Subscribe for notification

इलाहाबाद की गंगा-जमुनी तहजीब और लोकतांत्रिक मूल्यों की विरासत को दफ़्न करने पर उतारू है प्रशासन

उत्तर प्रदेश का इलाहाबाद शहर जिसका नाम अब प्रयागराज हो गया है गंगा-जमुनी तहज़ीब का केंद्र होने के साथ-साथ आंदोलनों, सत्ता से संघर्ष और शहादतों के लिए भी जाना जाता है। चंद्रशेखर आज़ाद ने यहीं पर अल्फ्रेड पार्क में 27 फ़रवरी 1931 को अंग्रेज़ों से लोहा लेते हुए ब्रिटिश पुलिस अध्यक्ष नॉट बाबर और पुलिस अधिकारी विशेश्वर सिंह को घायल कर कई पुलिसजनों को मार गिराया और अंततः ख़ुद को गोली मारकर आजीवन आज़ाद रहने की कसम पूरी की।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भी इलाहाबाद की अहम भूमिका रही। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन 1857 के विद्रोह का नेतृत्व भी मौलवी लियाक़त अली ने यहीं से किया। कांग्रेस पार्टी के तीन अधिवेशन यहां पर 1888, 1892 और 1910 में क्रमशः जार्ज यूल, व्योमेश चन्द्र बनर्जी और सर विलियम बेडरबर्न की अध्यक्षता में हुए। 1919 के रौलेट एक्ट को सरकार द्वारा वापस न लेने पर जून, 1920 में इलाहाबाद में एक सर्वदलीय सम्मेलन हुआ, जिसमें स्कूल, कॉलेजों और अदालतों के बहिष्कार के कार्यक्रम की घोषणा हुई, इस प्रकार प्रथम असहयोग आंदोलन और ख़िलाफ़त आंदोलन की नींव भी इलाहाबाद में ही रखी गयी थी। इसलिए इस शहर को राजनीति का गढ़ भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने राजनीतिक आंदोलन को और मुक़म्मल तरीक़े से तैयार करने में मदद किया। यहां की छात्र राजनीति ने बड़े से बड़े आंदोलन खड़े किए। इसी शहर से भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहरलाल नेहरू, चन्द्रशेखर, गुलज़ारी लाल नंदा, ज़ाकिर हुसैन, वीपी सिंह, व सूर्य बहादुर थाप्पा, हेमवती नंदन बहुगुणा, अर्जुन सिंह, फिरोज गांधी, मुरली मनोहर जोशी जैसे अनगिनत कई बड़े नेता हुए। आईएएस की फैक्ट्री कहा जाने वाला शहर से हज़ारों छात्र प्रशासनिक सेवा के रूप में अहम योगदान देते हैं। अभी भी लाखों की संख्या में आकर छात्र-छात्राएं विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं। इलाहाबाद साहित्यकार, बुद्धिजीवी, अधिवक्ताओं बड़ा केंद्र रहा है। जो अभी भी है।

आज उसी इलाहाबाद शहर में सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोगों को दबाया जा रहा है। जहां केंद्र सरकार के नागरिकता संसोधन कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे लोगों को सरकार किस तरह डरा धमकाकर शांत करा रही थी हम सब ने देखा। पूर्व आईएएस कनन गोपीनाथन जिनको अलोपीबाग सरदार पटेल संस्थान में ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम की विचार गोष्ठी में सम्बोधित करना था। उनको बमरौली एयरपोर्ट पर ही डिटेन कर लिया गया और वापस दिल्ली भेज दिया जाता है। जबकि उन्हें इलाहाबाद से रांची कार्यक्रम में जाना था।

रोशनबाग मंसूरअली पार्क में सीएए, एनआरसी, एनपीआर के विरोध में बैठी महिलाओं द्वारा चलाये जा रहे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन को समर्थन देने जाने पर वरिष्ठ पत्रकार केके पाण्डेय, छात्र नेता शैलेश पासवान सहित दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को धमकाया गया, एफआईआर दर्ज़ की गई व जेल भेजा गया। 69000 हज़ार शिक्षक भर्ती घोटाले के ख़िलाफ़ संघर्षरत न्याय मोर्चा के संयोजक सुनील मौर्य को कई बार नज़र बंद किया गया व सीओ ने धमकाया।

