Thursday, December 9, 2021

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कृषि-कानून वापसी के बाद यूपी की चुनावी राजनीति में भाजपा के बड़े मंसूबे

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दोहरे दबाव में कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अब आगे की रणनीति क्या है? यह बात सबको मालूम है कि इन कारपोरेट-पक्षी और किसान-विरोधी कानूनों को दो तरह के दबावों-किसान आंदोलन और यूपी-पंजाब के चुनावों के दबाव में वापस लिया गया। लोगों को यह भी समझ में आया होगा कि प्रधानमंत्री ने जो किया, वह उनकी शैली नहीं है। जन-दबाव में आना उनके मन-मिजाज के बिल्कुल उलट है। फिर उन्होंने क्यों किया? 19 नवम्बर को सबको चौंकाने और खबर की दुनिया में सनसनी फैलाते हुए यह फैसला लेने के पीछे उनकी क्या रणनीति हो सकती है? तीनों कानूनों को वापस लेने का ऐलान उन्होंने अपनी कैबिनेट को विश्वास में लिये बगैर लिया। आज के दौर में कैबिनेट भला क्या करेगी! प्रधानमंत्री मोदी किसी निर्वाचित नेता की तरह नहीं, किसी ‘सम्राट’ जैसा आचरण करते हैं। उनके लिए संसदीय लोकतंत्र में कैबिनेट प्रणाली के खास मायने नहीं हैं।

कैबिनेट की जगह असल कार्यकारी शक्ति अब पीएमओ के ही पास है—और यह कोई नया सिलसिला नहीं है। सन् 1997-98 के बाद पीएमओ ने कैबिनेट को धीरे-धीरे पीछे करना शुरू किया। वाजपेयी काल में वह प्रक्रिया सुदृढ़ होकर उभरी। अब कैबिनेट बैठक सिर्फ पीएमओ के फैसले पर अपनी सहमति की मुहर लगाती है। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में जैसा ऐलान किया, उसके मुताबिक कानूनों को रद्द करने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र में कानून पारित कराया जायेगा। कानून को रद्द कराने के लिए भी कानून!  प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश में यह ऐलान किया इसलिए निश्चय ही यह सब हो जायेगा। लेकिन आगे क्या होगा?  जिन तीन कृषि कानूनों को प्रधानमंत्री मोदी ‘दिये के प्रकाश जैसा सत्य’ मानते हैं, क्या उनकी सरकार उन्हें हमेशा के लिए दफन कर देगी या यह एक अल्पकालिक और रणनीतिक कदम है? कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि यूपी में भाजपा फिर से चुनाव जीत गयी तो तीनों कृषि कानूनों को कुछ संशोधनों के साथ फिर से सामने लाया जा सकता है। 

प्रधानमंत्री मोदी के बहुतेरे समर्थक और यहां तक कि पार्टी व सरकार के कुछ प्रमुख नेता इन कानूनों को आज भी पूरी तरह जायज बता रहे हैं। मंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी के कदम का स्वागत करने के बावजूद उन तीनों कानूनों की भूरि-भूरि प्रशंसा का सिलसिला बंद नहीं किया है। क्या यह अचरज की बात नहीं कि जिन तीन कानूनों को जनता, खासतौर पर किसानों के दबाव में सरकार ने रद्द कराने का ऐलान कर दिया, उन्हें सरकार में बैठे नेता अब भी किसानों और देश के लिए बहुत अच्छा साबित करने में लगे हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर से लेकर भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी की बहुचर्चित समर्थक ‘पद्मश्री’ कंगना रनौत ने भी तीनों कानूनों के दफन होने पर अफसोस जताया है। 

