दिल्ली में 10 जनवरी से लेकर 18 जनवरी तक विश्व पुस्तक मेला सम्पन्न हो गया, इसके बारे में एन बी टी (नेशनल बुक ट्रस्ट) ने कहा है, कि “इसमें 35 से ज़्यादा देश, एक हज़ार से अधिक पब्लिशर्स, तीन हज़ार से अधिक स्टॉल और 600 से अधिक कार्यक्रम हुए, जिसमें एक हज़ार से ज़्यादा स्पीकर्स शामिल हुए।” इस बार जनता के लिए प्रवेश पूरी तरह से नि:शुल्क था, जिसके बारे में एन बी टी का कहना है कि “इसका उद्देश्य देश भर में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करना है।”
दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला हर वर्ष लगने वाला एक अनुष्ठान है।
अब हम इस बात पर गौर करेंगे, कि देश में विशेष रूप से हिन्दी प्रदेशों में पठनीयता का जबरदस्त संकट बढ़ रहा है। 80 करोड़ की हिन्दी आबादी वाले प्रदेशों में किसी भी हिन्दी लेखक के पुस्तकों की 100-200 प्रतियाँ बिकनी भी मुश्किल हो जाती हैं।
ऐसे माहौल में इतने बड़े पैमाने पर लगने वाला पुस्तक मेला अपने उद्देश्यों की पूर्ति में किस प्रकार सफल होगा? वास्तव में अगर हम देखें, इस वर्ष का पुस्तक मेला वर्तमान शासन के किन उद्देश्यों की पूर्ति कर रहा है? अगर इस वर्ष के पुस्तक मेले को शीर्षक देना हो, तो ‘फासीवाद के दौर में पुस्तक मेला’ कहना ज़्यादा उपयुक्त होगा।
हर साल यह पुस्तक मेला किसी थीम पर आधारित होता है। विगत मेले कला, साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण जैसे विषयों की थीम पर आधारित रहे हैं। इस साल का मेला ‘भारतीय सैन्य इतिहास: वीरता और ज्ञान @ 75’ पर आधारित था, जिसके बारे में बताया गया है, कि यह भारत के रक्षा बलों के महत्वपूर्ण योगदानों और कहानियों पर ध्यान केन्द्रित करता है। इस मेले को लगभग किसी वाॅर मेमोरियल में तब्दील कर दिया गया।
देश के प्रधानमंत्री को मेले का मुख्य आकर्षण बनाने की कोशिश करते हुए हर दस कदम पर उनका प्लेन उड़ाकर देश की जनता को हवाई अभिवादन करते हुए उनका वीडियो चलाया जा रहा था। मेले के गेट ही पर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और शिक्षामंत्री के बड़े-बड़े कटआउट लगे थे, जिससे कि लोग उनके साथ सेल्फी खिंचवा सकें। हथियारों से लदे सैनिक, कमांडों और सेना के टैंक भी सेल्फी के लिए वहाँ मौजूद थे।
मेले का मुख्य आकर्षण अन्य देशभक्ति की वे कक्षाएँ थीं, जो वामपंथ से मुक्ति के रास्ते खोजने के लिए चलाई जा रही थीं। दुनिया को वामपंथी दीमकों से बचाने के लिए हिन्दी साहित्य के हॉल का सेंटर बखूबी तैयार किया गया था। सारे सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम युद्ध उन्माद से प्रेरित थे। एक ओर इस तरह का उन्माद था, तो दूसरी ओर मेले की यह स्थिति थी, कि हिन्दी की पुस्तक बेचने वाले अधिकतर स्टॉल का ख़र्चा तक नहीं निकाल सके। यही कारण है, कि हर वर्ष हिन्दी के छोटे प्रकाशक मेले से दूर हो रहे हैं।
मेले में जहाँ एक ओर वामपंथ के प्रति नफ़रत का प्रचार चल रहा था तथा अनेक विदेशी स्टॉलों को अपने स्टॉलों से खाने-पीने के महंगे सामानों को बेचने की छूट थी, वहीं दूसरी ओर अनेक प्रगतिशील पुस्तक बेचने वाले प्रकाशकों के स्टॉलों से देसी-विदेशी कवियों, लेखकों और क्रांतिकारियों के पोस्टरों और बुकमार्क तक को बेचने पर रोक लगा दी गई। युवा प्रगतिशील चित्रकार मोनिका को जब अपने पोस्टर और बुकमार्क को स्टॉलों से बेचने पर रोक लगा दी गई, तब उसे हॉल ही में ज़मीन पर बैठकर इसका विक्रय करना पड़ा।
पुस्तक मेले में धार्मिक पुस्तक बेचने वाले स्टाॅल, जिनमें से अनेक में बाबाओं के प्रवचन तक चल रहे थे, ऐसे स्टॉलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, इस बार तो वह अपने चरम पर पहुँच गई। ऐसा लगता है, कि विश्व पुस्तक मेला न होकर केवल धार्मिक पुस्तक मेला हो।
मेरठ के एक प्रकाशक, जिन्होंने बड़े पैमाने पर क्लासिक पुस्तकों का प्रकाशन किया है, ने बताया, कि “वे क़रीब एक दशक से मेले में आ रहे हैं, लेकिन कुछ सालों से मेले में बहुत सरकारी अव्यवस्था है। स्टॉलों का किराया भी इस साल बढ़ गया है। लगता है, कि लाखों रुपए ख़र्च करके अब मेले में भागीदारी करने का कोई औचित्य नहीं है। सम्भवतः वे अगले वर्ष से मेले में नहीं आएँगे।” मेले के अंग्रेजी सेक्शन में ज़रूर पाठकों की संख्या ज़्यादा थी, लेकिन पुस्तकों की आसमान छूती कीमतें भी लोगों को पुस्तकों से दूर कर रही हैं।
प्रगतिशील साहित्य बेचने वाले अनेक छोटे प्रकाशक ज़रूर घाटे की परवाह न करते हुए लोगों को अच्छी पुस्तकें उपलब्ध करवा रहे हैं, जो निश्चय ही सराहनीय प्रयास है, जिसमें ‘गार्गी प्रकाशन, फिलहाल और जनचेतना ‘प्रमुख हैं, जो इस बार बहुत बेहतरीन मौलिक और अनुवादित विश्व साहित्य लेकर मेले में आए। हिन्दी प्रदेशों में बौद्धिक पिछड़ापन पहले से ही मौजूद है, जिसने फासीवाद के लिए उर्वर भूमि तैयार की है।
जब सैन्यवाद, धार्मिक एवं जातीय कट्टरता और आर्थिक पिछड़ेपन ने इन प्रदेशों में सारी संस्थाओं को हर तरह अपने आगोश में ले लिया है, तब यह पुस्तक मेला भी उससे अलग कैसे रह सकता है?