चंद दिनों पहले ईरान के नौसेना बेड़े के साथ सैनिक भारत के साथ युद्धाभ्यास करके वापस जा रहे थे। वे अभी हिंद महासागर में ही थे, उनके युद्धपोत पर अमेरिका ने हमला किया और उन्हें समुद्र में डुबा दिया। उन्होंने अपने डूबते जहाज से भारत को संपर्क किया। भारत का दावा है कि उसने भी संपर्क करने की कोशिश की। उन्होंने श्रीलंका को संपर्क किया। श्रीलंका का बचाव दल पहुंचा और कुछ सैनिकों को बचाने में सफल रहा। भारत इस बचाने के अभियान में नहीं पहुंचा।
ठीक कारण क्या है, यह अभी साफ नहीं है। भारत आये इन मेहमानों को, जो भारत के नौसैनिकों को प्रशिक्षित करने आये थे, के मारे जाने पर भारत के प्रधानमंत्री की चुप्पी पूरी दुनिया में, और भारत में भी हैरान करने वाली है। भारत ने अमेरिका के इस घिनौने और कायराना कृत्य पर चुप्पी साध ली। ईरान जिस पर हमला आसन्न था, ने भारत को अपना एक महत्वपूर्ण युद्धपोत भेजा।
ईरान से भारत आये इस युद्धपोत के अभ्यास में भारत की राष्ट्रपति ने भी इसका जायजा लिया था। ईरान से आये नौसैनिक भारत में अपनी छुट्टियाँ मनाने आगरा भी आये थे। उनका ताजमहल के सामने खिंचाया गया ग्रुप फोटो को देखा जा सकता है। सफेद संगमरमर से बनी इस शानदार इमारत के आगे खड़े सैनिक सिर्फ मेहमान नहीं थे। इस इमारात की नक्काशियों और इसके स्थापत्य के ईरानी असर की याद को ताजा कर रहे थे।
भारत की ईरान के साथ सभ्यता और संस्कृति के उस संश्लिष्टता की याद को ताजा कर रहे थे, जो हजारों बरस से चली आ रही है। यह खूबसूरत नजारा अमेरीकी हमले में एकबारगी त्रासदी में बदल गया। यह हमला भारत और ईरान की सांस्कृतिक विरासत पर हमला था। यह उस सूफीवाद पर हमला था जो भारत के अद्वैतवाद के साथ मिला और एक विशिष्ट शैली पैदा हुई।
यह ताजमहल के सफेद संगमरमर से उठती उस आभा का हिस्सा बन गया जो प्यार की हकीकी दुनिया की निशानी में तब्दील हो गया। अमेरीकी तारपीडो ने हमारी इस विरासत को बहुत गहरे साजिशी तरीके से मारकर समुद्र में डुबो दिया। भारत इस पर चुप रह गया।
भाजपा नेतृत्व की भारत की सरकार, प्रधानमंत्री मोदी और उनका पूरा कैबिनेट साम्राज्यवादी अमेरिका के सामने चुप लगाकर बैठा हुआ है। उसकी धमकियों, उसकी नीतियों और उसकी योजनाओं का हिस्सा बनता जा रहा है। उसे भारत की विरासत, उसका इतिहास, उसका राजनय, आर्थिक नीतियां, … सबकुछ अमेरिका के सामने गिरवी रखता जा रहा है। अब हम यही इजरायल के संदर्भ में भी देख रहे हैं।
भारत के प्रधानमंत्री मोदी युद्ध के माहौल में इजरायल चले गये और वहां उन्होंने उनसे मेडल लिया, बदले में उसे ‘फादरलैंड’ जैसा तमगा भी दे दिया। ऐसा क्यों हो रहा है?
