Mon. Sep 16th, 2019

आखिर और किसे कहते हैं मध्यस्थता!

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इमरान, ट्रंप और मोदी।

विशेषज्ञों ने कश्मीर को लेकर जिस बात का खतरा जताया था चीजें उसी दिशा में बढ़ती दिख रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कल तीसरी बार कश्मीर मामले में भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की। और पेशकश से पहले उन्होंने जो बयान दिया है वह उससे भी ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने कश्मीर को हिंदू-मुस्लिम झगड़े के तौर पर पेश किया है। साथ ही कहा कि घाटी में स्थितियां बेहद विध्वंसक हैं। और यह आज नहीं बल्कि पिछले 100 सालों से है। बयान आने को तकरीबन 24 घंटे बीतने को होने जा रहे हैं। लेकिन अभी तक न तो भारत सरकार की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया आयी है और न ही आने की संभावना दिख रही है।

दरअसल ट्रंप जिस बात को कह रहे हैं औपचारिक रूप से न सही भारत की मोदी सरकार ने उसी रास्ते को अपना लिया है। अपने तरीके से ट्रंप इस मामले में मध्यस्थ बन गए हैं। कभी आप फोन करके पाकिस्तान की शिकायत करते हैं तो कभी इमरान आपके खिलाफ उनके कान भरते हैं। और दोनों ही स्थितियों में ट्रंप मध्यस्थ की भूमिका में होते हैं। इससे अलग मध्यस्थता और क्या होती है? क्या जब तक औपचारिक रूप से घोषणा कर दोनों देशों को आमने-सामने नहीं बैठाया जाएगा तब तक उसे मध्यस्थता नहीं कहा जाएगा? दो दिन पहले ही रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वहां के रक्षामंत्री पोंपियो से बात कर अपना पक्ष रखा है।

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ये सब बातें यही बता रही हैं कि आप खुद कश्मीर के मसले का अंतरराष्ट्रीकरण कर रहे हैं। क्योंकि जब आप कहते हैं कि मामला द्विपक्षीय है उसी के साथ यह भी कह देते हैं कि जब तक आतंकवाद समाप्त नहीं होगा पाकिस्तान से बात नहीं होगी। अब तो इसको और आगे बढ़ाते हुए केवल पीओके पर बात करने की बात की जा रही है। यह सब कुछ करके परोक्ष रूप से यही कह रहे होते हैं कि पाकिस्तान से कोई बात नहीं हो सकती है। इस तरह से आप खुद ही अपने तर्क को खारिज कर रहे होते हैं।

लिहाजा ऐसी स्थिति में तीसरी शक्तियों या फिर अंतरराष्ट्रीय ताकतों के लिए यहीं से जगह बननी शुरू हो जाती है। बांग्लादेश से लेकर नेपाल और अमेरिका से लेकर चीन तक की आप की यात्रा इसके अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनने के ही संकेत हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस पर कोई बयान न जारी करने पर भले ही हम अपनी पीठ थपथपा लें लेकिन सच्चाई यह है कि उस मंच पर अनौपचारिक बात होना ही हमारी हार है। और इससे एक बात तय हो गयी कि जैसे ही भविष्य में कश्मीर में किसी तरह की हलचल या फिर चीजें नियंत्रण से बाहर होंगी संयुक्त राष्ट्र उसे अपने हाथ में ले लेगा।

और अब संयुक्त राष्ट्र का संतुलन भी बदल गया है। चीन के लिए यह उसका व्यक्तिगत मामला हो गया है। लिहाजा उसका रुख स्थाई तौर पर भारत विरोधी होगा। लिहाजा कश्मीर मसले पर संयुक्त राष्ट्र में भारत को नीचा दिखाने का वह कोई मौका नहीं छोड़ेगा। ब्रिटेन कुछ अपनी घरेलू परिस्थितियों और कुछ अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के चलते चीन के साथ अकेला देश था जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस पर बयान जारी किए जाने पर अड़ा था। इसके अलावा बचा फ्रांस जो अभी भारत के साथ इसलिए है क्योंकि राफेल से लेकर तमाम मसलों पर दोनों के एक दूसरे के साथ हित जुड़े हुए हैं। और सबसे खास बात इस पूरे प्रकरण में रूस का रुख रहा। रूस जो भले कहे कि मामला द्विपक्षीय है लिहाजा दोनों देशों के बीच बातचीत ही इसका असली रास्ता है।

लेकिन संयुक्त राष्ट्र में इस अनौपचारिक बातचीत को रोकने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल न करके भारत के लिए बड़ा संकेत दे दिया है। रूस अब वह रूस नहीं रहा जो हमेशा भारत के साथ खड़ा दिखता था। और आखिर में अमेरिका है जिसे मौके की तलाश है। लेकिन वह ऐसा कुछ करता हुआ नहीं दिखना चाहता है जो भारत की इच्छा के खिलाफ हो। क्योंकि उसे अभी चीन के खिलाफ भारत को इस्तेमाल करना है।

लिहाजा वह उस समय का इंतजार कर रहा है जिसमें उसकी दखलंदाजी बिल्कुल स्वाभाविक दिखने लगे। अभी उसे भारत और पाकिस्तान के बीच संतुलन भी बनाना है क्योंकि इधर अगर चीन है तो उधर अफगानिस्तान। जिसमें तालिबानों से बातचीत और अफगानिस्तान के फंदे से निकलने के लिए उसे पाकिस्तान की मदद की दरकार है। लिहाजा दोनों को साधते हुए अगर उसे मध्यस्थता मिल जाए तो ट्रंप के लिए भला इससे अच्छी बात और क्या होगी।

विदेशी मोर्चे पर हम एक के बाद दूसरे दोस्त को किस तरह से खोते जा रहे हैं उसकी ताजा नजीर ईरान है। वह ईरान जो अभी तक हर मौके पर हमारे साथ हुआ करता था। और उससे हमारी गहरी दोस्ती थी। लेकिन अमेरिका के चक्कर में वह हमसे दूर हो गया और उसका नतीजा यह है कि कल ही खुमैनी का कश्मीर पर बयान आया है। जिसमें कश्मीरियों पर किसी भी तरह के जुल्म से बचने की भारत को सलाह दी गयी है। और इसी अंतरराष्ट्रीयकरण के क्रम में पीएम मोदी आज से तीन देशों की यात्रा पर निकल रहे हैं।

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