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कश्मीरः नेटबंदी इस तरह जन्नत को बदल रही है दोजख में

सुप्रीम कोर्ट के सीधे हस्तक्षेप के बावजूद कश्मीर में इंटरनेट सेवाएं अभी भी बहाल नहीं हो पाई हैं। ज्यादातर इलाकों में ब्रॉडबैंड पांच महीनों (अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने के बाद) से पूरी तरह ठप हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस बाबत महत्वपूर्ण निर्देशों की अवहेलना जारी है। कश्मीर के प्रबुद्ध और आम लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि जिस समीक्षा का आदेश उच्चतम न्यायालय ने सरकार को दिया था, उसकी खानापूरी भी उन्हें कहीं दिखाई नहीं दे रही। सब कुछ जस का तस है।

इस पत्रकार ने कश्मीर में लगाए गए प्रतिबंधों पर समीक्षा और इंटरनेट बहाल करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश तथा दिशा-निर्देश के अर्ध सप्ताह पर कश्मीर में रह रहे कुछ कतिपय लोगों से खास बातचीत की। दिल्ली में सरकार कहीं भी कुछ दावा करे लेकिन कुल मिलाकर जमीनी हकीकत दूसरी है।

फोन पर बातचीत में श्रीनगर में रह रहे सीपीआई, कश्मीर स्टेट काउंसिल के सदस्य मोहम्मद यूसुफ भट्ट कहते हैं, “कुछ सरकारी अस्पतालों और होटलों में इंटरनेट चल रहा है, लेकिन वह भी सुचारू नहीं बल्कि तदर्थ रूप से। यही हाल बैंकों और शिक्षण संस्थानों का है। जहां-जहां इंटरनेट चल रहा है, वहां एजेंसियां बाकायदा निगरानी कर रही हैं। सारा कंट्रोल एजेंसियों के हाथों में है। कश्मीर में कदम-कदम पर इसके प्रमाण आपको मिल जाएंगे। दिखावे के तौर पर ‘कुछ न कुछ’ किया जा रहा है। असल हालात अगस्त सरीखे ही हैं।”

उन्होंने कहा कि लोग बैंक जाकर या एटीएम के जरिए पैसे तो निकलवा सकते हैं, लेकिन अपने मोबाइल के जरिए (ई बैंकिंग द्वारा) कहीं ट्रांसफर नहीं करवा सकते। विद्यार्थी और बेरोजगार ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल न कर पाने के चलते जबरदस्त मुश्किलों में हैं। सुप्रीम कोर्ट के इंटरनेट संबंधी दिए गए दिशा-निर्देश महज कागजों तक महदूद है। कश्मीर उसी तरह लॉक डाउन का सामना करने को मजबूर है। कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

डॉक्टर उमर शाद सलीम यूरोलिस्ट हैं और मुंबई से अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़कर सेवा भावना के साथ श्रीनगर प्रैक्टिस करने आए थे। उनके माता-पिता भी श्रीनगर के ख्यात डॉक्टर हैं। इस डॉक्टर परिवार को लगता है कि कश्मीर इन दिनों दमन और शीत गृह युद्ध के दौर से गुजर रहा है। डॉक्टर उमर साइकिल से श्रीनगर से सटे गांवों में जाकर बीमारों का प्राथमिक उपचार करते हैं और समकालीन कश्मीर से बखूबी वाकिफ हैं।

उनके मुताबिक, “इंटरनेट के अभाव ने कश्मीर में तमाम स्वास्थ्य सुविधाओं को नाकारा कर दिया है। यहां आकर जानिए कि बहुप्रचारित प्रधानमंत्री ‘जन आरोग्य योजना’ किस तरह मृत हो गई है। उसका सिर्फ नाम बचा है। इस योजना के कार्ड स्वाइप नहीं हो पा रहे हैं और मरीज मारे-मारे फिर रहे हैं।”

एक अन्य एमबीबीएस डॉक्टर हसन गिलानी कहते हैं, “बारूदी गोलियों और दहशत से मरने वाले कश्मीरी आज जरूरी दवाइयों के अभाव में दयनीय मौत मर रहे हैं। इसलिए कि दवाइयां और डॉक्टरों के बीच होने वाला चिकित्सीय परामर्श इंटरनेट के जरिए आता-जाता है। सरकारी अस्पतालों में इंटरनेट और ब्रॉडबैंड की सुविधा दी गई है, लेकिन एक डॉक्टर को परामर्श से लेकर बाकी चीजों का आदान-प्रदान इंटरनेट के जरिए करना होता है, जबकि उनके घरों में यह सुविधा अभी भी प्रतिबंधित है।”

