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क्या प्रोपेगंडा मशीन को मेनस्ट्रीम मीडिया कहना वाजिब है?

लो जी, बस इसी की कमी रहती थी।

मोदी सरकार ने यह कमी भी पूरी कर दी।

अब कॉरपोरेट मीडिया के जबड़े से बाहर जो इन्टरनेट पर पत्रकारिता की थोड़ी बहुत पवित्र जगह (प्रभाष जोशी के शब्दों में) बची थी वहाँ भी कीचड़ फैला कर ‘कमल’ खिलाने की कोशिश शुरू हो गयी है। जो राजनेता अपना राजधर्म भूल गए हैं वह चाहते हैं कि जो बचे-खुचे चंदेक पत्रकार हैं, वह भी अपना पत्रकारीय धर्म भूल जाएँ। यह तो धर्म-संहार है। हे राम। हे राम।

राम के नाम पर याद आया। राम को केवट ने गंगा पार करवाई तो राम उन्हें कुछ देना चाहते थे। केवट ने कुछ भी लेने से मना कर दिया। बोले- हे राम, आज मैंने गंगा पर कारवाई है, कुछ नहीं लिया। जब मैं मर जाऊँ तो भवसागर पार लगा देना, कुछ मत लेना, हिसाब बराबर हो जाएगा। अगर मानें तो, राम का जन्म त्रेता युग में अर्थात द्वापर से पहले हुआ था। राम रहे हैं 11000 वर्ष फिर द्वापर युग के अंत से अब तक कलयुग का 5100 वर्ष बीत चुका है।

इस कलयुग में अगर लोकतन्त्र राम है तो हर संकट की गंगा पार पहुँचने वाला मीडिया उसका केवट है, अगर केवट को ही राम के ‘राज्य’ ने मार डाला तो राम (लोकतन्त्र) तो डूबेंगे ही साथ में भारतेश्वरी माँ सीता (जनता/देश) भी डूब जाएँगी, यह तय है।  

बहरहाल कलयुग की ताजा खबर आई है कि इंटरनेट पर समाचार और मनोरंजन प्रसारित करने वाली सेवाओं पर निगरानी के लिए कैबिनेट सचिवालय ने भारत सरकार के नियमों में बदलाव किए हैं और राष्ट्रपति ने इसे अपनी अनुमति भी दे दी है। ‘द वायर’, ‘जनचौक’, ‘न्यूज़क्लिक’, ‘सत्यहिंदी’ व अन्य तमाम समाचार वेबसाइटें और मनोरंजन के कार्यक्रम प्रसारित करने वाली अमेज़न प्राइम, ‘हॉट स्टार’ और नेटफ्लिक्स जैसी तमाम सेवाओं के लिए अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय दिशा निर्देश जारी करेगा जो वेबसाइटों को मानने पड़ेंगे।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय इंटरनेट से जुड़े विषयों को देखता है लेकिन अभी तक मंत्रालय के पास वेबसाइटों पर डाली जाने वाली सामग्री के मानक निर्धारित करनी की कोई विशेष शक्तियां नहीं थीं। अगर सूचना और प्रसारण मंत्रालय अब ऐसे मानक बनाने की शुरुआत करता है तो इसका इन क्षेत्रों पर निश्चित रूप से दूरगामी असर होगा।

इस बदलाव से मोदी सरकार ने इंटरनेट के एक साथ दो बड़े क्षेत्रों समाचार/करंट अफेयर्स और मनोरंजन दोनों पर नियंत्रण करने की शुरुआत कर दी है। इंटरनेट पर यही दो क्षेत्र हैं जो निरंतर मोदी सरकार की खामियों को उजागर कर रहे थे। विज्ञापनों पर पूरी तरह से निर्भर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो लगभग मोदी सरकार ने अपने नियंत्रण में कर लिया है। बीते कुछ सालों में न्यूज और करंट अफेयर्स की वेबसाइटों पर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तुलना में सरकार की कमियों पर ज्यादा चर्चा होती रही है। सवाल है कि क्या उन पर मोदी सरकार का शिकंजा कसेगा?

