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कार्पोरेट लूट जारी रखने को नहीं लागू हो रहा पेसा एक्ट

छत्तीसगढ़ के बस्तर में पेसा कानून अधिनियम 1996 का स्थापना दिवस बुरुंगपाल गांव में मनाया गया। संविधान स्तंभ एवं भारतीय संविधान की प्रस्तावना का वाचन किया गया। पेसा एक्ट बने 24 साल हो गए हैं और राज्य सरकार पेसा एक्ट की क्रियान्वयन का नियम तक नहीं बना पाई है।

पेसा एक्ट बनाने क मूल उद्देश्य आदिवासी बाहुल जिलों को, जिन्हें संविधान में विशेष तौर पर रेखांकित किया गया है, उनके लिए वर्ष 1996 में संसद ने विशेष तौर पर पंचायत राज का एक अलग कानून बनाया गया था, जिसे संक्षेप में पेसा कानून कहा जाता है। इस कानून में आदिवासी क्षेत्रों की विशेष जरूरतों का ध्यान रखते हुए और यहां ग्रामसभा को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया था।

आदिवासी मामलों के अधिकांश विशेषज्ञों ने यह माना है कि यदि इस कानून को पूरी ईमानदारी से लागू किया जाए तो इससे आदिवासियों को राहत देने और उनका असंतोष दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है। इस कानून को बने हुए 24 साल हो गए हैं, परंतु देश के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश को छोड़कर छह राज्यों में आज तक इस कानून के क्रियान्वयन के लिए नियम तक नहीं बनाया गया है।

ताज्जुब की बात यह है कि इस एक्ट को कांग्रेस सरकार द्वारा 1996 में पास किया गया था, उसके बाद भी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में कांग्रेस की सरकार रही है उसके बाद विधानसभा चुनाव 2018 में इन दोनों राज्यों में कांग्रेसी सत्ता में आई और घोषणा पत्र में भी पेसा एक्ट के क्रियान्वयन की बात कही गई, लेकिन एक साल बीत जाने के उपरांत भी राज्य सरकार के द्वारा पेसा एक्ट के क्रियान्वयन के लिए नियम बनाने की बात आज तक सकारात्मक नजर नहीं आ रही है।

इस एक्ट का मूल उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों के जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों की रूढ़िगत परंपरा रीति-रिवाज, भाषा-बोली, विधि, सामुदायिक संसाधनों पर परंपरागत प्रबंध के साथ विकास और कल्याण का कार्य को अंजाम दिए जाने का प्रावधान है।

पेसा कानून के लिए इंजीनियर डॉ. बीडी शर्मा ने बुरुंगपाल में ही रह कर आंदोलन की रूपरेखा तय की थी। यही नहीं उन्होंने पेसा कानून का ड्राफ्ट भी यही रह कर तैयार किया था। उनके साथ आंदोलन में रह चुके और पेसा ड्राफ्ट कमेटी में रह चुके सोमारू करमा ने पेसा एक्ट स्थापना दिवस पर कहा “मावा नाटे मावा राज”।

उन्होंने कहा कि 1992 में रातों रात बिना पूछे शासन-प्रशासन के द्वारा केरल की डायकेम नामक कंपनी का शिलान्यास किया गया था। उस समय हम अचंभित थे। क्या करें कुछ समझ नहीं आ रहा था। उन दिनों में एक व्यक्ति हमारे पास आया फरिश्ता बनके। उसका नाम डॉ. बीडी शर्मा था। उनके मार्गदर्शन में हम गांव पारा के सभी लोग एकजुट हुए  और रात-दिन अपनी जमीन को बचाने के लिए चिंतन करने लगे। सर कटा जाएंगे, लेकिन नहीं हटेंगे। कागज तुम्हारी जमीन हमारी जैसे नारों के साथ संघर्ष किया और उसी संघर्ष का नतीजा है पेसा कानून। उन्होंने कहा कि इस कानून की ड्राफ्टिंग इसी गांव इसी भूमि इसी धरती में बैठकर हुई थी।

