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राहुल गांधी के सामने आखिर क्या है रास्ता?

वैसे तो लग रहा है कि कांग्रेस का संकट खत्म हो गया है, और दबी ही सही बगावत को सुर देने वाले लोग भी पीछे हट गए हैं, लेकिन मामला इतना सरल होता  नहीं है। सामने दिखने वाले चेहरे महज मुखौटे या फिर कहिए अपनी तरह की कठपुतलियां थीं, जिनकी डोर किसी और के हाथ में है। यह बात सही है कि इनके आपस में जुड़ने के अलग-अलग कारण थे। इसमें किसी का राज्य सभा का कार्यकाल खत्म हो रहा था और भविष्य की राहुल की टीम में बने रहने की कोई संभावना नहीं थी।

तो किसी को नई बनने वाली टीम में तवज्जो नहीं मिल रही थी और बीजेपी के दबाव और इशारे पर काम करने वाला आरोप भले ही सबके लिए सच न हो, लेकिन इनमें से कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जिनके सामने जेल जाने की तलवार लटक रही है। बीजेपी ने अगर उनका इस्तेमाल किया हो तो किसी के लिए अचरज नहीं होना चाहिए। लेकिन इसमें एक बात साझी है वह यह कि इनके पीछे एक चेहरा है जो अदृश्य होते हुए भी बेहद ताकतवर है।

कांग्रेस का यह संक्रमण काल है। यह बात हर कोई जानता है। राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर पहली ताजपोशी इसलिए नाकाम हो गई, क्योंकि पुरानी टीम भारी पड़ गई थी, और उसके घेरे को तोड़कर राहुल गांधी ने कोई निर्णायक पहल की हो ऐसा भी नहीं हो सका।

इस पर आने से पहले इस पूरे संकट के पीछे के असली खिलाड़ी और उसके खेल पर बात करना जरूरी होगा। दरअसल सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल अभी भी कांग्रेसी सत्ता के मजबूत केंद्र बने हुए हैं। पार्टियों में सलाहकार सिर्फ सलाहकार नहीं होता एक तरह से वह संचालक होता है। पिछले 25 सालों से अहमद पटेल कांग्रेस के भीतर इसी भूमिका में हैं। इस दौरान वह पार्टी के लिए सबसे बड़े फंड मैनेजर बने रहे।

व्यावसायिक तौर पर समृद्ध राज्य गुजरात से आने के चलते यह बात उनके पक्ष में भी रही। वैसे भी जो पैसा लाता है परिवार में उसी की चलती है। इस नजरिये से भी किसी और के मुकाबले उनका अपर हैंड बना रहा, लेकिन अहमद पटेल की सत्ता केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं थी। वह बीजेपी के भीतर तक मार करते थे। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में यह कहावत प्रचलित थी कि सूबे को तीन लोग चलाते हैं- नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अहमद पटेल।

बताया जाता है कि उनके गृह जिले भडूच में डीएम कौन होगा यह फैसला अहमद पटेल ही करते थे। इसके अलावा सूबे में उनसे जुड़े आर्थिक हितों के केंद्र हों या फिर दूसरी कोई जरूरी और प्रभावशाली चीज अहमद पटेल की हर जगह चलती थी, और फिर उनके जरिये मोदी ने न केवल गुजरात कांग्रेस बल्कि यूपीए के दौरान पूरी केंद्र की सत्ता में अपनी दखल बनाए रखी। नहीं तो इसका क्या जवाब है कि गुजरात दंगों की जांच करने वाली एसआईटी के मुखिया राघवन जांच को ताख पर रखकर मोदी द्वारा मुहैया कराए गए संसाधनों के बल पर विदेशों की सैर कर रहे थे और पटेल मौन साधे हुए थे। और अगर यह बात नहीं थी तो फिर उसको रोकने और जांच को सही तरीके से संचालित करने के लिए उन्होंने क्या किया?

इतना ही नहीं मोदी के बारे में तो यहां तक कहा जाता था कि वह सत्ता के साथ ही विपक्ष को भी संचालित करने का काम करते थे। गुजरात में अगर कांग्रेस मोदी शासन के दौरान अपाहिज बनी रही तो उसके पीछे कुछ इसी तरह के कारण थे। मोदी ने कांग्रेस के नेताओं को बारी-बारी से कैसे अपनी जेब में डाला उसकी कुछ बानगियां ही यहां पेश करना काफी होगा।

सूबे के कभी मुख्यमंत्री रहे चिमनभाई पटेल के बेटे सिद्धार्थ पटेल कांग्रेस के कद्दावार नेता हैं। उनके पास शिक्षण संस्थाओं की एक लंबी चौड़ी श्रृंखला है। मोदी शासन के दौरान ही उनके किसी कॉलेज में एससी-एसटी स्कॉलरशिप में करोड़ों रुपये के घोटाले का मामला सामने आया। इसमें मैनेजमेंट और मालिक का जेल जाना लगभग तय था, लेकिन मोदी ने एक फोन किया और सिद्धार्थ को बोल दिया कि चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब इसके बाद क्या कभी सिद्धार्थ मोदी के सामने सिर उठा कर और उनसे नजर मिला कर बात कर सकते थे?