मनोरंजन के क्षेत्र में दस करोड़ की मेम्बरशिप वाले अमेज़न प्राइम के कंटेन्ट में अश्लीलता और हिंसा परोसने के बहाने दरअसल मामला अमेज़न पर नकेल कसने का है। अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेज़न डॉट कॉम के मालिक जेफ प्रेस्टन बेजॉस और रिलायंस समूह के चेयरमैन मुकेश अंबानी के बीच लड़ाई अनिवार्य रूप से भारत के अनुमानित 1 ट्रिलियन डॉलर यानि तकरीबन 70 लाख करोड़ रुपये के उपभोक्ता खुदरा बाजार के प्रभुत्व के लिए है।

ख़बर आई थी कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की सब्सिडियरी कंपनी रिलायंस रिटेल वेंचर्स लिमिटेड (RRVL) फ्यूचर ग्रुप की रिटेल एंड होलसेल बिजनेस और लॉजिस्टिक्स एंड वेयरहाउसिंग बिजनेस का अधिग्रहण करने जा रही है। इससे रिलायंस, फ्यूचर ग्रुप के बिग बाजार, ईजीडे और FBB के 1,800 से अधिक स्टोर्स तक पहुंच बनाएगी, जो देश के 420 शहरों में फैले हुए हैं। यह डील 24713 करोड़ में फाइनल हुई थी। पहले फ्यूचर ग्रुप के संस्थापक किशोर बियानी अमेज़न के साथ थे, कोरोना काल में जब दिवालिया होने की नौबत आ गई तो किशोर बियानी ने मुकेश अंबानी को अपनी हिस्सेदारी बेचने की पेशकश की। सौदा पक्का हो गया। कंगाली के कगार पर पहुँचे किशोर बियानी के अच्छे दिन आने ही वाले थे कि दुनिया के पहले खरबपति जेफ बेजोस ने किशोर बियानी पर अनुबंध का उल्लंघन और प्रकटीकरण नियमों को तोड़ने का आरोप लगाया। मामला अदालत में पहुंचा तो और अदालत ने रिलायंस और फ्यूचर ग्रुप के सौदे पर रोक लगा दिया है।

दो सांड़ों की भिड़ंत में बेचारा मेमना कुचला गया।

दुनिया भर के जाने-माने बुद्धिजीवी इसकी आलोचना इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें इस बात का पता है कि डिजिटल मीडिया स्वभाव से स्थापना-विरोधी है, वह हिन्दुत्व या राष्ट्रवाद के चश्मे से घटनाओं को नहीं देखता, दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिए सहानुभूति रखता है। हाथरस जैसी दिल दहला देने वाली घटनाओं को लेकर की गई पुलिसिया कार्रवाई की वह जम कर लानत-मलामत करता है। जब बाबरी ध्वंस में शामिल संघ और बीजेपी के 32 नेताओं को अदालत बरी कर देती है तो मेनस्ट्रीम मीडिया तो जश्न मनाता है लेकिन डिजिटल मीडिया पूछता है क्या ‘जय श्री राम’ के जैकारों से ही बाबरी मस्जिद गिर गई? ऐसा मीडिया ही सत्ता की आंखों की किरकिरी बना हुआ है।

राष्ट्रवादी भारतीय चिंतन परम्परा में जो प्रश्न पूछने की रिवायत है, दक्षिणपंथी सत्ता-पक्ष उससे भी अनभिज्ञ हैं। विजय शर्मा हमें याद दिलाती हैं कि बालक नचिकेता यमराज से प्रश्न पूछता है। जब राम गर्भवती सीता को लक्ष्मण के साथ वन भेज देते हैं तो सीता लक्ष्मण से प्रश्न पूछती हैं, जिसका उनके पास कोई जवाब नहीं है। महाभारत में द्रौपदी अपने पतियों से, सम्राट से, वरिष्ठ श्रेष्ठ जनों से प्रश्न करती हैं। ‘केनोपनिषद’ और श्रीमदभगवतगीता का प्रारम्भ ही प्रश्न से होता है। एक उपनिषद का नाम ही ‘प्रश्नोपनिषद’ है। नपुंसक परजीवियों का टोला ‘हिन्दू राष्ट्र’ की बात तो करता है पर हिन्दू ग्रंथ नहीं पढ़ता।

मेनस्ट्रीम मीडिया प्रश्न नहीं पूछता बल्कि प्रश्न पूछने वालों से सत्ताधारियों को बचाता है। मेनस्ट्रीम मीडिया बहुत खुश है कि ओटीटी अब सरकारी निगरानी में रहेंगे और सेंसरशिप लागू होगी। तर्क यह दिया जा रहा है कि ओटीटी पर अश्लीलता और हिंसा के सर्वाधिक दर्शक हैं इसलिए नियंत्रण लगाने की जरूरत है। कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना। दरअसल 2020 की दूसरी तिमाही के आँकड़ों के अनुसार ओटीटी मार्केट के 40% हिस्से पर नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम का कब्जा है। दोनों की 20%-20% की हिस्सेदारी है। मुकेश अंबानी के जियो सिनेमा के 7% बाज़ार को अगर अमेज़न का 20% मिल जाता है तो उसका देश के सबसे बड़े खिलाड़ी के तौर पर 27% बाज़ार पर कब्जा हो जाएगा।