उन्होंने बताया कि अब सब कुछ आपके मूल अधिकारों पर नहीं बल्कि सरकारी मनमर्जी तथा अंकुश पर निर्भर है। गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोग व्हाट्सऐप के जरिए डॉक्टर से सलाह नहीं ले सकते। पांच अगस्त के बाद जरूरी इलाज के अभाव में जो मरीज मरे हैं, उनके सही आंकड़े सामने आएं तो इस खौफनाक स्थिति की असली तस्वीर पता चलेगी।

गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर में उच्च पद पर रहे और इंडियन डॉक्टर्स एंड पीस डेवलपमेंट और आईएमए से जुड़े जम्मू-कश्मीर के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने श्रीनगर से फोन पर इस पत्रकार को बताया कि घाटी में इंटरनेट और ब्रॉडबैंड बहाल करने का दावा एक छलावा है। दुनिया के सबसे बड़े इस लॉक डाउन ने आवाम की जिंदगी को और ज्यादा नर्क बना दिया है।

वह कहते हैं, “आज के युग में डॉक्टर सिर्फ किताबी ज्ञान या पुराने अनुभव के आधार पर ही मरीज का इलाज नहीं करते। उन्हें देश-विदेश से नई सूचनाएं भी लाजिमी तौर पर चाहिए होती हैं, जो सिर्फ और सिर्फ इंटरनेट मुहैया करवा सकता है और कश्मीर में यह बाधित है। लंदन से प्रकाशित 200 साल पुराने अति प्रतिष्ठित मेडिकल जनरल ‘लेमट’ ने अपनी एक हालिया विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में लिखा है कि लॉक डाउन के चलते दुनिया में ऐसे हालात पहले कहीं दरपेश नहीं हुए, जैसे आज कश्मीर में हैं।

कुछ अस्पतालों में ब्रॉडबैंड शुरू कर दिए गए हैं लेकिन डॉक्टरों को अध्ययन पद्धति से लेकर मरीजों की कुछ जटिल बीमारियों की रिपोर्ट्स पर घर पर भी मनन-विमर्श करना होता है तथा बाहर के डॉक्टरों से संपर्क करके निष्कर्ष पर पहुंचना होता है।”

उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर प्रतिबंध ने इस सिलसिले को खतरनाक हद तक खत्म कर रखा है। फिलहाल सरकारी दहशत भी इतनी ज्यादा है कि अनेक डॉक्टर इस वजह से सरकार से ब्रॉडबैंड नहीं लेना चाहते कि उनकी एक-एक गतिविधि सरकारी खुर्दबीनी की कैद में आ जाएगी। इंटरनेट स्थगित होने से अस्त–व्यस्त हुई मेडिकल सेवाओं के लिहाज से कश्मीर में हालात यकीनन 1947 से भी बदतर हैं। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं।

सरकारी मेडिकल कॉलेज, श्रीनगर में सेवारत एक डॉक्टर के अनुसार सरकार आखिर इंटरनेट शुरू करने से परहेज क्यों कर रही है। अगर संचार सेवाएं चलती हैं तो लोगों को बुनियादी सुविधाएं तो मिलेंगी ही, वे व्यस्त भी हो जाएंगे और उनकी मानसिक दुश्वारियां भी कम होंगी। इंटरनेट पर पाबंदियां और उसके जरिए सूचनाओं का आदान-प्रदान न होना उन्हें मानसिक रोगी बना रहा है।

सोपोर के एक अध्यापक के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी आम कश्मीरी इंटरनेट सेवाओं से पूरी तरह वंचित हैं। इस आदेश के तीन दिन बाद कुछ सरकारी परीक्षाओं के परिणाम आए तो परीक्षार्थी उन्हें नेट पर नहीं देख पाए। सरकारी जगहों पर लगाए गए सूचनापटों के जरिए उन्हें देखा गया। इसके फोटो मीडिया में भी आए। क्या यह मंजर साबित नहीं करता कि कश्मीर में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी इंटरनेट सेवाएं बंद हैं? एक बैंक कर्मचारी ने बताया कि लोग एटीएम से पैसे निकलवा सकते हैं लेकिन खुद ट्रांजैक्शन नहीं कर सकते। ब्रॉडबैंड भी कुछ जगह काम कर रहे हैं।

