Monday, August 8, 2022

क्या कहती है मंत्री की यह तिलमिलाहट?

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मंत्री केन्द्र के हों या राज्यों के, पत्रकारों के सारे सवालों के जवाब नहीं देते। अप्रिय, असुविधाजनक अथवा गैरजरूरी लगने पर ‘नो कमेंट’ कहकर आगे बढ़ लेते हैं। गत बुधवार को लखीमपुर खीरी में पत्रकारों के सवालों से चिढ़कर आपा खो देने वाले केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी के पास भी ‘नो कमेंट’ का यह विकल्प था। इसके बावजूद गत तीन अक्टूबर को जिले के तिकोनिया में आन्दोलनकारी किसानों की साजिशन हत्याओं के मामले में जेल में बन्द अपने बेटे से जुड़ा एक सवाल उन्हें जिस तरह नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो गया और जिसके चलते वे सवालिया पत्रकारों पर झपटकर उनको काम करने से रोकने, गलियाने, धमकाने, बेवकूफ, गन्दे व चोर वगैरह ठहराने पर उतर आये, किसी भी सभ्य व लोकतांत्रिक देश में उसकी कोई जगह नहीं हो सकती। 

हमारे देश में है तो इस कारण कि सत्ताधीशों ने हाल के वर्षां में एक से बढ़कर एक ऐसे कई करतब दिखाये हैं, जिनके कारण हमारा लोकतंत्र लंगड़ा व आजादी, जानने व बताने की आजादी समेत, आंशिक हो गई है। इस लंगड़े लोकतंत्र और आंशिक आजादी के माहौल में विकसित हो रही अपसंस्कृति का ही ‘चमत्कार’ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दो सत्ताकालों के सात से अधिक सालों में किसी संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों के सवालों के जवाब देने की जरूरत नहीं समझी है-भले ही वे गाहे-ब-गाहे देश के लोकतंत्र के गुन गाते और अभिनेताओं व कलाकारों को अपने साक्षात्कारों की ‘अनुकम्पा’ से नवाजते रहते हैं। 

इस लिहाज से अजय मिश्र टेनी द्वारा पत्रकारों से बदसलूकी को लेकर उन पर बहुत गुस्सा होने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि उनका कुसूर इतना भर है कि उन्होंने गैरजवाबदेही की उक्त अपसंस्कृति में एक नई कड़ी भर जोड़ी है और इससे हो रही जगहंसाई के मद्देनजर उन्हें हटा दिया जाये, तो भी महज इस कड़ी के टूट जाने के अतिरिक्त उसका शायद ही कोई बालबांका हो। क्योंकि उसने पत्रकारों के बड़े हिस्से को पहले ही अपने अरदब में ले रखा है और अप्रिय व असुविधाजनक सवाल पूछने की उनकी आदत छुड़ा दी है। 

यही कारण है कि अब प्रधानमंत्री के साक्षात्कारों में देश के ज्वलंत मुद्दों से जुड़े सवालों को उठाकर उनका जवाब हासिल करने के बजाय उन्हें ‘आप कौन-सा टानिक लेते हैं’, ‘आम कैसे खाते हैं’ और ‘जेब में बटुआ रखते हैं या नहीं’, जैसे मनबहलाऊ सवालों के हिंडोले में झुलाया जाता है। हालात यहां तक जा पहुंचे हैं कि सरकारों द्वारा अपने यशोगान के लिए आकाशवाणी व दूरदर्शन जैसे सरकारी प्रचार माध्यमों के दुरुपयोग का प्रसार भारती ऐक्ट के रूप में जो तोड़ निकाला गया था और जिसके तहत नवम्बर, 1997 में उन्हें स्वायत्त बनाने के उद्देश्य से प्रसारभारती नाम के निगम के अधीन कर दिया गया था, उसके लाभ भी हानि में बदलने लगे हैं। आज प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी शशि शेखर वेम्पति यह बताने में बेहद गर्व का अनुभव करते हैं कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वाराणसी के महत्वाकांक्षी दौरे को दूरदर्शन द्वारा 55 कैमरों सें कवर किया गया! 

