झारखंड में राज्यपाल को भेजी गई सूचना आयुक्तों के लिए 5 नामों की अनुशंसा पर एतराज 

रांची। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act 2005) भारत की संसद द्वारा पारित एक ऐतिहासिक कानून है जो 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ। यह नागरिकों को सरकारी और सार्वजनिक प्राधिकरणों से जानकारी मांगने का अधिकार देता है। इसका उद्देश्य है सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही, भ्रष्टाचार को कम करना और नागरिकों को सशक्त बनाना। यह कानून केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों पर लागू होता है। 

हाल के मीडिया में आई खबरों के अनुसार झारखंड में सूचना आयुक्तों के लिए 5 नामों की अनुशंसा राज्यपाल के समक्ष अनुमोदन के लिए भेजी गई है।

जिनमें पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा, धर्मवीर सिन्हा, कांग्रेस नेता अमूल्य नीरज खलखो, झामुमो आईटी सेल के तनुज खत्री और भाजपा प्रवक्ता शिवपूजन पाठक शामिल हैं।

जिसके आलोक में झारखंड जनाधिकार महासभा ने राज्यपाल (झारखंड) को एक पत्र भेजकर कहा है कि सूचना आयुक्तों के लिए चयन समिति (मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष व मुख्यमंत्री द्वारा मनोनीत मंत्री) द्वारा सूचना आयुक्तों के लिए जिन 5 नामों की अनुशंसा आपके समक्ष अनुमोदन के लिए भेजी गई है, जिसमें ऐसे व्यक्तियों का चयन किया गया है जो सूचना के अधिकार कानून एवं सर्वोच्च न्यायालय के संबंधित निर्देशों का उल्लंघन है। 

महासभा ने अपने पत्र में कहा है कि सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों द्वारा इस मामले में संज्ञान लेने के बाद राज्य सरकार ने कुछ महीने पहले सूचना आयुक्तों के नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया था। आरटीआई की धारा 15 में राज्य सूचना आयोग के आयुक्त की पात्रता का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार विधि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, समाज सेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, जनसंचार, प्रशासन एवं शासन के क्षेत्र में व्यापक ज्ञान एवं अनुभव वाले व्यक्ति ही पात्र होंगे। 

साथ ही, ऐसे व्यक्ति का किसी राजनैतिक दल से संबंध नहीं होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना आयुक्तों की नियुक्ति संबंधित स्पष्ट निर्देश दिया है कि नियुक्ति प्रक्रिया जैसे सरकार द्वारा आवेदकों को शॉर्टलिस्ट करने का मापदंड, आवेदकों व शॉर्टलिस्ट किए गए व्यक्तियों की सूची आदि जैसे जानकारी सार्वजनिक किया जाना है।

महासभा ने कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (आरटीआई एक्ट) लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। अपने अधिकारों संबंधित जानकारी पाने के लिए यह कानून लोगों, खास करके वंचित व गरीब समुदाय के नागरिकों, द्वारा व्यापक इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन झारखंड राज्य सूचना आयोग मई 2020 से मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों के पद रिक्त होने के कारण पूरी तरह निष्क्रिय पड़ा है, जिससे हजारों द्वितीय अपीलें लंबित हैं और आरटीआई का मूल उद्देश्य ही विफल हो रहा है।

 महासभा ने अपने पत्र स्पष्ट लिखा है कि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जिन व्यक्तियों का नाम आपके पास अनुमोदन के लिए भेजा गया है, वे या तो स्पष्ट रूप से सत्तारूढ़/विपक्षी राजनीतिक दलों के पदाधिकारी हैं, या जुड़े हुए हैं या इनसे काफी नजदीकी संबंध रखते हैं तथा कुछ चयनित व्यक्ति शायद आरटीआई की धारा 15 के अनुसार ‘समाज में प्रख्यात” भी नहीं हैं।

अतः इस परिप्रेक्ष में हम आपसे सरकार को निम्न मार्गदर्शन देने की अपील करते हैं:-

■ उक्त 5 नामों की अनुशंसा पर तत्काल रोक लगाई जाए।

■ सूचना आयुक्तों के सभी दस स्वीकृत पदों के लिए नियुक्ति की जाए। मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू न करना यह दर्शाता है कि सरकार एक पूर्ण सूचना आयोग गठित करने की मंशा नहीं रखती है।

■ चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए सभी आवेदनों की सूची, शॉर्टलिस्ट, चयन मानदंड एवं स्कोरिंग सार्वजनिक की जाए।

■ केवल आरटीआई अधिनियम एवं सर्वोच्च न्यायालय के सख्त मानदंडों पर खरे, राजनीतिक दलों से पूर्णतः स्वतंत्र एवं महिलाओं, आदिवासी, दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय सहित विविध पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति ही नियुक्त किए जाएं।

  • एक महीने में प्रक्रिया को पूरी कर सूचना आयोग को पूर्ण रूप से सक्रिय किया जाए।

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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