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फासीवादी लड़ाई को कमजोर करेगा इस दौर में नोटा का इस्तेमाल: अखिलेंद्र

आरएसएस और उसकी भाजपा सरकार ने देश के सामने बड़ा खतरा पैदा कर दिया है इसलिए इसे हराना जरूरी है लेकिन इसके लिए किसी गठबंधन या महागठबंधन का हिस्सा बनना आवश्यक नहीं है। आज के दौर में भाजपा, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों को एक समान मानना गलत है इसलिए सबको समान मानकर प्रत्याशियों के विरूद्ध नोटा का उपयोग उचित नहीं है। नोटा का उपयोग फासीवाद विरोधी लड़ाई को कमजोर करता है। यह बातें आज राबर्ट्सगंज में सोनभद्र, चंदौली और मिर्जापुर के कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए स्वराज अभियान की राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कही। वह स्वराज इंडिया समर्थित आइपीएफ प्रत्याशी पूर्व आईजी एसआर दारापुरी के नामांकन के बाद बड़ी संख्या में जुटे कार्यकर्ताओं को सम्बोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने और जनता को अधिकार दिलाने का काम हमारे आंदोलन ने किया है। इस चुनाव का हमारा मुद्दा आदिवासियों को वनाधिकार के तहत जमीन पर अधिकार, कोल को आदिवासी का दर्जा, ठेका मजदूरों की पक्की नौकरी, शुद्ध पेयजल, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर पर्यावरण, मनरेगा में 150 दिन काम, स्थानीय निवासियों को उद्योगों में रोजगार, विकसित खेती और खेती आधारित उद्योगों की स्थापना, खनन को स्थानीय निवासियों की सहकारी समिति को देना है।

भाजपा गठबंधन के अपना दल और सपा के मौजूदा प्रत्याशी तो सांसद रहे हैं और इन्होंने सांसद रहते यहां के किसी सवाल को हल नहीं किया यहां तक कि कोल जाति जिससे वह आते हैं उसके आदिवासी दर्जे के लिए संसद में बोले तक नहीं। ऐसे लोगों ने दलित आदिवासी आंदोलन को बेहद नुकसान पहुंचाया है और अभी भी नुकसान कर रहे हैं। इनसे सचेत रहने और इस चुनाव में शिकस्त देने की जरूरत है। इस चुनाव में दलित आंदोलन की रेडिकल धारा के प्रतिनिधि और डा. अम्बेडकर के सच्चे अनुयायी स्वराज इंडिया समर्थित आईपीएफ प्रत्याशी एसआर दारापुरी का सभी अम्बेडकरवादियों को चाहे वह किसी राजनीतिक धारा में हों समर्थन करना चाहिए।

दलित-आदिवासी व वनाश्रित बाहुल्य सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली को आरएसएस अपनी प्रयोगस्थली के बतौर विकसित करना चाहता है और नागरिक अधिकार आंदोलन और राजनीतिक असहमति को दबा देना चाहता है। इसीलिए नागरिक, राजनीतिक आंदोलन का प्रशासन के माध्यम से दमन करने पर आमादा है, इस चुनाव में इसका प्रतिकार किया जायेगा। सावरकर विचार के प्रयोगस्थली के बतौर इस क्षेत्र को कतई बनने नहीं दिया जायेगा।

उसके फासीवादी सांस्कृतिक, राजनीतिक अभियान को जन संस्कृति और लोकप्रिय लोकतांत्रिक आंदोलन से मुकाबला करना होगा। हमें विश्वास है कि आदिवासी अपनी पहचान सुरक्षित रखने और भाईचारे की संस्कृति का निर्माण करेंगे। मजदूर आंदोलन एकजुट होकर अपने अधिकार को प्राप्त करेगा और भाजपा के जनविरोधी राजनीति के विरुद्ध दारापुरी के लोकसभा के इस चुनावी संघर्ष की अगुआई करेगा। यहां पर्यावरण की रक्षा और अवैध खनन पर रोक की जरूरत है और यहां के स्थानीय निवासियों की सहकारी समितियों के जरिए वैध खनन कराया जाना चाहिए।

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This post was last modified on May 7, 2019 9:17 am

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