ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों दिल्ली स्थित भाईराम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कैंप को किसी भी कीमत पर उजाड़ देने पर आमादा है, मोदी सरकार?

नई दिल्ली। दिल्ली के रेस कोर्स का एरिया भारत के शासक वर्ग के सबसे अभिजात्य लोगों का वास-स्थान। आप ज्यों ही लोक कल्याण मार्ग मेट्रो से बाहर निकलते हैं, चारों तरफ कमांडो फोर्स, अत्याधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षा बलों, चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था, पग-पग पर सुरक्षा बलों के कैंप और सायरन बजाती गाड़ियों को देखकर-सुन समझ जाते हैं कि आप ऐसी जगह आ गए हैं, जहां इंडिया के आधुनिक शहंशाह, सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश, पूर्व राष्ट्रपति- उपराष्ट्रपति, नौकरशाह, मंत्री-संत्री रहते हैं। अगर आप लंबे समय से गांव-देहात में रहे हैं या दिल्ली के निम्न मध्यवर्गीय-गरीब लोगों के एरिया में रहे हैं, तो आप थोड़ी देर के लिए यह शाही तामझाम देखकर भौंचक-औचक भी हो सकते हैं।

इन सब के के बीच, स्लम कही जाने वाली तीन अलग-अलग बस्तियां हैं, जिनके निवासियों को यह आदेश दे दिया गया है कि वे 6 मार्च तक अपने घरों को छोड़कर चले जाएं, नहीं तो उनके घरों को बुलडोजर से तोड़ दिया जाएगा। यह आदेश इसी पॉश एरिया के बीच स्थित तीन बस्तियों (कॉलोनियों) के लोगों को दिया गया है। जिनके नाम- भाईराम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कैंप हैं। इन्हें स्लम बस्ती के रूप में भी जाना जाता है।

यहां तीनों बस्तियों में कुल मिलाकर कम से कम एक हजार परिवार रहते हैं। कम से कम 5 से 6 हजार लोग रहते हैं। 19 फरवरी, 2026 को केंद्र सरकार के आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के भूमि और विकास कार्यालय के आदेश में कहा गया है कि “वर्तमान में कब्जे वाले परिसर को 6 मार्च, 2026 तक अनिवार्य रूप से खाली कर दें। 6 मार्च, 2026 तक वर्तमान परिसर को खाली करने में विफल रहने की स्थिति में कानून के अनुसार औपचारिक बेदखली की कार्यवाही और संरचनाओं को हटाने की कार्रवाई की जाएगी।” 

नोटिस/ आदेश में कब्जे वाले परिसर के रूप में रेस कोर्स रोड के निकट स्थित जे. जे. क्लस्टर्स को चिन्हित किया गया है। बी. आर. कैंप, मस्जिद कैंप और डी.आई. डी. कैंप नामक झुग्गी-झोपड़ी (जे.जे.) क्लस्टर्स के रूप में नोटिस थमाया गया है। यह नोटिस पुलिस बल के साथ लोगों को धमकाते हुए पकड़ाया गया है और लोगों की जबर्दस्ती हस्ताक्षर लिया गया।

जनचौक की टीम जब लोक कल्याण मेट्रो से निकली तो हमें इन तीनों बस्तियों का पता लगाने में थोड़ी दिक्कत हुई, क्योंकि जिन औपचारिक नामों को पढ़कर-जानकर हम गए थे, वहां स्थानीय तौर पर आटो वाले उसे रेस कोर्स स्लम के रूप में जानते हैं। 

आम तौर पर लोगों के दिमाग में स्लम या झुग्गी-झोपड़ी (जे. जे.) का जो चित्र होता है, वह व्यवस्थित तौर पर करीब पक्के मकानों, बिजली, पानी, सड़क, पग-पग पर कैमरे लगे और पक्की नालियों और फर्श वाली जगह का नहीं होता है। हमारे दिल-दिमाग में भी ऐसा ही था, लेकिन यह तीनों बस्तियों में अधिकांश पक्के मकान वाली, सब में बिजली मीटर, पानी की आपूर्ति, पक्की गलियां, चारों तरफ लगे कैमरे, यहां तक कि सारी खाली जगहों पर पक्की ईटों के फर्श हैं। यह तीनों बस्तियां आजादी के पहले बसी हैं, करीब 1940 के आस-पास। इसी समय यहां रेसकोर्स की स्थापना हुई है।

