कांवड़ यात्रा के बहाने उग्र हिन्दुत्व का प्रयोग

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श्रावण मास हिन्दुओं खासकर शिव भक्तों के लिए विशेष होता है। पूरे माह लोग मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाकर शिव आराधना करते हैं। यह परम्परा बहुत पुरानी है, जिसे मैं बचपन से ही देखता आ रहा हूं, परन्तु कांवड़ लेकर पैदल लंबी यात्रा करते हुए शिव मंदिरों में जल चढ़ाने की परम्परा सारे उत्तर भारत में बहुत पुरानी नहीं हैं। बिहार के देवधर जिले में (वर्तमान समय में झारखण्ड में) स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग में कांवड़ियों द्वारा गंगा से गंगाजल लेकर मंदिर में चढ़ाने की एक स्थानीय परम्परा थी, लेकिन देखते-देखते यह एक राष्ट्रीय परिघटना में ‌बदल गई तथा एक दशक से इसका प्रयोग संघ परिवार के लोग उग्र हिन्दुत्व के प्रचार के लिए करने लगे।

करीब दो दशक पहले की बात है, दिल्ली के एक हिन्दी के राष्ट्रीय समाचार पत्र के चर्चित संपादक ने अपने संपादकीय में लिखा था, कि “यह देशव्यापी कांवड़ यात्रा पंजाब में ख़ालिस्तानी आंदोलन तथा भिंडरावाला के उदय के जवाब में शुरू हुई थी।” हालांकि यह विश्लेषण मेरे गले नहीं उतरता। बात जो भी हो, परन्तु यह बात सही है कि इसको बढ़ावा देने में इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया की बड़ी भूमिका है।

किस प्रकार एक स्थानीय धार्मिक परंपरा देखते ही देखते अराजकता और धार्मिक उन्माद में बदल जाती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह परिघटना है। पूरे उत्तर भारत में सावन शुरू होते ही इसको लेकर मुख्यमंत्रियों और पुलिस अधिकारियों की मीटिंग शुरू हो जाती है। इससे कानून व्यवस्था की बड़ी समस्या पैदा हो जाती है। आम यात्रियों के लिए बड़े-बड़े राजमार्ग बंद कर दिए जाते हैं।

अगर आप बस या कार से दिल्ली से मेरठ या देहरादून जाना चाहते हैं, तो आप नहीं जा सकते, क्योंकि कांवड़ियों को छोड़कर अन्य सभी के लिए यह मार्ग बंद कर दिया जाता है। यही स्थिति गोरखपुर मंडल से ‌फैजाबाद, बनारस और इलाहाबाद जाने वाले मार्गों की होती है। इस यात्रा का बाज़ारीकरण बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। बोल बम और जय श्रीराम जैसे नारों वाले टीशर्ट और कांवड़ यात्रा से संबंधित सभी सामग्रियों से बाज़ार भरा पड़ा है।

गाजियाबाद से दिल्ली तक के इलाकों में जगह-जगह कांवड़ियों के ठहरने और खाने-पीने के लिए लगे तंबुओं में बज रहे कानफोड़ू डीजे से इतना शोर-शराबा होता है कि आस-पास के लोगों का रहना-जीना हराम हो जाता है। कांवड़ियों द्वारा नशीले पदार्थों का सेवन आम बात है, हालांकि प्रशासन ने इस पर रोक लगाई है। कांवड़ियों द्वारा सड़क पर चलने वाले आम यात्रियों से मार-पीट, कार-बस और ट्रक फूंकने की घटनाएं आम होती जा रही हैं।

इस विशाल उन्मादी जनसैलाब से राजनीतिक फ़ायदा लेने के लिए सभी राजनीतिक दलों में होड़ लग जाती है। दिल्ली में तो भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लोग इनके ‌खाने-पीने और ठहरने के लिए मुफ़्त व्यवस्था करते हैं, लेकिन इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा भाजपा ने उग्र हिन्दुत्व की राजनीति के प्रचार-प्रसार के लिए किया है।