आप कह सकते हैं कि यह तो हद है! एक ओर प्रधानमंत्री अपने प्रचार के लिए कैमरों पर इतने निर्भर हैं और दूसरी ओर उनके गृहराज्यमंत्री को किसी पत्रकार के साधारण से मोबाइल कैमरे से भी इतनी दिक्कत महसूस होती है कि वे आपा खोकर उसे बन्द कराने पर तुल जाते हैं। आप चाहें तो इस विडम्बना को यों भी समझ सकते हैं कि जनता पार्टी की सरकार के दौरान सूचना व प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने 1975 में देश पर थोपे गये आपातकाल में सेंसर समेत नाना बंदिशों व अंकुशों के समक्ष आत्मसमर्पण को लेकर पत्रकारों को उलाहना देते हुए कहा था कि आप लोगों को महज झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन आप तो रेंगने लग गये और आज उनके ‘मार्गदर्शन’ वाली मोदी सरकार के वक्त मीडिया नामधारण कर चुकी पत्रकारिता के बड़े हिस्से ने सत्ता के आगे समर्पण को ही पत्रकारिता का मापदंड बना लिया है। इससे चाटुकारिता और पत्रकारिता के बीच की सीमा रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि कई बार नजर ही नहीं आती। कहने की जरूरत नहीं कि इन हालात में मेहनती, ईमानदार और पत्रकारिता के उजले मूल्यों से प्रतिबद्ध पत्रकारों की चुनौतियां निरंतर बढ़ती जा रही हैं। वे अंदरूनी मोर्चों पर भी असहाय व अरक्षित हो गये हैं और बाहरी मोर्चों पर भी। 

लेकिन दूसरे पहलू से देखें तो इन मूल्य प्रतिबद्ध पत्रकारों द्वारा उठाये जा रहे जोखिमों का ही नतीजा है कि अभी पूरे कुंए में भांग जैसे सत्ताधीशों को अभीष्ट हालात नहीं बन पाये हैं और किसी न किसी तरफ से कभी न कभी कोई न काई ऐसा सवाल सिर उठा ही लेता है, सत्ताधीशों से जिसकी अनसुनी करते बनता है, न जवाब देते। एक साधारण से पत्रकारीय सवाल के सामने, कि तिकोनिया कांड में एसआईटी ने आपके बेटे के खिलाफ हत्या की धाराएं लगा दी हैं, इस बाबत आपको क्या कहना है, केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री का झुंझलाकर अबे-तबे पर उतरना उनकी शक्ति व उसके स्रोतों का ही पता नहीं देता, यह भी जताता है कि चोट सीधे मर्मस्थल पर लगी है, जो  सहलाई नहीं जा रही। 

आगे देखने की बात यह होगी कि वे जिस राजनीतिक जमात का हिस्सा हैं और जिसने ऐसे सवालों को अपने संकीर्तन से प्रतिस्थापित करने की अपसंस्कृति के विकास क्रम में उन्हें निर्भय किया हुआ है, वह उन्हें इस चोट को सहलाने की शक्ति देती है या इसे उनका अकेले का अपराध मानकर उसकी सजा तजवीज करती है। जो हालात हैं, उनमें यह सजा उनकी मंत्री पद से बर्खास्तगी में बदल जाये तो भी संदेह बने रहने वाले हैं कि कहीं वह दिखाने और फंसंत से निकलने भर के लिए तो नहीं दी गई। आखिरकार, इस जमात में पत्रकारों के सवालों का कौन कहे, महात्मा गांधी तक का अपमान करने वाली ‘शख्सियतें’ मौजूद हैं, प्रधानमंत्री द्वारा कभी भी दिल से क्षमा न करने की घोषणा से भी न जिनका रवैया बदलता है, न ही कुछ बिगड़ता है।

याद कीजिए, गत लोकसभा चुनाव के वक्त भोपाल सीट से भाजपा की प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता डाला तो प्रधानमंत्री ने डैमेज कंट्रोल के तहत कहा था कि उनके माफी मांग लेने पर भी वे उन्हें दिल से कभी क्षमा नहीं कर पायेंगे, क्योंकि उनकी बातें सभ्य समाज के लायक नहीं हैं। लेकिन तब से अब तक न प्रज्ञा के असभ्य बयानों की श्रृंखला पर कोई असर पड़ा है, न ही भाजपा में उनकी सेहत पर। भला अजय मिश्र टेनी ही इस परम्परा या नियम का अपवाद क्यों कर बनेंगे? 

साफ कहें तो वे अपवाद तभी बनेंगे, जब मीडिया उनके अपशब्दों से सबक लेकर अपनी जिम्मेदारी को ठीक से समझे और उसे निभाने की कीमत चुकाने को तैयार हो। वर्ना ऐसे अपशब्दों को परम्परा या मौसम बनते भी देर नहीं लगने वाली।

(कृष्ण प्रताप सिंह दैनिक अखबार जनमोर्चा के संपादक हैं।)

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