रेस कोर्स जहां घुड़दौड़ होती है। रईस लोग घोड़े के दौड़ की प्रतियोगिता कराते हैं और बड़ी संख्या में अलग घोड़ों पर दांव लगाते हैं। अभी यहां रेसकोर्स है। घुड़दौड़ होती है, हालांकि अब राजा-नवाबों की जगह नए कारोबारियों-पूंजीपतियों ने ले ली है। हालांकि हमारी टीम सिर्फ दो बस्तियों पहली भाईराम कैंप और दूसरा मस्जिद कैंप में जा सकी। अंधेरा हो जाने के चलते हम तीसरी बस्ती डीआईडी में नहीं जा सके। 

भाईराम कैंप में करीब 500 घर हैं। धार्मिक आस्था के आधार पर देखें तो इसमें 70 प्रतिशत हिंदू और करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम हैं। सामाजिक समूह के आधार पर देखें तो अधिकांश दलित-पिछड़े या बहुजन समाज के लोग हैं। इसी तरह मस्जिद कैंप में करीब 100 घर हैं। इसमें 70 प्रतिशत मुस्लिम और 30 प्रतिशत हिंदू हैं। आर्थिक आधार पर देखें तो यह निम्न मध्यवर्ग और कुछ मध्यवर्ग के लोगों का वास स्थान है।  इसका अंदाज इससे भी लगाया जा सकता है कि इन दोनों बस्तियों के करीब एक तिहाई परिवारों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं, कुछ एक की सालाना फीस एक लाख रुपये तक भी है। दो पहिया वाहन एक बड़े हिस्से के पास है। घरों में टीवी, फ्रीज, वाशिंग मशीन भी मौजूद हैं।

न केवल बस्तियों के बाहरी इलाके में बल्कि घरों के भीतर उन्नत स्तर की साफ-सफाई दिखी। घरों के दरवाजे-खिड़कियां, पर्दे और सोफे-कुर्सियों को देख कर लगा कि एक सापेक्षिक तौर पर अच्छे जीवन-स्तर के लोग रहते हैं लोग विशेषकर बच्चे-बच्चियां और महिलाएं स्वस्थ और सुंदर दिखे। कुपोषण और गरीबी के भयानक चिह्न नहीं दिखे, जो आमतौर पर दिल्ली की बहुलांश स्लम बस्तियों और गरीब-मेहनतकशों की बस्तियों में पाए जाते हैं। यह बस्ती दीन-हीन नहीं, बल्कि खुशहाल लोगों की बस्ती दिखी।

बस्ती के लोगों की बातों और परिवेश को देख-समझकर यह कोई अंदाज लगा सकता है कि यह बस्ती, जिसे स्लम बस्ती कहा जाता है, वह मध्यवर्गीय बस्ती जैसी क्यों है? लोगों का जीवन-स्तर सापेक्षिक तौर पर गुणवत्तापूर्ण क्यों है?

पहली बात यह कि यह बस्ती आजादी से पहले से आबाद है। 1950-55 तक इन बस्तियों ने पूरी शक्ल ले लिया था। करीब 80-85 वर्षों तक यहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी रहने के बाद लोग यह मान चुके थे कि यही उनका स्थायी घर है, वे यहां के स्थायी बाशिंदे हैं।  कोई व्यक्ति या समाज जैसे अपने-अपने स्थायी मुहल्ले और घर को संवारता है, यहां लोगों ने उसे धीरे-धीरे संवारा। दूसरी बात यह कि अन्य स्लम बस्तियों की तरह इसे हर साल रूटीन में एक बार उजाड़ने का कोई अभियान नहीं चलता था, जिससे लोगों को यह लगे कि उन्हें कभी भी उजाड़ा जा सकता है। 

