साहित्यकारों का सत्ता विमर्श

साहित्य और सत्ता का संबंध हमेशा जटिल, बहुस्तरीय और कभी-कभी विरोधाभासी रहा है। साहित्यकार, जो मूलतः समाज की संवेदनशील चेतना का प्रतिनिधि होता है, सत्ता के सामने खड़ा होकर प्रश्न भी करता है और कभी-कभी उसी सत्ता के आख्यानों में शामिल भी हो जाता है। यही द्वंद्व “सत्ता विमर्श” को जन्म देता है।

सत्ता केवल राजनीतिक संरचना नहीं है; वह संस्कृति, भाषा, इतिहास और स्मृति पर भी नियंत्रण स्थापित करती है। मिशेल फूको ने सत्ता को एक ऐसे जाल के रूप में देखा, जो हर सामाजिक संबंध में व्याप्त होती है। इस दृष्टि से साहित्य केवल सत्ता का प्रतिरोध नहीं करता, बल्कि कई बार अनजाने में उसका पुनरुत्पादन भी करता है।

हिंदी साहित्य में यह विमर्श विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देता है। रामधारी सिंह दिनकर की कविता में सत्ता के प्रति आकर्षण और प्रतिरोध दोनों मिलते हैं—वे राष्ट्रवादी ऊर्जा के कवि हैं, लेकिन “परशुराम की प्रतीक्षा” जैसी रचनाओं में वे सत्ता के दमनकारी रूप की आलोचना भी करते हैं। इसी तरह नागार्जुन ने सत्ता के विरुद्ध सबसे तीखा व्यंग्य रचा—उनकी कविताएँ सीधे-सीधे शासकों को कटघरे में खड़ा करती हैं।

धूमिल का काव्य सत्ता विमर्श का एक निर्णायक पड़ाव है। उनकी पंक्तियाँ—“क्या आज़ादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है?”—सत्ता के प्रतीकों और वास्तविकता के बीच की खाई को उजागर करती हैं। धूमिल के यहाँ भाषा भी एक राजनीतिक उपकरण बन जाती है, जो सत्ता के छल को बेनकाब करती है।

वहीं महाश्वेता देवी जैसी लेखिकाओं ने हाशिए के समाजों की आवाज़ बनकर सत्ता के संरचनात्मक हिंसा को उजागर किया। उनके साहित्य में सत्ता केवल सरकार नहीं, बल्कि वह सामाजिक व्यवस्था है, जो आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों को हाशिए पर रखती है।

समकालीन दौर में सत्ता विमर्श और भी पेचीदा हो गया है। आज साहित्यकार केवल राज्यसत्ता से नहीं, बल्कि कॉरपोरेट सत्ता, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से भी जूझ रहा है। ऐसे में साहित्यकार की स्वतंत्रता पर नए प्रकार के दबाव उत्पन्न होते हैं—प्रत्यक्ष सेंसरशिप से लेकर अप्रत्यक्ष बहिष्कार तक।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है—क्या साहित्यकार को पूरी तरह “सत्ता-विरोधी” होना चाहिए? या क्या वह सत्ता के साथ संवाद करते हुए भी अपनी स्वतंत्रता बनाए रख सकता है? दरअसल, साहित्यकार का दायित्व किसी एक खेमे में खड़े होना नहीं, बल्कि सत्य के पक्ष में खड़ा होना है। यदि सत्ता न्यायपूर्ण है, तो उसका समर्थन भी साहित्य का हिस्सा हो सकता है; लेकिन जब सत्ता अन्यायपूर्ण हो, तब साहित्य का मौन रहना उसके अस्तित्व के विरुद्ध होगा।

अंततः, सत्ता विमर्श में साहित्यकार की भूमिका एक “वाचक” से अधिक एक “साक्षी” की होती है—वह समय की गवाही देता है। वह उन आवाज़ों को शब्द देता है, जिन्हें सत्ता दबा देती है। और यही कारण है कि सच्चा साहित्य हमेशा असुविधाजनक होता है—क्योंकि वह प्रश्न करता है, और प्रश्न सत्ता को सबसे अधिक असहज करते हैं।

इसलिए साहित्यकार का सत्ता विमर्श केवल विरोध या समर्थन नहीं, बल्कि एक सतत जागरूकता है—जहाँ वह हर प्रकार की सत्ता के प्रति सजग, आलोचनात्मक और मानवीय दृष्टि बनाए रखता है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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