Monday, October 25, 2021

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क्या प्रशांत किशोर मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत अभियान में लगे हैं?

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चुनाव की रणनीति बनाने वाले प्रशांत किशोर ने भी लखीमपुर खीरी में प्रियंका-राहुल गांधी की मजबूत उपस्थिति को खारिज कर दिया है। उनकी राय और भाजपा नेताओं-समर्थकों की राय में कोई अंतर नहीं है। जाहिर है कि आरएसएस-भाजपा के ‘‘कांग्रेस-मुक्त भारत’’ अभियान का हिस्सेदार बना गोदी मीडिया काफी उत्साहित हो गया है और उनकी टिप्पणी पर बहस करने लगा है। ऊपर से सादी और निर्दोष दिखने वाली इस टिप्पणी के पीछे गहरी राजनीति छिपी है जिसे समझना जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल है कि किशोर की अपनी राजनीति क्या है और कांग्रेस के उभरने की संभावना पर हो रही चर्चा से वह बेचैन क्यों हो गए हैं ?

किशोर ने अपने ट्वीट में कहा है, ‘‘लखीमपुर खीरी कांड के कारण सबसे पुरानी पार्टी के नेतृत्व में विपक्ष के शीघ्र, अपने आप पुनर्जीवन की उम्मीद कर रहे लोगों को निराशा हाथ लगने वाली है। दुर्भाग्य से, सबसे पुरानी पार्टी की गहरी समस्याओं और संरचनात्मक कमजारियों के कोई झटपट समाधान नहीं हैं।’’

अव्वल तो इस बात का खुलासा होना चाहिए कि बौद्धिकता और चिंतन का पूरी ताकत से विरोध करने वाले मीडिया को किशोर जैसे लोग प्यारे क्यों लगते हैं? इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है कि किशोर को चुनाव-प्रचार के आधुनिक तरीकों के इस्तेमाल में महारत हासिल है। इस लिहाज से वह संभवतः देश के सर्वश्रेष्ठ चुनाव-मैनेजर हैं। कई लोग यह काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी तरह सफल नहीं हो पाए। इसके साथ ही यह भी सच है कि देश के बौद्धिक विमर्श में उनका कोई योगदान नहीं है। पिछले सात सालों में देश ने गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं देखी है। हम देख रहे हैं कि किस तरह देश की सारी संवैधानिक संस्थाएं ध्वस्त हो रही हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में सीबीआई-ईडी जैसी कार्यपालिका की संस्थाओं की बात तो जाने दीजिए न्यायपालिका तथा चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं ने भी अपनी शक्ति खो दी है। इन मुद्दों पर किशोर को कभी अपनी राय देते नहीं सुना गया है। देश को कारपोरेट के हाथों में बेचा जा रहा है। तीन कृषि कानून भी खेती को उद्योगपतियों के हाथ में सौंपने की कोशिश है। लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि किशोर इस बारे में क्या साचते हैं। अगर उनके पिछले कैरियर पर नजर डालें तो उनके विचारों पर रोशनी पड़ती है और अंदाजा मिलता है कि वह मीडिया के इतने प्यारे क्यों हैं।

उन्होंने 2012 के गुजरात विधान सभा चुनावों में नरेद्र मोदी को उस समय जीतने में मदद की जब वह भारतीय समाज को बांटने वाले नंबर एक व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे और उनकी यह ख्याति पूरी दुनिया में फैली हुई थी। वह कारपोरेट के चहेते थे। किशोर ने 2014 में देश के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में मोदी को चुनावी विजय पाने में मदद की। क्या यह उनके राजनीतिक झुकावों की ओर इशारा नहीं करता है कि उन्होंने उस मोदी और शाह के साथ काम किया और उन्हें उनके लक्ष्यों को पाने में मदद की। दोनों कट्टर हिंदुत्व के चेहरे हैं। इस जोड़ी ने हर चुनावों में मजहबी नफरत के आधार पर वोट पाने की कोशिश की है। मोदी ने जिस विकास के नाम पर 2014 का चुनाव जीता, उसका असली रूप भी अब सामने है। ।
क्या मोदी-शाह से अलग होने के बाद किशोर उनके विचारों से अलग हो गए हैं? क्या वह सच में उन विचारों को खत्म करने का इरादा रखते हैं जिसका प्रतिनिधित्व आरएसएस करता है?

