यूपी में लोग गोलियां खाते रहे, गिरफ्तार होते रहे और मुख्य विपक्षी दल सोते रहे

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पूरे देश में सीएए और एनआरसी को लेकर प्रदर्शन जारी हैं। इसके उलट यूपी में विपक्षी सियासी पार्टियों ने प्रदर्शनकारियों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। विपक्ष की रहस्यमय खामोशी का ही नतीजा है कि यहां सत्ता के संरक्षण में पुलिस गुंडे की भूमिका में है। आम लोगों के साथ ही नागरिक समाज के लोग जेलों में ढूंस दिए गए हैं। प्रदेश के सबसे बड़े विपक्षी दल सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगले से ही बयान देते रहे। यूपी में विपक्ष की खामोशी तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब लोग अंतरराष्ट्रीय अदालत हेग तक पर प्रदर्शन कर रहे हों।

बेअसर विपक्ष का ही नतीजा है कि यूपी में सबसे ज्यादा 19 मौतें हुई हैं। बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी हुई है और हिरासत में लिए गए हैं। यूपी के प्रदर्शन में सभी धर्म-जाति के लोग शामिल हैं। इसका पता यहां हुई गिरफ्तारियों से भी चलता है, लेकिन मारे सिर्फ मुसलमान ही गए हैं। जिन मुस्लिम नौजवानों की जान गई है, उनमें से ज्यादातर गरीब तबके से हैं। कुछ परिवारों ने तो अपना इकलौता कमाने वाला खो दिया है।

इतना सब होने के बावजूद इतने बड़े प्रदेश में उनके जख्मों पर कोई भी सियासी पार्टी मलहम रखने को तैयार नहीं है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में मुखर जरूर है, लेकिन पार्टी का सीमित आधार उसके प्रभाव को भी सीमित करता है। मुसलमानों के लिए वोट की राजनीति करने वाली सपा पूरे सीन से शुरू से ही गायब है।

लखनऊ में छुटपुट प्रदर्शन को छोड़कर सपा कहीं भी नजर नहीं आ रही है। जबरदस्त सर्दी में जब लोग सड़कों पर हैं, तो सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव बंगले में बैठकर ट्विट करते रहे।

पार्टी के इस रवैये से सपा के मुसलमान नेताओं को अपने क्षेत्र में मुश्किल पेश आ रही है। नाम न छापने की शर्त पर कई नेता साफ कहते हैं कि क्षेत्र के मुस्लिम मतदाताओं के सवालों के जवाब देना मुश्किल हो रहा है। अब तो सपा की आलोचना में यहां तक कहा जाने लगा है कि उन्हें मुसलमानों का वोट तो चाहिए, लेकिन मुस्लिम नहीं!

इस पूरे मामले में पार्टी सीधे आंदोलन से गुरेज करती रही। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहने के बाद अखिलेश यादव थोड़ा दबाव में आए और फिर उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस करके पार्टी का स्टैंड क्लियर किया। वह इस कदर दबाव में नजर आए कि झारखंड में सीएम के शपथ ग्रहण समारोह में जाने के बजाय प्रेस कान्फ्रेंस करना जरूरी समझा।

माना जा रहा है कि आजादी के बाद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में मुसलमान भी सड़कों पर उतरे हैं। इस तरह के प्रदर्शन तो बाबरी मस्जिद या कश्मीर के मुद्दे पर भी नहीं हुए। मुसलमानों का यह प्रदर्शन स्वतः स्फूर्त था। यही वजह थी कि उसकी कोई दिशा नहीं थी। अगर यह प्रदर्शन सियासी होता तो इस तरह हिंसा नहीं होती और न ही इतनी बड़ी संख्या में लोगों की जान ही जाती।

पुलिस की गोली से तमाम मौतों के बाद यहां पर बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां भी हुई हैं। यही नहीं पुलिस ने लोगों के घरों में भी जमकर तोड़फोड़ की है। उनके इस दर्द को साझा करने के लिए कोई तैयार नहीं है। यही नहीं हिंसक प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों की तरफ से हुई कथित तोड़फोड़ की वसूली भी अब मुसलमानों से की जा रही है। प्रदर्शन में शामिल लोगों की तस्वीरें डाकुओं की तरह चौराहे-चौराहे लगाई गई हैं। कोई सियासी दल यह भी पूछने को तैयार नहीं है कि हिंदू युवा वाहनी ने जो पूर्व में सार्वजिनक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया है उसकी वसूली सरकार कब करेगी?

बसपा की बात करें तो उनकी सियासत में प्रदर्शनों का स्थान गौण है। बसपा सिर्फ चुनावों में ही सभाएं और रैलियां या प्रदर्शन करती है, इसलिए उससे बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।

यूपी के मुकाबले अगर बात दूसरे प्रदेशों की करें तो जबरदस्त प्रदर्शन वहां अभी भी हो रहे हैं। नागरिक समाज के साथ ही यहां सियासी पार्टियां विरोध-प्रदर्शन कर रही हैं। पड़ोसी राज्य दिल्ली में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं और इनमें बड़ी संख्या में सभी धर्म-वर्ग के युवा शामिल हैं। पंजाब में भी नागरिक समाज के साथ ही कांग्रेस और अकालियों ने बड़े प्रदर्शन किए हैं।

केरल नें तो वामपंथी सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव लाकर सीएए को राज्य में लागू करने से ही मना कर दिया है। वहां भी वामपंथी सड़कों पर उतर कर विरोध जता रहे हैं।

इन सबके बीच सबसे ज्यादा मुखर ममता बनर्जी हैं। वह लगातार दो हफ्तों से प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं। वहां लोगों ने एक रेलवे स्टेशन को आग लगा दी, लेकिन पुलिस ने वहां किसी को गोली नहीं मारी है। अहम यह है कि उन्हीं प्रदेशों की पुलिस ने गोली चलाई है जहां भाजपा की सरकार है। यूपी के अलावा कर्नाटक में दो लोगों की पुलिस की गोली से मौत हुई है। जाहिर बात है कि यूपी और कर्नाटक में पुलिस को प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए खुली छूट दी गई थी।

विरोध किसी भी मनुष्य का पहला लोकतांत्रिक अधिकार है। अगर सत्ता प्रतिष्ठान उस पर रोक लगाने लगें तो मामला गंभीर हो जाता है। ऐसे में अगर कोई सियासी दल महज अपनी खाल बचाए रखने के लिए राजनीतिक धर्म भी पूरा नहीं कर रहा है तो ऐसे नेताओं को इतिहास भले माफ कर दे, लेकिन जनता माफ नहीं करेगी।

कुमार रहमान
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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