उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे को लेकर कयासों का बाजार गर्म है। लेकिन अभी तक कोई किसी पुख्ता नतीजे पर नहीं पहुंच सका है। एक बात तो बिल्कुल तय है कि धनखड़ साहब ने अपने से यह इस्तीफा नहीं दिया है। और इसके पीछे दिया गया उनका स्वास्थ्य का कारण भी सही बात नहीं है। यानि धनखड़ साहब ने व्यक्तिगत मजबूरियों और परेशानियों के चलते यह इस्तीफा नहीं दिया है। वह किसी भी अपमान को सहते हुए कुर्सी से चिपके रहने वाले जीव हैं। और उनकी चमड़ी बहुत मोटी है। और वैसे भी जो शख्स किसी दूसरे का जिस हद तक अपमान करने के लिए तैयार रहता है उसमें खुद भी उतना सहने की क्षमता होती है।
तब ऐसे में सवाल उठता है कि वह कौन कारण है जिसके चलते उन्हें आखिर इस्तीफा देना पड़ा। इसको लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर सड़कों तक पर अटकलें लगायी जा रही हैं। सत्ता पक्ष की तरफ से इस मसले पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आयी हैं उससे रहस्य और गहराता जा रहा है। अगर पूरे घटनाक्रम पर एकबारगी नजर डालें तो पहले सोमवार को शाम को अचानक यह खबर फ्लैश हुई कि उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों से अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
फिर उसके अगले दिन दोपहर जब तक राज्यसभा के भीतर घनश्याम तिवाड़ी ने पीठासीन के पद से गृहमंत्रालय के उस वक्तव्य को नहीं पढ़ दिया जिसमें बताया गया था कि उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे को राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया है, तब तक सत्ता पक्ष के किसी शख्स का वह मंत्री हो या कि सांसद कोई एक बयान तक नहीं आया। मानो सत्ता के गलियारे में सांप सूंघ गया हो। इस बीच कोई सांसद या फिर कोई मंत्री न तो धनखड़ की खबर लेना जरूरी समझा और न ही उन्हें स्वास्थ्य संबंधी शुभकामना दिया। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस्तीफे की वापसी के लिए न तो पीएम मोदी, न गृहमंत्री अमित शाह और न ही रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जैसे वरिष्ठ मंत्रियों ने उन्हें मनाने की कोई कोशिश की।
चुपचाप उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। अगर वह स्वास्थ्य या फिर किसी निजी कारण से इस्तीफा दिए होते तो स्वाभाविक तौर पर सत्ता पक्ष के लोग उनके पास जाते और उनकी स्थितियों को समझने और फिर उसके मुताबिक फैसला लेने में उनकी मदद करते। लेकिन चूंकि ऐसा कुछ था नहीं इसलिए ऐसा कुछ हुआ भी नहीं। किसी एक मंत्री का भी इस्तीफा वापस लेने के अनुरोध संबंधी बयान सामने नहीं आया।
और न ही कोई उनके आवास पर जाकर उनकी खोज-खबर लेने और उन्हें मनाने की कोशिश की। ऐसे में यह बात बिल्कुल तय हो जाती है कि यह इस्तीफा उनकी मर्जी से नहीं हुआ है। बल्कि उनको ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया है। और ऐसा कौन कर सकता है? इसको जानना किसी अलजबरा को हल करने जैसा नहीं है। हां तो इसके पीछे कारण क्या हो सकता है इसकी तलाश बहुत जरूरी हो जाती है। अब तमाम लोग इसका अलग-अलग कारण बता रहे हैं। लेकिन किसी एक पर आम सहमति नहीं बन पा रही है। उनमें से कुछ पर आइये गौर फरमाते हैं।
सोशल मीडिया पर एक क्लिप घूम रही है जिसमें एक मंच से उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भाषण दे रहे हैं और उसी मंच पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान बैठे हैं। धनखड़ बिल्कुल जाट वाले अंदाज में शिवराज सिंह चौहान को निर्देश देते दिख रहे हैं। जिसमें वह कहते हैं कि शिवराज जी किसानों की मांगें लगातार लंबित हैं वो लगातार आंदोलन कर रहे हैं लेकिन पूरी नहीं हो पा रही हैं। आप समय निर्धारित करिए और उसके भीतर उनकी समस्याओं को हल करिए। मंच से यह कृषि मंत्री को एक तरह का निर्देश जैसा दिखता है। किसानों के मामले में सरकार का नजरिया बिल्कुल तय है। वह किसी भी रूप में कॉरपोरेट को खेती में ले आना चाहती है ऐसे में किसानों की मांगों को मानने का मतलब है कि अपनी उस नीति से पीछे हटना। यानि उपराष्ट्रपति की यह पहल सरकार की नीतिगत स्थिति में हस्तक्षेप जैसा था। और भला केंद्र में बैठा वह शख्स जिसके इशारे पर चीजें चलती हैं इसको कैसे बर्दाश्त कर सकता था।
धनखड़ जी अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं। और सरकार तथा खासकर पीएम मोदी की मालिशगिरी में वह किसी भी हद तक जा सकते थे। पीएम मोदी के साथ सामने आयीं उनकी कई तस्वीरें उसकी खुली बयानी हैं। उसी कड़ी में एक बार उन्होंने अपनी लक्ष्मणरेखा भी क्रास कर दी। जब उप राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद की गरिमा को तार-तार करते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर हमला कर दिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर न केवल भ्रष्टाचार का आरोप लगाया बल्कि जस्टिस यशवंत वर्मा वाले मामले में सवाल उठाया कि उनके घर से नोट बरामद होने के बाद उनके खिलाफ आखिर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गयी? और इसी तरह से एक और मौके पर वह सुप्रीम कोर्ट की घेरेबंदी से बाज नहीं आए थे। जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों और राष्ट्रपतियों के लिए किसी बिल पर फैसला लेने के लिए समय सीमा निर्धारित करने की बात कही थी। तब धनखड़ ने कहा था कि भला राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट निर्देश कैसे दे सकता है?
