ग्राउंड स्टोरी: निषादों की रोजी-रोटी पर खतरा क्यों नहीं बन पा रहा चुनावी मुद्दा?

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मुजफ्फरपुर के गोसाईटोला गांव के 35 वर्षीय सुरेंद्र सहनी बागमती नदी में मछली फंसाने के लिए फेंके गए जाल को खींचने की कोशिश कर रहे हैं। सुरेंद्र सहनी के मुताबिक जाल में उम्मीद से कम मछली फंसी है, क्योंकि पानी में गाद की वजह से क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। बिहार की अधिकांश नदियों की स्थिति ऐसे ही है। निषाद समाज के मुताबिक नदी और निषाद समुदाय एक दूसरे पर निर्भर हैं।

गोसाईटोला गांव के ही सुखदेव मुखिया बताते हैं कि हम कहने के लिए दलित नहीं है लेकिन हमारी स्थिति दलितों से कम भी नहीं है। आज भी कई मल्लाह परिवार सरकारी जमीन पर रहने को मजबूर है। मैं खुद मछली बेचकर10000 रुपये महीना नहीं कमा पा रहा हूं। इसमें मेरे परिवार के छह लोगों को पालन होता है। कमाने वाला एकमात्र मैं हूं।”

बोचहा विधानसभा स्थित कोचिया गांव के श्रीराम निषाद कहते हैं कि, “आज सबसे ज्यादा पलायन हमारे समाज से हो रहा है। हमारा पारंपरिक पेशा खतरे में है। पहले अधिकांश लोग मछली पालन करके और नाव चलाकर जीवन यापन करते थे। अब स्थिति ऐसी है कि कमाने के लिए मजदूरी करनी पड़ती है। मैं खुद पिछले 4 साल से पंजाब में कमाता हूं।”

मनरेगा की ओर से जीआईएस का प्रयोग किया गया। इसमें प्रारंभिक स्तर के अध्ययन में पाया गया कि राज्य की 24 नदियों को पुनर्जीवित व जीर्णोद्धार करने की आवश्यकता है। इसमें मुजफ्फरपुर में बलान नदी के अलावा समस्तीपुर व बेगूसराय में बैती, सीतामढ़ी और दरभंगा में बूढ़, पश्चिमी चंपारण में चंद्रावत (कोढ़ा सिकरहना), खगड़िया और समस्तीपुर में चान्हो, गोपालगंज और सारण में दाहा नदी भी शामिल हैं।

दूसरे के जमीन पर कितना ही लाभ होगा

सुपौल के रंजीत मुखिया लगभग 10 बीघा पोखर में मछली और मखाना की खेती करते हैं। वह बताते हैं कि, “सुपौल के सुंदरपुर गांव में लगभग 200 घर मल्लाह का होगा। जिसमें सिर्फ 30 से 35 परिवार पोखर पर निर्भर है। अधिकांश परिवार कमाने के लिए दिल्ली और पंजाब जा रहे हैं। गांव की अधिकांश जमीन सवर्ण और मंडल जातियों की है। जिससे हम लोग बटाईदारी करके मछली और मखाना की खेती करते है। गांव में कभी-कभी बदमाशी से मछली मार दिया जाता है। मछली चोरी किया जाता है। लेकिन इसके नुकसान की भरपाई मालिक को नहीं हमको करना पड़ता है। इस जमीन पर अनुदान हम नहीं मालिक उठाते है। ऐसे में बिजनेस कोई कितना ही कर पाएगा?”

बिहार सरकार द्वारा हाल में जारी जाति आधारित गणना रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में मल्लाह जाति के लोगों की आबादी 34 लाख 10 हजार 93 (2.36085 प्रतिशत), केवट जाति की आबादी 9 लाख 37 हजार 861 (0.717 प्रतिशत), कैवर्त जाति की आबादी 2 लाख 65 हजार 943 (0 2034 प्रतिशत) के अलावा बिंद जाति के लोगों की आबादी 12 लाख 85 हजार 358 (0.9833 प्रतिशत) है। इसके बावजूद 8 महीना पहले बिहार सरकार को 50 हजार मछुआरे नहीं मिल पाए। नतीजन यह रहा कि 12 हजार 633 मछुआरों को ही महीने की अंशदान की राशि खाते में ट्रांसफर की गई।

मुजफ्फरपुर के संदीप इंजीनियरिंग करके एनजीओ चलाते है। वो बताते हैं कि, “पूरे बिहार में कहीं भी पर्यावरण कोई मुद्दा नहीं है। ऐसे में निषाद समाज के पोखर और नदी का जिक्र कौन करेगा? नदियों के लगातार सूखने की वजह से मछली भी कम हो रही है। नदी में बढ़ते प्रदूषण और बढ़ते बांध भी इसका मुख्य वजह है। गांव में जहां मछलियों का पालन तेजी से हो रहा है, वहां उनके मालिकाना हक नहीं है। बटाईदारी पर पोखर लेना पड़ता है। बटाईदारी में लाभ न के बराबर होता है। ‌मुजफ्फरपुर लोकसभा क्षेत्र में लगातार निषाद जाति के लोग सांसद बनते रहे है। लेकिन निषाद का कोई मुद्दा जमीन पर नजर नहीं आता है।”

संदीप बताते हैं कि “अब बिहार के मल्लाह जाति के लोग बंगाल और त्रिपुरा में बांस की टोकरियां बनाते हैं और चाय बागानों में मजदूरी भी करते हैं। बिहार में भी यह संगठित नहीं हैं, क्योंकि इनकी पहचान एक जैसी नहीं है। कहीं ये मल्लाह हैं तो कहीं मछुआरा, कहीं निषाद तो कहीं केवट। मुकेश साहनी कोशिश कर रहे हैं देखिए क्या होता है।”

16 गांव के निषादों का एकमात्र जरिया ‘कांवर’ झील की स्थिति

बेगूसराय स्थित कांवर झील पर 16 गांव के लगभग 20,000 निषाद समुदाय इसी झील से मछली पालन पर निर्भर है। यहीं के दिलीप मुखिया बताते हैं कि यहां के हजारों मछुआरा परिवार का चूल्हा इसी कांवर झील के सहारे चलता है। लेकिन किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए कांवर झील वोट का मुद्दा नहीं है। बेगूसराय की पूरी राजनीति हिंदू बनाम मुस्लिम पर टिकी हुई है।

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत ने कहा प्रत्येक वर्ष सैकड़ों की संख्या में विदेशी पर्यटक बेगूसराय पहुंचते हैं। लेकिन स्थिति ऐसी हो गई है कि कांवर झील अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। 16 गांव के निषाद जाति के लोग ही मछली पालन करते हैं और नाव चला कर पर्यटकों को घुमाते हैं। कांवर का जीर्णोद्धार करने के लिए योजनाएं धरातल पर नहीं उतर सकी। कभी किसी जनप्रतिनिधि को कांवर के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली। जबकि कांवर झील बेगूसराय की पहचान है।”

गौरतलब है कि बिहार के बेगूसराय शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित गोखुर झील (कांवर ताल) एकमात्र रामसर साइट और एशिया का सबसे बड़ा ताल है।

(बिहार से राहुल की ग्राउंड रिपोर्ट)

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