पंजाब, जहां दलित होना गुनाह है!

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जातिवादी हिंसा का वहिशाना शिकार हुए पंजाब के संगरूर जिले के चंगालीवाल गांव के दलित युवक जगमाल सिंह जग्गा हत्याकांड ने सूबे को सकते में तो डाला ही है, साथ ही पुराने कुछ सवालों को भी नए सिरे से खड़ा किया है। क्रूरता की शिखर की मिसाल यह हत्याकांड तब सामने आया, जब पंजाब श्री गुरु नानक देव जी का 550वां प्रकाश पर्व धूमधाम से मना रहा है। यक्ष प्रश्न है कि क्या यह नानक का पंजाब है? जहां निर्ममतता और अत्याचारों ने तमाम हदें पार कर दीं। महज जातिवादी दंभ के चलते।

पहले घटना की बाबत जान लेते हैं। संगरूर के गांव चंगालीवाल वासी दलित युवक जगमाल का बीती 21 अक्टूबर को किसी मामूली सी बात को लेकर रिंकू नामक एक नौजवान और अन्य अगड़ी जाति के लोगों से झगड़ा हो गया। मामला पुलिस तक गया और आखिरकार समझौता भी हो गया। इस समझौते के तहत कथित ऊंची जाति वाले दोषियों को माफी मांगनी पड़ी थी और यह बात उनकी बर्दाश्त से बाहर थी।

नतीजतन सात नवंबर को रिंकू ने जगमाल को धोखे से अपने घर बुलाया। उसके बाद चार लोगों ने लोहे की भारी छड़ों और लाठियों से जगमाल की बेरहमी के साथ पिटाई की। उसे घंटों तक खंभे के साथ बांधकर पीटा गया। जगमाल ने जब पीने के लिए पानी मांगा तो उसे पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया। जब वह बुरी तरह से जख्मी हो गया तो उसे छोड़ दिया गया। जगमाल अपने हमलावरों अथवा अतताइयों से तो हारा ही, सरकारी व्यवस्था से भी लगातार हारता गया।

पुलिस ने सब जानते हुए अनदेखा किया तो अस्पताल भी इलाज में आनाकानी करते रहे। जबरदस्त कवायद के बाद किसी तरह पीजीआई में इलाज शुरू हुआ। साथ ही शुरू हुई जिंदगी के साथ जगमाल सिंह जग्गा की आखरी जंग, जिसे वह 17 नवंबर को अंततः हार गया। सरकारी व्यवस्था के रवैये से खफा उसके घर वाले न उसका पोस्टमार्टम करवा रहे हैं और न संस्कार। अलबत्ता राजनीति जरूर शुरू हो गई है। जगमाल का पूरा जिस्म जख्मों से भरा हुआ है और खुद पर हुए अमानवीय अत्याचारों की कहानी खुद कहते हैं। इलाके का हर बाशिंदा बखूबी जानता है कि यह जातीय हिंसा की क्रूरतम परिणति है।

15 दिन की विदेश यात्रा पर गए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को सुदूर देश में इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक तथा उच्च सरकारी मशीनरी को सक्रिय किया, लेकिन जगमाल के परिजन संपूर्ण इंसाफ की दुहाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि जगमाल का संस्कार तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक मुख्यमंत्री खुद आकर उनसे नहीं मिलते। तमाम सरकारी घोषणाएं, दावे-वादे और मंत्रियों का आना-जाना भी जगमाल के परिवार वालों की ज़िद तोड़ने में फिलहाल तक नाकाम हैं।

सरकारी अमला यह मानने को तैयार नहीं कि जगमाल की हत्या जातीय हिंसा की अलामत है। इस हत्याकांड ने अकाली-भाजपा गठबंधन सरकार के वक्त हुए भीम टॉक हत्याकांड की कटु स्मृतियां ताजा कर दी हैं। रसूखदारों ने अबोहर में भीम पर जुल्म की इंतहा करते हुए उसके दोनों बाजू काटकर बेरहमी से उसे मौत के घाट उतार दिया था। इस ताजा घटना में भी जगमाल की दोनों टांगे कट गईं। अब राज्य में कांग्रेस की सरकार है। साफ है कि दलितों के लिए सरकारें बदलने के कोई मायने नहीं हैं। तब कांग्रेसी हत्या की राजनीति कर रहे थे और अब यह मौकापरस्ती अकाली-भाजपा गठबंधन के नेताओं ने संभाल ली है।

असली इंसाफ तब भी नदारद था और अब भी सिरे से नदारद है। तब के गुनाहगार पकड़े गए थे और कई मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जेल में ऐश करते फिर रहे हैं और अब के दोषी भी सलाखों के पीछे आराम से हैं। तब भीम के हत्यारों को बचाने के लिए अकाली-भाजपा गठबंधन के बिचौलिए सक्रिय थे और अब जगमाल के परिवार से समझौते के लिए कतिपय कांग्रेसी पर्दे के पीछे काम कर रहे हैं। यह समूची सत्ता व्यवस्था का नंगा सच है, जो बेपर्दा भी है।

पंजाब में दलितों की भी कई श्रेणियां हैं। बेशक सब जगह वे ऊंची जाति वाले दबंगों के आगे हारते ही हैं। भीम प्रकरण में यह खुला सच तथ्यों के साथ सामने आया था और अब जगमाल के मामले में भी आ रहा है। दोनों के परिवार दलितों की निचली श्रेणी से वाबस्ता हैं, इसलिए इंसाफ उन की दहलीज तक जाते-जाते बेतहाशा हांफ रहा है। 

खैर, बेतहाशा अपमानित करके अति क्रूरता के साथ मार दिए गए जगमाल सिंह के परिवार के पक्ष में सुखबीर सिंह बादल से लेकर आम आदमी पार्टी के भगवंत मान तक बयानबाजी कर रहे हैं और धरना-प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन कोई भी सियासतदान खुलकर कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा कि यह जातीय जहर के चलते हुआ हत्याकांड है। उस जातीय जहर के चलते, पंजाब में जिसकी जड़ें अभी भी इसलिए इतनी गहरी हैं कि खुद समता की बात करने वाले राजनेता ही उसे खाद पानी मुहैया कराते हैं। फिलहाल तो जगमाल सिंह जघन्य हत्याकांड चीख-चीख कर यही कह रहा है कि पंजाब में दलित होना अभी भी गुनाह है!

(अमरीक वरिष्ठ पत्रकार हैं और पंजाब के लुधियाना में रहते हैं।)

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