19 नवम्बर गुरुपरब था-गुरुनानक देव की जयंती, जब मोदी जी ने ऐलान किया। उन्होंने अपने संबोधन में इसका खासतौर पर जिक्र किया और कहाः आइये आज से नई शुरुआत करते हैं। क्या मोदी जी वाकई राजकाज की कोई नयी शुरुआत करने वाले हैं या उनकी यह टिप्पणी भी महज एक जुमला है। उनके पूरे भाषण को मैने शब्दशः देखा-सुना। उनके पूरे संदेश से यही लगता है कि नई शुरुआत की बात महज जुमला भर है। उनके फैसले की असल वजह ‘नई शुरुआत’ नहीं, वही पुरानी बात है! चुनाव जीतने के लिए सब कुछ करना! अगर प्रधानमंत्री को गुरु-परब के मौके पर किसानों को उपहार देना था तो गुरु-परब पिछले साल भी आया था। वह तब 30 नवम्बर को पड़ा था। पिछले साल 26 नवम्बर को पंजाब-हरियाणा के किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया था। प्रधानमंत्री को उसी वक्त गुरु-परब के मौके पर किसानों को तीन काले कृषि कानूनों की वापसी के फैसले का ‘उपहार’ देना चाहिए था। उनकी सरकार की बल्ले-बल्ले हो जाती। पर उस समय़ तो उनकी सरकार किसानों पर इस कदर आक्रामक थी मानो वे किसी ‘शत्रु-देश’ के घुसपैठियों हों! इस साल यह फैसला तब हुआ, जब आंदोलन के दौरान विभिन्न कारणों से 671 किसानों की मौत हो चुकी है। यूपी और पंजाब का चुनाव सामने है। भाजपा की चुनौतियां गंभीर हैं।

प्रधानमंत्री का य़ह कहना कि ये तीनों कानूनों को उऩकी सरकार ने पवित्र मन और दिमाग से लाया था; बहुत चिंता जगाने वाली बात है।  उनके शब्दों पर गौर करें—आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए पवित्र ह्रदय से कहना चाहता हूं कि शायद हमारी तपस्या में कोई कमी रह गयी होगी जिसके कारण ‘दिये के प्रकाश जैसा सत्य’ हमारे कुछ किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाये। हमने इन तीनों कानूनों को वापस लेने का फैसला किया है। इससे पहले उन्होंने देश के कोने-कोने में उन ‘कोटि-कोटि किसानों और किसान संगठनों’ का धन्यवाद-ज्ञापन किया, जिन्होंने इन काले कानूनों का स्वागत किया था। प्रधानमंत्री ने कहा, वे आज उन सबके आभारी हैं। फिर उन्होंने फरमाया कि किसानों का एक वर्ग ही इन कानूनों का विरोध कर रहा था। कोशिशों के बावजूद वे इन कुछ किसानों को समझा नहीं पाये। समझा नहीं सके इसके लिए प्रधानमंत्री ने देश से माफी भी मांगी। काले कानूनों के लिए माफी नहीं, किसानों यानी ‘दिग्भ्रमित किसानों’ को समझा न पाने की अपनी विफलता के लिए माफी। उन्होंने कहाः भविष्य में वे इसका ख्याल रखेंगे कि लोग उनकी बात समझें। क्योंकि वह जो भी करते हैं देश के भले के लिए। ये कानून भी किसानों और देश के भले के लिए ही लाये गये। उनके इस वाक्य का मतलब निकालने के अलग-अलग कोण हो सकते हैं। 

आश्चर्य है कि संसदीय परम्परा और मर्यादा का उल्लंघन कर जबरन पारित मान लिये गये इन तीनों काले कानूनों को प्रधानमंत्री मोदी पवित्र मन से लाया कानून बताते हैं।  जिस तरह तीनों कानूनों को सितम्बर, 2020 में पारित कराने का ऐलान किया गया, वह भारतीय संविधान का घोर अपमान था। संसद के दोनों सदनों में, खासतौर पर राज्यसभा में किसी बहस या फिजिकल वोटिंग के बगैर जिस तरह ये कानून पारित कराये गये, वह अभूतपूर्व था। संविधान के अनुच्छेद 100 के तहत इसके लिए वोटिंग कराना जरूरी था। याद रहे, विधेयक से पहले अध्यादेश लाया गया था-यह जून, 2020 की बात है। 

