भारतीयों का नस्लवाद: अफ्रीकी कप्तान टेम्बा बेवुमा को जसप्रीत बुमराह और ऋृषभ पंत का ‘बौना’ कहना

भारत के ईडेन गार्डेन (कोलकाता) में भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच चल रहे टेस्ट मैच के दौरान भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी जसप्रीत बुमराह और विकेटकीपर ऋषभ पंत ने दक्षिणी अफ्रीकी क्रिकेट टीम के कप्तान टेम्बा बेवुमा को ‘बौना’ कहकर संबोधित किया। इसे व्यक्ति विशेष पर अपमानजनक टिप्पणी के साथ ही एक नस्लीय टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। इसके पहले हरभजन सिंह ने एंड्रू साइमंड को मंकी कहा था। इसे एक नस्लीय टिप्पणी मानकर उन्हें दंडित किया गया था और उनके ऊपर तीन मैचों का प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि बीसीसीआई ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करके इस प्रतिबंध को खत्म करवा लिया था। 

भारतीय उपमहाद्वीप लंबे समय तक गोरे यूरोपीय-अमेरिकी (यूएस) नस्लवाद का शिकार रहा है, लेकिन भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा खुद भी नस्लीय श्रेष्ठता बोध से ग्रसित रहा है। ब्रिटिश उपनिवेशवादी भारत पर अपने औपनिवेशिक कब्जे और साम्राज्यवादी वर्चस्व को ‘गोरों का बोझ’ के रूप में परिभाषित करते रहे हैं। उन्हें लगता था कि वे भारत पर औपनिवेशिक शासन कायम करके ‘असभ्य’ भारतीयों को ‘सभ्य’ बना रहे हैं। रंग के आधार पर यूरोपीय गोरे प्रभु खुद को भारतीयों से श्रेष्ठ मानते रहे हैं और आज भी कई सारे मानते हैं। 

यूरोपीय गोरों के नस्लीय श्रेष्ठता बोध के शिकार भारतीय भी खुद को श्रेष्ठ आर्य नस्ल का मानते हुए, अफ्रीकी लोगों को उनके रंग और शारीरिक बनावट के आधार पर नीचा मानते रहे हैं और आज भी उसकी यह सोच किसी न किसी स्तर पर कायम है। भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी जसप्रीत बुमराह और ऋषभ पंत ने ईडेन गार्डेन मैदान पर पहले टेस्ट मैच के दौरान दक्षिणी अफ्रीकी टीम के कप्तान टेम्बा बेवुमा को बौना कहना एक और प्रमाण बस है।

यहां एक बार याद कर लेना जरूरी है कि दक्षिण अफ्रीका के मूल अफ्रीकी लोग लंबे समय तक यूरोप से दक्षिण अफ्रीका जाकर बस गए गोरो के नस्लवाद के बुरी तरह शिकार रहे हैं। वहां के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर इन गोरों का लंबे समय तक पूर्ण वर्चस्व रहा है। लंबे संघर्षों के बाद नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में दक्षिणी अफ्रीकी बाशिंदों को बराबरी का हक मिला। पहली बार 1994 में जाकर नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। 

1948 में गोरों ने एक ऐसा कानून बनाया था कि जिसके तहत कोई भी अश्वेत दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम में शामिल नहीं हो सकता था, इस कदर का नस्लवाद था। 1970 तक यह नस्लवादी कानून चलता रहा, जिसके चलते अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कॉउंसिल ने दक्षिण अफ्रीकी टीम के नस्लवादी चरित्र को देखते हुए उसकी मान्यता को रद्द कर दिया। यह मान्यता 1991 में जाकर बहाल हुई। फिर भी व्यवहारिक रूप में दक्षिणी अफ्रीकी क्रिकेट टीम पर गोरों का वर्चस्व बना रहा। 2016 में जाकर 11 में से 6 अश्वेत खिलाड़ी अफ्रीकी क्रिकेट टीम में शामिल करना अनिवार्य कर दिया गया। इन 6 लोगों में कम से कम 2 खिलाड़ी अफ्रीकी ब्लैक होने चाहिए यह भी अनिवार्य कर दिया। मतलब है कि उन्हें आरक्षण प्रदान किया गया। 6 अश्वेत के लिए आरक्षित 6 में से कम से कम 2 अफ्रीकी ब्लैक के लिए आरक्षित कर दिया गया। 

जब 6 अश्वेत क्रिकेट खिलाड़ियों के लिए यह आरक्षण हुआ तो कहा गया कि यह आरक्षण अफ्रीकी क्रिकेट को बर्बाद कर देगा। प्रतिभाहीन खिलाड़ी आएंगे। प्रतिभावान खिलाड़ी बाहर हो जाएंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि उसका उलट हुआ। अश्वेत और अफ्रीकी ब्लैक खिलाड़ी इस टीम के रीढ़ बन गए। उन्होंने यह दिखा दिया कि यदि उन्हें मौका मिले तो वे क्या कर सकते हैं। उसके एक उदाहरण अफ्रीकी क्रिकेट टेस्ट टीम और वन डे टीम के कप्तान टेम्ब बेवुमा भी हैं।