नेट्फ़्लिक्स फ़िल्में दिखाये जो दिखानी है लेकिन तकलीफ ‘बैड बॉय बिलिनियर्स’ जैसे कार्यक्रमों से हो रही है। यह एक वेब-सिरीज़ है जिसमें नेट्फ़्लिक्स ने एक वेब सिरीज़ बनाई थी उसमें नीरव मोदी, विजय माल्या और ‘सहारा श्री’ सुब्रतो रॉय जैसे अरबपतियों की जीवन गाथा इस तरह से पेश की गई है कि अंत में आम आदमी किसी नतीजे पर पहुँचने की बजाए यही कहेगा कि जरा सी बात थी, ज्यादा ही ‘गरीबमार’ हो गई। मेहुल चौकसी (मोदी जी के मेहुल भाई) ने तो सुना इसके खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है। इस बात में कितनी सच्चाई है अब मेहुल भाई जाने या मोदी जी जाने पर नेट्फ़्लिक्स की सेंसरशिप होगी यह बात पक्की है।

आप इसे जो भी नाम दें, नोम चोम्स्की इसे सत्ता का ‘पसंदीदा जनतन्त्र’ कहते है। ‘पसंदीदा जनतन्त्र’ का ‘जनतंत्र’ से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता और इसकी खासियत यह है कि इस ‘तंत्र’ में सब कुछ इतने गुप्त तरीके से होता है कि ‘जन’ को पता ही नहीं चलता। अमेरिकी नीतियों और विश्व बैंक के निर्देशों द्वारा संचालित इस ‘पसंदीदा जनतन्त्र’ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों या नरेंद्र मोदी हैं उसके ‘मुक्त बाज़ार’ में हमेशा ही रौनक रहती है।

प्रत्येक व्यवस्था को ऐसे लोग पसंद हैं जो निष्ठावान रहें, चाटुकारिता करें, हाँ में हाँ मिलाएँ। बस, नंगे शासक को नंगा ना कहें। कॉर्पोरेट सेक्टर के अनेक प्रमुख निर्णय और सरकार के ज़्यादातर निर्णय शक्तिशाली लोगों से प्रभावित होकर लिए जाते हैं। इसके बारे में जनता को शायद ही कोई जानकारी अथवा किसी किस्म की सूचना दी जाती है। अगर कोई सिद्धार्थ वरदरजन या प्रणंजय गुहा ठाकुरता अपने न्यूज़ पोर्टल या पत्रिका के माध्यम से इन जरूरी जानकारियों को जनता तक लाने की कोशिश करता है तो 500 करोड़ का मानहानि का मुकदमा तो अब आम बात है।

मोदी 2.0 में पत्रकारों के खिलाफ उनके द्वारा दी गई खबर की वजह से पुलिसिया कार्रवाई काफी बढ़ गई हैं।  ‘द वायर’ वेबसाइट के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा तालाबंदी के बीच में अयोध्या में पूजा करने की खबर छापने की वजह से पुलिस की कार्रवाई का सामना करना पड़ा और उन पर अफरातफरी फैलाने के आरोप में एफआईआर दर्ज हुई।

एक भाजपा नेता ने पत्रकार विनोद दुआ पर आरोप लगाया कि उन्होंने अपने एक वीडियो शो केडबल्यू माध्यम से ‘फ़र्जी सूचनाएँ’ फैलाईं और और प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है। शिकायत पर पुलिस ने राजद्रोह का मामला दर्ज कर लिया। यह जो ‘फ़र्जी सूचना’ या ‘झूठी खबर’ का इल्ज़ाम है इसके घेरे में तो सबसे ज्यादा सियासी पार्टियां ही आती हैं। सभी बड़ी पार्टियों के पास अपनी आईटी टीमें हैं जो सुनियोजित तरीके से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती हैं ताकि ट्विटर पर हैशटैग ट्रेंड कराए जा सकें और एक फेक न्यूज का जवाब दूसरी फेक न्यूज से दिया जा सके। सभी पार्टियां छद्म विज्ञापन और प्रोपेगंडा के लिए अपनी आईटी सेल्स का इस्तेमाल कर रही हैं।

