Thursday, October 28, 2021

Add News

पंजाब सरकार पंचायती जमीनों की शुरू कर रही ‘जमीन हड़पो’ अभियान

ज़रूर पढ़े

पंजाब को हमेशा से कृषि प्रधान सूबा कहा-माना जाता है। यहां के किसानों  और किसानी से जुड़े कामगरों को सदियों से अन्नदाता का खिताब हासिल है। इसी वजह से यहां सक्रिय हर सियासी दल खुद को बढ़-चढ़कर किसान हितैषी के रूप में प्रस्तुत करता है। तीन साल पहले जब राज्य में कांग्रेस सत्ता पर काबिज होने की कवायद कर रही थी तो उसके घोषणापत्र में सबसे ज्यादा वादे किसानों के साथ थे।

मुख्य प्रतिद्वंदी अकाली-भाजपा गठबंधन और आम आदमी पार्टी भी पीछे नहीं थे। वोट की राजनीति के लिहाज से जनाधार खो चुके वामपंथी संगठन तो खैर किसान हितों के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं ही! इसी पंजाब में शासन व्यवस्था की बागडोर संभाले हुए कांग्रेस एक ऐसी कारगुजारी को अंजाम देने की राह पर है जो ऐतिहासिक रुप से किसान विरोधी है तथा पंजाब में पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित विवादास्पद सिंगूर घटना क्रम को दोहराने की बहुत बड़ी गलती भी है। जो सन 2005–2006 में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर में मार्क्सवादी कमूनिस्ट पार्ट ने किया,  ठीक वैसा ही पंजाब सरकार कर रही है।

मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुवाई में औपचारिक नीतिगत सरकारी फैसला लिया गया है कि पंजाब सरकार गांव-पंचायतों की शामलाट जमीनें अधिग्रहित (एक्वायर) करके उनका ‘लैंड बैंक’ बनाएगी और बकायादा उन जमीनों के प्लॉट काटकर उद्योगपतियों को दिए जाएंगे। सरकारी योजना है कि प्लाटों के अलॉटमेंट से होने वाली आमदनी का 25 फीसदी हिस्सा संबंधित गांव पंचायत के खाते में फिक्स डिपाजिट (एफडी) के रूप में जमा करवाया जाएगा। 75 फीसदी बकाया राशि दो सालों में चार किश्तों के जरिए पंचायतों को दी जाएगी।

पंजाब में 12,278 गांव हैं और राज्य ग्रामीण विकास और पंचायत विभाग के अनुसार इन तमाम गांव के पास इस समय 1,35,000 एकड़ जमीन की मिलकीयत है। गांव-पंचायत की शामलाट जमीन सर्वसांझी होती है। इस जमीन को हर साल के शुरू में बोली लगाकर खेती-बाड़ी के लिए काश्तगारों को ठेके पर दिया जाता है। शामलाट जमीन का एक तिहाई हिस्सा सब जगह दलित काश्तकारों के लिए आरक्षित है। विभागीय नियमों के अनुसार ठेके से हासिल रकम का 30 फीसदी पंचायती विभाग के कर्मचारियों के वेतन की मद में खर्च होता है और शेष 70 फीसदी गांवों के विकास पर।

यह प्रावधान ईस्ट पंजाब होल्डिंग एक्ट 1948 और पंचायती राज एक्ट 1961 के तहत है। इन्हीं दोनों एक्टों में कानूनन यह सुनिश्चित है कि सरकार, विभाग और पंचायत शामलाट जमीन को बेच नहीं सकते, लेकिन ‘गिद्ध नजरें’ और चतुर अफसरशाही रास्ते निकाल लेती हैं, जैसे अब पंजाब में निकाला गया है।