सरकार को इन काले कानूनों को लेकर कितनी जल्दबाजी थी। इस तरह के विधायी फैसलों से इसका ठोस संकेत मिलता है। सदन मे जब विपक्षियों ने कहा कि सरकार अगर इन तीनों कानूनों को वापस न लेने की जिद्द पर अड़ी है तो संसद में जबरन पारित कराने से पहले उसे इन तीनों विधेयकों को संसद की सलेक्ट कमेटी के समक्ष भेजना चाहिए। राज्यसभा में यह विपक्ष की तरफ से सर्वदलीय मांग थी। उस दिन राज्यसभा में विपक्ष का बहुमत था। पर उसकी बात नहीं मानी गई। मजे की बात है कि सन् 1917 में चम्पारन के किसान सत्याग्रह की मांगों पर विचार करने के लिए उस समय की ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत न केवल तैयार हो गई थी अपितु उसने अपने विवादास्पद ‘चम्पारन एग्रेरियन कानून’ को बिहार और ओडिशा की एसेंबली की सलेक्ट कमेटी के विचारार्थ भेजा था।

यहां तक कि ब्रिटिश सरकार ने सत्याग्रह के नेता महात्मा गांधी को भी उस सलेक्ट कमेटी के साथ उन कानूनों की समीक्षा प्रक्रिया में शामिल होने पर सहमति जताई थी। पर आजाद भारत की मोदी सरकार को इन तीनों विवादास्पद कानूनों को संसद की सलेक्ट कमेटी में भेजना भी गवारा नहीं था। विपक्षी मांग को दरकिनार कर सरकार ने अपने मन-माफिक पीठासीन अधिकारी के जरिये उक्त कानूनों को ध्वनिमत से ही पारित करा लिया, जिसकी वैधानिक प्रामाणिकता पूरी तरह संदिग्ध थी। उस दिन विपक्ष ने एक स्वर से ध्वनि मत के बजाय व्यक्तिशः मतदान की मांग की थी। पर उसे अनसुना किया गया। और तीनों कानूनों को पारित घोषित किया गया। इसके बाद जो हुआ, वह विश्व के महान् जनआंदोलनों के इतिहास में दर्ज हो चुका है। किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी के तीन तरफ आंदोलन के तम्बू गाड़ दिये। 

क्या है भाजपा की भावी रणनीति

इतना सब होने के बावजूद प्रधानमंत्री ने किसानों के दबाव और यूपी-पंजाब के चुनाव के खातिर अगर कानूनों को वापस लेने का फैसला किया तो इसे सामान्य नहीं कहा जायेगा। हमारे सूत्रों का कहना है कि आरएसएस ने यूपी चुनाव को हर कीमत पर जीतने का सरकार और पार्टी के मौजूदा नेतृत्व को निर्देश दिया है। बताते हैं कि संघ का सोच है कि यूपी के 2022 चुनाव के बाद फिर भाजपा की सरकार नहीं बनी तो 2024 के केंद्रीय आम चुनाव में भाजपा के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जायेगा। सन् 2025 में आरएसएस के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। उसके लिए सन् 2024 के चुनावों का खास महत्व है। उस चुनाव को जीतने के लिए यूपी के 2022 चुनाव सेमिफाइनल की तरह हैं। किसान आंदोलन के चलते यूपी में जिस तरह पश्चिम यूपी के सामाजिक समीकरण बिगड़े हैं और लोग आरएसएस के प्रचारकों की भी नहीं सुन रहे हैं, उसके संकेत भाजपा के लिए अच्छे नहीं।

यूपी के पश्चिमी क्षेत्र जहां किसानों का बडा हिस्सा आंदोलन में शामिल है—में कुल 110 सीटें हैं। यूपी विधानसभा की कुल 403 सीटों में इन 110 सीटों का कितना बड़ा महत्व है, यह इन आंकड़ों से समझ सकते हैं। 2017 के एसेंबली चुनाव मे भाजपा ने राज्य में कुल 312 सीटें पाई थीं। इसमें पश्चिम यूपी की सीटें 88 थीं। जबकि 2012 में उसे यहां महज 38 सीटें मिली थीं। किसान आंदोलन के चलते इस बार यहां भाजपा को 20 सीट पाना भी कठिन हो गया है। वह इस हिस्से में कम से कम 50 सीटें नहीं पाती तो यूपी की लड़ाई उसके लिए बहुत मुश्किल हो जायेगी। यह आरएसएस के प्रचारकों और इंटरनल पार्टी सर्वेक्षकों के आब्जर्वेशन थे, जिसे पिछले दिनों केंद्रीय नेतृत्व को बताया गया। तब यूपी के लिए नयी रणनीति पर पार्टी और सरकार में चर्चा छिड़ गयी। 