विनोद दुआ पर ‘झूठी खबर’ और मोदी को अपमानजनक शब्द कहे का मुक़दमा…. मुझे अकबर इलाहाबादी याद आ गए। उनका एक शे’र है:

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती।

(इस शे’र का मोदी, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या गौरी लंकेश से कोई लेना देना नहीं है।)

इंडियन एक्सप्रेस अखबार के दिल्ली संपादक और एक रिपोर्टर को दिल्ली पुलिस ने अखबार में तबलीगी जमात पर छपे एक लेख से संबंधित जांच में शामिल होने के लिए नोटिस जारी किया है। पुलिस ने चेतावनी भी दी है कि जांच में शामिल ना होने पर दोनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 174 के तहत यानी एक पब्लिक सर्वेंट के निर्देश का पालन ना करने के लिए कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इसके अलावा कुछ ही दिन पहले जम्मू और कश्मीर पुलिस ने कम से कम तीन पत्रकारों के खिलाफ “झूठी” खबर छापने के आरोप में आतंकवादियों के खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला कानून यूएपीए लगा दिया था। कश्मीर में पत्रकारों के खिलाफ पुलिस के इस तरह कार्रवाई करने का एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने विरोध किया था और इसे सत्ता की शक्ति का दुरूपयोग और पत्रकारों में डर पैदा करने की कोशिश बताया था। गिल्ड ने मांग की है कि इन मामलों को तुरंत रद्द किया जाए लेकिन मामले अभी तक रद्द नहीं हुए हैं।

जम्मू और कश्मीर पुलिस ने फोटोजर्नलिस्ट मसरत जेहरा पर सोशल मीडिया पर ‘देश विरोधी’ गतिविधियों का गुणगान करने वाले तस्वीरें लगाने का आरोप लगा कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। इतना ही नहीं, एफआईआर में जेहरा के खिलाफ यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं। इस कानून का इस्तेमाल आतंकवादियों और ऐसे लोगों के खिलाफ किया जाता है जिनसे देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरा हो।

जम्मू और कश्मीर में तो पुलिस दमन की कहानियों का कोई अंत नहीं है। अभी थोड़े दिन हुए कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन को उनके सरकारी निवास से निकाल दिया गया। मोदी सरकार की कश्मीर नीतियों और राजकीय दमन का विरोध करने की सज़ा उन्हें यह दी गयी है कि उनके पिछले पाँच साल से सरकारी विज्ञापन बंद हैं। अखबार का दफ्तर सील कर दिया गया है। अनुराधा भसीन ने जम्मू और कश्मीर के मीडिया पॉलिसी को ‘ऑरवेलियन मीडिया पॉलिसी 2020’ करार दिया है।

क्या जॉर्ज ऑरवेल ने सचमुच ऑरवेलियन स्टेट की कल्पना भारत को ध्यान में रखते हुए की थी जहाँ पार्टी लोगों का ब्रेनवाश कर चुकी है।

जहाँ युद्ध ही शांति है।

जहाँ आज़ादी ही गुलामी है।

जहाँ अज्ञानता ही ताकत है।

जहाँ सत्ता के दमन से जुड़ी खबरें मेनस्ट्रीम मीडिया का हिस्सा कभी नहीं बनतीं।

भारतीय मेनस्ट्रीम मीडिया बहुत बड़ी जनतंत्र विरोधी शक्ति बन गया है। प्रधानमंत्री बदल देने के ताकत से लैस यह दरअसल मेनस्ट्रीम मीडिया न रहकर केंद्रीय सत्ता की प्रोपेगंडा मशीन बनकर रह गया है। अर्णब गोस्वामी दरअसल इसी मशीन का एक पुर्जा है। अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश सहित बहुत सारे पत्रकार एक सुर में यह कहते देखे गए कि वह तो पत्रकार ही नहीं है या जो वह कर रहा है वह पत्रकारिता ही नहीं है। अब भारतीय लोकतन्त्र के पैरोकारों को इस प्रश्न को विमर्श के केंद्र में ले आना चाहिए कि क्या किसी प्रोपेगंडा मशीन को मेनस्ट्रीम मीडिया कहना वाजिब है?

(देवेंद्र पाल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 15, 2020 9:06 pm

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