Monday, December 5, 2022

गुजरात: चुनाव से पहले ही सिद्ध हो गया कि भाजपा की B टीम है एआईएमआईएम

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अहमदाबाद। गुजरात चुनाव के शोर में बिहार की गोपालगंज विधानसभा उपचुनाव के परिणाम से यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या एआईएमआईएम मात्र भाजपा को फायदा पहुंचाने वाली राजनीति कर रही है। क्योंकि ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार अब्दुस्सलाम को गोपालगंज में 12212 वोट मिलते हैं। लेकिन भाजपा उम्मीदवार कुसुम देवी मात्र 1789 वोट से विजयी हो जाती हैं। 8854 वोट बीएसपी को भी मिलते हैं। बीएसपी और एआईएमआईएम मिलकर यादव और मुस्लिम वोट में सेंध मारी करते हैं जो आरजेडी का परंपरागत वोट है।

बीजेपी के शक्तिशाली होने का यह भी एक कारण है। बीजेपी अपने वोटों को एकजुट करने के साथ विपक्षी दल के वोटों को बिखेरने का हुनर भी जानती है। बीजेपी के सत्ता में लगातार बने रहने से यादवों को उतना फर्क नहीं पड़ता है जितना मुसलमानों को। यूनाइटेड नेशन भी मानता है कि भाजपा के शासनकाल में मुसलमानों के साथ भेदभाव और प्रताड़ना बढ़ी है। लेकिन असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों की प्रताड़ना और भेदभाव को एक मौके के तौर पर देखते हैं।

जस्टिस राजेंद्र सच्चर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मुसलमान आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति से भी पिछड़ा है। 2011 की जन गणना के अनुसार मुस्लिमों की भारत में जन संख्या 14.2% है। Pew Research centre के अनुसार 2020 में मुसलमानों की भारत में जन संख्या 15.5%  हो गई है। विश्व की कुल मुस्लिम जनसंख्या का 10.9% मुस्लिम  आबादी भारत में ही रहती है। देश का 47% मुसलमान उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में ही रहता है। ऐसे तो इतनी बड़ी आबादी की नुमाइंदगी के लिए छोटे बड़े नेता हर राज्य में मिल जायेंगे। उदाहरण के तौर पर असम में बदरुद्दीन अजमल , उत्तर प्रदेश में आजम खान , बिहार में अख्तरुल ईमान और पसमांदा मुस्लिम नेता अली अनवर अंसारी , पश्चिम बंगाल में मोहम्मद सलीम , महाराष्ट्र में इम्तियाज जलील ,नवाब मलिक और अबू आसिम आज़मी,केरला में मुस्लिम लीग का थंगल परिवार इत्यादि। इनमें कोई भी नेता ऐसा नहीं है। जिसे पूरे भारत के मुसलमान या अधिकतर मुसलमान अपना नेता मानते हों।

2014 से थोड़ा पहले अथवा बाद में मात्र असदुद्दीन ओवैसी ऐसे नेता उभरे हैं। जिसे भारत के मुसलमानों ने बड़ी उम्मीद से देखा , चाहा और लाड़ किया। मौलाना अबुल कलाम आजाद के बाद ओवैसी को जो प्रसिद्धि मिली वह आजाद भारत में किसी को नहीं मिली। आज भी ओवैसी को सुनने और देखने के लिए हज़ारों की भीड़ जुटती है। जिस नेता को हजारों की भीड़ सुनने और पास से देखने के लिए मुस्लिम युवा पागल हों उसे मुसलमान वोट क्यों नहीं करता। उत्तर प्रदेश में लगभग 4 करोड़ मुसलमान रहते हैं।