इसी तरह का एक और मामला सामने आया है जिसमें कहा जा रहा है कि धनखड़ ने बीजेपी हाईकमान की नाराजगी मोल ले ली। वह है जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ विपक्ष द्वारा दायर महाभियोग प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का मामला। आपको याद होगा इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश शेखर यादव ने न केवल विश्व हिंदू परिषद का मंच शेयर किया बल्कि उस मंच से उन्होंने घोर सांप्रदायिक भाषण दिया जो न तो किसी जज की गरिमा के अनुरूप था और न ही सभ्य समाज में उसकी कोई जगह थी। सुप्रीम कोर्ट ने उस भाषण का संज्ञान जरूर लिया और जांच भी बैठायी लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिफर रहा। मामले को विपक्ष ने उठाया और उसने उनके खिलाफ संसद में महाभियोग चलाने का प्रस्ताव दे दिया। जिस पर कई विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर भी कर दिए।
इस बीच जस्टिस वर्मा के मामले में पक्ष और विपक्ष की सहमति के साथ जब महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी। इसी बीच जस्टिस शेखर यादव के मामले में एक सांसद के हस्ताक्षर को लेकर विवाद था जिसमें धनखड़ का यह बयान आया कि उस हस्ताक्षर की जांच कर ली गयी है और वह सही पाया गया है और शेखर यादव के मामले को भी जस्टिस वर्मा के साथ आगे बढ़ा दिया जाएगा। यह सत्ता पक्ष को किसी भी कीमत पर गंवारा नहीं था। क्योंकि उसे न्यायपालिका में हजारों शेखर चाहिए जो ये बातें खुल कर न केवल कह सकें बल्कि उसी के आधार पर फैसले दें। ऐसे में यह सत्ता पक्ष को भला कहां बर्दाश्त था।
इसी मामले में सत्ता पक्ष और उपराष्ट्रपति के बीच एक और मतभेद उभरा जो इस्तीफे में निर्णायक साबित हुआ। बताया जाता है कि वर्मा के महाभियोग का प्रस्ताव सत्ता पक्ष सबसे पहले लोकसभा में पेश करना चाहता था। लेकिन धनखड़ ने सत्ता पक्ष को बगैर विश्वास में लिए इस पर विपक्ष के प्रस्ताव को राज्यसभा में पेश करने का फैसला कर लिया। जिससे सत्ता पक्ष उनसे बहुत नाराज हो गया। टेलीग्राफ की रिपोर्ट को मानें जो उसने मंत्रियों के हवाले से प्रकाशित की है, मंत्रियों और धनखड़ के बीच इसको लेकर कई बार झड़प हो गयी।
इसी तरह का एक और मामला गिनाया जा रहा है जिसमें राज्यसभा टेलीविजन के 200 से ज्यादा कर्मचारियों का मामला है। बताया जा रहा है कि उनके साथ बैठक कर उप राष्ट्रपति धनखड़ ने उनकी समस्याओं को हल करने का कुछ आश्वासन दिया था लेकिन वह पूरा नहीं हो सका। नतीजतन इस बीच सारे कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे थे। और अगर उप राष्ट्रपति के खिलाफ कोई मामला कोर्ट चला जाता तो यह सरकार के लिए बेहद शर्मिंदगी की बात होती।
लेकिन कहा जा रहा है कि उनके इस्तीफे के लिए जो बात निर्णायक साबित हुई वह राज्यसभा में आपरेशन सिंदूर पर बहस का उनका दिया गया फैसला है। दरअसल पीएम मोदी और सरकार इस सत्र को ‘विजय सत्र’ के तौर पर पेश करना चाहते थे। यानि पाकिस्तान पर भारत की विजय का सत्र। और इस बात को पीएम मोदी ने सत्र शुरू होने से पहले संसद परिसर में पत्रकारों के सामने भी कही थी। उन्होंने कहा था कि यह सत्र विजय सत्र है। हमारे सैनिकों ने पाकिस्तान पर जीत का जो बहादुराना प्रदर्शन किया है उसको संसद को भी सेलिब्रेट करना चाहिए। लेकिन सत्र के पहले ही दिन उप राष्ट्रपति धनखड़ पीएम मोदी के इन मंसूबों पर पानी फेरते दिखे।
