‘छत्तीसगढ़ जन अधिवेशन’ ने जल-जंगल-जमीन की लूट और आदिवासियों के हिंदूकरण का किया विरोध

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जनता के वभिन्न सवालों को लेकर 24-25 फरवरी को रायपुर में दो दिवसीय ‘छत्तीसगढ़ जन अधिवेशन’ आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में जल-जंगल-जमीन को बचाने के साथ-साथ आदिवासियों पर हो रहे दमन, उनके अस्तित्व और पहचान पर हो रहे हमलों को लेकर चर्चा हुई। अधिवेशन में आदिवासियों के हिंदूकरण की कोशिशों का भी विरोध किया गया।

अधिवेशन की शुरुआत करते हुए ‘सर्व आदिवासी समाज’ के संरक्षक व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने कहा कि आज सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लूट बदस्तूर जारी है। संसद में कानून तो बनते हैं लेकिन सरकारें उनका पालन नहीं करतीं, बल्कि इसके विपरीत कार्य करती हैं।

नेताम ने कहा कि पेसा और वनाधिकार कानून के साथ भी यही हुआ है। छत्तीसगढ़ सरकार ने पेसा का नियम तो बनाया लेकिन उसने कानून की मूल आत्मा को ही खत्म कर दिया।

अधिवेशन के प्रथम सत्र में स्वशासन पर बोलते हुए भारत जन आंदोलन के बिजय भाई ने कहा कि देश में लोकतांत्रिक शासन के ढांचे में असमानता व्याप्त है। आम राजनीति का केंद्र बिंदु, केंद्र व राज्य सरकारें होती हैं। देश में संघीय व्यवस्था है। केंद्र में एक संघीय सरकार है और प्रदेशों में राज्य सरकार। जिलों में जिला सरकार भी होनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ जन अधिवेशन

उन्होंने कहा कि कांग्रेस भी भारत की शासन सरंचना की विकेंद्रित व्यवस्था की वकालत करते हुए नारा देती है, ‘मैक्सिमम गवर्नेंस, मैक्सिमम डिवोल्यूशन’। यानि अधिकतम शासन के लिए अधिकतम सत्ता। आज कांग्रेस विकेंद्रीकरण के नारे को भुला चुकी है।

‘आदिवासी जन वन अधिकार मंच’ के केशव शोरी ने बताया कि नारायणपुर जिला लौह अयस्क के ढेर पर बैठा है, जिसे हड़पने के लिए आदिवासी संस्कृति, पहचान और उनके हकों को कुचला जा रहा है। इसके लिए अधिकार आधारित कानूनों का उल्लंघन और अर्धसैनिक बलों का दुरुपयोग किया का रहा है।

दलित आदिवासी मंच की राजिम बहन ने कहा कि वनाधिकार प्राप्त भूमि पर प्लांटेशन व तारबंदी की जा रही है। महिलाएं वहां से वन उपज नहीं ला पातीं। महिलाओं के वनाधिकार को माना ही नहीं जाता। दावे साबित करने के लिए वर्ष 2005 के पहले के सबूत मांगे जाते हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों पर वन विभाग ने बहुत अत्याचार किए हैं, और उसके सबूत भी मिटा दिए गए हैं।

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दूसरे सत्र में खेती-किसानी और किसानों की गंभीर स्थिति पर चर्चा हुई। संजय पराते, शौरा यादव और सुदेश टीकम ने किसानों की स्थिति पर रिपोर्ट पेश की।

संजय पराते ने बताया कि देश में प्रति लाख किसान परिवारों पर सबसे ज्यादा औसतन चालीस प्रतिशत आत्महत्याएं छत्तीसगढ़ में हो रही हैं। जो गहरे कृषि संकट की अभिव्यक्ति है। बढ़ती लागत और घटती आय से किसान ऋणग्रस्त हैं। उनकी जमीनें विकास परियोजनाओं के नाम पर गैर-कानूनी तरीके से छीनी जा रही हैं।

सुदेश टीकम ने इस स्थिति से निपटने के लिए आत्म-निर्भर किसानों की एकजुटता पर जोर दिया। उन्होंने धान की खेती करने और जंगल से जीवन-यापन करने वाले किसानों को एक साथ आने की जरूरत पर बल दिया ताकि सरकार की कार्पोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ लड़ा जा सके।

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तीसरे सत्र में दमन पर बोलते हुए ‘बस्तर जन अधिकार समिति’ के अध्यक्ष रघु ने कहा कि बस्तर में जो भी आदिवासी अपने अधिकार के लिए आवाज उठा रहे हैं, उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। मुख्यमंत्री से तीन बार मुलाकात की जा चुकी है। डेढ़ महीने में न्याय देने की बात की गई थी लेकिन दो साल के बाद भी न्याय नहीं मिला है।

वकील शालिनी गेरा ने कहा कि बस्तर में ‘बीज पंडुम’ मनाते निर्दोष आदिवासियों की फर्जी मुठभेड़ की घटनाओं की जांच और आयोग के लिए कांग्रेस ने खूब आंदोलन किया। आज जब दोनों रिपोर्ट आ चुकी हैं तो उन पर कार्यवाही के बजाए रिपोर्ट को ही दबा दिया गया था। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट लीक होने के बाद इसे विधानसभा के पटल पर रखा गया।

सरजू टेकाम ने कहा कि बस्तर में हमारी निजता और स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है। आदिवासियों ने कभी भी अंग्रेजी राज को स्वीकार नहीं किया, इसलिए वो कांग्रेस और भाजपा के हिंसक राज को भी स्वीकार्य नहीं करेगा।

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सरजू टेकाम ने कहा कि बस्तर में तो माओवादी होना भी जरूरी नहीं है, यहां तो पुलिस की गोली खाने के लिए आदिवासी होना ही काफी है। क्या संविधान हमारे लिए नहीं है? उन्होंने कहा कि आदिवासियों की आदिवासियत को ही बस्तर में खत्म किया जा रहा है। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश हो रही है लेकिन जब तक एक भी आदिवासी जिंदा है इस देश को हिंदू राष्ट्र नहीं बनाया जा सकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने कहा कि बस्तर में तीन तरह से आदिवासियों पर दमन हो रहा है। उनके अस्तित्व और पहचान पर हमला हो रहा है और उनका हिंदूकरण किया जा रहा है। जिस SPO को सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंधित किया, उसका नाम बदलकर उन्हीं को बंदूक थमा दी गई हैं। जो अपने ही आदिवासी भाईयों पर सरकार की ओर से हमला कर रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया ने कहा कि बस्तर में 2005 से 2018 तक भयानक दमन और नरसंहार हो चुका था। इस परिस्थिति में भूपेश बघेल ने कहा था कि बस्तर में शांतिपूर्ण संवाद के गंभीर प्रयास किए जाएंगे, लेकिन कुछ भी नही हो रहा है। बस्तर को अंधाधुंध सैन्यीकरण में धकेला जा रहा है।

(झारखंड से तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट)

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