हम सभी जानते हैं युद्ध राजनीति की सबसे तीव्र और हिंसक अभिव्यक्ति होती है। जब दुनिया युद्ध में उलझ रही है, तो इसकी भी राजनीति है। ईरान पर अमेरिका के द्वारा किया हमला उसकी निरन्तर युद्ध में रहने की वह रणनीति है जिससे वह अपने आर्थिक हितों को भू-राजनीतिक परिदृश्य पर लाद सके। वहां का साम्राज्यवादी अहंकार कुछ और नहीं वहां के पूंजीपति वर्ग की वह भूख है जो सिर्फ और सिर्फ कब्जा और मुनाफा चाहता है।
इजरायल को एक वृहत्तर मध्य-एशिया का भूभाग चाहिए। उसके पूंजीपतियों को भी कब्जा और मुनाफा के भूपरिदृश्य पर एकाधिकार चाहिए। यह युद्ध ईरान पर कब्जा करने के लिए नहीं हो रहा है। यह चीन और रूस के आउटपोस्ट को नियंत्रित करने के लिए हो रहा है। यह ईरान के मध्य-एशिया के प्रभाव को खत्म करने के लिए हो रहा है। उसे कतर जैसा देश बना देने के लिए उस पर हमला किया जा रहा है। ईरान यह होना नहीं चाहता।
वह सिर्फ अपनी संप्रभुता के लिए ही नहीं लड़ रहा है। वह अपनी विरासत और सभ्यता की परम्परा के लिए लड़ रहा है। आप उसकी विरासत और परम्परा के दावे से असहमत हो सकते हैं, लेकिन वह इसी जमीन से साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ा है और अपनी आजादी की आवाज को बुलंद कर रहा है। यही कारण है कि ईरान का संघर्ष एक शानदार संघर्ष की तरह दिख रहा है। उसकी राजनीति कहीं ज्यादा तार्किक और नैतिक तौर पर मजबूत दिख रही है।
भारत तो दुनिया में चल रहे है इस युद्ध में सीधा हिस्सेदार नहीं है। लेकिन, भारत के साथ क्या हो रहा है? अमेरीका बिना युद्ध के भारत को एक उपनिवेश की तरह व्यवहार कर रहा है। इजरायल अपने एक पिट्ठू देश की तरह देख रहा है। हाल के वर्षाें में अमेरीका, खासकर ट्रम्प के आने के बाद से भारत की विदेश नीति और उस पर आधारित समझौते को पूरी तरह से नियंत्रित करता हुआ दिख रहा है। एक समझौते के तहत अमेरीका का हिंद महासागर पर कब्जा पहले से कई गुना बढ़ गया है।
भारत-ईरान-यूरोप कोरिडोर की महत्वाकांक्षी योजना को अमेरिका ने हिंद महासागर में डुबो दिया। रूस के साथ तेल व्यापार समझौते को बंद करा दिया और ईरान के साथ दूरी बनाने के लिए बाध्य किया। ट्रम्प ने दावा किया कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों को धमकी देकर ठीक कराया। भारत के नागरिकों को जंजीरों में जकड़कर अमेरीका से भारत भेजा गया।
भारत पर कर की आक्रामक नीति अख्तियार कर अमेरिका ने अपनी व्यापार शर्तों को लाद दिया। यह सब भारत चुपचाप स्वीकार करता गया है। प्रधानमंत्री इन मसलों पर चुप रहे और उनके कैबिनेट के या उनके कुछ सांसद बयान देकर इन मसलों पर अमेरिका की तरफदारी वाली नीतियां बघारते हुए बयान देते रहे।
अंतर्राष्ट्रीय नीतियां दो ही तरह से बनती हैं, युद्ध से या मैत्री से। युद्ध से बनी नीतियां असंतुलित होती हैं। मैत्री के दौरान दोनों देश अपनी ताकत के अनुरूप नीतियां गढ़ते हैं। मैत्री में ताकत का संतुलन होता है जिससे युद्ध की संभावना को नकारा जाता है। भारत में मैत्री के नाम पर पर जिस तरह के समझौते दिख रहे हैं वे किसी भी तरह संतुलित नहीं है। ये पूरी तरह अमेरीकी युद्ध नीति के विस्तार की तरह दिखते हैं।
दो दिन पहले हुए रायसीना डायलाग में अमेरीकी प्रतिनीधि का यह बयान कि अमेरीका भारत को एक और चीन बनने नहीं देगा, का अर्थ क्या हो सकता है? यह मैत्री का नहीं युद्ध की भाषा है। इसी दौरान अमेरीका की ओर से यह बयान कि भारत 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीद सकता है, उपनिवेश के साथ होने वाले व्यवहार को दर्शाता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ट्रम्प ने कई बार यह कहा कि उसने धमका कर युद्ध को बंद कराया।