इलाहाबाद देश प्रदेश में चलने वाले लोकतांत्रिक राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र रहा है, यहां से चलने वाले कई छात्र युवाओं, मजदूर, कर्मचारियों, बुद्धिजीवियों, अधिवक्ताओं के साथ नागरिक समाज द्वारा चलाये गये आंदोलनों ने कई तरह के नये-नये विमर्श को जन्म दिया है। आज उसी शहर में संगठनों के राष्ट्रीय आह्वान पर होने वाले शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीके से कार्यक्रम को भी करने नहीं दिया जा रहा है, यदि कोई संगठन साहस करके कोई कार्यक्रम करता है तो प्रशासन से खुली धमकी मिलती है और एफआईआर दर्ज किया जाता है।

वर्तमान में सत्तारूढ़ योगी-मोदी सरकार यहां इलाहाबाद में किसी भी तरह का कोई भी आंदोलन होते हुए नहीं देखना चाहती है। इसीलिए तो ऐक्टू सहित देश की दस केंद्रीय ट्रेड यूनियन्स महासंघों के राष्ट्रीय आह्वान पर 22 मई 2020 को हुए प्रवासी मजदूरों के सवाल और श्रम कानूनों के स्थगन के विरोध पर राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस होता है, जिसे इलाहाबाद की सभी ट्रेड यूनियन्स लागू करते हुए पहले से सभी आला अफ़सर को सूचित भी करती हैं।

इलाहाबाद उपश्रमायुक्त मंडल कार्यालय के बाउंड्रीवाल के अंदर शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक तरीके से शारीरिक दूरी बनाकर कार्यक्रम किए और ज्ञापन सौंपे उसके कुछ ही दिन बाद 3 जुलाई 2020 को ऐक्टू सहित सभी दस केंद्रीय ट्रेड यूनियन्स महासंघ के आह्वान पर रेलवे, कोल, सेल, भेल, बीएसएनएल, डिफेंस सहित बैंक, बीमा जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण के खिलाफ “राष्ट्रीय प्रतिरोध दिवस” के कार्यक्रम को इलाहाबाद की सभी केंद्रीय ट्रेड यूनियन्स, केंद्रीय व राज्य कर्मचारी महासंघ इलाहाबाद, जिलाधिकारी को पूर्व में लिखित सूचना देकर सिविल लाइंस स्थित सुभाष चौराहे पर शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक तरीके से शारीरिक दूरी बनाकर कार्यक्रम किया।

अगले ही दिन पता चलता है कि ऐक्टू के राष्ट्रीय सचिव डॉ. कमल उसरी, इंडियन रेलवे इम्प्लाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज पाण्डेय, ऐक्टू राज्य सचिव अनिल वर्मा, नार्थ सेंट्रल रेलवे ठेका वर्कर्स यूनियन की केंद्रीय उपाध्यक्ष बबली, सुनीता, एटक से नसीम अंसारी, रामसागर, अन्नू सिंह, एआईयूटीयूसी से राजवेन्द्र प्रताप सिंह, केंद्रीय कर्मचारी संगठन से सुभाष पाण्डेय, पूर्व विधायक अनुग्रह नारायण सिंह सहित सत्रह लोगों के ऊपर पहले मुकदमा दर्ज होता है। फिर वही मुकदमा कुछ दिन बाद हुए 3 जुलाई के कार्यक्रम में 25 अन्य लोगों के ऊपर दर्ज किया जाता है। चाहे वो बाउंड्री के अंदर हो या बाउंड्री के बाहर दोनों ही कार्यक्रम में धारा 188, 269, 270 महामारी अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