इसी तरह से शक्ति सिंह गोहिल, जो इस समय कांग्रेस के महासचिव बने हुए हैं और बिहार के प्रभारी हैं, वह दरबारा समुदाय से आते हैं। मोदी ने इनको अपनी गिरफ्त में लेने के लिए एक दूसरी चाल चली। बताया जाता है कि उनके पास शुरू में जब दरबारा समुदाय का कोई फरियादी आता तो उसे यह कहकर कि तुम मेरे पास इसकी सिफारिश गोहिल से करवा दो। यह कर उसे गोहिल के पास भेज देते। अब जिसको अपना काम करवाना हो तो उसके लिए भला क्या गोहिल और क्या मोहिल।

इससे कहलवाना या फिर उससे। शुरू में जब कोई शख्स गोहिल के पास मोदी से सिफारिश करने की गुजारिश लेकर गया तो उन्होंने यह कह कर मना करने की कोशिश की कि मोदी उनकी बात क्यों मानेंगे, लेकिन जब सिफारिश करने पर संबंधित लोगों के काम हो गए और ऐसा एक नहीं, दो नहीं, कई बार हुआ। तब गोहिल अपने भी काम इसी तरह से मोदी से करवाने लगे। और ऐसा करते-करते कब वह मोदी की जेब में चले गए खुद उन्हें भी नहीं पता चल पाया। इस तरह से सूबे में कांग्रेस के तीनों शीर्ष नेताओं को मोदी ने अपनी जेब में रख लिया था, इसीलिए कहा जाता था कि गुजरात में मोदी सत्ता और विपक्ष दोनों को संचालित करते हैं।

बहरहाल यह कुछ विषयांतर हो गया, लेकिन असली बात यही है कि अभी भी अहमद पटेल कांग्रेस की सत्ता के केंद्र में, बने हुए हैं। अब या तो मोदी को उनकी जरूरत नहीं रही। या फिर राहुल गांधी उनकी असलियत जान गए हैं, इसलिए वह तवज्जो नहीं मिल पाती है, लेकिन चाह कर भी गांधी परिवार अहमद पटेल के खिलाफ कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं कर सकता है। कार्रवाई की बात तो दूर उनको किसी भी तरह के जोखिम का अहसास भी कराना खतरे से खाली नहीं है।

गांधी परिवार के वह सर्वप्रमुख राजदार जो हैं और उनकी किसी भी तरह की नाराजगी पूरे परिवार और फिर पार्टी के लिए भारी पड़ सकती है, क्योंकि इस तरह के किसी भी मौके का फायदा उठाने से मोदी और उनकी टीम नहीं चूकेगी, लेकिन फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए उनकी गिरफ्त से निकलना कांग्रेस की मजबूरी है, लेकिन राहुल गांधी को एक बात समझनी होगी कि कांग्रेस के भीतर इन मगजमारियों से उनकी समस्या नहीं हल होने जा रही है। इसमें फंसने का मतलब है संकट का बढ़ते जाना। यह ऐसा दलदल होगा जिससे निकलने की आशा में डूबने का खतरा ज्यादा है।

इस बात में कोई शक नहीं कि कांग्रेस के नेतृत्व में नेहरू के बाद पहला कोई शख्स है जो खुलकर संघ के खिलाफ बोल रहा है। और इस बात को संघ अच्छी तरह से जानता है कि राहुल के सत्ता में आने का मतलब उसके वजूद को खतरा। अनायास नहीं कि उसने करोड़ों रुपये राहुल गांधी को पप्पू साबित करने में लगा रखे हैं। इसके साथ ही मौजूदा सत्ता से लड़ने में जिस साहस और धैर्य की जरूरत है वह भी किसी और कांग्रेसी से ज्यादा राहुल दिखा रहे हैं। इस मामले में वह पूरे विपक्ष में भी अकेले नेता हैं, लेकिन राहुल या फिर कांग्रेस अभी जहां फंसी है, शायद उनकी उस तरफ निगाह नहीं गई या फिर जान कर भी उसकी अनदेखी की जा रही है।