सोमारू करमा आगे कहते हैं, दुख इस बात का है कि 24 साल गुजर जाने के बाद भी पेसा कानून का पूर्णता पालन नहीं किया जा रहा है। राज्य सरकार द्वारा पेसा एक्ट की क्रियान्वयन के लिए नियम नहीं बनाया गया है। इसी क्रम में गोंडवाना रत्न दादा हीरा सिंह मरकाम ने कहा कि मैं इस कर्मभूमि संघर्ष की भूमि में कदम रखते ही गौरवान्वित महसूस करता हूं। डॉ. बीडी शर्मा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि मैंने उनके साथ में काम किया है।

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उन्होंने कहा कि दुख इस बात है कि भारत का मूल बीज मालिकों के साथ केवल झुनझुनी पकड़ा दिया जाता है। नारा लगाया जाता है। कानून नाम मात्र का बनता है। परिपालन नहीं होता है। हमें एकजुट होना होगा, तभी अपनी परंपरा, रीति-नीति, भाषा, जल-जंगल-जमीन को सुरक्षित कर पाएंगे। वक्ताओं ने कहा कि सीएए भी साजिश का हिस्सा है। अनुसूचित क्षेत्रों में अवैध तरीके से बाहरी घुसपैठियों को बसाकर नागरिकता देना इसके पूर्व में 1971-72 में पखांजूर भांसी बैलाडीला जैसे क्षेत्रों में बसाया गया था। आज उनकी संख्या लाखों की तादात में है। अनुसूचित क्षेत्रों में यहां की संपदाओं का अवैध तरीके से हड़प लिया है।

वक्ताओं ने कहा कि छठवीं अनुसूची की तरह पांचवी अनुसूचित क्षेत्र में सीएए को प्रतिबंधित कर देना चाहिए। साथ ही मौजूदा सरकारों के द्वारा आदिवासियों के साथ भेदभाव रवैया जग जाहिर है। चुनावों के दौरान उनकी मेनिफेस्टो में लुभावने वादे किए जाते हैं और चुनाव परिणाम के बाद मुंह फेर लेते हैं। 15 साल बीजेपी सरकार ने भी यही किया है। वर्तमान राज्य सरकार भी उसी रास्ते पर है आहिस्ता-आहिस्ता संविधान में आदिवासियों के लिए प्रदत अधिकारों को समाप्त किया जा रहा है।

वक्ताओं ने कहा कि जिस प्रकार से परिस्थिति निर्मित की जा रही है उन परिस्थितियों से निपटने के लिए हमें सतर्क होना होगा और पांचवीं अनुसूची  244 (1) का पूर्णता परिपालन कर अनुसूची के उप बंधुओं के अधीन जनजाति सलाहकार परिषद का अध्यक्ष आदिवासी प्रतिनिधि हो ऐसा नहीं होने पर आदिवासी समाज शासन के खिलाफ आंदोलित होगा।

वक्ताओं ने कहा कि 20 सालों में सचिवालय नहीं बनाया गया है। आदिम जाति कल्याण विभाग के एक बाबू के भरोसे जनजाति सलाहकार परिषद के द्वारा राज्य के आदिवासियों के कल्याण और विकास योजना संचालित की जा रही है। यह छत्तीसगढ़ के 33 प्रतिशत जनजाति समुदाय के साथ धोखा है। वक्ताओं ने पी रामा रेड्डी, समता जजमेंट जैसे निर्णय को याद करते हुए लोकसभा का विधानसभा सबसे ऊंची ग्रामसभा, जिसकी जमीन उसकी खनिज जैसे जजमेंट को याद करते हुए कहते हैं कि इतने जजमेंट आने के बाद भी सरकार का पालन नहीं करवाती हैं। बल्कि देश के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की अवमानना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि समुदाय सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करेगा। इस कार्यक्रम में हीरा सिंह मरकाम, श्याम सिंह मरकाम, सोमारू कर्मा, सोमारू कौशिक, धरम उईके, हेमलाल मरकाम, तिरूमाय रुकमणी कर्मा तारे, सुलो पोयाम, सुकलो मंडावी, मंधर नाग मोसू पोयाम, खगेश्वर कश्यप, संतु मौर्य, गंगा, होली, लालचंद, पोयाम आदि हजारों की संख्या में क्षेत्र के लोग उपस्थित थे।
(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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