इलाहाबाद प्रशासन पूरी तरह से तानाशाही रवैया अपनाते हुए ट्रेड यूनियन्स लीडर को डराना चाहते हैं। जिसका सहयोग सरकार भी पूरी तरह कर रही है और वर्तमान की सत्तारूढ़ तानाशाही-फासीवादी सरकार नहीं चाहती है लोग अपनी आवाज़ को बुलंद करें। डॉ. कमल उसरी ने कहा कि पूरे देश के केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के महासंघों की तरफ से यह आह्वान था। सरकार की मज़दूर विरोधी व कॉरपोरेट परस्त नीतियों के खिलाफ़ हम लोग इलाहाबाद में कार्यक्रम कर रहे थे।

अभी आप देख रहे होंगे सरकार ने निजी रेलें चलाने का ऐलान किया है। कोयला खदानों से लेकर डिफेंस, भेल, सेल, बीमा आदि सब कुछ प्राइवेट सेक्टरों के हाथों में बेचा जा रहा है जबकि कोरोना काल में जो हमारे कोरोना वैरियर्स सिपाही, होमगार्ड्स, सफाईकर्मी, बिज़ली कर्मचारी, डॉक्टर, नर्स आदि तमाम लोगों ने अपने जीवन को संकट में डालकर काम किया।

दुनिया के तमाम मुल्कों में जहां प्राइवेट सेक्टरों को सरकारी किया जा रहा है वहीं हमारे देश के हुक्मरान अमेरिका के दबाव में हमारे सरकारी सेक्टरों को प्राइवेट हाथों में बेच रहे हैं। यकीनन हम भगतसिंह-अम्बेडकर के रास्तों पर चलने वाले लोग हैं, हम संविधान को मानने वाले लोग हैं हमें संविधान पर पूरी तरह विश्वास है। इस संविधान विरोधी सरकार के खिलाफ़ हम नहीं डरेंगे, नहीं डरेंगे। सरकार को जितनी ताकत लगानी है लगा ले।

पहले इलाहाबाद जनपद का नाम बदला गया अब हमारी सरकारें क्या करना चाहती हैं। क्या गंगा-जमुनी तहज़ीब, शहादतों की धरती इतिहास के पन्नों तक ही सिमट कर रह जाएगी। क्या अब यही रामराज्य बनाना चाहते हैं?

( इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन के छात्र पुनीत कुमार की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 9, 2020 2:46 pm

Share

Recent Posts

लेबनान सरकार को अवाम ने उखाड़ फेंका, राष्ट्रपति और स्पीकर को हटाने पर भी अड़ी

आखिरकार आंदोलनरत लेबनान की अवाम ने सरकार को उखाड़ फेंका। लोहिया ने ठीक ही कहा…

2 hours ago

चीनी घुसपैठः पीएम, रक्षा मंत्री और सेना के बयानों से बनता-बिगड़ता भ्रम

चीन की घुसपैठ के बाद उसकी सैनिक तैयारी भी जारी है और साथ ही हमारी…

3 hours ago

जो शुरू हुआ वह खत्म भी होगा: युद्ध हो, हिंसा या कि अंधेरा

कुरुक्षेत्र में 18 दिन की कठिन लड़ाई खत्म हो चुकी थी। इस जमीन पर अब…

4 hours ago

कहीं टूटेंगे हाथ तो कहीं गिरेंगी फूल की कोपलें

राजस्थान की सियासत को देखते हुए आज कांग्रेस आलाकमान यह कह सकता है- कांग्रेस में…

5 hours ago

पुनरुत्थान की बेला में परसाई को भूल गए प्रगतिशील!

हिन्दी की दुनिया में प्रचलित परिचय के लिहाज से हरिशंकर परसाई सबसे बड़े व्यंग्यकार हैं।…

13 hours ago

21 जुलाई से राजधानी में जारी है आशा वर्करों की हड़ताल! किसी ने नहीं ली अभी तक सुध

नई दिल्ली। भजनपुरा की रहने वाली रेनू कहती हैं- हम लोग लॉकडाउन में भी बिना…

15 hours ago

This website uses cookies.