उन्होंने पिछले वर्ष दक्षिणी अफ्रीकी टीम को वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप का खिताब आस्ट्रेलिया जैसी टीम को हरा कर दिलाया। वे सबसे तेजी से 10 टेस्ट मैच जिताने वाले कप्तान बन गए हैं। उन्होंने ईडेग गार्डेन में अपनी कप्तानी और अर्द्ध शतक से भारतीय टीम को बुरी तरह हरा दिया, यह मैच भारत की झोली में दिख रहा था। टेम्बा बेवुमा पहले अफ्रीकी ब्लैक कप्तान हैं। वैसे ग्रीम स्मिथ दक्षिणी अफ्रीकी क्रिकेट टीम के पहले अश्वेत कप्तान थे, लेकिन यदि ब्लैक अफ्रीकी लोगों के स्पष्ट संदर्भ में देखा जाए तो टेम्ब बावुमा पहले ब्लैक कप्तान हैं। 

भारतीयों का यह नस्लीय श्रेष्ठता बोध कोई नई चीज नहीं है और यह सिर्फ अफ्रीकी मूल के ब्लैक लोगों तक सीमित नहीं है। हिंदी पट्टी के गेंहुए रंग के लोग खुद को दक्षिण भारत के और हिंदी पट्टी के भी काले रंग के लोगों की तुलना में श्रेष्ठ मानते रहे हैं और आज भी बहुत सारे मानते हैं। इसका एक नस्लीय आधार भी रहा है, हिंदी पट्टी के लोग खुद को आर्यावर्त के आर्य मानते हैं और दक्षिण भारत के काले रंग के लोगों को दोयम दर्जे की द्रविड़ नस्ल के रूप में देखते रहे हैं और आज भी देखते हैं।

हिंदी पट्टी और पश्चिमोत्तर भारत के भारतीयों का यह नस्लीय रवैया केवल दक्षिण भारत के लोगों तक सीमित नहीं है, इसका सबसे भद्दा रूप अपने ही देश के पूर्वोत्तर लोगों के मामलों में दिखता है। उनके नाक-नक्श और रूप-रंग के आधार उन्हें चीनी, नेपाली और न जाने क्या-क्या कहते रहे हैं और आज भी कहते हैं। ऐसा ही, और कई बार इससे भी बदतर स्थिति आदिवासियों के बारे में दिखाई देती है।  

भारतीय के इस नस्लीय श्रेष्ठताबोध की जड़ें कितनी गहरी हैं और कितने महान से महान कहे जाने वाले लोग इसके शिकार रहे हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत के सबसे महान इंसान और राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी हैं। वे जब दक्षिण अफ्रीका वैरिस्टर की डिग्री (ब्रिटेन से) लेकर वकील के तौर गए थे, तो गहरे स्तर नस्लीय श्रेष्ठताबोध के शिकार हुए थे। खुद को आर्य नस्ल का मानते थे। इस आधार पर उनका कहना था कि दक्षिण अफ्रीका में जो अधिकार गोरे लोगों को मिला हुआ है, वह अधिकार उन्हें मिलना चाहिए। उनको इस बात से सख्त एतराज था कि उन्हें अफ्रीक ब्लैक लोगों की श्रेणी का माना जाए और उसके आधार पर उनके साथ व्यवहार किया जाए।

जब दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन यात्रा के दौरान उनसे कहा गया कि वे उस डिब्बे में नहीं बैठ सकते हैं, जो गोरे लोगों के लिए आरक्षित है। तो उन्होंने यह तर्क नहीं दिया था कि एक इंसान होने के नाते मैं हर दूसरे इंसान के बराबर का हक रखता हूं, उन्होंने यह तर्क दिया कि वे भी उसी नस्ल के हैं, जिस नस्ल के गोरे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे उस नस्ल के नहीं है, जिस नस्ल के अफ्रीकी ब्लैक हैं।

इसी तरह जब उन्हें दक्षिण अफ्रीका के जेल में ब्लैक अफ्रीकी लोगों के साथ रखा गया तो उन्होंने अपने आर्य नस्ल, गोरों से बराबरी और ब्लैक अफ्रीकी लोगों से श्रेष्ठता का दावा करते हुए कहा कि उन्हें उस बैरक में नहीं रखा जा सकता है, जिसमें ब्लैक अफ्रीकी लोग हैं। खैर अच्छा यह हुआ कि वह धीरे-धीरे नस्लीय श्रेष्ठता के बोध से बाद में मुक्त हो गए। हालांकि यह सब उनके भारत लौटने के बाद हुआ। वे 21 सालों तक दक्षिण अफ्रीका में रहे और नस्लीय श्रेष्ठताबोध का यह बोझ अपने सिर पर लेकर घूमते रहे। 

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के पहले बड़े नेता कहे जाने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक खुद को आर्य नस्ल का मानते थे और यह साबित किया था कि उनके पूर्वज आर्य आर्कटिक से भारत आए थे। किसका किसका नाम लिया जाए।

भारतीयों की एक नस्लीय श्रेष्ठताबोध उनके वर्ण-जातिवादी श्रेष्ठताबोध से जुड़कर  भारतीय समाज के लिए एक नासूर सा बन गया। जिससे आज भी भारतीय मुक्त नहीं हो पाए। चाहे वह बुमराह और पंत जैसे खिलाड़ी ही क्यों न हों, जो पूरी दुनिया घूम आए हैं। हर तरह के लोगों के साथ खेल आए हैं। 

जसप्रीत बुमराह और ऋषभ पंत की यह नस्लीय टिप्पणी शर्मनाक है। इसे ढंकने-पोतने की जगह उन्हें माफी मांगनी चाहिए और ऐसे खिलाड़ियों को नियमों के अनुसार दंडित भी किया जाना चाहिए और हम भारतीयों को अपने नस्लीय या किसी अन्य तरह के श्रेष्ठताबोध की बीमारी के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। इससे मुक्त होकर इंसान बनने की कोशिश करनी चाहिए।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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