कोई भी नेता अपनी नीतियों के साथ ही बनता और बिगड़ता है। देश के तमाम ज्वलंत सवालों पर कांग्रेस का रुख लिजलिजा होने के साथ ही बेहद अस्पष्ट है। वह कश्मीर का मसला हो या कि अयोध्या की बात या फिर सार्वजनिक क्षेत्रों को कॉरपोरट के हाथों में सौंप देने की मौजूदा सरकार की नीति। सभी मसलों पर कांग्रेस का रुख ढुलमुल रहा है। अब इन स्थितियों में अगर कोई पार्टी के भीतर से किसी नेतृत्व के उभरने की उम्मीद करे तो उसके भोलेपन पर महज तरस ही खाया जा सकता है और दुनिया को बताने से पहले खुद को बताना पड़ता है कि आप क्या हैं? और जनता कभी भी उस शख्स के साथ नहीं खड़ी होती है जिसकी अपनी कोई नीति नहीं होती। और यहां अगर कुछ है भी तो वह बेहद ढुलमुल।

राहुल गांधी को एक बात समझनी होगी कि कुछ वाम कार्यकर्ताओं और उनके कुछ बुद्धिजीवियों के जुटा लेने भर से इसकी भरपाई कतई नहीं होने जा रही है। इससे संख्या में भले ही कुछ बदलाव आ जाए लेकिन गुणवत्ता के स्तर पर चीजें नहीं बदलने जा रही हैं। उसके लिए उन्हें खुद उन चीजों पर स्टैंड लेना होगा जिनकी आज देश की व्यापक गरीब जनता, किसान, मजदूर और दूसरे अल्पसंख्यक और उत्पीड़ित दलित समुदायों को जरूरत है, जिस बात से राहुल गांधी और उनके सलाहकार डर रहे हैं शायद वह उसकी असली सच्चाई को नहीं देख पा रहे हैं। दुनिया में दक्षिणपंथी उदारवादी व्यवस्था संकट में है। आईएमएफ-वर्ल्ड बैंक के नेतृत्व में दुनिया की लूट की जो व्यवस्था बनी थी वह चरमरा कर गिर रही है।

कभी उसका नेतृत्व करने वाला अमेरिका आज खुद उसके विरोध में खड़ा हो गया है, क्योंकि उसके बने रहने से उसको बड़ा नुकसान है और अमेरिका से लेकर दुनिया के दूसरे हिस्सों के बाजार पर चीन का कब्जा होता जा रहा है। लिहाजा ट्रम्प अनायास नहीं अमेरिका फर्स्ट का नारा देने के लिए मजबूर हैं। और आत्मनिर्भरता से लेकर अपने बाजार को सुरक्षित रखने के साथ ही चीनी सामानों और उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने तक के रास्ते पर बढ़ गए हैं।

यह बात हर किसी को याद होगी कि कभी डब्ल्यूटीओ के जरिये तीसरी दुनिया के गरीब देशों को अपना बाजार खोलने के लिए अमेरिका धमकी दिया करता था। लेकिन वही अमेरिका आज अपना बाजार बंद कर रहा है। किसी समय दुनिया को गांव में बदल देने की अगुआई करने वाला यह मुल्क अब अमेरिका फर्स्ट और अमेरिकी राष्ट्र्वाद की बात कर रहा है। बावजूद इसके चीजें उसके हाथ से निकलती जा रही हैं। और अमेरिका का यह दक्षिणपंथी वर्चस्व उसके ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन में टूट कर उस समय धराशायी हो गया जब गोरों और कालों ने मिलकर वर्चस्व के हर प्रतीक को ध्वस्त कर दिया। आने वाले अमेरिका के नवंबर चुनाव में शायद यह अपने तार्किक परिणति तक पहुंच जाए।

ऐसे में राहुल गांधी को इस देश के भीतर एक उदार-प्रगतिशील, जनपक्षधर और सेकुलर नीति पर न केवल खड़ा होना होगा बल्कि उसको हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देनी होगी। राहुल गांधी को एक बार जरूर यह सोचने की जरूरत है कि अगर वह इस दौर में प्रशांत भूषण के साथ नहीं खड़े हो सकते हैं तो किसी और सत्य के साथ कैसे खड़े हो पाएंगे। इतिहास में ऐसे ही मौके आते हैं जब नेतृत्व की परीक्षा होती है। और इन मौकों पर लिए गए अपने स्टैंड के जरिये नेतृत्व की पहचान बनती है।

इसलिए इधर-उधर देखने की जगह नीतिगत स्तर पर जिस बदलाव की जरूरत है राहुल गांधी को उसके बारे में सोचने चाहिए। और उसी के साथ नेतृत्व भी खड़ा होगा, क्योंकि कोई भी नेता हवा में नहीं बनता। वह अपनी सोच, नीति और उन पर लिए गए अपने फैसलों से बनता है।

राहुल गांधी को यह बात समझनी होगी कि समाजवादी चंद्रशेखर के कांग्रेस में शामिल होने भर से इंदिरा गांधी को फायदा नहीं होता। अगर वह बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स के समाप्ति की घोषणा नहीं करतीं।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संस्थापक संपादक हैं।)

This post was last modified on August 27, 2020 4:55 pm

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