लखनऊ-गाजीपुर एक्सप्रेस-वे का जल्दबाजी में उद्घाटन फिर झांसी में राष्ट्रीय रक्षा पर्व का आयोजन आदि के फैसले इसी सोच के तहत लिये गये। किसानों की नाराजगी कम करने के लिए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना सरकार की मजबूरी बन गया। न चाहते हुए भी उसे अपने पसंदीदा कानूनों को पीछे करने पड़ा। अब भाजपा की कोशिश है कि यूपी में किसान आंदोलन के शीर्ष नेता राकेश टिकैत को किसी तरह साथ लाया जाय! अगर वह नहीं आते तो उनके भाई नरेश टिकैत पर जोर लगाया जायेगा। हाल ही में केंद्र सरकार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत एक बड़े नेता ने जयंत चौधरी से भी बातचीत की। बताते हैं कि इसके लिए एक टीवी पत्रकार को माध्यम बनाया गया था।

जयंत से हर पार्टी बात कर रही है-कांग्रेस और सपा भी। उधर, भाजपा के पूर्व नेता और मेघालय के राज्यपाल सतपाल मलिक पर भी नजर है। बहुत संभव है, मलिक को अब राज्यपाल पद से हटाकर यूपी में भाजपा का स्टार प्रचारक बना दिया जाय या उन्हें कोई और राजनीतिक जिम्मेदारी दी जाय! एक ही समस्या है कि वह पूर्व समाजवादी भी हैं। इसलिए समय-समय पर कुछ न कुछ ऐसा बोल देते हैं, जिससे संघ-भाजपा के नेताओं का मन उनसे खिन्न होता है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से उनके रिश्ते अच्छे हैं। स्वयं जाट समुदाय से आते हैं इसलिए मलिक के राजनीतिक उपयोग की संभावना अगर भाजपा टटोल रही है तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं! लेकिन सत्ताधारी दल के लिए दो चर्चित जाट-परिवार ज्यादा महत्वपूर्णँ हैं-टिकैत और चौधरी परिवार। राकेश टिकैत या जयंत चौधरी में कोई भी अगर भाजपा के साथ खड़ा होने पर राजी हो जाता है तो पश्चिम यूपी में अपनी खोई हैसियत हासिल करने का उसका भरोसा पुख्ता हो सकता है। लेकिन किसान आंदोलन से जुड़े हमारे सूत्रों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि अतीत में टिकैत की भाजपा से नजदीकियां रही हैं। 

पर आज की तारीख में उनका फिर भाजपा से हाथ मिलाना उन्हें किसानों के बीच पूरी तरह अविश्वसनीय बना देगा। ऐसा जोखिम वे क्यों मोल लेंगे!  तीनों कानूनों के रद्द करने के मोदी के ऐलान और किसानों से घर लौट जाने की अपील के बावजूद किसान अब भी मैदान में डटे हुए हैं। अभी एमएसपी और बिजली संशोधन बिल का मामला लटका हुआ है। एमएसपी पर सरकार ने अगर किसानों के मनमाफिक फैसला किया तो राकेश या नरेश टिकैत के लिए भाजपा की तरफ मुखातिब होना थोड़ा आसान हो जायेगा। फिलवक्त हालात ऐसे नहीं हैं। पर भाजपा के रणनीतिकार पश्चिम यूपी में इन्हीं कुछ राजनीतिक संभावनाओं को टटोल रहे हैं। अगर वे कामयाब हुए तो तीन कृषि कानूनों को रद्द करने के सरकारी फैसले के निहितार्थ और साफ होकर सामने आयेंगे। क्या ऐसा होगा? अगर भाजपा को इस ‘प्रोजेक्ट’ में कामयाबी मिली तो किसान आंदोलन की गैर-पार्टी राजनीतिक-धारा का बहुत भारी नुकसान होगा।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और कई किताबों के लेखक हैं आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 

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