उत्तर प्रदेश और बंगाल में ओवैसी के नाम से भीड़ जुटी लेकिन वोट नहीं दिया।

2017 यूपी विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिसे इत्तिहादिल मुस्लेमीन से 38 उम्मीदवार चुनाव में उतरते हैं। ओवैसी की पार्टी को शून्य सीट और लगभग 2 लाख वोट (0.20%) मिलते हैं। 2022 में ओवैसी की पार्टी यूपी विधानसभा की 97 सीटों से चुनाव लड़ती है। मात्र 1 सीट छोड़ कर ओवैसी का कोई भी उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा पाता है। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में अख्तरुल ईमान की अगुवाई में 20 सीटों पर एआईएमआईएम चुनाव लड़ती है।

ओवैसी हेलीकॉप्टर से मुस्लिम बहुल सीमांचल के इलाकों में धुंआधार प्रचार करते हैं। ओवैसी 20 में से 5 को विजयी बनाने में सफल होते हैं। लेकिन 1 साल बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में ओवैसी मुस्लिम बहुल 7 सीटों से अपने उम्मीदवार उतारते हैं। लेकिन ओवैसी का कोई भी उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाता है। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में ओवैसी दिनाकरन की पार्टी AMMK के साथ गठबंधन कर तीन सीटों पर चुनाव लड़ते हैं। परंतु एक सीट पर भी सफलता नहीं मिलती है।

CAA-NRC आंदोलन से ओवैसी को नगर निगम चुनाव में फायदा हुआ विधानसभा में खुल गई पोल

इस समय असदुद्दीन ओवैसी गुजरात विधानसभा में अपनी पार्टी के प्रचार में व्यस्त हैं। 2021 में एआईएमआईएम ने गुजरात की अहमदाबाद नगर पालिका, गोधरा और डीसा नगर पालिका चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे थे। एआईएमआईएम के अहमदाबाद और गोधरा से सात सात पार्षद , डीसा से 9 पार्षद विजयी हुए थे। नगर पालिका चुनाव में ओवैसी ने तीन जन सभाएं की थी। एक जनसभा अहमदाबाद में , दूसरी उत्तर गुजरात और तीसरी जन सभा गोधरा में की थी। ओवैसी के गुजरात प्रवेश से पहले अहमदाबाद के मुसलमानों ने नागरिकता कानून के खिलाफ कई बड़े आंदोलन किए थे। अहमदाबाद के अजीत मील में दिल्ली के शाहीन बाग के समर्थन में शाहीन बाग बनाया गया था। जिसकी तीव्रता को पूरे गुजरात के मुसलमान महसूस कर रहे थे।

CAA-NRC को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों से गुजराती मुसलमान नाराज़ थे। जिसका लाभ असदुद्दीन ओवैसी को 2021 नगर निगम चुनाव में मिला। एक वर्ष के अंतराल में एआईएमआईएम की कलई खुल गई। अब नहीं लगता है कि ओवैसी 2022 विधान सभा चुनाव में कोई भी चमत्कार दिखा पाएंगे। अब सवाल यही उठता है। कि जब ओवैसी को हजारों की संख्या में लोग सुनते हैं लाइव टेलीकास्ट में यह संख्या लाखों में पहुंच जाती है। फिर भी पोलिंग के दिन यही मुसलमान ओवैसी को भाजपा का दलाल कहते हुए वोट नहीं करता है।

क्या ओवैसी भाजपा की B टीम हैं ?

लोकतंत्र में सभी राजनैतिक दलों को अपने उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारने तथा उसके लिए प्रचार का पूरा अधिकार है। जब एक बड़ी पार्टी को जिताने के लिए छोटी पार्टी एक बड़ी पार्टी से साठगांठ कर किसी बड़ी पार्टी के उम्मीदवार को वोट कटुआ बनकर जिताए तो वोट कटुआ पार्टी को B टीम कहते हैं। या किसी बड़े दल से अंदुरूनी साठ गांठ करे।