दो वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर फूल बरसाने का कार्यक्रम शुरू किया। अब सरकारी खर्चे से पुलिस के लोग कांवड़ियों पर फूल बरसाते हैं। कुछ राजनीतिक दलों ने छुट-पुट इसका विरोध किया, लेकिन कोई बड़ा विरोध सामने नहीं आया। सबसे ख़तरनाक बात यह हुई है, कि इस यात्रा के बहाने धर्म, अंधराष्ट्रवाद और हिन्दुत्व को आपस में मिलाया जा रहा है।

कांवड़िए‌ बड़े पैमाने पर कांवड़ के साथ तिरंगा झंडा लेकर चल रहे हैं। ‘बोल बम’ नारे के साथ-साथ ‘जय श्रीराम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे भी लगा रहे हैं। गाजियाबाद में पिछले वर्ष ही मैंने स्वयं कांवड़ यात्रा के मार्ग में चारों ओर तिरंगे झण्डे लगे देखे थे।

सबसे ख़तरनाक चीज़ें उत्तर प्रदेश में हो रही हैं, जहां इस वर्ष कांवड़ यात्रा के सिलसिले में उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे एक महीने मीट की दुकानों को बंद करवा दिया और अब गोकशी के शक में मीट व्यापारियों को गिरफ़्तार किया जा रहा है। महज़ शक के आधार पर मुजफ्फरनगर में करीब 90 मीट व्यापारियों को धारा 151 के तहत चालान करके जेल भेज दिया गया। करीब 500 व्यापारियों को चिंहित किया गया है, जिन पर कार्रवाई करने की धमकी दी गई है।

केवल शक के आधार पर 90 व्यापारियों को जेल भेज देना पूरी तरह से ग़ैरक़ानूनी है। उत्तर प्रदेश में गोकशी विरोधी कानून तो पहले ही से है फिर केवल शक के आधार पर ये गिरफ़्तारियां क्यों? कुछ सामाजिक संगठनों को छोड़कर सभी राजनीतिक दल इस तरह की ग़ैरक़ानूनी कार्रवाई पर चुप्पी साधे हुए हैं।

कई दशकों से संघ परिवार तथा अन्य हिन्दूवादी संगठन लम्बे समय से लगने वाले धार्मिक मेलों, त्योहारों तथा यात्राओं पर ‌अपनी रणनीति के तहत क़ब्ज़ा कर लिया है।

गोरखपुर में सदियों से होली त्योहार से एक दिन पहले होली का जुलूस निकलता था, जिसमें हिन्दू-मुस्लिम सभी मिलकर एक-दूसरे को रंग-अबीर डालते हुए चलते थे। 1996 से तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ ख़ुद ही इस जुलूस का नेतृत्व करने लगे। जिसके कारण करीब दो-तीन दशक पहले हिन्दुत्ववादियों ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया।

योगी आदित्यनाथ जो उस समय गोरखपुर के सांसद थे और आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। ख़ुद रथ पर सवार होकर इस मेले में चलने लगे तथा उनके समर्थक लाठी-डंडा और तलवार लेकर शक्ति प्रदर्शन के लिए उनके साथ निकलने लगे। इस जुलूस में लगने वाले उग्र हिन्दुत्व के नारों के कारण अब यह होली का जुलूस आतंक का पर्याय बन चुका है।

गोरखपुर में होली के‌ त्योहार में हुए दंगे में इसकी बड़ी भूमिका थी। लम्बे समय से गंगा-जमुनी तहज़ीब वाला हिन्दू-मुस्लिम हर त्योहार में ‌आंतक के‌ भय के माहौल में जीता है। इसी तरह का प्रयोग संघ परिवार कांवर यात्रा के संदर्भ में कर रहा है।

(स्वदेश कुमार सिन्हा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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    Kumar

    सड़क पर जो नमाज पढ़ी जाती है इसको क्या कहे गे। लम्बा जाम लग जाता है हजारो लोग परेशान होते इस बारे मे खबर कभी नही लिखा। इसको आप मुस्लिमों का उग्र रूप कह सकते है क्या । आप इतने मुस्लिम प्रेमी और हिंदू विरोधी क्यों है

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