यह निश्चित ही मैत्री की भाषा नहीं, युद्ध की भाषा है और ऐसा लगने लगा कि भारत बिना युद्ध के ही एक उपनिवेश में बदलता जा रहा है।
हिंदुत्व का राष्ट्रवाद अपने गृहनीति में जितना आक्रामक है उतना दुनिया के नक्शे पर क्यों आक्रामक नहीं दिख रहा है? यह जर्मन फासिस्ट नीतियों जैसा आक्रामक नहीं दिख रहा है? क्या इसलिए कि इसने ‘विश्वगुरू’ की अवधारणा को अपना लिया था? यदि ऐसा है तो इसे भारत के अंदर भी इस विश्वगुरू की नमनीयता और समर्पण का भाव दिखाना चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।
यह तो विपक्ष की एक के बाद एक सरकारों को खत्म करता जा रहा है, उनकी पार्टियों को नेस्तनाबूद करते हुए आगे बढ़ रहा है। इसके राज में तो मंदिरों का निर्माण चरम पर है और धर्म का बाजार हर घर तक पहुंच गया है। निश्चित ही यह एक उलझाने वाली पहेली है जो अपने ही नागरिकों पर इतना हमलावर है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय नीति में उतना ही दब्बू दिख रहा है। गृहनीति और विदेशनीति के बीच का यह फर्क जितना दिख रहा है, उतना यह है नहीं।
भारत के प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों का मूलाधार राजनीति का वह व्यवहारवाद है जो राजनीतिक सिद्धांत में अवसरवाद से अधिक परिभाषित होता है और जिसमें नैतिकता की कोई जगह नहीं है। यदि आप याद कर सकें तो इस सदी के शुरूआत में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें ‘राजधर्म’ निभाने की सलाह दी थी। निश्चित ही यह शब्द सामंती अर्थ लिए हुए था लेकिन इसमें नैतिकता की एक जमीन थी जिस पर वह चलने के लिए कह रहे थे।
जब खुद मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गये तब उन्होंने कई ऐसे बयान दिये जिसमें नैतिकता की जगह नहीं थी। आपदा में अवसर ऐसा ही एक जुमला था। आपदा अपने साथ कई सारे संकट लाता है जिसमें नैतिकता भी प्रभावित होती है। यह जुमला अवसर पर जिस तरह जोर देता है, वह नैतिकता को काफी पीछे छोड़ देता है। नोटबंदी के दौरान उनके कई बयान नैतिकता के मूल्यों को चुनौती देेते हुए सामने आये।
विपक्ष की सरकारों को गिराने के कई उदाहरण है जिसमें नैतिकता का ख्याल नहीं रखा गया। इस तरह के कारनामों को काँग्रेस की अनैतिकता के इतिहास का उदाहरण पेश किया गया और इसी अनैतिकता को ही नैतिकता में बदल दिया गया। ‘राजनीति में सब कुछ जायज है’ का कथित व्यवहारवादी रुख अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नये समीकरणों को गढ़ने की नीति में बदल गया।
लेकिन, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का मंच एक अलग तरह की राजनीति का मंच होता है जिस पर पूंजी मुख्य भूमिका निभाती है और शक्ति इसके केंद्र में होती है। भारत इन दोनों मोर्चों में अधिक से अधिक विकासशील अवस्था में था और शक्ति के नाम पर उसके परम्परागत मित्र थे। इस कमी को पूरा करने के लिए हिंदुत्व बिग्रेड ने अमेरीकी और यूरोपीय डायस्पोरा का उपयोग किया और उसे मोदी का कद बढ़ाने में लगा दिया।
दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था को ट्रिलियन डालर में बदल देने के दावे के लिए कई सारे ऐसे कदम उठाये जो बाद में संदेह के घेरे में आ गये। भारत के डायस्पोरा का उन्माद जल्द ही विदेशी नफरतों का शिकार होने लगा और अवैध प्रवासन के नाम पर ट्रम्प की नीतियों ने इसकी हवा निकाल दी। ट्रिलियन डालर अर्थव्यवस्था को मुद्रा कोष की टिप्पणी और रेटिंग ने उसे नीचे ला दिया और संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया।
घर में पहलवान, बाहर सियार वाली जो कथा है, वह भारत में खूब दिखने लगी है। दरअसल, इस पहलवानी की ताकत पूंजीवाद की उस अनैतिकता में छुपी हुई है जिसे वह हथियार की तरह प्रयोग कर रहा है।
अभी हाल ही में पानीपत की एक पेट्रोलियम रिफायनरी में मजदूर महीने में चार दिन की छुट्टी की मांग कर रहे थे और समय से वेतन भुगतान करने के लिए कह रहे थे। वे नेशनल हाॅलीडे पर छुट्टी की मांग कर रहे थे। मजदूर सिर्फ पूंजीपतियों के सामान्य नियमों से ही नहीं बंधे हुए हैं, वे उन अवैधानिक नियमों से बंधकर काम कर रहे हैं जो नियमों के तहत मान्य नहीं हैं।
मजदूर एक अवैधानिक नियमों में जकड़े जा रहे हैं और यह किसी भी राजसत्ता के नियमों और नैतिकताओं का उल्लंघन है। पूंजी की यह अनैतिकता बेधड़क पूरे भारत में फैलती जा रही है और अब उसे कानूनी जामा पहनाया जा रहा है। ‘सस्ता श्रम’ उस क्रूर व्यवहारवाद का एक उदाहरण है जिसमें श्रमिक गुलाम बनता जा रहा है उसकी उजरत श्रम के नियमों से नहीं, कानूनी और अवैधानिक प्रक्रियाओं से तय हो रही है।
यही हाल किसानों के उत्पादों का मूल्य निर्धारण के समय हो रहा है और किसान बर्बादी की ओर बढ़ रहे हैं। मध्यवर्ग की तबाही सिर्फ उसकी आय में कमी, बरोजगारी की वहज से ही नहीं हो रही है, उस पर तरह तरह से लादे करों से भी हो रही है और उसकी बचत पर उचित मूल्य का भुगतान न होनेे से हो रही है।
आज जब हम ईरान पर अमेरिका और इजरायल का हमला देख रहे हैं, ईरान के राष्ट्रपति को मार डालना देख रहे हैं, भारत आये ईरानी मेहमानों को डुबो देने की घटना को देख रहे हैं तब क्या हम महाभारत के उस युद्ध को नहीं देख रहे हैं जिसमें अभिमन्यु को घेर कर मार देने पर चुप्पी रही? भारत की चुप्पी से भारत को फायदा होता तो इसे मोदी की ‘आपदा में अवसर’ के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता।
लेकिन, भारत तो बिना लड़े ही अमेरिका का एक उपनिवेश बनता दिख रहा है। अमेरिका तो भारत के साथ उपनिवेश की तरह व्यवहार कर रहा है। सच् बात यही कि हर राजनीति के पीछे एक दर्शन होता है और उसी पर आधारित नैतिकता होती है, मूल्य होते हैं, जीवन होता है और जीवन की पद्धतियां होती हैं। हिंदुत्व की राजनीति और उसका दर्शन उसके इतिहास और उसके व्यवहार में हम देखते आये हैं।
विलियम जोंस ने इसकी खोज पददलित, खो गया और भ्रष्ट हो चुकी आर्य सभ्यता में करते हैं जिसमें कभी ‘शुद्धता’ थी। सावरकर ने इस शुद्धता को पितृभूमि में रखा और हेडगेवार ने हिंदू समाज की वर्णव्यवस्था में स्थापित किया। दरअसल में यह वह अतीतग्रस्तता है जिसे भारत का सूदखोर वर्ग एक बिल्ली की तरह बंदरों को रोटी बांटने के नाम पर उन्हें लड़ा रहा है और खुद उस खा रहा है।
हम जानते हैं कि अतीत की रोटी कभी खत्म नहीं होती और यदि उसमें धर्म की अफीम मिली हो तब उसे वर्तमान और भविष्य की तो कत्तई चिंता नहीं होती।
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के युद्ध में ईरान ने संप्रभुता, नैतिकता और आजादी के उन मूल्यों को सामने ला दिया है जिसे आज भी दुनिया के लोग चाहते हैं। इसी कारण से अमेरिका और इजरायल का युद्ध एक बदनुमा दाग की तरह दिखाई दे रहा है। यह युद्ध भारत के मुहाने पर आ गया है। हम न चाहते हुए भी इसका हिस्सा बन गये हैं। अमेरिका और इजरायल की युद्ध नीति का सीधा असर भारत की नीतियों पर पड़ रहा है और यहां के आम जन इसकी आग की ताप में हैं।
हमें अपने उपनिवेशवाद विरोधी इतिहास को जरूर याद रखना चाहिए और उससे पैदा हुए मूल्यों की तरफ जरूर देखना चाहिए। जो नीति जन के खिलाफ है, जो आजादी के खिलाफ है, वह हमारे किसी काम की नहीं है, ऐसी नीतियां हमें गुलामी की ओर ले जाएंगी। हमें ऐसी नीतियों का विरोध करना ही होगा।
(अंजनी कुमार लेखक व राजनीतिक टिप्पणीकार हैं।)