तीसरी बात यह कि यहां एक के बाद एक केंद्र और दिल्ली में बनने वाली राज्य सरकारों ने यहां के निवासियों को जरूरी प्रमाण पत्र और सुविधाएं प्रदान की। भाई राम बस्ती में इंदिरा गांधी स्वयं आई थीं, वहां उन्होंने एक मंदिर को सोने का उपहार दान किया था। उस मंदिर के गेट पर इंदिरा गांधी के नाम की प्लेट और विवरण लिखा हुआ है। यहां सबके पास वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड और बिजली का बिल है। हर घर में बिजली का मीटर लगा है। पानी की टोटी पहुंची है। मकानों पर मकान का नंबर दर्ज है।

इन बस्तियों में सबसे अधिक सुविधा केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने प्रदान किया। यह नई दिल्ली विधान सभा में आता है, जहां से केजरीवाल लगातार शीला दीक्षित को हराने के बाद विधायक रहे। पिछले विधान सभा चुनाव में वे हार गए। आम आदमी पार्टी ने जितना संभव था, उतनी सुविधाएं इन बस्तियों में दिया। यहां तक कि कदम-कदम कैमरे भी लगवाए। सारी बस्ती को पक्के ईंटों का फर्श दिया। कई महिलाओं और युवाओं ने केजरीवाल के प्रति अपनी भावनाएं प्रकट करते हुए कहा कि “ केजरीवाल का राज तो अपना ही राज था।”

इन बस्तियों की खुशहाली और बेहतरी का चौथा कारण यह था कि इन बस्तियों के चारों-तरफ भारत के सबसे अमीर लोग रहते हैं। विशेषकर नौकरशाह, राजनेता, न्यायाधीश, सेना के शीर्ष अधिकारी और सेवा निवृत्त शीर्ष पदों पर रहने वाले लोग जैसे-राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति आदि। इसके चलते आस-पास सर्वोच्च स्तर की नागरिक सुविधाएं और सुरक्षा व्यवस्था है। इसके चलते लोगों के लिए रोजगार और स्व-रोजगार के अवसर हमेशा उपलब्ध रहे। रेस कोर्स होने के चलते घोड़ों और घोड़ों के मालिकों के लिए विभिन्न तरह की सेवाएं भी यहां के लोग देते हैं। घुड़दौड़ की प्रतियोगिता में यहां के लोग जॉकी (घुड़सवार) का काम भी करते हैं। 

यहां की महिलाएं अमीरों के घरों में किचन से लेकर साफ-सफाई तक की तमाम सेवाएं देती हैं। युवा ड्राइवर, इलेक्ट्रिशियन, सुरक्षा गार्ड, निजी सहायक (सेवक) आदि के रूप में सेवा देते हैं। स्वरोजार के रूप में युवक-युवतियां तमाम फास्ट फूड के ठेले-खोमचे लगाते हैं। कई सारे लोगों को आजादी के बाद सरकारी नौकरियां भी मिलीं। कुछ एक लोग सेना में भी हैं। उनकी नौकरियां और सेवाएं कुछ किलोमीटर के दायरे में ही हैं। शैक्षिक-सांस्कृतिक तौर पर यहां के लोगों का जीवन-स्तर पूरे परिवेश के चलते भी जागरूक और उन्नत है। कुल मिलाकर यहां के लोग एक खुशहाल वर्तमान के साथ बेहतर भविष्य के सपनों से लैस जीवन जी रहे थे। 

हां यह सच है कि इन बस्तियों को हमेशा स्लम बस्ती (जे. जे.क्लस्टर) का ही दर्जा प्राप्त रहा। अस्थाई कॉलोनियां या मुहल्ले। इन्हें दूसरी मंजिल बनाने का हक नहीं था। लेकिन निम्न तीन चीजों ने इन्हें करीब-करीब आश्वस्त कर दिया था कि वे यहां के स्थायी बाशिदें हैं, उन्हें कोई हटा नहीं सकता है-

