढ़ने नहीं जाता है।

संजय राम और उनकी झोपड़ी

अगर बस्ती की बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो बस्ती के लोगों को आने-जाने के लिए ठीक से रास्ता तक नहीं है। गलियां कच्ची हैं। पानी निकासी के लिए नाली भी नहीं बनी है। बाबा कीनाराम अघोरपीठ मठ के सामने से जाने वाला रास्ता बस्ती ईंटयुक्त जरूर है लेकिन गड्ढे में तब्दील हो गया है। गत पांच दिसम्बर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बस्ती से महज चार सौ मीटर की दूरी पर स्थित ‘श्री सद्गुरु अघोराचार्य बाबा कीनाराम जन्म स्थली’ मठ में आए थे लेकिन उन्होंने इस बस्ती की सुध तक नहीं ली थी। उन्होंने समेकित पर्यटन विकास योजना के तहत 18 करोड़ 37 लाख रुपये की लागत वाले बहुउद्देशीय सभागार और सांस्कृतिक पंडाल का शिलान्यास किया था लेकिन रामगढ़ इलाके की दलित बस्तियों के लिए कोई सौगात नहीं दी। रामगढ़ से 15 किलोमीटर की दूरी के दायरे में कोई भी राजकीय इंटर कॉलेज और राजकीय महाविद्यालय नहीं है लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसकी घोषणा तक नहीं की।

रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम अघोरापीठ मठ

रामगढ़ स्थित बाबा कीनाराम इंटर कॉलेज ही एक ऐसा शिक्षण संस्थान है जो सरकार द्वारा वित्तपोषित हैं लेकिन छात्रों को यहां भी पढ़ाई के लिए भारी फीस चुकानी पड़ती है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से महज पैंतीस किलोमीटर दूर है जहां पांच विश्वविद्यालय स्थित हैं।  

(सकलडीहा, चंदौली से शिव दास प्रजापति की रिपोर्ट।)

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