भाजपा का साथ छोड़ कर किशोर ने जिन लोगों की मदद की उनकी राजनीतिक भूमिका तथा दिशा को भी समझना चाहिए। उन्होंने साल 2015 के बिहार विधान सभा चुनावों में सत्ता-विरोधी लहर का मुकाबला करने में नीतीश कुमार की मदद की। उन्होंने पिछले पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनावों में ममता बनर्जी के लिए चुनाव-संचालन किया और यहां मिली कामयाबी असाधारण थी क्योंकि मुकाबला मोदी-शाह की जोड़ी से था। दोनों किसी तरह भी चुनाव जीतने में यकीन रखते हैं। वे चुनाव जीतने के लिए धन-बल, सरकार-बल, सांप्रदायिकता और जातिवाद सबका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ममता चुनाव जीत गईं। क्या इसका राजनीतिक विश्लेषण नहीं होना चाहिए कि कुमार तथा ममता की वापसी का सीधा नुकसान किन शक्तियों को पहुंचा है? पश्चिम बंगाल के चुनावों को भाजपा बनाम तृणमूल में इस तरह बदल दिया गया कि दोनों ने आपस में बंगाल का बंटवारा कर लिया। कांग्रेस तथा वाम मोर्चा दोनों का सफाया हो गया। इसे भी बताना पड़ेगा कि इनके, खासकर वाम मोर्चा के सफाए में आरएसएस की कितनी रूचि रही होगी?

साल 2015 में नीतीश कुमार को फिर से सत्ता दिलाने तथा 2021 में ममता बनर्जी की वापसी में मदद के अलावा उन्होंने अरविंद केजरीवाल, जगन रेड्डी, स्टालिन तथा पंजाब में कैप्टन अमरिंदर को सत्ता दिलाने में मदद की। भले ही गोदी मीडिया को इसमें कोई राजनीतिक दिशा दिखाई नहीं दे, राजनीति के किसी भी छात्र को यह साफ दिखेगा कि इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ है। क्या इसे समझना मुश्किल है कि भाजपा जहां सत्ता नहीं पा सकती है वहां कांग्रेस को सत्ता में वापस आने से रोकना ही भाजपा का लक्ष्य है। क्या इसे नहीं देखना चाहिए कि कैप्टन अमरिंदर कांग्रेस के हितों को नुकसान पहुंचाने में किस तरह जुट गए हैं? किशोर इसके ठीक पहले तक उनके सलाहकार थे। कैप्टन ने सीधे अमित शाह से हाथ मिलाया है।

किशोर ने 2017 में उत्तर प्रदेश चुनावों में कांग्रेस की मदद के बहाने उनकी लुटिया डुबोने में योगदान किया। उन्होंने अपने पांवों पर खड़ा होने की सलाह देने के बदले उसे समाजवादी पार्टी की सत्ता-विरोधी लहर से बांध दिया। यह भी ध्यान देना चाहिए कि बंगाल के चुनावों के बाद शरद पवार तथा अन्य नेताओं से मिल कर किशोर कौन सा फार्मूला बेच रहे हैं। इस फार्मूले की मूल बात यही है कि कांग्रेस को उन राज्यों से भाग जाने के लिए कहना है जहां क्षेत्रीय पार्टियां हैं। यह कांग्रेस को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में उभरने से रोकने की कोशिश है। कई क्षेत्रीय पाटियां ऐसी हैं जो केंद्र में भाजपा की सत्ता पसंद करती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला कांग्रेस और वाम पार्टियां ही कर सकती हैं।

कांग्रेस में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो पार्टी में रह कर भाजपा-आरएसएस या कारपोरेट हितों के लिए काम करते हैं। जाहिर है कि ऐसे लोग किशोर को साथ लेना चाहते हैं। यह भी संभव है कि संघर्ष के बदले चालाकी से चुनाव जीतने की कामना रखने वालों को यही शॉर्टकट सही लगता हो।

भारत जैसे लोकतंत्र में जहां चुनावी राजनीति में सामान्य लोगों की भागीदारी इतनी अधिक है, चुनाव प्रबंधन की एकमात्र वजह पार्टियों के भीतर के लोकतंत्र का खत्म हो जाना है। कंपनियों की तरह पार्टी चलाने तथा चुनाव का संचालन करने वालों को मैनेजरों की जरूरत है। वैसे भी, लोगों को उनके राजनीतिक विवेक से अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए प्रेरित करने के बदले उन्हें किसी पार्टी की ओर कृत्रिम ढंग से खींच लाना लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ है। पार्टियों की राजनीति को लोगों में साबुन की तरह बेचने का काम जनता के साथ धोखा है।

प्रशांत किशार ने मोदी को सत्ता में लाने में मदद कर भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। क्या अभी भी उनके ‘‘कांग्रेस-मुक्त भारत’’के लक्ष्य को साधने में लगे हैं? लोगों को याद रखना चाहिए कि नीतीश कुमार ने कहा था कि किशोर को जेडीयू का उपाध्यक्ष बनाने की सिफारिश अमित शाह ने की थी!
(अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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