सदन के भीतर विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे जब बोलने के लिए खड़े हुए तो एकबारगी धनखड़ उन्हें बोलने ही नहीं दे रहे थे लेकिन जब उन्होंने आपरेशन सिंदूर और उसमें ट्रम्प के हस्तक्षेप से लेकर तमाम कमियों को गिनाने की कोशिश की तो धनखड़ ने कहा कि इस मसले पर तो अलग से बहस रखी गयी है और उसमें आप जितना चाहे बोल सकते हैं। बताया जा रहा है कि उप राष्ट्रपति ने इसके लिए तकरीबन 22 घंटे मुकर्रर किए थे। अब अगर संसद के भीतर आपरेशन सिंदूर पर बहस हो जाती और उसमें ट्रम्प के हस्तक्षेप से लेकर विमानों के गिराए जाने तक की बातें बार-बार की जातीं और इस तरह से अभी तक सत्ता पक्ष जो बातें छुपाने की कोशिश कर रहा है वह खुलकर देश के सामने आ जाता तो फिर मोदी जी के मानसून सत्र को विजय सत्र के तौर पर पेश करने के मंसूबों का क्या होता?
सत्ता पक्ष की धज्जियां उड़ रही होंती क्योंकि विपक्ष के तमाम सवालों का उसके पास कोई जवाब नहीं होता। ऊपर से इस सत्र के कुछ दिनों बाद ही बिहार चुनाव है जिसकी सारी पार्टियां तैयारी कर रही हैं। और सत्ता पक्ष तो इस तैयारी में चुनाव आयोग तक को लगा दिया है। अगर बिहार चुनाव सत्ता पक्ष के लिए इतना जरूरी है तो फिर भला इस तरह का कोई रिस्क वह संसद में कैसे ले सकता था जो उसके चुनाव को नकारात्मक तरीके से प्रभावित कर दे।
बताते हैं कि उप राष्ट्रपति का यह फैसला बीजेपी हाईकमान को नागवार गुजरा और फिर यहीं से धनखड़ साहब की उल्टी गिनती शुरू हो गयी। और सांकेतिक तौर पर ही सही खड़गे के बोलने के बाद सदन में सत्ता पक्ष के नेता जेपी नड्डा ने जब विपक्ष को इंगित करते हुए यह कहा कि ‘नथिंग इज गोइंग ऑन रिकॉर्ड आप बोलते रहिए’। वह अपने तरीके से चेयर की भूमिका की समाप्ति की घोषणा थी। यानि धनखड़ साहब आपका अब कोई काम नहीं है। फिर उस घटना से लेकर शाम तक बताया जा रहा है कि धनखड़ साहब का सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा कई बार अपमान किया गया।
चार बजे विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक के बाद छह बजे जब बिजनस एडवाइजरी कमेटी की बैठक हुई तो उसमें राज्यसभा में सत्ता पक्ष के नेता जेपी नड्डा और संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू नदारद थे। यह उपराष्ट्रपति का खुला अपमान था। और अपने तरीके से उनके एग्जिट का संकेत। बताया जाता है कि उसी शाम धनखड़ ने पीएम मोदी से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। इन सारी परिस्थितियों ने उन्हें बता दिया कि आखिर बीजेपी हाईकमान उनसे क्या चाहता है? और उपराष्ट्रपति जी पेशे से वकील रहे हैं हालांकि उनकी चमड़ी मोटी है बावजूद इसके वह इस्तीफे के लिए तैयार हो गए। क्योंकि उन्हें पता था कि जल में रहकर मगर से बैर नहीं किया जा सकता है। एक संवैधानिक पद पर रहते हुए उन्होंने जिस तरह से संवैधानिक मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाई हैं देश में उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मलेगी। आगे इस पर विस्तार से लिखने की इच्छा थी लेकिन लेख बेहद लंबा हो जाएगा इसलिए इसको यहीं विराम देते हैं।
(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)