दुनिया पर भारी पड़ रहा है अमेरिका की अगुवाई वाला ईरान युद्ध 

ईरान पर अमेरिकी अगुवाई वाला युद्ध अब दुनिया को अपने आग़ोश में समेट रहा है। केवल तेल पर कब्ज़ा करने का यह अमेरिका का खेल दुनिया को कितना सता रहा है इसकी जानकारी खुद अमेरिका को भी है लेकिन उसे इसका कोई परवाह नहीं। भला उससे कौन सवाल पूछेगा ? जो पूछेगा उस पर हमला होगा और फिर से ख़त्म करने की कोशिश की जाएगी।

ईरान में परमाणु अस्त्र बनाने या फिर परमाणु अस्त्र का विस्तार देने की कहानी रची गई, कोई बहाना तो चाहिए था लेकिन अब उसी अमेरिका की तरफ से जो बातें सामने आ रही है वह भ्रमित ही नहीं करती, चौंकाती भी हैं।

अमेरिका की राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गाबार्ड के ताजा बयानों ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी सीनेट की इंटेलिजेंस कमिटी के सामने पेश वार्षिक थ्रेट असेसमेंट में गाबार्ड ने एक ओर पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर गंभीर चेतावनी दी, वहीं दूसरी ओर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ऐसा खुलासा किया, जिसने ट्रंप प्रशासन की नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गाबार्ड ने अपने बयान में कहा कि पाकिस्तान का लंबी दूरी का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भविष्य में इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल स्तर तक विकसित हो सकता है। इसका मतलब यह है कि ऐसी मिसाइलें अमेरिका की मुख्य भूमि, यहां तक कि वॉशिंगटन तक पहुंचने में सक्षम हो सकती हैं।

उन्होंने चेताया कि पाकिस्तान अकेला देश नहीं है, बल्कि चीन, रूस, उत्तर कोरिया और ईरान भी लगातार ऐसे उन्नत मिसाइल सिस्टम विकसित कर रहे हैं, जो परमाणु और पारंपरिक दोनों तरह के हथियार ले जाने में सक्षम हैं। अमेरिकी खुफिया समुदाय के अनुमान के मुताबिक, अमेरिका के खिलाफ संभावित मिसाइल खतरों की संख्या मौजूदा 3,000 से बढ़कर 2035 तक 16,000 से अधिक हो सकती है।

गाबार्ड का यह बयान ऐसे समय आया है, जब दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन पहले से ही नाजुक बना हुआ है। पाकिस्तान के संभावित आईसीबीएम कार्यक्रम का जिक्र अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ाने वाला माना जा रहा है।

पाकिस्तान पर सख्त रुख के साथ ही गाबार्ड ने ईरान को लेकर अपेक्षाकृत अलग तस्वीर पेश की। उन्होंने अपनी लिखित गवाही में कहा कि जून 2025 में अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए हमलों के बाद ईरान का परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पूरी तरह नष्ट हो गया था।

उन्होंने साफ कहा कि उस हमले के बाद से ईरान ने अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को दोबारा शुरू करने की कोई कोशिश नहीं की है। यह दावा बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने ईरान के परमाणु खतरे को ही सैन्य कार्रवाई का मुख्य आधार बताया था।

गाबार्ड ने हालांकि यह भी जोड़ा कि ईरानी शासन अब भी कायम है और वह भविष्य में अपनी मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं को फिर से विकसित करने की कोशिश कर सकता है। यानी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसका स्वरूप बदल सकता है।

गाबार्ड के इस बयान ने अमेरिकी राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता मार्क वार्नर ने सवाल उठाया कि गाबार्ड ने अपनी मौखिक गवाही में उस हिस्से को क्यों नहीं पढ़ा, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम के नष्ट होने और दोबारा शुरू न होने की बात कही गई थी।

गाबार्ड के इन बयानों का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। एक तरफ पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम को लेकर नई अंतरराष्ट्रीय चिंता पैदा हो सकती है, तो दूसरी ओर ईरान युद्ध की वैधता पर भी गंभीर सवाल उठ सकते हैं। मध्य पूर्व में जारी तनाव, अमेरिका-इजराइल की सैन्य कार्रवाई और खुफिया आकलनों के बीच यह स्पष्ट होता जा रहा है कि वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। ऐसे में गाबार्ड के बयान आने वाले समय में कूटनीतिक और रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।  

लेकिन गाबार्ड की बातों को थोड़ी देर के लिए पीछे छोड़ भी दी जाए तो ईरान के खिलाफ जारी युद्ध का असर अब वैश्विक स्तर पर गहराता जा रहा है। मुख्य बात यह है कि इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत खुद अमेरिका नहीं, बल्कि एशिया, यूरोप और विकासशील देशों को चुकानी पड़ रही है। ऊर्जा आपूर्ति में बाधा, बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्राएं और आपूर्ति शृंखलाओं में अवरोध ने दुनिया के बड़े हिस्से की अर्थव्यवस्थाओं को झकझोर दिया है।

इस संकट का केंद्र है हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल का परिवहन होता है। ईरान की जवाबी कार्रवाइयों के कारण यह मार्ग लगभग बाधित हो गया है, जिससे वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी है।

इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर साफ दिख रहा है—अमेरिका में औसतन 23.6 प्रतिशत वृद्धि हुई है, लेकिन नाइजीरिया (39.5%), लाओस (32.9%) और ऑस्ट्रेलिया (31.8%) जैसे देशों में यह वृद्धि कहीं अधिक है।

एशियाई देशों में स्थिति और भी गंभीर है। थाईलैंड में ईंधन की कमी के कारण सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने के निर्देश दिए गए हैं। बांग्लादेश में ईंधन राशनिंग शुरू हो चुकी है, जबकि श्रीलंका और फिलीपींस ने ऊर्जा बचाने के लिए चार-दिवसीय कार्य सप्ताह लागू कर दिया है। भारत जैसे देशों में एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति बाधित होने से आम लोगों पर सीधा असर पड़ रहा है।

उधर , कतर पर हमलों और आपूर्ति में व्यवधान के कारण लिक्विफाइड नेचुरल गैस  की कीमतें यूरोप और एशिया में तेजी से बढ़ रही हैं। यूरोप, जो ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भर है, इस झटके से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जर्मनी की केमिकल इंडस्ट्री और इटली के पेपर उद्योग जैसे ऊर्जा-गहन सेक्टरों की लागत में भारी वृद्धि हुई है। इसके उलट, अमेरिका—जो दुनिया का सबसे बड़ा गैस उत्पादक है—इस मामले में अपेक्षाकृत सुरक्षित है।

इस असमान प्रभाव ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित किया है। यूरोपीय कंपनियां, जो पहले ही अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रही थीं, अब महंगी ऊर्जा के कारण और पीछे जा रही हैं। इटली की एक पेपर कंपनी के अनुसार, उनके प्राकृतिक गैस बिल में 60 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जिससे उत्पादन लागत 40 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इससे अमेरिकी कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिल रही है।

युद्ध का असर खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। दुनिया के लगभग एक-तिहाई उर्वरक कच्चे माल की आपूर्ति मध्य पूर्व से होती है। आपूर्ति बाधित होने से कृषि उत्पादन पर असर पड़ रहा है, खासकर अफ्रीका और दक्षिण एशिया के गरीब देशों में। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यदि तेल की कीमतें 100 डॉलर से ऊपर बनी रहीं और युद्ध जारी रहा, तो 4.5 करोड़ लोग और खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ सकते हैं।

मुद्रा बाजार भी इस संकट से अछूता नहीं है। ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही हैं। भारतीय रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे आयात और महंगा हो गया है। दक्षिण कोरिया और जापान जैसे औद्योगिक देशों को भी मुद्रा संकट का खतरा सता रहा है।

मध्य पूर्व के देशों के लिए यह युद्ध आर्थिक रूप से विनाशकारी साबित हो सकता है। अनुमान है कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो कतर और कुवैत की अर्थव्यवस्था में 14 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है, जबकि सऊदी अरब और यूएई को भी नुकसान झेलना पड़ेगा।

यूरोप में आर्थिक विकास दर के अनुमान घटा दिए गए हैं। यूरोजोन की वृद्धि दर 2026 में 0.9 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो पहले 1.2 प्रतिशत आंकी गई थी। वहीं अमेरिका में यह गिरावट अपेक्षाकृत कम है—2.6 से घटकर 2.4 प्रतिशत। हालांकि, महंगाई दोनों जगह बढ़ने की आशंका है।

इस पूरे परिदृश्य से एक स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही आर्थिक स्थिरता की कुंजी बनती जा रही है। अमेरिका, अपनी घरेलू तेल और गैस उत्पादन क्षमता के कारण, इस संकट से अपेक्षाकृत सुरक्षित है, जबकि आयात-निर्भर देश अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

(अखिलेश अखिल पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)

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