1- पहली बात यह कि वे और उनके पुरखे यहां करीब 80-85 सालों से रह रहे हैं। करीब तीन-चार पीढ़ियां यहां रह चुकी हैं। इतने दिनों बाद इन्हें उजाड़ा नहीं जा सकता है। समय-समय पर इस संदर्भ में बने तमाम कानून और हाईकोर्टों-सुप्रीमकोर्ट के आदेश भी यही कहते हैं।

2-दूसरी बात यह कि दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनने और उसके लगातार जीतने की एक बड़ी वजह उनका यह नारा था कि- जहां झुग्गी वहीं मकान।” केजरीवाल और उनकी सरकार ऐसा कर तो नहीं पाई। हां उसने यह ज़रूर किया कि अधिकांश स्लम बस्तियों में बिजली, पानी, मेडिकल सुविधाएं और एक हद तक बेहतर स्कूल ज़रूर मुहैया करा दिया। इसके साथ हर साल स्लम बस्तियों को उजाड़ने और उनके फिर बसने के नियमित दस्तूर पर रोक ज़रूर लगा दिया। 

चूंकि यह तीनों स्लम कही जाने वाली बस्तियां (भाईराम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कैंप) केजरीवाल के विधान सभा क्षेत्र (नई दिल्ली) में थे और उनका इतिहास भिन्न था। उसके चलते यहां विशेष ध्यान दिया गया, जो इन कॉलोनियों में दिखता भी है और लोग केजरीवाल को इसका श्रेय भी देते हैं।

केजरीवाल इन तीनों कॉलोनियों को स्थायी निवास स्थान का दर्जा दे भी नहीं सकते थे, क्योंकि यह इस जमीन पर केंद्र सरकार की दावेदारी है। इस बार और इसके पहले अक्टूबर ( 2025) में इसे उजाड़ने का आदेश केंद्र सरकार के शहरी आवास और विकास मंत्रालय की ओर से ही जारी हुआ है। 

3- दिल्ली के लोकसभा और विधान सभा चुनावों के दौरान बार-बार स्वयं नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने यह नारा दिया कि- “जहां झुग्गी वहीं मकान।” दिल्ली की स्लम कॉलोनियों के लोगों ने भी इस पर विश्वास किया। उनके एक हिस्से ने भाजपा को वोट भी दिया। हालांकि लोग अपने घरों को उजाड़े जाने के आदेश के बाद पछताते हुए दिखे। पर ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।’

उपरोक्त तीनों चीजों ने मिलकर लोगों को आश्वस्त कर दिया था कि वे घर उनके हैं, जहां उनके दादा-दादी रहे हैं, यह घर उनके हैं, जहां उनके वे स्वयं या उनके पिता जन्म लिए हैं। वह मुहल्ला उनका है, जहां वे अन्य बच्चे-बच्चियों के साथ खेले-कूदे हैं, यह गलियां उनकी हैं, जहां-जहां उन्होंने दोस्तों के साथ उछल-कूद मचाई है। वे चौराहे उनके अपने हैं, जहां वे बैठकी करते हैं और करते रहे हैं। उन्हें जरा भी अहसास नहीं था कि उन्हें उजाड़ा जा सकता है, उनके उनके बाप-दादाओं के घर उनसे छीने जा सकते हैं, उनकी गलियों और उनके मुहल्ले से उन्हें बेदखल किया जा सकता है। उन दिवालों-छतों को तोड़ा जा सकता है, जिसमें उनकी सांसें बसती हैं, उन्हें वहां से भगाया जा सकता है, जहां उन्होंने जन्म लेने के बाद पहली किलकारी भरी। 

इन मुहल्ले या तथाकथित स्लम बस्तियों के बाशिंदों को यह पता नहीं था कि देश में आजादी का जो अमृतकाल आया है, वह सबके लिए अमृत नहीं लाया है, बहुतों के लिए विष (जहर) लेकर आया है। इस अमृत काल में दिल्ली के सबसे पॉश हिस्से में उनका रहना दिल्ली की शान-शौकत के खिलाफ है। यह उस इलाके में रह रहे बड़े लोगों की तौहीन है।

