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Saturday, September 25, 2021

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सुप्रीम कोर्ट में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित 2,879 याचिकाएं लंबित: सरकार

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सुप्रीम कोर्ट ने नवम्बर 2020 में देशभर के हाईकोर्ट को रिमाइंडर जारी करके कहा था कि फैसलों में देरी अनुच्छेद-21 के तहत संविधान में मिले जीवन के मूल अधिकार का उल्लंघन है। न्यायिक अनुशासन के लिए निर्णय लेने में तत्परता की जरूरत होती है। इसे बार-बार कहा भी गया है। समस्या तब है जब नतीजा पता हो लेकिन कारण नहीं। यह किसी पीड़ित को न्याय पाने के अवसर से वंचित करता है। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच के फैसले खिलाफ दायर याचिका पर यह फैसला दिया। इसके बरअक्स उच्चतम न्यायालय में केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित 2,879 याचिकाएं लंबित हैं। यह जानकारी मोदी सरकार ने राज्यसभा में दी है।

केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में राज्यसभा को यह जानकारी दी कि वर्ष 2019 से लेकर इस वर्ष 23 जुलाई तक उच्चतम न्यायालय में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित कुल 3,036 जनहित याचिकाएं दायर की गयीं और इसी अवधि के दौरान इससे संबंधित लंबित मामलों की संख्या 2,879 है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित 1,176 मामले उच्चतम न्यायालय में दायर किए गए जबकि 2020 में यह संख्या बढ़कर 1,319 हो गई। इस साल 23 जुलाई तक कुल 541 ऐसे मामले दायर किए गए हैं।

विगत दो वर्ष और चालू वर्ष के दौरान लंबित याचिकाओं के बार में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय में 23 जुलाई तक मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित लंबित मामलों की कुल संख्या 2,879 है। देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित दायर मामलों के मामले में उड़ीसा सबसे आगे है। जहां 2019 से लेकर अब तक कुल 1,552 याचिकाएं दायर की गई हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का नंबर आता है। जहां इसी अवधि में अभी तक कुल 1,487 याचिकाएं दायर की गई हैं। इस मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय तीसरे स्थान पर है। यहां अब तक 1,479 याचिकाएं दायर की गई हैं।

रिजिजू के मुताबिक कलकत्ता उच्च न्यायालय में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित 204 याचिकाएं, छत्तीसगढ़ में 06, गुवाहाटी में 165, गुजरात में 77, आंध्र प्रदेश में 646, झारखंड में 71, मद्रास उच्च न्यायालय में 12, मणिपुर में 141, मेघालय में 13, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में 587, राजस्थान उच्च न्यायालय में 631, त्रिपुरा में 44 तेलंगाना में 30 और उत्तराखंड में 555 याचिकाएं दायर की गई हैं। केंद्रीय मंत्री के अनुसार मुंबई, इलाहाबाद, दिल्ली, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर सहित कुछ उच्च न्यायालयों ने बताया है कि ऐसी जनहित याचिकाओं के बारे में अलग से कोई जानकारी नहीं रखी जाती।

वर्ष 2019 से लेकर अब तक विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित जनहित याचिकाओं के बारे में पूछे जाने पर रिजिजू ने बताया कि ऐसे सर्वाधिक मामले उड़ीसा उच्च न्यायालय में हैं। यहां लंबित जनहित मामलों की संख्या 7,802 है। मद्रास उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिकाओं की कुल संख्या 5,698 है जबकि राजस्थान में ऐसे मामलों की संख्या 2,750 है।

गौरतलब है कि पहले से ही देश में पेंडिंग केस की संख्या अदालतों में काफी है, वहीं अब कोरोना की वजह से इसकी संख्या और भी ज्यादा बढ़ गई है। देश में पेडिंग केस की संख्या 4.4 करोड़ के पार चली गई है। लंबित मामलों की यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर लोअर कोर्ट सभी जगहों पर पेडिंग केस की संख्या बढ़ी है। पिछले साल मार्च के मुकाबले इस साल संख्या 19 प्रतिशत तक बढ़ी है। पिछले साल जब मार्च के महीने में लॉकडाउन की घोषणा हुई उसके बाद जरूरी मुकदमों की सुनवाई सिर्फ ऑनलाइन हुई।

इस बीच पहले से कोर्ट में लंबित मामलों में 70 लाख से ज्यादा केस और जुड़ गए। मार्च 2020 में पेंडिंग केस की संख्या 3.68 करोड़ थी। न्यायालय में लंबित मामले कोई नई बात नहीं है लेकिन इतनी संख्या में और अधिक जुड़ जाने के बाद चुनौती और बढ़ जाएगी। भारतीय न्याय प्रणाली के सामने यह एक नई चुनौती है।

कोरोना के कारण जो चुनौती उभरी है उसमें डिजिटिल को ओर बढ़ने की चुनौती है। वर्तमान स्थिति जो है उसके बाद जजों के खाली पद उससे चिंता और बढ़ी है। देश के 25 हाईकोर्ट में 400 से ज्यादा जजों के पद खाली हैं। वहीं निचली अदालतों में 05 हजार से ज्यादा जजों के पद खाली हैं।

नीति आयोग की ओर से 2018 में कहा गया था कि मामलों के निपटाने की जो रफ्तार है उस हिसाब से बैकलॉग क्लियर करने में 324 साल लग जाएंगे। यह उस वक्त कहा गया था जब पेंडिंग केस की संख्या 2.9 करोड़ के पास थी। कोरोना के बाद स्थिति और भी खराब हो गई है।

30 साल से अधिक पुराने मामलों की सुनवाई वाले केस में 61 फीसदी की बढ़ोत्तरी पिछले दो साल में देखने को मिली है। दिसंबर 2018 में 65 हजार 695 केस थे वहीं जनवरी 2021 में ऐसे मुकदमों की संख्या बढ़कर 01लाख 5 हजार 560 हो गई।

-वरिष्ठ पत्रकार जे पी सिंह की रिपोर्ट

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