राजनैतिक सूझबूझ वाले लोग तंज़ में कहते हैं। ओवैसी से समझदार उसका वोटर है। जो ओवैसी को अपना नेता मानता है। लेकिन चुनाव के दिन भाजपा के खिलाफ मजबूती से लड़ने वाले उम्मीदवार के साथ हो जाता है। मुसलमानों को शक है कि ओवैसी बीजेपी के एजेंट हैं। राजनैतिक दल ओवैसी को भाजपा की B टीम कहते तो आए हैं। लेकिन अधिकतर दल पुख्ता सुबूत देने में असफल रहे हैं। लेकिन तर्क मजबूती से देते हैं।

दूसरी तरफ ओवैसी भी ऐसा कोई ठोस सुबूत नहीं दे पाते हैं कि भाजपा की B टीम नहीं हैं ओवैसी मुसलमानों के जज़्बात से खेलने का हुनर जानते हैं। यही इनकी ताकत है। गुजरात प्रवेश से पहले भी ओवैसी 2002 गुजरात दंगे , सोहराबुद्दीन शेख और इशरत की मौत का मामला हमेशा उठाते आए हैं। इनकी यही बातें भारतीय मुसलमानों को अच्छी लगती हैं। उन्हें लगता है कि उनका दर्द कोई तो समझ रहा है।

मुस्लिम विरोधी पार्षद से गोधरा नगर पालिका 2021 में गठबंधन

2021 गोधरा नगर पालिका चुनाव परिणाम के बाद एआईएमआईएम का गठबंधन उस राजू दर्जी से होता है जो फरवरी 2002 साबरमती ट्रेन बर्निंग घटना के बाद मुस्लिमों के खिलाफ झूठी गवाही देता है। और बेकसूर मुस्लिमों के जेल पहुंचाने का कारण बनता है। आप को बता दें 2002 साबरमती ट्रेन बर्निंग केस में राजू दर्जी उन 9 पार्षदों में से एक था। जिसने मुस्लिमों के खिलाफ झूठी गवाही दी थी। राजू दर्जी की गवाही के अनुसार वह ट्रेन बर्निंग वाले दिन गोधरा रेलवे स्टेशन पर कार सेवकों को चाय नाश्ता कराने के लिए उपस्थित था। उसने ट्रेन जलाने वाले मुस्लिमों को देखा था।

राजू दर्जी और अन्य आठ गोधरा नगर पालिका पार्षद अपनी गवाही से 41 मुस्लिमों को आरोपी बनवाते हैं। 2007 में हुए स्टिंग ऑपरेशन कलंक में खुलासा होता है कि दर्जी उस दिन रेलवे स्टेशन पर नहीं था। उसे झूठी गवाही देने के लिए उसके संगठन ने कहा था। अदालत में जब दर्जी से प्लेटफार्म टिकट मांगा गया था तो दर्जी प्लेटफार्म  टिकट बिना गोधरा स्टेशन पर जाने की बात कही थी। अदालत में दर्जी मुस्लिमों पर लगाए आरोप को साबित नहीं कर पाया। कोर्ट ने राजू दर्जी के आगे लिख दिया। “राजनीति से प्रेरित नॉट ट्रू विटनेस”। झूठी गवाही से दर्जनों बेगुनाह मुस्लिमों को सालों जेल में रहना पड़ा।

फरवरी, 2011 में गोधरा ट्रेन बर्निंग घटना को कोर्ट ने अपने निर्णय में pre-planned conspiracy बताया। निचली अदालत से 63 आरोपी छूटते हैं। 31 को अदालत दोषी ठहराते हुए 11 को फांसी की सजा सुनाती है। हालांकि गुजरात हाई कोर्ट 11 लोगों को हुई फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल देती है।

2021 में एआईएमआईएम और निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से गोधरा नगर पालिका का बोर्ड गठबंधन से बनता है। इस गठबंधन में राजू दर्जी भी होता है। असदुद्दीन ओवैसी और अकबरुद्दीन ओवैसी हमेशा 2002 गुजरात दंगे का जिक्र कर मुसलमानों की हमदर्दी तो लेते हैं और गोधरा में राजू दर्जी के साथ गठबंधन भी कर लेते हैं। गठबंधन एक बड़ा निर्णय होता है। जो बिना हाई कमांड की मंजूरी के नहीं हो सकता है। ओवैसी जिन्होंने मुस्लिम राजनीति के ही कारण अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की है। तो गुजरात में राजू दर्जी के साथ गठबंधन कर नगर पालिका में बोर्ड बनाते हैं।

एआईएमआईएम और निर्दलीय पार्षदों का बना बोर्ड 6 महीने भी नहीं चलता है। राजू दर्जी और नगर अध्यक्ष संजय सोनी सहित कई पार्षद बीजेपी में घर वापसी करते हैं तो गोधरा नगर पालिका में एआईएमआईएम नो मोशन भी मूव नहीं करती है। 2002 ट्रेन बर्निंग घटना और उसके बाद हुए दंगों में राजू दर्जी की भूमिका रिकॉर्ड पर है। आशीष खेतान ने अपनी क़िताब Under Cover में भी दर्जी सहित उन 9 पार्षदों द्वारा मुस्लिमों को ट्रेन कांड में झूठी गवाही द्वारा फसाए जाने का उल्लेख है। फिर भी एआईएमआईएम को गठबंधन करने में कोई हिचक नहीं हुई। हैदराबाद के पूर्व मेयर मजीद हुसैन सफाई में कहते हैं। “हमने बीजेपी को रोकने के लिए संजय सोनी को समर्थन दिया था। राजू दर्जी को नहीं।”

एआईएमआईएम गुजरात प्रमुख मोदी और शाह का लाड़ला

एआईएमआईएम गुजरात अध्यक्ष साबिर काबलीवाल कांग्रेस पार्टी से दो बार विधायक रह चुके हैं। 2012 में कांग्रेस ने मोदी और शाह से नजदीकी बढ़ाने के कारण टिकट नहीं दिया था। काबलीवाला के पुत्र के विवाह समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए थे। एक मुस्लिम नेता के यहां शादी समारोह में मोदी का शामिल होना चौंकाने वाला निर्णय था।

एआईएमआईएम गुजरात से कई मुस्लिमों ने काबलीवाला और उनकी पार्टी का साथ छोड़ दिया। क्योंकि काबलीवाला केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संपर्क में रहते हैं। अहमदाबाद शहर मेयर किरीट परमार, गुजरात बीजेपी के खज़ांची और अहमदाबाद नगर निगम के प्रभारी धर्मेंद्र शाह और साबिर काबलीवाला के बीच ठीक चुनाव से पहले एक मीटिंग एआईएमआईएम कार्यालय में हुई। इस मीटिंग के बाद आम आदमी पार्टी ने एआईएमआईएम को भाजपा की B टीम बताते हुए खूब घेरा।

29-30 अक्टूबर को ओवैसी गुजरात दौरे पर थे। 30 अक्तूबर को ओवैसी की अहमदाबाद में प्रेस वार्ता होनी थी। जिसके लिए पत्रकारों को आमंत्रित भी किया गया था। लेकिन तय समय से आधा घंटे पहले प्रेस वार्ता बिना कारण बताए निरस्त कर दी गई। अनुमान यही लगाया गया कि भाजपा नेताओं के साथ कबलीवाला की मीटिंग पर ओवैसी अधिक चर्चा नहीं चाहते हैं। प्रेस वार्ता होती तो धर्मेंद्र शाह पर सवाल होते। इसीलिए वार्ता को ही रद्द कर दिया। हालांकि बापूनगर जन सभा में सफाई देते हुए ओवैसी बोले “आवाम के काम के लिए मेयर से मिलना कुछ गलत नहीं है।” धर्मेंद्र शाह पर कोई सफाई नहीं दी।

ओवैसी चुनाव जीतने के लिए नहीं सिर्फ वोट काटने के लिए लड़ते हैं

2011 की जन गणना के अनुसार गुजरात में मुस्लिम जन संख्या लगभग 58 लाख 47 हज़ार है। जो कुल जनसंख्या के दसवें हिस्से से भी कम है। गुजरात में दो विधानसभा सीटें ( दानी लीमड़ा और जमालपुर) हैं, जहां मुस्लिम मतदाता 50 प्रतिशत से अधिक हैं। यहां मुस्लिम मतदाता अपने बलबूते किसी को भी जिता सकते हैं। एक दरियापुर सीट ऐसी है। जिस सीट पर हिंदू-मुस्लिम वोट लगभग बराबर है। राज्य में लगभग 35 सीटें ऐसी हैं। जहां मुस्लिम मतदाता 20 प्रतिशत से अधिक हैं।

ओवैसी अब तक सबसे अधिक जनसभा उत्तर गुजरात की वडगाम विधान सभा में कर चुके हैं। जो अनुसूचित जाति के लिए एक सुरक्षित सीट है। दलित नेता जिग्नेश मेवानी वडगाम से निर्दलीय विधायक हैं। इस समय वह प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और चुनाव पार्टी चिन्ह पंजे पर लड़ने वाले हैं। 2017 का विधानसभा चुनाव हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर के इर्द गिर्द लड़ा गया था। लेकिन पांच वर्षों में मेवानी को छोड़ कर दोनों नेता बीजेपी के पाले में चले गए हैं। बीजेपी के निशाने पर अब जिग्नेश मेवानी हैं। लोकल मीडिया में खबर चल रही है कि बीजेपी ने जिग्नेश मेवानी को हराने का मास्टर प्लान तैयार कर लिया है। वडगाम विधानसभा में लगभग ढाई लाख मतदाता हैं। जिसमें 70-75000 मतदाता मुस्लिम हैं। दलित मुस्लिम समीकरण ही मेवानी की ताकत है। वडगाम में ओवैसी अब तक तीन जन सभा कर चुके हैं। मालेगांव से मजलिस के विधायक मुफ्ती इस्माइल वडगाम का दौरा कर मुस्लिम संगठनों और उलेमाओं को एआईएमआईएम के पक्ष में खड़े करने का प्रयत्न कर चुके हैं।

उसके उलट एक अन्य सुरक्षित सीट दानी लीमडा जहां 50 प्रतिशत से अधिक मतदाता मुस्लिम हैं। दानी लीमड़ा के मुस्लिम पॉकेट जैसे कि शाह आलम , बॉम्बे होटल और बेहरामपुर में ओवैसी की कोई जनसभा अभी तक नहीं हुई है। ओवैसी देश भर में घूम घूम कर पिराना डंप साइट के बारे में कहते हैं कि “अहमदाबाद के बेहरामपुर में मुस्लिम बस्तियों के बीच पूरे शहर का कचरा फेंका जाता है। जिस वजह से वहां के मुसलमान तरह तरह की बीमारियों पीड़ित हैं।” लेकिन अभी तक ओवैसी उस बस्ती का हाल चाल लेने नहीं गए।

ओवैसी का उद्देश्य मात्र वोट कटवा बने रहना है। इसीलिए सौदेबाजी की राजनीति करते हैं। एआईएमआईएम ने अब तक सूरत की 2 सीट और अहमदाबाद की 3 सीट पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा की है। एआईएमआईएम के घोषित पांच उम्मीदवारों में से 2 उम्मीदवार भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सी आर पाटिल के करीबी बताए जा रहे हैं। ओवैसी 10 से 12 उम्मीदवार घोषित कर सकते हैं।

क्यों मुस्लिमों के शक के घेरे में रहते हैं ओवैसी

•ओवैसी मुस्लिम मुद्दों पर बोलते तो हैं। लेकिन मुस्लिम समस्याओं का हल निकालने का प्रयत्न नहीं करते हैं। मुस्लिम समस्या ओवैसी के लिए मात्र राजनैतिक मुद्दा है।