जहां वे रहते हैं, वह जमीन अरबों नहीं, खरबों की है। यहां आलीशान फ्लैट, मॉल, अमीरों के क्लब, ऐशगाह और गोल्फ सेंटर, स्वीमिंग फूल या ऐसा ही कुछ और बनना है। इन जमीनों पर बड़े बिल्डरों- पूंजी के मालिकों की निगाह है। यह एरिया देश के मालिकों का एरिया है। यहां भारत के औसत सामान्य नागरिक के लिए कोई जगह नहीं है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, इसकी इकोनॉमी को जल्द से जल्द पांच ट्रिलियन या दस ट्रिलियन या पंद्रह ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाना है। 

यह विकसित भारत और खूबसूरत दिल्ली का स्वप्न उनकी कुर्बानी मांग रहा है। उन्हें अपने पुरखों का घर छोड़कर इस अमृत काल के लिए कुर्बानी देनी चाहिए। जहां सरकार कहे वहां चले जाना चाहिए। यही देश हित है, यह राष्ट्रहित और यही उनका विकसित और भारत को विश्व गुरु बनाने में उनका योगदान होगा। उन्हें अपना घर, गलियां, मुहल्ला और सबसे बढ़कर अपनी रोजी-रोटी की रक्षा के लिए यहां रुकने की जिद नहीं करनी चाहिए।

यदि वह ऐसी जिद करेंगे, तो उन्हें देश हित में, राष्ट्रहित में और अमृकाल लाने के लिए बुलडोजर लगाकर तबाह कर दिया जाएगा, उजाड़ दिया जाएगा। उन्हें लाठियों-डंडों से पीटकर भगाया जाएगा। आंसू गैस के गोले छोड़े जाएंगे, पानी की बौछार की जाएगी। उन्होंने वर्षों की मेहनत से जिन चीजों को जुटाया है, उसे मलबे में बदल दिया जाएगा। जैसा कि पिछले कुछ एक वर्ष के भीतर ही दिल्ली की कई स्लम बस्तियों, अस्थाई या तथाकथित गैर-कानूनी कॉलोनियों के मामले में किया गया है।

तो क्या केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इन तीनों बस्तियों के लोगों को कोई विकल्प नहीं दिया है? विकल्प दिया गया है, इन बस्तियों के 712 घरों के लोगों को पुनर्वास लायक पाकर उनसे कहा गया है कि हम आपको दिल्ली में ही इन बस्तियों के घरों को खाली करने के बदले में आवास देंगे। यह आवास सावदा घेवरा में है।  

सावदा घेवरा उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित एक कॉलोनी है। इसे पुनर्वास कॉलोनी नाम दिया गया है। दिल्ली में जिन लोगों को उजाड़ा जाता है और जो कानूनी तौर पर पुनर्वास के अधिकारी होते हैं, उन्हें यहां भेजने के लिए यह कॉलोनी बनाई गई। यहीं इन तीनों बस्तियों के उन लोगों को सरकार भेजना चाह रही है, जो कानूनी तौर पर आवास के बदले में पुनर्वास पाने के अधिकारी हैं। पर जिन तर्कों के आधार पर पहले इस तरह के पुनर्वास की जगहों पर अधिकांश लोग नहीं गए, उन्हीं तर्कों के आधार पर यहां के लोग भी वहां जाना नहीं चाहते हैं। जनचौक की टीम जब दूसरे दिन वहां गई तो देखी कि प्रशासन की तीन बसें लोगों को सावदा घेवरा की वह कॉलोनी दिखाने ले गई। 95 प्रतिशत से अधिक लोगों को वह जगह बिल्कुल ही पसंद नहीं आई।