पंजाब के गांवों का जो ‘विकास’ हम देखते हैं, उसके पीछे शामलाट जमीनों से होने वाली आय की भूमिका है। दीगर है कि उसके पीछे भी विसंगतियों और भ्रष्टाचार का घनघोर अंधकार भी है जो अलग पड़ताल की मांग करता है। सिर्फ ‘सरदारी’ या चौधराहट के लिए पंचायत चुनाव में लाखों रुपये पानी की तरह नहीं बहाए जाते। राज्य के पंचायती विभाग और अन्य सरकारी मेहकमों की मिलीभगत से होने वाली घपलेबाजी का राष्ट्रव्यापी खेल पंजाब में भी खूब चलता है।

इसके बावजूद शामलाट जमीनों में दलितों के 33 फीसदी हिस्से को कोई हड़प नहीं पाया। कोशिशें हुईं तो जिला अदालतों से लेकर हाईकोर्ट तक ने उन्हें नाकाम कर दिया, लेकिन जो अब तक नहीं हुआ उसे पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार बाकायदा नियम-कायदे बनाकर करने जा रही है।

फिलहाल इसका एक ही मकसद सामने दिखाई दे रहा है: प्रदेश के ‘विकास’ के लिए पूंजीपति उद्योगपतियों को कौड़ियों के दाम पर उस जमीन को देना, जिस जमीन के जरिए बेजमीन किसान और दलित परिवार जैसे-तैसे रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं। यानी पूंजीपति उद्योगपतियों के जरिए किए जाने वाले तथाकथित विकास की असली कीमत ये वंचित काश्तगार अदा करेंगे!

पंजाब सरकार बखूबी इस संविधानिक पक्ष से वाकिफ है कि वह ‘सरकार’ तो है, लेकिन इन शामलाट जमीनों की ‘मालिक’ नहीं। इसलिए उसके पास इन्हें बेचने का कोई अधिकार नहीं। यह अधिकार चुनी हुई गांव पंचायत को भी नहीं हासिल है। यानी किसी को भी शामलाट जमीन बेचने का कतई कोई अधिकार नहीं। इसीलिए ‘लैंड बैंक’ को वजूद में लाया गया। उद्योगपतियों को शामलाट जमीन मुहैया कराने के चोर रास्ते निकाले गए। इसके मुताबिक पंजाब लघु उद्योग और निर्यात निगम (पीएसआईसी) 25 फीसदी पैसा नकद देकर जमीनें अपने नाम करवाएगा और दो साल के अरसे में बकाया राशि का भुगतान किश्तवार होगा।

पंचायतों को नसीहत दी गई है कि वे इस पैसे को लैंड बैंक में रख लें या और जमीन खरीद लें। यह निहायत बेसिर-पैर मशवरा है। विलेज कॉमन लैंड एक्ट की खुली अवहेलना जरूर करता है। सरकार और अफसरशाही इस ‘लचीले’ नियम का फायदा अपने ढंग से पूंजीपति उद्योगपतियों के पक्ष में ले रही है कि ग्राम सभा बेशक जमीन बेच नहीं सकती, लेकिन उसके इस्तेमाल की बाबत सर्वसम्मति से फैसला जरूर कर सकती है।

सरकार शामलाट जमीन पर खुली डकैती तो डाल रही है, लेकिन वंचितों की वैकल्पिक व्यवस्था की बाबत एकदम खामोश है। उन हजारों दलित परिवारों की भी उसे रत्ती भर परवाह नहीं, जिन्हें दशकों से शामलाट जमीन पर (33 प्रतिशत के हिसाब से) काश्त करने का कानूनी हक है। पहले ही किसानों की क्रबगाह बनते पंजाब में वे अपने लिए कहां और कैसे जमीनें ढूंढेंगे?

राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री तृप्त राजेंद्र सिंह बाजवा कहते हैं कि पंजाब के विकास के लिए शामलाट जमीनें उद्योगपतियों को दी जा रही हैं। लैंड बैंक नीति भी राज्य के हित में बनाई गई है। इससे पंजाब में पूंजी निवेश भी बढ़ेगा। यही उनके कप्तान मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की भाषा है। विकल्प के सवाल पर मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सब खामोश हैं।

बैंस विधायक बंधुओं की अगुवाई वाली लोक इंसाफ पार्टी और विभिन्न वामपंथी संगठन पंजाब सरकार की लैंड बैंक योजना का मुख्य विरोध कर रहे हैं। लोक इंसाफ पार्टी के अध्यक्ष विधायक सिमरजीत सिंह बैंस कहते हैं, “पंजाब के 18000 उद्योग बंद पड़े हैं। सरकार उन्हें चालू करवाने के लिए कुछ नहीं कर रही। अब गांवों की विरासती शामलाट जमीन पहले से अमीर उद्योगपतियों में लुटाई जा रही है।

यह सरकार के संरक्षण में चल रहे भूमाफिया की साजिश है, जिसमें आर्थिक फायदे के लिए सरकार में बैठे बड़े-बड़े लोग शामिल हैं। हमारी पार्टी ‘साडी पंचायत साडी जमीन’ आंदोलन पंजाब के तमाम गांवों में शुरू कर रही है। हमारा गांव-दर-गांव आहवान है कि पंचायतें लैंड बैंक योजना के पक्ष में कोई प्रस्ताव पास न करें। दबाव में कोई पंचायत ऐसा करती है तो गांव सभा आम इज्लास बुलाकर उसका विरोध करे।” 

पंजाब के वामपंथी संगठन भी लैंड बैंक और शामलाट जमीनें जरूरतमंद किसानों से छीनकर उद्योगपतियों को देने का विरोध कर रहे हैं। इन संगठनों की ओर से जनवरी के पहले हफ्ते में राज्यव्यापी विरोध आंदोलन शुरू हो रहा है। पंजाब खेत मजदूर यूनियन इसकी अगुवाई करेगी। राज्य के कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों का एकमत है कि अगर पंचायती जमीनें इस मानिंद हड़प ली जाती हैं तो समूची ग्रामीण अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो जाएगी तथा गांवों का विकास थम जाएगा।

जिक्रेखास है कि यूपीए-दो सरकार ने भूमि अधिग्रहण करने तथा पुनर्वास के लिए 2013 में एक कानून बनाया था। इसके अनुसार एक्वायार के चलते भूमिहीन हुए वर्ग को राहत और मुआवजे के लिए मापदंड तय किए थे। उसी कानून के अनुसार किसानों या गांवों से जमीन लेकर उद्योगपतियों को देने के लिए ग्रामसभा के 80 फीसदी सदस्यों की सहमति अपरिहार्य है, लेकिन पंजाब सरकार की नीति के मुताबिक इसके लिए पंचायत का प्रस्ताव ही काफी है। 2013 के उस कानून का एक मकसद यह बताया गया था कि किसानों की जमीन सस्ते दाम पर उद्योगपतियों को न दी जाएं, बल्कि किसानों को बाजार भाव के मुताबिक पैसा मिलना चाहिए।

जमीन छीनने के चलते उनके जीवन पर पड़ने वाले नागवार असर की पूर्ति भी हर लिहाज से होनी चाहिए, लेकिन पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार इस सबसे पीठ किए बैठी है। सिंगूर-झारखंड के सबक उसे जरा भी याद नहीं। छोटी-छोटी बात पर राज्य सरकार को घेरने वाले शिरोमणि अकाली की खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है!  बाहरहाल, पंजाब सरकार का अपने किस्म का अनोखा ‘जमीन हड़पो’ अभियान जिला पटियाला के राजपुरा से सटे गांवों की शामलाट जमीनों से शुरू होने जा रहा है। इत्तफाक है कि यह इलाका कभी पटियाला (शाही) रियासत का हिस्सा रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह जिसके वंशज हैं और आज पंजाब के मुख्यमंत्री!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और जालंधर में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ भवन पर यूपी मांगे रोजगार अभियान के तहत रोजगार अधिकार सम्मेलन संपन्न!

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश छात्र युवा रोजगार अधिकार मोर्चा द्वारा चलाए जा रहे यूपी मांगे रोजगार अभियान के तहत आज...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -