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महिला संगठनों ने लव जिहाद कानून के खिलाफ बुंलद की आवाज

उत्तर प्रदेश में महिला हिंसा और योगी सरकार द्वारा लाए गए लव जिहाद कानून के ख़िलाफ़ महिला संगठनों ने प्रेस क्लब में मीडिया के जरिए अपनी बात रखी। प्रेस कान्फ्रेंस में किसान आंदोलन का पुरजोर समर्थन करते हुए सरकार से तीनों किसान विरोधी कृषि कानूनों को वापस लेने की भी मांग की गई।

मीडिया से बात करते हुए महिला नेताओं ने बताया कि प्रदेश के प्रमुख महिला संगठन एडवा, एपवा, भारतीय महिला फेडरेशन और सामाजिक कार्यकर्ता नाइश हसन द्वारा संयुक्त रूप से 25 नवंबर से महिला हिंसा के खिलाफ 15 दिवसीय महिला अभियान चलाया गया। अभियान के पहले दिन ही हजरतगंज पुलिस ने पर्चा बांटते समय छह महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया था, जो योगी सरकार की तानाशाही को बताती है।

हमारा यह अभियान लखनऊ के विभिन्न हिस्सों में हजरतगंज, चिनहट, बख्शी का तालाब, सरोजनी नगर, गोमती नगर, बस्तौली, मुंशी पुलिया, उदय गंज, आलमबाग, सर्वोदय नगर, इंदिरा नगर, खदरा समेत 25 इलाकों में चलाया गया। इसके जरिए जनता से संवाद स्थापित किया गया। कुछ पीजी विद्यालयों में छात्र-छात्राओं से बातचीत भी की गई। इस अभियान के दौरान किसानों के आंदोलन को समर्थन देते हुए कई इलाकों में प्रदर्शन किए। 6 दिसंबर से बाबा साहब अम्बेडकर के परानिर्वाण दिवस पर लखनऊ के तीन इलाकों में सभाएं भी की गईं।

महिला संगठनों ने कहा कि उत्तर प्रदेश आज जंगलराज का यथार्थ बन गया है। प्रदेश में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ हिंसा की वीभत्स घटनाओं ने हम सबको स्तब्ध कर दिया है। हमारी स्पष्ट समझ है कि हिंसा की वीभत्स घटनाओं की वृद्धि सरकारों की विफलता है। ‘भयमुक्त समाज’ या ‘बेटी बचाओ’ या ‘मिशन शक्ति’ का नारा भी खोखला नजर आता है, जब पीड़िता की ‘जाति’ और ‘धर्म’ से उसके लिए इंसाफ तय किया जाता है। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था बिल्कुल ध्वस्त है। इसे दुरुस्त करने के स्थान पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री संविधान के मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना करते हुए एक कानून बना रहे हैं, जिसका निशाना एक विशेष समुदाय है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नया अध्यादेश  ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश, 2020’ दरअसल एक क्रूर संविधान विरोधी अध्यादेश है, यह संविधान की धारा-21 और 25 पर भी हमला है, जो निजी स्वतंत्रता तथा जीवन के अधिकार की गारंटी करती है। संविधान की धारा-25 विश्वास की स्वतंत्रता और किसी धर्म को अंगीकार करने, उसका व्यवहार करने तथा उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देती है। हम इस अध्यादेश का पुरजोर विरोध करते हैं जो दरअसल पितृसत्तात्मक मूल्यों और लैंगिक भेदभाव को भी बढ़ावा देता है।

महिला नेताओं ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को एक सरकार की भूमिका में रहना चाहिए न कि ‘खाप पंचायतों’ की भूमिका में आ जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में पिछले 15 दिनों के अंदर पुलिस ने इस अध्यादेश के तहत पांच केस दर्ज किए हैं, जिसमें पसंद के संवैधानिक अधिकार पर हमला किया गया है। बरेली के एक केस में लड़की की शादी होने के बाद उसके अदालत में दिए गए बयान के बाद भी पुलिस ने जबरन लड़की के घर जाकर मुकदमा दर्ज करवाया।

पुलिस अब सरकार में बैठे अपने आकाओं को खुश करने के लिए सहमति से किए गए अंतरधार्मिक विवाहों को भी खंगाल रही है, और मुकदमे कर रही है। सबसे प्रमुख बात यह है कि जब देश का कानून दो वयस्क व्यक्तियों को सहमति से साथ रहने और विवाह करने की अनुमति देता है तो माता-पिता की शिकायत पर विवाहित जोड़े को अपराधी बना देना, दरअसल दो वयस्क व्यक्तियों के अधिकारों का हनन है।

हम उत्तर प्रदेश सरकार की पुलिस की दोहरी भूमिका की सख्त निंदा करते हैं। जैसा बरेली के ही एक मुस्लिम समुदाय के पिता की शिकायत पर पुलिस ने हिंदू युवक के खिलाफ नए अध्यादेश के तहत मुकदमा दर्ज नहीं किया, जबकि मुरादाबाद में हिंदू लड़की के बयान देने के बाद भी उसके पति को जेल भेजा गया। हम कहना चाहते हैं कि ‘सहमति’ का प्रश्न दो व्यक्तियों की निजी स्वतंत्रता का मुद्दा है न कि यह राज्य का मुद्दा है।

हम प्रेस वार्ता के माध्यम से कहना चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार प्रदेश की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाए न कि लोगों के परिवारों के निजी मामलों में दखल देने का कार्य करे। हम लखनऊ के पारा क्षेत्र में आपसी सहमति से किए जा रहे अंतरधार्मिक विवाह की हिंदू संगठनों की शिकायत पर पुलिस द्वारा रोक दिए जाने की कटु निंदा करते हैं। इस विवाह में धर्म परिवर्तन भी नहीं था, किंतु हिंदू वाहिनी के लोगों ने पुलिस की मदद से विवाह को रोक कर एक असंवैधानिक काम किया है।

महिलाओं के मुद्दों पर काम करने वाले संगठन और व्यक्ति इस प्रेस वार्ता के माध्यम से सरकार से मांग करते हैं कि इस संविधान विरोधी अध्यादेश को वापस लें, क्योंकि धोखाधड़ी, जबरन धर्म परिवर्तन के लिए पहले से से ही कानून मौजूद है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट का भी इस संबंध में फैसला है कि राज्य को दो वयस्क व्यक्तियों के निजी मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं है, अंतरधार्मिक विवाह दो वयस्क व्यक्तियों के बीच होता है न कि हिंदू और मुसलमान के बीच का मामला होता है।

हम माननीय सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसले पर सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए इस अध्यादेश को वापस लेने की मांग करते हैं। अन्यथा इसका दुरुपयोग होगा तथा निर्दोष व्यक्तियों को शिकार बनाया जाएगा। महिला संगठन आम महिलाओं के बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए संकल्पबद्ध हैं। प्रेस वार्ता को सामाजिक कार्यकर्ता नाइश हसन, एपवा की मीना सिंह आदि ने संबोधित किया।

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This post was last modified on December 9, 2020 7:53 pm

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