पहला सबसे बड़ा कारण तो यह है कि लोगों की रोजी-रोटी यानी जीविकोपार्जन का है। सावदा घेवरा इन बस्तियों से 45 किलोमीटर दूर है। अधिकांश लोगों की नौकरी, स्व-रोजगार और जीविकोपार्जन अन्य काम आस-पास के दो-तीन या पांच-दस किलोमीटर के अंदर हैं। जहां वे कम खर्चे में और आसानी से जा सकते हैं और शाम को लौट सकते हैं। सावदा घेवरा जाने के बाद रोज करीब 90 किलोमीटर आ-जाकर ही वे अपने काम को जारी रख सकते हैं, जो अधिकांश लोगों के लिए बिल्कुल ही संभव नहीं है।  

इन बस्तियों की बहुत सारी महिलाएं आसपास के घरों में खाना बनाने से लेकर साफ-सफाई आदि का काम करती हैं। उनका काम पूरी तरह छूट जाएगा। इन महिलाओं को अपने निजी घरेलू जरूरी कामों को पूरा करके काम पर जाना होता है, ऐसा इतनी दूर आ- जाकर संभव नहीं है। इसके अलावा इन कामों से इतना नहीं मिलता है कि वे इतनी दूरी का किराया चुका सकें। तीसरी बात यह कि आठ से 12 घंटे काम करके फिर रोज 90 किलोमीटर आना-जाना असंभव सा है। यही हाल अधिकांश पुरुषों के कामों का भी है। स्व-रोजगार में लगे लोगों के लिए भी संभव नहीं है। जहां इन्हें बसने के लिए भेजा जा रहा है, वह दिल्ली का एक कमोबेश ग्रामीण इलाका है, जहां इस तरह के न काम हैं, न स्व-रोजगार की गुंजाइश।

सावदा घेवरा न जाने का दूसरा कारण यह है कि इन लोगों को इस इलाके में सापेक्षिक तौर पर अच्छे सरकारी स्कूल, अस्पताल, पार्क और अन्य सरकारी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो सावदा घेवरा में नदारद हैं। जो लोग प्राइवेट स्कूलों या अस्पतालों में इलाज कराने की क्षमता रखते हैं, वह सुविधा भी वहां उपलब्ध नहीं है।

तीसरी बात यह कि सावदा घेवरा का इलाका इस इलाके की तुलना में ज्यादा असुरक्षित है। यह तीनों कॉलोनियां, जैसा कि ऊपर जिक्र किया जा चुका है कि दिल्ली के सबसे विकसित पॉश एरिया के बीच हैं। जहां सुरक्षा इतनी चाक-चौबंद है कि लोग यहां अपने को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करते हैं। इन बस्तियों की लड़कियां-महिलाएं बार-बार इस सुरक्षा की चर्चा कर रही थीं। वे बार-बार इस बात को रेखांकित कर रही थीं कि यहां कोई लड़की दो बजे रात को भी आराम से आ-जा सकती है, कोई डर-भय नहीं होता। यहां तक कि इन तीनों मुहल्लों में पग-पग पर कैमरे लगे हैं। 

इन तीनों बस्तियों को उजाड़ने का आदेश यदि लागू हो गया और उन्हें उजाड़ दिया गया तो सिर्फ हजार या बारह सौ घर नहीं उजड़ेंगे। सापेक्षिक तौर पर बेहतर जिंदगी जी रहे लोगों को एक ऐसी जगह ठेल दिया जाएगा, जहां उनके लिए न रोजगार है, न जिंदगी की बुनियादी सुविधाएं। अमृतकाल के नाम पर देश के छोटे से हिस्से को अमृत दिया जा रहा है, तो एक बड़े हिस्से को विष परोसा जा रहा है। जैसे समुद्र मंथन में देवताओं को विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर छल से अमृत दिया और असुरों के हिस्से विष आया। वही आज खुद को विष्णु का अवतार (नॉन-वायोलॉजिकल मैन) मानने वाले कर रहे हैं।

एक नागरिक के तौर क्या हम इन बस्तियों के लोगों की जिंदगी और सपनों को उजाड़ने से बचा सकते हैं? हां यदि हम चाहें तो यह कर सकते हैं। बस इनके साथ एक बार खड़ा होने का संकल्प और निर्णय तो लें। 

(डॉ. सिद्धार्थ की ग्राउंड रिपोर्ट।)

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