कब महिलाओं को मिलेगी मर्दवादी सोच से निजात?

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आज भारतीय नारी के लिए ही नहीं संपूर्ण देश के लिए एक गौरवशाली दिन था जब मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में सिल्वर मेडल लेकर देश को गौरवान्वित किया। सहसा मेरा ध्यान उनकी पोशाक पर गया और फिर देवरिया की नाबालिग लड़की की अचानक याद आ गई जिसे जींस पहनने के कारण दादा, चाचा या कहें तमाम कुनबे ने मौत के घाट उतार कर फेंक दिया। उसकी गलती यह थी कि वह जो पोशाक लुधियाना में पहन सकती थी वह गांव में पहनना इतना संगीन गुनाह बन गया। नतीजतन प्यारी मासूम जींस के प्रेम में बलि चढ़ा दी गई। मां की चीखें और आटो वाले की फरियाद भी काम नहीं आई बल्कि उनकी पिटाई की गई। खाप पंचायतों की तरह का यह फरमान एक गंभीर अपराध है। दोषियों को सख्त सजा की दरकार है।

बहरहाल, इस घटना ने हर संवेदनशील स्त्री को यकीनन झकझोरा ही होगा। लेकिन प्रतिरोध कहीं भी शायद ही दर्ज कराया हो। हम यहीं चूक कर जाते हैं। स्त्री यदि स्त्री के साथ खड़ी नहीं होगी तो इस तरह की घटनाओं को रोकना कठिन होगा। हम भली-भांति जानते हैं कि आज भी स्त्री देह पर स्त्री का नहीं पुरुषों का बर्चस्व है। उसकी नीयत साफ़ नहीं इसलिए कहीं वह घूंघट की कारा में है तो कहीं बुर्के की गिरफ्त में।

आज महिलाएं जब क्षितिज पर पहुंच अन्तर्राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं तब ये घटनाएं ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली प्रतिभाओं का दम घोंट देने पर विवश करती हैं। स्त्री को स्त्री का सहारा मिले तो वह मीरा चानू बन सकती है। विदित हो कि मीरा की मां की एक छोटी सी दुकान है पर मीरा के अरमानों का उन्होंने ख्याल रखा जिसकी बदौलत वह आज दुनिया में नाम रोशन कर पाई। परिवार का साथ स्त्री को मज़बूती से मिले तो भारत की तस्वीर बदल सकती है। उसके वस्त्रों पर मर्दवादी सोच हावी‌ है इस पर भी स्त्री को मिलकर पहलकदमी करनी होगी।

आइए, स्त्री के वस्त्रों के बारे में पर विहंगम दृष्टि डालें तो इसे पुरानी मूर्तियों में देखा जा सकता है जहां स्त्री कितने कम वस्त्रों में मौजूद है। ईसा से तीन सदी पहले मौर्य और शुंग राजवंश के वक्त की प्रस्तर प्रतिमाएं ये बताती हैं कि तब स्त्री और पुरुष आयताकार कपड़े का एक टुकड़ा शरीर के निचले हिस्से में और एक ऊपरी हिस्से में पहना करते थे। तब सिर्फ अधोवस्त्र ही स्त्री पुरुष का परिधान था।

15वीं सदी में हम देखते हैं कि मुसलमान और हिंदू औरतें अलग अलग तरह के कपड़े पहनती थीं और 16वीं और 17वीं सदी के दौर में जब पूरे भारत और पाकिस्तान पर मुगलों की सत्ता थी तो उनका भी साफ असर था। पहनावे के तौर तरीके को लेकर कभी भी कोई लिखित नियम कायदा नहीं था कि किस तरह से क्या पहना जाए, हां ये जरूर था कि मुसलमान औरतें अमूमन खुद को ढंक लिया करती थीं और उनके लिबास कई हिस्सों में होते थे शायद इन्हीं कपड़ों से सलवार-कमीज़ की शुरुआत हुई होगी जिसे आज भारत में एक तरह से राष्ट्रीय पोशाक माना जाता है।

यहां यह भी जानना चाहिए वो ज्ञानदानंदिनी देवी थीं जिन्होंने ब्लाउज़, बंडी, कुर्ती और आज के दौर की साड़ी को फ़ैशन में लाया। वे मशहूर कवि रवींद्रनाथ टैगोर के भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर की पत्नी थीं। कहा जाता है कि उन्हें नग्न वक्षस्थल के ऊपर साड़ी लपेटकर अंग्रेज़ों के लिए बनाए गए क्लबों में जाने से रोक दिया गया था। सत्येंद्रनाथ के बारे में माना जाता है कि वे पश्चिमी तौर-तरीके अपनाने के लिए अपनी पत्नी को प्रोत्साहित करते रहते थे। इसीलिए बहुत से भारतीय ये समझते हैं कि औरत के पहनावे और उसकी लज्जा से जुड़े विचार अंग्रेजों से विरासत में मिले हैं यानि नारी लज्जा की बुनियाद हमारे देश में अंग्रेजों ने रखी।

इसके चलते आज कालेजों में कहीं कहीं जींस पर प्रतिबंध है। ड्रेस कोड स्कूलों, कालेज और कई संस्थानों में लागू है। इसे अनुशासन और एक पहचान के बतौर इस्तेमाल किया जाता है लेकिन पहनावा निजी पसंद का मामला है उस पर रोक टोक उचित नहीं। फिर भारत विविधताओं का देश है सभी तरह की जलवायु यहां मौजूद है। बहुत गर्म क्षेत्र हैं तो बहुत ठंडे भी। इसलिए हर बदलाव पर पोशाक और रहन-सहन, खानपान, भाषाएं बदल जाती हैं। यहां सबको साड़ी ,सलवार कुर्ती या जीन्स नहीं पहनाई जा सकती। मौसम बदलने पर ज़रुर पोशाक बदल जाती है।

आज महिलाओं ने अब जिस तरह के जोखिम भरे काम लेना शुरू किए हैं वे हवाई जहाज उड़ा रही हैं, मोटर साइकिल पर सवार हैं। सेना में हैं,पुलिस में हैं, सीआरपीएफ में हैं वहां साड़ी पहनकर, अपने को बंधन में महसूस करती हैं  इसलिए वे जींस पहनती हैं जिस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आज पोशाक और जेवर, ज़रूरत के अनुसार पहने जाते हैं। क्या ये सब ग़लत हैं। संस्कारों का अपमान है? आगे बढ़ती स्त्री की बढ़ती सोच का स्वागत होना चाहिए।

खासकर बच्चों को तो जो भी पसंद आता है वह उन्हें उनकी ख़ुशी के लिए पहनाना ही होता है ये नहीं होता कि वह फ्राक या जींस पहनकर अंग्रेज बन रही हैं या सलवार कुर्ती पहनकर मुस्लिम। उसे हम सब पहनाते हैं तिस पर देवरिया की ऐसी हृदयविदारक घटना सारा सुकून छीन लेती है।

मगर उन तंग-दिमाग लोगों के पास न तर्क होते हैं न वितर्क। बहस उन्हें आतंकित करती है। वे दूसरों पर खुलना नहीं चाहते। बंधनों को तोड़ने से घबराते हैं। यथास्थितिवाद उन्हें पसंद है। सदियों से जिन बासी मान्यताओं और सड़ी-गली स्थापनाओं को वे देखते, पढ़ते व सुनते चले आ रहे हैं, चाहते हैं, अब भी उसी दलदल में धंसे रहें।

(सुसंस्कृति परिहार स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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