कश्मीर के कुछ और लोगों ने बताया कि सरकार जो भी ‘समीक्षा रिपोर्ट’ सुप्रीम कोर्ट में फाइल करे, लेकिन फिलवक्त अगस्त से जारी लॉक डाउन यथावत जारी है। श्रीनगर के एक पत्रकार कहते हैं, “सरकार के भरोसेमंद बड़े अधिकारियों और सुरक्षा एजेंसियों के लोगों को पहले दिन से ही इंटरनेट सेवाएं हासिल हैं। उसके आधार पर शायद आंकड़ें पेश कर दिए जाएं कि इतने ब्रॉडबैंड और इंटरनेट कनेक्शन कश्मीर में काम कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि समीक्षा रिपोर्ट या तो लीपापोती होगी या फिर नयी बहानेबाजियों के साथ और समय मांगा जाएगा। जिन 48 सरकारी अस्पतालों में ब्रॉडबैंड शुरू करने के दावे किए गए हैं उनकी आड़ भी ली जाएगी। वह जोर देकर कहते हैं कि यकीनन ऐसा ही होगा। घाटी के चप्पे-चप्पे पर सरकारी एजेंसियों का कब्जा है।

मोहम्मद यूसुफ भट्ट कहते हैं, “पांच महीने बाद भी कश्मीर खामोश तो है पर सामान्य नहीं। रोजमर्रा की जिंदगी चलाने के लिए छोटे-मोटे कारोबार अथवा दुकानदारी वाले धंधे तो चल रहे हैं लेकिन कश्मीर की आंतरिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ पूरी तरह टूट चुकी है। आज से भी शुरू किया जाए तो इसे ठीक होने में दशकों लग जाएंगे। सरकार न तो खुद कश्मीरियों की आवाज सुनना चाहती है और न किसी को सुनने देना चाहती है। नहीं तो अभी भी इंटरनेट इस तरह बंद करने और इसे लेकर झूठ पर झूठ की क्या वजह है?”

उधर, जम्मू में रहते सीपीआई के राज्य सचिव नरेश मुंशी ने कहा कि जम्मू में भी इंटरनेट को लेकर काफी भ्रम है। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों और अफसरों के ब्रॉडबैंड तथा इंटरनेट तेज गति से चलते हैं, जबकि आम नागरिकों के धीमी रफ्तार से। आम नागरिकों को 2-जी की ही सुविधा हासिल है और उसमें भी अक्सर व्यवधान आता है। कुछ डाउनलोड नहीं हो पाता।

नरेश मुंशी जम्मू के ताजा हालात के बारे में कहते हैं, “पांच अगस्त को जम्मूवासियों में जो लड्डू बांटे गए थे वे अब यहां के बाशिंदों को कड़वे लगने लगे हैं। जम्मू का अधिकांश कारोबार कश्मीर घाटी पर निर्भर था। वहां से जम्मू के व्यापारियों को पैसा मिलना बंद हो गया है और इस खित्ते का बहुत बड़ा तबका अब मानता है कि अनुच्छेद 370 निरस्त करना उनके लिए बहुत ज्यादा नुकसानदेह है। वैसे भी जम्मू को दबाव में लिया गया था।

सरकार यह जानकारी भी छुपा रही है कि पांच अगस्त के बाद जम्मू की कठुआ, पुंछ और राजौरी सीमा पर भारत-पाक के बीच लगातार फायरिंग हो रही है, जिसमें आम नागरिक, महिलाएं और बच्चे तक मारे जा रहे हैं। इसे सरकार जगजाहिर नहीं होने दे रही। समूची कश्मीर घाटी के भीतर तो लावा है ही, जम्मू भी धीरे धीरे और गहरे असंतोष की जद में आ रहा है। हम रोज से फैलते देख और महसूस रहे हैं। जम्मू इलाके में लोग महसूस करने लगे हैं कि धारा 370 का इस तरह रद्द होना उनके लिए भी खासा नागवार है।”

This post was last modified on January 22, 2020 10:07 pm

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