•ओवैसी की पार्टी हमेशा वोट कटवा साबित होती है। क्योंकि इनकी रणनीति जीतने की नहीं वोट काटने की होती है।

• ओवैसी की पार्टी हवा तो बनाती है। लेकिन धरातल पर इनके पास संगठन नहीं होता है। जिस कारण मात्र वोट कटवा साबित होते हैं।

• उस जगह भी उम्मीदवार खड़े करते हैं। जहां जीतने की कोई गुंजाइश नहीं होती है।

• चुनाव का कीमती समय सौदेबाजी में निकल जाता है।

पिराना डंप साइट की तरह “बिल्किस बानो” भी ओवैसी के लिए मात्र चुनावी मुद्दा

बिल्किस बानो के अपराधियों को जब से सरकार द्वारा छोड़ा गया है। ओवैसी लगातार हर मंच से मुद्दे को उठाते हैं। चुनाव से पहले महिलाओं और मुस्लिमों के बीच बिल्किस बानो एक बड़ा मुद्दा है। सुभाषिनी अली , महुआ मोइत्रा , रेवती लाल और रूप रेखा ने सुप्रीम कोर्ट में बिल्किस के अपराधियों को छोड़े जाने के खिलाफ याचिका दायर की है। सीपीआई की महिला विंग भी सुप्रीम कोर्ट गई है। सोशलिस्ट पार्टी इंडिया इस अन्याय के खिलाफ 9 दिन की पदयात्रा का आयोजन किया था। लेकिन प्रशासन ने 9 दिन की पदयात्रा को सरकारी वाहनों द्वारा पूरा करा दिया। लेकिन ओवैसी ने बिल्किस बानो के मुद्दे को अपने भाषणों तक सीमित रखा। ओवैसी ने न तो कोर्ट जाने में और न ही जमीन पर संघर्ष में कोई दिलचस्पी दिखाई।

क्या ओवैसी कांग्रेस को नुकसान पहुंचा पाएंगे?

2020 बिहार विधान सभा चुनाव में गोपालगंज में एआईएमआईएम अपने उम्मीदवार नहीं उतारती है। कांग्रेस के आसिफ गफूर महागठबंधन के उम्मीदवार होते हैं। गफूर को 36460 वोट मिलते हैं। बीजेपी 77791 वोटों के साथ बंपर जीत हासिल करती है। 2022 उपचुनाव में गठबंधन उम्मीदवार 2000 से भी कम वोटों से हारता है। जबकि ओवैसी की पार्टी से मुस्लिम उम्मीदवार होता है। फिर भी हार जीत का फासला बिल्कुल कम हो गया। अब आम जनता समझ चुकी है कि ओवैसी भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए काम करते हैं।

इसीलिए ओवैसी सेकुलर दलों को अब अधिक नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। ओवैसी के उम्मीदवार के कारण गुजरात में कांग्रेस को नुकसान के बजाय फायदा होगा क्योंकि एआईएमआईएम के मुस्लिम उम्मीदवार के कारण अब हिंदू वोटर कांग्रेस की तरफ घूम जाता है। यह ट्रेंड अहमदाबाद नगर निगम चुनाव के समय देखा गया था। मुस्लिम बहुल दरियापुर में एआईएमआईएम को मुस्लिम वोट मिले लेकिन हिंदू वोटों ने कांग्रेस पैनल के सभी चार उम्मीदवारों को विजयी बना दिया। विधानसभा चुनाव में बापूनगर और दरियापुर में यह ट्रेंड फिर से देखा जा सकता है। ओवैसी पर भाजपा की B टीम का आरोप लगता आया है। गुजरात चुनाव से पहले ही यह सिद्ध हो गया कि ओवैसी भाजपा को फायदा पहुंचाने वाली ही राजनीति करते हैं।

(अहमदाबाद से पत्रकार और एक्टिविस्ट कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट।)

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