दहेज हत्या केस में ज़मानत देने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा फटकारे गए जज ने ऐसे 99% मामलों में दी है बेल

फरवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में ज़मानत देने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस पंकज भाटिया की आलोचना की थी। अब एक पड़ताल में सामने आया है कि अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच जस्टिस भाटिया की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ ने दहेज संबंधित हत्या के 510 मामले सुने थे, जिनमें से 508 केस में उन्होंने आरोपियों की ज़मानत मंज़ूर की।

इस बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने आज एक नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें अन्य बातों के अलावा, जस्टिस पंकज भाटिया के रोस्टर में बदलाव किया गया है। नए नोटिफ़िकेशन वाले रोस्टर के तहत, जो 23 मार्च से लागू होगा, जस्टिस भाटिया अब सिविल मामलों की सुनवाई करेंगे।

यह बदलाव जस्टिस भाटिया के उस आदेश के कुछ ही दिनों बाद आया है, जिसमें उन्होंने चीफ़ जस्टिस से अनुरोध किया था कि भविष्य में उन्हें ज़मानत से जुड़े मामलों का रोस्टर न सौंपा जाए। उन्होंने यह अनुरोध सुप्रीम कोर्ट द्वारा दहेज हत्या के एक मामले में उनके एक ज़मानत आदेश को “बेहद चौंकाने वाला और निराशाजनक” बताए जाने के महज़ चार दिन बाद किया था।

बीते फरवरी महीने में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस पंकज भाटिया द्वारा दहेज हत्या से जुड़े मामले में ज़मानत देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए थे। शीर्ष अदालत का कहना था कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को अपराध की प्रकृति, सजा की गंभीरता, आरोपी और मृतका के रिश्ते, घटना की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था।

अब इंडियन एक्सप्रेस  की एक पड़ताल में सामने आया है कि पिछले साल 2025 के आखिर के तीन महीनों में जिस बेंच की अध्यक्षता जस्टिस पंकज भाटिया कर रहे थे, उसने दहेज हत्या के लगभग सभी मामलों में आरोपियों को ज़मानत दी है।

अख़बार के विश्लेषण के अनुसार, तीन महीने- अक्टूबर से दिसंबर 2025 के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस पंकज भाटिया की अध्यक्षता वाली एकल-न्यायाधीश पीठ ने दहेज से संबंधित हत्या के 510 मामलों में से 508 में ज़मानत दी। इसका मतलब है कि उन्होंने कुल मामलों का लगभग 99.6% में ज़मानत मंजूर की।

अख़बार के मुताबिक, इन आदेशों की भाषा और संरचना भी लगभग एक जैसी देखी गई। ज्यादातर मामलों में ज़मानत के लिए 20-20 हजार रुपये की दो ज़मानतदारों के साथ व्यक्तिगत बॉन्ड देने का निर्देश दिया गया। अलग-अलग परिस्थितियों में मौत होने के बावजूद आदेशों की भाषा और तर्क काफी हद तक समान थे।

उल्लेखनीय है कि 9 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही ज़मानत आदेश को रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि आदेश पढ़कर समझ ही नहीं आता कि हाईकोर्ट आखिर क्या कहना चाहता है और इतने गंभीर अपराध में आरोपी को ज़मानत देने का आधार क्या था।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की ज़मानत रद्द करते हुए उसे आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की, वह श्रावस्ती जिले की 28 वर्षीय सुषमा देवी की मौत से जुड़ा था। शादी के दो महीने से भी कम समय बाद उनका शव ससुराल के बरामदे में मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला दबाना बताया गया था। सुषमा के पिता का कहना था कि शादी के समय उन्होंने 3.5 लाख रुपये नकद दिए थे, लेकिन बाद में ससुराल वालों ने कार की मांग शुरू कर दी थी। इस मामले में सत्र न्यायालय ने पहले ही ज़मानत देने से इनकार कर दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने ज़मानत मंजूर कर ली।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट को अपराध की प्रकृति, सजा की गंभीरता, आरोपी और मृतका के रिश्ते, घटना की जगह और मेडिकल सबूतों को ध्यान में रखना चाहिए था। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के तीन महीने के भीतर हुई मौत के मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत विशेष कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की इस कड़ी टिप्पणी के कुछ ही दिनों बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि उन्हें अब ज़मानत से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी न दी जाए। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उन पर बहुत ‘निराशाजनक और मनोबल गिराने वाला प्रभाव’ पड़ा है।

अख़बार ने इन मामलों पर जस्टिस भाटिया से प्रतिक्रिया लेने के लिए संपर्क किया था, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजे गए सवालों के भी उत्तर नहीं मिले।

ज़मानत आदेश में एक जैसी बातों का दोहराव

अखबार के अनुसार, जिन 510 मामलों का विश्लेषण किया गया, उनमें सभी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी (दहेज हत्या) या भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत आरोप लगे थे।

इन मामलों में अधिकतर आरोपी पति, सास-ससुर और अन्य रिश्तेदार थे। कुल आरोपियों में 362 पति, 68 सास और 63 ससुर शामिल थे।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार 340 मामलों में मौत का कारण फांसी बताया गया, 27 मामलों में जहर, 16 में गला दबाना, 11 में जलने से मौत, जबकि कुछ मामलों में सिर की चोट, दम घुटना या डूबने से मौत दर्ज हुई। छह मामलों में मृत महिला गर्भवती भी थीं।

अधिकतर मामलों में ज़मानत देते समय अदालत ने यह कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि मौत से ठीक पहले महिला को दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था। यही तर्क करीब 253 आदेशों में दोहराया गया।

हालांकि, 510 में से दो मामलों में ज़मानत नहीं दी गई। पहले मामले में महिला के शरीर का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा जल गया था और उसने अपने पिता को हमले की जानकारी दी थी। वहीं, दूसरे मामले में आरोपी पति पर पत्नी को गोली मारने का आरोप था।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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